वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः १६ · ३२ श्लोकाःSarga 16 · 32 ślokas

देवताओं का श्रीहरि से रावणवध के लिये मनुष्यरूप में अवतीर्ण होने को कहना, राजा के पुत्रेष्टि यज्ञ में अग्निकुण्ड से प्राजापत्य पुरुष का प्रकट होकर खीर अर्पण करना और उसे खाकर रानियों का गर्भवती होना

Viṣṇu agrees to be born as man; the divine pāyasa, and the queens conceive

दिव्य पायस-दान

“दिव्य पायस-दान”
॥ १ · १६ · ११–२२ ॥

यज्ञाग्नेर्मध्यात् समुत्थितो महातेजाः प्राजापत्यः पुरुषः सुवर्णपात्रीं दिव्यपायसपूर्णां राज्ञे दशरथाय प्रयच्छति। राजा कृताञ्जलिः साश्रुनयनस्तां प्रतिगृह्णाति।

यज्ञ की धधकती ज्वालाओं के बीच से उठा हुआ महातेजस्वी प्राजापत्य पुरुष — सिंह-सी जटाओं और स्वर्ण-आभूषणों वाला — दिव्य खीर से भरी सुवर्ण की पात्री राजा दशरथ की ओर बढ़ा रहा है। वर्षों की प्रतीक्षा आँखों में लिये राजा दोनों हाथ उठाए उसे ग्रहण करते हैं; पीछे धुएँ और दीपों के बीच ऋत्विज् स्तब्ध खड़े हैं।

From the heart of the sacrificial blaze rises the immense Prajapatya being — lion-maned, crimson-clad, hung with gold — holding out the golden vessel of celestial kheer that glows like a captive sun. The aged king receives it with lifted hands and eyes full of decades of waiting, while priests stand awestruck in the smoke and lamplight.

॥ १ · १६ · १ ॥
ततो नारायणो विष्णुर्नियुक्तः सुरसत्तमैः जानन्नपि सुरानेवं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत्

tato nārāyaṇo viṣṇurniyuktaḥ surasattamaiḥ ।
jānannapi surānevaṁ ślakṣṇaṁ vacanamabravīt ॥

तदनन्तर उन श्रेष्ठ देवताओं द्वारा इस प्रकार रावणवध के लिये नियुक्त होने पर सर्वव्यापी नारायण ने रावणवध के उपायों को जानते हुए भी देवताओं से यह मधुर वचन कहा—

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॥ १ · १६ · २ ॥
उपायः को वधे तस्य राक्षसाधिपतेः सुराः यमहं तं समास्थाय निहन्यामृषिकण्टकम्

upāyaḥ ko vadhe tasya rākṣasādhipateḥ surāḥ ।
yamahaṁ taṁ samāsthāya nihanyāmṛṣikaṇṭakam ॥

"देवगण! राक्षसराज रावण के वध के लिये कौन-सा उपाय है, जिसका आश्रय लेकर मैं महर्षियों के लिये कण्टकरूप उस निशाचर का वध करूँ?"

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॥ १ · १६ · ३ ॥
एवमुक्ताः सुराः सर्वे प्रत्यूचुर्विष्णुमव्ययम् मानुषं रूपमास्थाय रावणं जहि संयुगे

evamuktāḥ surāḥ sarve pratyūcurviṣṇumavyayam ।
mānuṣaṁ rūpamāsthāya rāvaṇaṁ jahi saṁyuge ॥

उनके इस तरह पूछने पर सब देवता उन अविनाशी भगवान् विष्णु से बोले — "प्रभो! आप मनुष्य का रूप धारण करके युद्ध में रावण को मार डालिये।"

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॥ १ · १६ · ४ ॥
हि तेपे तपस्तीव्रं दीर्घकालमरिंदम येन तुष्टोऽभवद् ब्रह्मा लोककृल्लोकपूर्वजः

sa hi tepe tapastīvraṁ dīrghakālamariṁdama ।
yena tuṣṭo'bhavad brahmā lokakṛllokapūrvajaḥ ॥

"उस शत्रुदमन निशाचर ने दीर्घकाल तक तीव्र तपस्या की थी, जिससे सब लोगों के पूर्वज लोकस्रष्टा ब्रह्माजी उस पर प्रसन्न हो गये थे।"

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॥ १ · १६ · ५ ॥
संतुष्टः प्रददौ तस्मै राक्षसाय वरं प्रभुः नानाविधेभ्यो भूतेभ्यो भयं नान्यत्र मानुषात्

saṁtuṣṭaḥ pradadau tasmai rākṣasāya varaṁ prabhuḥ ।
nānāvidhebhyo bhūtebhyo bhayaṁ nānyatra mānuṣāt ॥

"उस पर संतुष्ट हुए भगवान् ब्रह्मा ने उस राक्षस को यह वर दिया कि तुम्हें नाना प्रकार के प्राणियों में से मनुष्य के सिवा और किसी से भय नहीं है।"

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॥ १ · १६ · ६ ॥
अवज्ञाता पुरा तेन वरदाने हि मानवाः एवं पितामहात् तस्माद् वरदानेन गर्वितः

avajñātā purā tena varadāne hi mānavāḥ ।
evaṁ pitāmahāt tasmād varadānena garvitaḥ ॥

"पूर्वकाल में वरदान लेते समय उस राक्षस ने मनुष्यों को दुर्बल समझकर उनकी अवहेलना कर दी थी। इस प्रकार पितामह से मिले हुए वरदान के कारण उसका घमण्ड बढ़ गया है।"

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॥ १ · १६ · ७ ॥
उत्सादयति लोकांस्त्रीन् स्त्रियश्चाप्यपकर्षति तस्मात् तस्य वधो दृष्टो मानुषेभ्यः परंतप

utsādayati lokāṁstrīn striyaścāpyapakarṣati ।
tasmāt tasya vadho dṛṣṭo mānuṣebhyaḥ paraṁtapa ॥

"शत्रुओं को संताप देनेवाले देव! वह तीनों लोकों को पीड़ा देता और स्त्रियों का भी अपहरण कर लेता है; अतः उसका वध मनुष्य के हाथ से ही निश्चित हुआ है।"

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॥ १ · १६ · ८ ॥
इत्येतद् वचनं श्रुत्वा सुराणां विष्णुरात्मवान् पितरं रोचयामास तदा दशरथं नृपम्

ityetad vacanaṁ śrutvā surāṇāṁ viṣṇurātmavān ।
pitaraṁ rocayāmāsa tadā daśarathaṁ nṛpam ॥

समस्त जीवात्माओं को वश में रखनेवाले भगवान् विष्णु ने देवताओं की यह बात सुनकर अवतारकाल में राजा दशरथ को ही पिता बनाने की इच्छा की।

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॥ १ · १६ · ९ ॥
चाप्यपुत्रो नृपतिस्तस्मिन् काले महाद्युतिः अयजत् पुत्रियामिष्टिं पुत्रेप्सुररिसूदनः

sa cāpyaputro nṛpatistasmin kāle mahādyutiḥ ।
ayajat putriyāmiṣṭiṁ putrepsurarisūdanaḥ ॥

उसी समय वे शत्रुसूदन महातेजस्वी नरेश पुत्रहीन होने के कारण पुत्रप्राप्ति की इच्छा से पुत्रेष्टि यज्ञ कर रहे थे।

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॥ १ · १६ · १० ॥
कृत्वा निश्चयं विष्णुरामन्त्र्य पितामहम् अन्तर्धानं गतो देवैः पूज्यमानो महर्षिभिः

sa kṛtvā niścayaṁ viṣṇurāmantrya ca pitāmaham ।
antardhānaṁ gato devaiḥ pūjyamāno maharṣibhiḥ ॥

उन्हें पिता बनाने का निश्चय करके भगवान् विष्णु पितामह की अनुमति ले देवताओं और महर्षियों से पूजित हो वहाँ से अन्तर्धान हो गये।

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॥ १ · १६ · ११ ॥
ततो वै यजमानस्य पावकादतुलप्रभम् प्रादुर्भूतं महद् भूतं महावीर्यं महाबलम्

tato vai yajamānasya pāvakādatulaprabham ।
prādurbhūtaṁ mahad bhūtaṁ mahāvīryaṁ mahābalam ॥

तत्पश्चात् पुत्रेष्टि यज्ञ करते हुए राजा दशरथ के यज्ञ में अग्निकुण्ड से एक विशालकाय पुरुष प्रकट हुआ। उसके शरीर में इतना प्रकाश था, जिसकी कहीं तुलना नहीं थी। उसका बल-पराक्रम महान् था।

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॥ १ · १६ · १२ ॥
कृष्णं रक्ताम्बरधरं रक्तास्यं दुन्दुभिस्वनम् स्निग्धहर्यक्षतनुजश्मश्रुप्रवरमूर्धजम्

kṛṣṇaṁ raktāmbaradharaṁ raktāsyaṁ dundubhisvanam ।
snigdhaharyakṣatanujaśmaśrupravaramūrdhajam ॥

उसकी अंगकान्ति काले रंग की थी। उसने अपने शरीर पर लाल वस्त्र धारण कर रखा था। उसका मुख भी लाल ही था। उसकी वाणी से दुन्दुभि के समान गम्भीर ध्वनि प्रकट होती थी। उसके रोम, दाढ़ी-मूँछ और बड़े-बड़े केश चिकने और सिंह के समान थे।

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॥ १ · १६ · १३ ॥
शुभलक्षणसम्पन्नं दिव्याभरणभूषितम् शैलशृंगसमुत्सेधं दृप्तशार्दूलविक्रमम्

śubhalakṣaṇasampannaṁ divyābharaṇabhūṣitam ।
śailaśṛṁgasamutsedhaṁ dṛptaśārdūlavikramam ॥

वह शुभ लक्षणों से सम्पन्न, दिव्य आभूषणों से विभूषित, शैलशिखर के समान ऊँचा तथा गर्वीले सिंह के समान चलनेवाला था।

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॥ १ · १६ · १४ ॥
दिवाकरसमाकारं दीप्तानलशिखोपमम् तप्तजाम्बूनदमयीं राजतान्तपरिच्छदाम्

divākarasamākāraṁ dīptānalaśikhopamam ।
taptajāmbūnadamayīṁ rājatāntaparicchadām ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · १६ · १५ ॥
दिव्यपायससम्पूर्णां पात्रीं पत्नीमिव प्रियाम् प्रगृह्य विपुलां दोर्भ्यां स्वयं मायामयीमिव

divyapāyasasampūrṇāṁ pātrīṁ patnīmiva priyām ।
pragṛhya vipulāṁ dorbhyāṁ svayaṁ māyāmayīmiva ॥

॥ १४–१५ ॥

उसकी आकृति सूर्य के समान तेजोमयी थी। वह प्रज्वलित अग्नि की लपटों के समान देदीप्यमान हो रहा था। उसके हाथ में तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्ण की बनी हुई पात्री थी, जो चाँदी के ढक्कन से ढँकी हुई थी। वह (परात) थाली बहुत बड़ी थी और दिव्य खीर से भरी हुई थी। उसे उस पुरुष ने स्वयं अपनी दोनों भुजाओं पर इस तरह उठा रखा था, मानो कोई रसिक अपनी प्रियतमा पत्नी को अङ्क में लिये हुए हो। वह अद्भुत परात मायामयी-सी जान पड़ती थी।

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॥ १ · १६ · १६ ॥
समवेक्ष्याब्रवीद् वाक्यमिदं दशरथं नृपम् प्राजापत्यं नरं विद्धि मामिहाभ्यागतं नृप

samavekṣyābravīd vākyamidaṁ daśarathaṁ nṛpam ।
prājāpatyaṁ naraṁ viddhi māmihābhyāgataṁ nṛpa ॥

उसने राजा दशरथ की ओर देखकर कहा — "नरेश्वर! मुझे प्रजापतिलोक का पुरुष जानो। मैं प्रजापति की ही आज्ञा से यहाँ आया हूँ।"

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॥ १ · १६ · १७ ॥
ततः परं तदा राजा प्रत्युवाच कृताञ्जलिः भगवन् स्वागतं तेऽस्तु किमहं करवाणि ते

tataḥ paraṁ tadā rājā pratyuvāca kṛtāñjaliḥ ।
bhagavan svāgataṁ te'stu kimahaṁ karavāṇi te ॥

तब राजा दशरथ ने हाथ जोड़कर उससे कहा — "भगवन्! आपका स्वागत है। कहिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?"

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॥ १ · १६ · १८ ॥
अथो पुनरिदं वाक्यं प्राजापत्यो नरोऽब्रवीत् राजन्नर्चयता देवानद्य प्राप्तमिदं त्वया

atho punaridaṁ vākyaṁ prājāpatyo naro'bravīt ।
rājannarcayatā devānadya prāptamidaṁ tvayā ॥

फिर उस प्राजापत्य पुरुष ने पुनः यह बात कही — "राजन्! तुम देवताओं की आराधना करते हो; इसीलिये तुम्हें आज यह वस्तु प्राप्त हुई है।"

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॥ १ · १६ · १९ ॥
इदं तु नृपशार्दूल पायसं देवनिर्मितम् प्रजाकरं गृहाण त्वं धन्यमारोग्यवर्धनम्

idaṁ tu nṛpaśārdūla pāyasaṁ devanirmitam ।
prajākaraṁ gṛhāṇa tvaṁ dhanyamārogyavardhanam ॥

"नृपश्रेष्ठ! यह देवताओं की बनायी हुई खीर है, जो संतान की प्राप्ति करानेवाली है। तुम इसे ग्रहण करो। यह धन और आरोग्य की भी वृद्धि करनेवाली है।"

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॥ १ · १६ · २० ॥
भार्याणामनुरूपाणामश्नीतेति प्रयच्छ वै तासु त्वं लप्स्यसे पुत्रान् यदर्थं यजसे नृप

bhāryāṇāmanurūpāṇāmaśnīteti prayaccha vai ।
tāsu tvaṁ lapsyase putrān yadarthaṁ yajase nṛpa ॥

"राजन्! यह खीर अपनी योग्य पत्नियों को दो और कहो — 'तुमलोग इसे खाओ।' ऐसा करने पर उनके गर्भ से आपको अनेक पुत्रों की प्राप्ति होगी, जिनके लिये तुम यह यज्ञ कर रहे हो।"

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॥ १ · १६ · २१ ॥
तथेति नृपतिः प्रीतः शिरसा प्रतिगृह्य ताम् पात्रीं देवान्नसम्पूर्णां देवदत्तां हिरण्मयीम्

tatheti nṛpatiḥ prītaḥ śirasā pratigṛhya tām ।
pātrīṁ devānnasampūrṇāṁ devadattāṁ hiraṇmayīm ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · १६ · २२ ॥
अभिवाद्य तद्भूतमद्भुतं प्रियदर्शनम् मुदा परमया युक्तश्चकाराभिप्रदक्षिणम्

abhivādya ca tadbhūtamadbhutaṁ priyadarśanam ।
mudā paramayā yuktaścakārābhipradakṣiṇam ॥

॥ २१–२२ ॥

राजा ने प्रसन्नतापूर्वक "बहुत अच्छा" कहकर उस दिव्य पुरुष की दी हुई देवान्न से परिपूर्ण सोने की थाली को लेकर उसे अपने मस्तक पर धारण किया। फिर उस अद्भुत एवं प्रियदर्शन पुरुष को प्रणाम करके बड़े आनन्द के साथ उसकी परिक्रमा की।

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॥ १ · १६ · २३ ॥
ततो दशरथः प्राप्य पायसं देवनिर्मितम् बभूव परमप्रीतः प्राप्य वित्तमिवाधनः

tato daśarathaḥ prāpya pāyasaṁ devanirmitam ।
babhūva paramaprītaḥ prāpya vittamivādhanaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · १६ · २४ ॥
ततस्तदद्भुतप्रख्यं भूतं परमभास्वरम् संवर्तयित्वा तत् कर्म तत्रैवान्तरधीयत

tatastadadbhutaprakhyaṁ bhūtaṁ paramabhāsvaram ।
saṁvartayitvā tat karma tatraivāntaradhīyata ॥

॥ २३–२४ ॥

इस प्रकार देवताओं की बनायी हुई उस खीर को पाकर राजा दशरथ बहुत प्रसन्न हुए, मानो निर्धन को धन मिल गया हो। इसके बाद वह परम तेजस्वी अद्भुत पुरुष अपना वह काम पूरा करके वहीं अन्तर्धान हो गया।

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॥ १ · १६ · २५ ॥
हर्षरश्मिभिरुद्द्योतं तस्यान्तःपुरमाबभौ शारदस्याभिरामस्य चन्द्रस्येव नभोंऽशुभिः

harṣaraśmibhiruddyotaṁ tasyāntaḥpuramābabhau ।
śāradasyābhirāmasya candrasyeva nabhoṁ'śubhiḥ ॥

उस समय राजा के अन्तःपुर की स्त्रियाँ हर्षोल्लास से बढ़ी हुई कान्तिमयी किरणों से प्रकाशित हो ठीक उसी तरह शोभा पाने लगीं, जैसे शरत्काल के नयनाभिराम चन्द्रमा की रम्य रश्मियों से उद्भासित होनेवाला आकाश सुशोभित होता है।

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॥ १ · १६ · २६ ॥
सोऽन्तःपुरं प्रविश्यैव कौसल्यामिदमब्रवीत् पायसं प्रतिगृह्णीष्व पुत्रीयं त्विदमात्मनः

so'ntaḥpuraṁ praviśyaiva kausalyāmidamabravīt ।
pāyasaṁ pratigṛhṇīṣva putrīyaṁ tvidamātmanaḥ ॥

राजा दशरथ वह खीर लेकर अन्तःपुर में गये और कौसल्या से बोले — "देवि! यह अपने लिये पुत्र की प्राप्ति करानेवाली खीर ग्रहण करो।"

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॥ १ · १६ · २७ ॥
कौसल्यायै नरपतिः पायसार्धं ददौ तदा अर्धादर्धं ददौ चापि सुमित्रायै नराधिपः

kausalyāyai narapatiḥ pāyasārdhaṁ dadau tadā ।
ardhādardhaṁ dadau cāpi sumitrāyai narādhipaḥ ॥

ऐसा कहकर नरेश ने उस समय उस खीर का आधा भाग महारानी कौसल्या को दे दिया। फिर बचे हुए आधे का आधा भाग रानी सुमित्रा को अर्पण किया।

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॥ १ · १६ · २८ ॥
कैकेय्यै चावशिष्टार्धं ददौ पुत्रार्थकारणात् प्रददौ चावशिष्टार्धं पायसस्यामृतोपमम्

kaikeyyai cāvaśiṣṭārdhaṁ dadau putrārthakāraṇāt ।
pradadau cāvaśiṣṭārdhaṁ pāyasasyāmṛtopamam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · १६ · २९ ॥
अनुचिन्त्य सुमित्रायै पुनरेव महामतिः एवं तासां ददौ राजा भार्याणां पायसं पृथक्

anucintya sumitrāyai punareva mahāmatiḥ ।
evaṁ tāsāṁ dadau rājā bhāryāṇāṁ pāyasaṁ pṛthak ॥

॥ २८–२९ ॥

उन दोनों को देने के बाद जितनी खीर बच रही, उसका आधा भाग तो उन्होंने पुत्रप्राप्ति के उद्देश्य से कैकेयी को दे दिया। तत्पश्चात् उस खीर का जो अवशिष्ट आधा भाग था, उस अमृतोपम भाग को महाबुद्धिमान् नरेश ने कुछ सोच-विचारकर पुनः सुमित्रा को ही अर्पित कर दिया। इस प्रकार राजा ने अपनी सभी रानियों को अलग-अलग खीर बाँट दी।

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॥ १ · १६ · ३० ॥
ताश्चैवं पायसं प्राप्य नरेन्द्रस्योत्तमस्त्रियः सम्मानं मेनिरे सर्वाः प्रहर्षोदितचेतसः

tāścaivaṁ pāyasaṁ prāpya narendrasyottamastriyaḥ ।
sammānaṁ menire sarvāḥ praharṣoditacetasaḥ ॥

महाराज की उन सभी साध्वी रानियों ने उनके हाथ से वह खीर पाकर अपना सम्मान समझा। उनके चित्त में अत्यन्त हर्षोल्लास छा गया।

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॥ १ · १६ · ३१ ॥
ततस्तु ताः प्राश्य तमुत्तमस्त्रियो महीपतेरुत्तमपायसं पृथक् हुताशनादित्यसमानतेजसोऽचिरेण गर्भान् प्रतिपेदिरे तदा

tatastu tāḥ prāśya tamuttamastriyo mahīpateruttamapāyasaṁ pṛthak ।
hutāśanādityasamānatejaso'cireṇa garbhān pratipedire tadā ॥

उस उत्तम खीर को खाकर महाराज की उन तीनों साध्वी महारानियों ने शीघ्र ही पृथक्-पृथक् गर्भ धारण किया। उनके वे गर्भ अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी थे।

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॥ १ · १६ · ३२ ॥
ततस्तु राजा प्रतिवीक्ष्य ताः स्त्रियः प्ररूढगर्भाः प्रतिलब्धमानसः बभूव हृष्टस्त्रिदिवे यथा हरिः सुरेन्द्रसिद्धर्षिगणाभिपूजितः

tatastu rājā prativīkṣya tāḥ striyaḥ prarūḍhagarbhāḥ pratilabdhamānasaḥ ।
babhūva hṛṣṭastridive yathā hariḥ surendrasiddharṣigaṇābhipūjitaḥ ॥

तदनन्तर अपनी उन रानियों को गर्भवती देख राजा दशरथ को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने समझा, मेरा मनोरथ सफल हो गया। जैसे स्वर्ग में इन्द्र, सिद्ध तथा ऋषियों से पूजित हो श्रीहरि प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार भूतल में देवेन्द्र, सिद्ध तथा महर्षियों से सम्मानित हो राजा दशरथ संतुष्ट हुए थे।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १६ ॥