वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः १५ · ३४ श्लोकाःSarga 15 · 34 ślokas

ऋष्यशृंग द्वारा राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ का आरम्भ, देवताओं की प्रार्थना से ब्रह्माजी का रावण के वध का उपाय ढूँढ़ निकालना तथा भगवान् विष्णु का देवताओं को आश्वासन देना

The putreṣṭi begins; the gods seek Rāvaṇa’s death; Viṣṇu reassures them

देवताओं की विष्णु-प्रार्थना

“देवताओं की विष्णु-प्रार्थना”
॥ १ · १५ · १–२० ॥

क्षीरसमुद्रे शेषनागभोगे शयानो नीलवर्णश्चतुर्भुजो भगवान् विष्णुः — किरीटी मालाधरः शङ्खचक्रधरः प्रशान्तः; पुरतश्चतुर्मुखब्रह्मप्रमुखा देवाः प्राञ्जलयो दशग्रीवस्य वधायावतारं प्रार्थयन्ते; ऊर्ध्वे भीतिदा रावणस्य कृष्णच्छाया।

क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर शयन करते नीलवर्ण चतुर्भुज भगवान् विष्णु — किरीट और माला धारण किये, शंख-चक्रधारी, प्रशान्त; सामने चतुर्मुख ब्रह्मा आदि देवता हाथ जोड़े रावण-वध के लिये अवतार की प्रार्थना कर रहे हैं; ऊपर भय जगाती रावण की दशमुख काली छाया।

In the cosmic milk-ocean Lord Vishnu reclines four-armed upon the coils of the serpent Ananta — blue-complexioned, crowned and garlanded, conch and discus in hand, utterly serene; before him the assembled devas led by four-faced Brahma implore him, palms joined, to descend and slay the tyrant Ravana, whose dark ten-headed shadow looms faint above.

॥ १ · १५ · १ ॥
मेधावी तु ततो ध्यात्वा किंचिदिदमुत्तमम् लब्धसंज्ञस्ततस्तु वेदज्ञो नृपमब्रवीत्

medhāvī tu tato dhyātvā sa kiṁcididamuttamam ।
labdhasaṁjñastatastu sa vedajño nṛpamabravīt ॥

महात्मा ऋष्यशृंग बड़े मेधावी और वेदों के ज्ञाता थे। उन्होंने थोड़ी देर तक ध्यान लगाकर अपने भावी कर्तव्य का निश्चय किया। फिर ध्यान से विरत हो वे राजा से इस प्रकार बोले—

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॥ १ · १५ · २ ॥
इष्टिं तेऽहं करिष्यामि पुत्रीयां पुत्रकारणात् अथर्वशिरसि प्रोक्तैर्मन्त्रैः सिद्धां विधानतः

iṣṭiṁ te'haṁ kariṣyāmi putrīyāṁ putrakāraṇāt ।
atharvaśirasi proktairmantraiḥ siddhāṁ vidhānataḥ ॥

"महाराज! मैं आपको पुत्र की प्राप्ति कराने के लिये अथर्ववेद के मन्त्रों से पुत्रेष्टि नामक यज्ञ करूँगा। वेदोक्त विधि के अनुसार अनुष्ठान करने पर वह यज्ञ अवश्य सफल होगा।"

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॥ १ · १५ · ३ ॥
ततः प्राक्रमदिष्टिं तां पुत्रीयां पुत्रकारणात् जुहाव चाग्नौ तेजस्वी मन्त्रदृष्टेन कर्मणा

tataḥ prākramadiṣṭiṁ tāṁ putrīyāṁ putrakāraṇāt ।
juhāva cāgnau ca tejasvī mantradṛṣṭena karmaṇā ॥

यह कहकर उन तेजस्वी ऋषि ने पुत्रप्राप्ति के उद्देश्य से पुत्रेष्टि नामक यज्ञ प्रारम्भ किया और श्रौतविधि के अनुसार अग्नि में आहुति डाली।

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॥ १ · १५ · ४ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः भागप्रतिग्रहार्थं वै समवेता यथाविधि

tato devāḥ sagandharvāḥ siddhāśca paramarṣayaḥ ।
bhāgapratigrahārthaṁ vai samavetā yathāvidhi ॥

तब देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षिगण विधि के अनुसार अपना-अपना भाग ग्रहण करने के लिये उस यज्ञ में एकत्र हुए।

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॥ १ · १५ · ५ ॥
ताः समेत्य यथान्यायं तस्मिन् सदसि देवताः अब्रुवँल्लोककर्तारं ब्रह्माणं वचनं ततः

tāḥ sametya yathānyāyaṁ tasmin sadasi devatāḥ ।
abruvam̐llokakartāraṁ brahmāṇaṁ vacanaṁ tataḥ ॥

उस यज्ञ-सभा में क्रमशः एकत्र होकर (दूसरों की दृष्टि से अदृश्य रहते हुए) सब देवता लोककर्ता ब्रह्माजी से इस प्रकार बोले—

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॥ १ · १५ · ६ ॥
भगवंस्त्वत्प्रसादेन रावणो नाम राक्षसः सर्वान् नो बाधते वीर्याच्छासितुं तं शक्नुमः

bhagavaṁstvatprasādena rāvaṇo nāma rākṣasaḥ ।
sarvān no bādhate vīryācchāsituṁ taṁ na śaknumaḥ ॥

"भगवन्! रावण नामक राक्षस आपका कृपाप्रसाद पाकर अपने बल से हम सब लोगों को बड़ा कष्ट दे रहा है। हम में इतनी शक्ति नहीं है कि अपने पराक्रम से उसको दबा सकें।"

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॥ १ · १५ · ७ ॥
त्वया तस्मै वरो दत्तः प्रीतेन भगवंस्तदा मानयन्तश्च तं नित्यं सर्वं तस्य क्षमामहे

tvayā tasmai varo dattaḥ prītena bhagavaṁstadā ।
mānayantaśca taṁ nityaṁ sarvaṁ tasya kṣamāmahe ॥

"प्रभो! आपने प्रसन्न होकर उसे वर दे दिया है। तब से हमलोग उस वर का सदा समादर करते हुए उसके सारे अपराधों को सहते चले आ रहे हैं।"

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॥ १ · १५ · ८ ॥
उद्वेजयति लोकांस्त्रीनुच्छ्रितान् द्वेष्टि दुर्मतिः शक्रं त्रिदशराजानं प्रधर्षयितुमिच्छति

udvejayati lokāṁstrīnucchritān dveṣṭi durmatiḥ ।
śakraṁ tridaśarājānaṁ pradharṣayitumicchati ॥

"उसने तीनों लोकों की प्राणियों का नाकोंदम कर रखा है। वह दुष्टात्मा जिनको कुछ ऊँची स्थिति में देखता है, उन्हीं के साथ द्वेष करने लगता है। देवराज इन्द्र को परास्त करने की अभिलाषा रखता है।"

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॥ १ · १५ · ९ ॥
ऋषीन् यक्षान् सगन्धर्वान् ब्राह्मणानसुरांस्तदा अतिक्रामति दुर्धर्षो वरदानेन मोहितः

ṛṣīn yakṣān sagandharvān brāhmaṇānasurāṁstadā ।
atikrāmati durdharṣo varadānena mohitaḥ ॥

"आपके वरदान से मोहित होकर वह इतना उद्दण्ड हो गया है कि ऋषियों, यक्षों, गन्धर्वों, असुरों तथा ब्राह्मणों को पीड़ा देता और उनका अपमान करता फिरता है।"

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॥ १ · १५ · १० ॥
नैनं सूर्यः प्रतपति पार्श्वे वाति मारुतः चलोर्मिमाली तं दृष्ट्वा समुद्रोऽपि कम्पते

nainaṁ sūryaḥ pratapati pārśve vāti na mārutaḥ ।
calormimālī taṁ dṛṣṭvā samudro'pi na kampate ॥

"सूर्य उसको ताप नहीं पहुँचा सकते। वायु उसके पास जोर से नहीं चलती तथा जिसकी उत्ताल तरंगें सदा ऊपर-नीचे होती रहती हैं, वह समुद्र भी रावण को देखकर भय के मारे स्तब्ध-सा हो जाता है — उसमें कम्पन नहीं होता।"

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॥ १ · १५ · ११ ॥
तन्महन्नो भयं तस्माद् राक्षसाद् घोरदर्शनात् वधार्थं तस्य भगवन्नुपायं कर्तुमर्हसि

tanmahanno bhayaṁ tasmād rākṣasād ghoradarśanāt ।
vadhārthaṁ tasya bhagavannupāyaṁ kartumarhasi ॥

"वह राक्षस देखने में ही बड़ा भयंकर है। उससे हमें महान् भय प्राप्त हो रहा है; अतः भगवन्! उसके वध के लिये आपको कोई-न-कोई उपाय अवश्य करना चाहिये।"

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॥ १ · १५ · १२ ॥
एवमुक्तः सुरैः सर्वैश्चिन्तयित्वा ततोऽब्रवीत् हन्तायं विदितस्तस्य वधोपायो दुरात्मनः

evamuktaḥ suraiḥ sarvaiścintayitvā tato'bravīt ।
hantāyaṁ viditastasya vadhopāyo durātmanaḥ ॥

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॥ १ · १५ · १३ ॥
तेन गन्धर्वयक्षाणां देवतानां रक्षसाम् अवध्योऽस्मीति वागुक्ता तथेत्युक्तं तन्मया

tena gandharvayakṣāṇāṁ devatānāṁ ca rakṣasām ।
avadhyo'smīti vāguktā tathetyuktaṁ ca tanmayā ॥

॥ १२–१३ ॥

समस्त देवताओं के ऐसा कहने पर ब्रह्माजी कुछ सोचकर बोले — "देवताओ! लो, उस दुरात्मा के वध का उपाय मेरी समझ में आ गया। उसने वर माँगते समय यह बात कही थी कि मैं गन्धर्व, यक्ष, देवता तथा राक्षसों के हाथ से न मारा जाऊँ। मैंने भी 'तथास्तु' कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।"

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॥ १ · १५ · १४ ॥
नाकीर्तयदवज्ञानात् तद् रक्षो मानुषांस्तदा तस्मात् मानुषाद् वध्यो मृत्युर्नान्योऽस्य विद्यते

nākīrtayadavajñānāt tad rakṣo mānuṣāṁstadā ।
tasmāt sa mānuṣād vadhyo mṛtyurnānyo'sya vidyate ॥

"मनुष्यों को तो वह तुच्छ समझता था, इसलिये उनके प्रति अवहेलना होने के कारण उनसे अवध्य होने का वरदान नहीं माँगा। इसलिये अब मनुष्य के हाथ से ही उसका वध होगा। मनुष्य के सिवा दूसरा कोई उसकी मृत्यु का कारण नहीं है।"

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॥ १ · १५ · १५ ॥
एतच्छ्रुत्वा प्रियं वाक्यं ब्रह्मणा समुदाहृतम् देवा महर्षयः सर्वे प्रहृष्टास्तेऽभवंस्तदा

etacchrutvā priyaṁ vākyaṁ brahmaṇā samudāhṛtam ।
devā maharṣayaḥ sarve prahṛṣṭāste'bhavaṁstadā ॥

ब्रह्माजी की कही हुई यह प्रिय बात सुनकर उस समय समस्त देवता और महर्षि बड़े प्रसन्न हुए।

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॥ १ · १५ · १६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे विष्णुरुपयातो महाद्युतिः शङ्खचक्रगदापाणिः पीतवासा जगत्पतिः

etasminnantare viṣṇurupayāto mahādyutiḥ ।
śaṅkhacakragadāpāṇiḥ pītavāsā jagatpatiḥ ॥

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॥ १ · १५ · १७ ॥
वैनतेयं समारुह्य भास्करस्तोयदं यथा तप्तहाटककेयूरो वन्द्यमानः सुरोत्तमैः ब्रह्मणा समागत्य तत्र तस्थौ समाहितः

vainateyaṁ samāruhya bhāskarastoyadaṁ yathā ।
taptahāṭakakeyūro vandyamānaḥ surottamaiḥ ॥
brahmaṇā ca samāgatya tatra tasthau samāhitaḥ ।

॥ १६–१७ ॥

इसी समय महान् तेजस्वी जगत्पति भगवान् विष्णु भी मेघ के ऊपर स्थित हुए सूर्य की भाँति गरुड़ पर सवार हो वहाँ आ पहुँचे। उनके शरीर पर पीताम्बर और हाथों में शङ्ख, चक्र एवं गदा आदि आयुध शोभा पा रहे थे। उनकी दोनों भुजाओं में तपाये हुए सुवर्ण के बने केयूर प्रकाशित हो रहे थे। उस समय सम्पूर्ण देवताओं ने उनकी वन्दना की और वे ब्रह्माजी से मिलकर सावधानी के साथ सभा में विराजमान हो गये।

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॥ १ · १५ · १८ ॥
तमब्रुवन् सुराः सर्वे समभिष्टूय संनताः त्वां नियोक्ष्यामहे विष्णो लोकानां हितकाम्यया

tamabruvan surāḥ sarve samabhiṣṭūya saṁnatāḥ ॥
tvāṁ niyokṣyāmahe viṣṇo lokānāṁ hitakāmyayā ।

तब समस्त देवताओं ने विनीत भाव से उनकी स्तुति करके कहा — "सर्वव्यापी परमेश्वर! हम तीनों लोकों के हित की कामना से आपके ऊपर एक महान् कार्य का भार दे रहे हैं।"

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॥ १ · १५ · १९ ॥
राज्ञो दशरथस्य त्वमयोध्याधिपतेर्विभो

rājño daśarathasya tvamayodhyādhipatervibho ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · १५ · २० ॥
धर्मज्ञस्य वदान्यस्य महर्षिसमतेजसः अस्य भार्यासु तिसृषु ह्रीश्रीकीर्त्युपमासु

dharmajñasya vadānyasya maharṣisamatejasaḥ ।
asya bhāryāsu tisṛṣu hrīśrīkīrtyupamāsu ca ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · १५ · २१ ॥
विष्णो पुत्रत्वमागच्छ कृत्वाऽऽत्मानं चतुर्विधम् तत्र त्वं मानुषो भूत्वा प्रवृद्धं लोककण्टकम् अवध्यं दैवतैर्विष्णो समरे जहि रावणम्

viṣṇo putratvamāgaccha kṛtvā''tmānaṁ caturvidham ।
tatra tvaṁ mānuṣo bhūtvā pravṛddhaṁ lokakaṇṭakam ॥
avadhyaṁ daivatairviṣṇo samare jahi rāvaṇam ।

॥ १९–२१ ॥

"प्रभो! अयोध्या के राजा दशरथ धर्मज्ञ, उदार तथा महर्षियों के समान तेजस्वी हैं। उनके तीन रानियाँ हैं जो ह्री, श्री और कीर्ति — इन तीन देवियों के समान हैं। विष्णुदेव! आप अपने चार स्वरूप बनाकर राजा की उन तीनों रानियों के गर्भ से पुत्ररूप में अवतार ग्रहण कीजिये। इस प्रकार मनुष्यरूप में प्रकट होकर आप संसार के लिये प्रबल कण्टकरूप रावण को, जो देवताओं के लिये अवध्य है, समरभूमि में मार डालिये।"

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॥ १ · १५ · २२ ॥
हि देवान् सगन्धर्वान् सिद्धांश्च ऋषिसत्तमान् राक्षसो रावणो मूर्खो वीर्योत्द्रेकेण बाधते

sa hi devān sagandharvān siddhāṁśca ṛṣisattamān ॥
rākṣaso rāvaṇo mūrkho vīryotdrekeṇa bādhate ।

"वह मूर्ख राक्षस रावण अपने बढ़े हुए पराक्रम से देवता, गन्धर्व, सिद्ध तथा श्रेष्ठ महर्षियों को बहुत कष्ट दे रहा है।"

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॥ १ · १५ · २३ ॥
ऋषयश्च ततस्तेन गन्धर्वाप्सरसस्तथा क्रीडन्तो नन्दनवने रौद्रेण विनिपातिताः

ṛṣayaśca tatastena gandharvāpsarasastathā ॥
krīḍanto nandanavane raudreṇa vinipātitāḥ ।

"उस रौद्र निशाचर ने ऋषियों को तथा नन्दनवन में क्रीड़ा करनेवाले गन्धर्वों और अप्सराओं को भी स्वर्ग की भूमि पर गिरा दिया है।"

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॥ १ · १५ · २४ ॥
वधार्थं वयमायातास्तस्य वै मुनिभिः सह सिद्धगन्धर्वयक्षाश्च ततस्त्वां शरणं गताः

vadhārthaṁ vayamāyātāstasya vai munibhiḥ saha ॥
siddhagandharvayakṣāśca tatastvāṁ śaraṇaṁ gatāḥ ।

"इसलिये मुनियोंसहित हम सब सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष तथा देवता उसके वध के लिये आपकी शरण में आये हैं।"

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॥ १ · १५ · २५ ॥
त्वं गतिः परमा देव सर्वेषां नः परंतप वधाय देवशत्रूणां नृणां लोके मनः कुरु

tvaṁ gatiḥ paramā deva sarveṣāṁ naḥ paraṁtapa ॥
vadhāya devaśatrūṇāṁ nṛṇāṁ loke manaḥ kuru ।

"शत्रुओं को संताप देनेवाले देव! आप ही हम सब लोगों की परमगति हैं, अतः इन देवद्रोहियों का वध करने के लिये आप मनुष्यलोक में अवतार लेने का निश्चय कीजिये।"

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॥ १ · १५ · २६ ॥
एवं स्तुतस्तु देवेशो विष्णुस्त्रिदशपुंगवः

evaṁ stutastu deveśo viṣṇustridaśapuṁgavaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · १५ · २७ ॥
पितामहपुरोगांस्तान् सर्वलोकनमस्कृतः अब्रवीत् त्रिदशान् सर्वान् समेतान् धर्मसंहितान्

pitāmahapurogāṁstān sarvalokanamaskṛtaḥ ।
abravīt tridaśān sarvān sametān dharmasaṁhitān ॥

॥ २६–२७ ॥

उनके इस प्रकार स्तुति करने पर सर्वलोक-वन्दित देवप्रवर देवाधिदेव भगवान् विष्णु ने वहाँ एकत्र हुए उन समस्त ब्रह्मा आदि धर्मपरायण देवताओं से कहा—

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॥ १ · १५ · २८ ॥
भयं त्यजत भद्रं वो हितार्थं युधि रावणम् सपुत्रपौत्रं सामात्यं समन्त्रिज्ञातिबान्धवम्

bhayaṁ tyajata bhadraṁ vo hitārthaṁ yudhi rāvaṇam ।
saputrapautraṁ sāmātyaṁ samantrijñātibāndhavam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · १५ · २९ ॥
हत्वा क्रूरं दुराधर्षं देवर्षीणां भयावहम् दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि वत्स्यामि मानुषे लोके पालयन् पृथिवीमिमाम्

hatvā krūraṁ durādharṣaṁ devarṣīṇāṁ bhayāvaham ।
daśavarṣasahasrāṇi daśavarṣaśatāni ca ॥
vatsyāmi mānuṣe loke pālayan pṛthivīmimām ।

॥ २८–२९ ॥

"देवगण! तुम्हारा कल्याण हो। तुम भय को त्याग दो। मैं तुम्हारा हित करने के लिये रावण को पुत्र, पौत्र, अमात्य, मन्त्री और बन्धु-बान्धवोंसहित युद्ध में मार डालूँगा। देवताओं तथा ऋषियों को भय देनेवाले उस क्रूर एवं दुर्धर्ष राक्षस का नाश करके मैं ग्यारह हजार वर्षों तक इस पृथ्वी का पालन करता हुआ मनुष्यलोक में निवास करूँगा।"

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॥ १ · १५ · ३० ॥
एवं दत्त्वा वरं देवो देवानां विष्णुरात्मवान् मानुष्ये चिन्तयामास जन्मभूमिमथात्मनः

evaṁ dattvā varaṁ devo devānāṁ viṣṇurātmavān ॥
mānuṣye cintayāmāsa janmabhūmimathātmanaḥ ।

देवताओं को ऐसा वर देकर मनस्वी भगवान् विष्णु ने मनुष्यलोक में पहले अपनी जन्मभूमि के सम्बन्ध में विचार किया।

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॥ १ · १५ · ३१ ॥
ततः पद्मपलाशाक्षः कृत्वाऽऽत्मानं चतुर्विधम् पितरं रोचयामास तदा दशरथं नृपम्

tataḥ padmapalāśākṣaḥ kṛtvā''tmānaṁ caturvidham ॥
pitaraṁ rocayāmāsa tadā daśarathaṁ nṛpam ।

इसके बाद कमलनयन श्रीहरि ने अपने को चार स्वरूपों में प्रकट करके राजा दशरथ को पिता बनाने का निश्चय किया।

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॥ १ · १५ · ३२ ॥
ततो देवर्षिगन्धर्वाः सरुद्राः साप्सरोगणाः स्तुतिभिर्दिव्यरूपाभिस्तुष्टुवुर्मधुसूदनम्

tato devarṣigandharvāḥ sarudrāḥ sāpsarogaṇāḥ ।
stutibhirdivyarūpābhistuṣṭuvurmadhusūdanam ॥

तब देवता, ऋषि, गन्धर्व, रुद्र तथा अप्सराओं ने दिव्य स्तुतियों के द्वारा भगवान् मधुसूदन का स्तवन किया।

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॥ १ · १५ · ३३ ॥
तमुद्धतं रावणमुग्रतेजसं प्रवृद्धदर्पं त्रिदशेश्वरद्विषम् विरावणं साधुतपस्विकण्टकं तपस्विनामुद्धर तं भयावहम्

tamuddhataṁ rāvaṇamugratejasaṁ pravṛddhadarpaṁ tridaśeśvaradviṣam ।
virāvaṇaṁ sādhutapasvikaṇṭakaṁ tapasvināmuddhara taṁ bhayāvaham ॥

वे कहने लगे — "प्रभो! रावण बड़ा उद्दण्ड है। उसका तेज अत्यन्त उग्र और घमण्ड बहुत बढ़ा-चढ़ा है। वह देवराज इन्द्र से सदा द्वेष रखता है। तीनों लोकों को रुलाता है, साधुओं और तपस्वी जनों के लिये तो वह बहुत बड़ा कण्टक है; अतः तापसों को भय देनेवाले उस भयानक राक्षस की आप जड़ उखाड़ डालिये।"

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॥ १ · १५ · ३४ ॥
तमेव हत्वा सबलं सबान्धवं विरावणं रावणमुग्रपौरुषम् स्वर्लोकमागच्छ गतज्वरश्चिरं सुरेन्द्रगुप्तं गतदोषकल्मषम्

tameva hatvā sabalaṁ sabāndhavaṁ virāvaṇaṁ rāvaṇamugrapauruṣam ।
svarlokamāgaccha gatajvaraściraṁ surendraguptaṁ gatadoṣakalmaṣam ॥

"उपेन्द्र! सारे जगत् को रुलानेवाले उस उग्र पराक्रमी रावण को सेना और बन्धु-बान्धवोंसहित नष्ट करके अपनी स्वाभाविक निश्चिन्तता के साथ अपने ही द्वारा सुरक्षित इस चिरन्तन वैकुण्ठधाम में आ जाइये; जिसे राग-द्वेष आदि दोषों का कलुष कभी छू नहीं पाता है।"

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ॥ १५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १५ ॥