वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः २१ · २२ श्लोकाःSarga 21 · 22 ślokas

विश्वामित्र के रोषपूर्ण वचन तथा वसिष्ठ का राजा दशरथ को समझाना

Viśvāmitra’s wrathful words; Vasiṣṭha persuades the king

वसिष्ठ का समाधान

“वसिष्ठ का समाधान”
॥ १ · २१ · १–१८ ॥

मध्ये श्वेतश्मश्रुः पुरोहितो वसिष्ठः करमुत्थाप्य शान्तिं स्थापयति — दक्षिणे महामुनिर्विश्वामित्रोऽद्यापि निगृहीतक्रोधेन ज्वलति, वामे वृद्धो राजा दशरथः शिरो नमयन् सम्मतः कम्पमानश्च; स्वर्णसभा सोत्कण्ठा, प्राज्ञवचोभिः शान्तं संकटम्।

बीच में श्वेत-श्मश्रुधारी पुरोहित वसिष्ठ एक हाथ उठाकर शान्ति स्थापित कर रहे हैं — दाहिनी ओर महामुनि विश्वामित्र अब भी रोके हुए क्रोध से जल रहे हैं, बायीं ओर वृद्ध राजा दशरथ सिर झुकाये, समझाये हुए और काँपते हुए; स्वर्ण-सभा उत्कण्ठा से भरी, प्राज्ञ वचनों से एक संकट शान्त होता हुआ।

At the centre the serene white-bearded priest Vasishtha stands, one hand gently raised, calming the storm — to his right the great sage Vishvamitra still glows with barely-checked wrath, to his left the aged king bows his head, persuaded and trembling — while the golden hall watches in suspense as wise words quiet a dangerous moment.

॥ १ · २१ · १ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य स्नेहपर्याकुलाक्षरम् समन्युः कौशिको वाक्यं प्रत्युवाच महीपतिम्

tacchrutvā vacanaṁ tasya snehaparyākulākṣaram ।
samanyuḥ kauśiko vākyaṁ pratyuvāca mahīpatim ॥

राजा दशरथ की बात के एक-एक अक्षर में पुत्र के प्रति स्नेह भरा हुआ था, उसे सुनकर महर्षि विश्वामित्र कुपित हो उनसे इस प्रकार बोले—

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॥ १ · २१ · २ ॥
पूर्वमर्थं प्रतिश्रुत्य प्रतिज्ञां हातुमिच्छसि राघवाणामयुक्तोऽयं कुलस्यास्य विपर्ययः

pūrvamarthaṁ pratiśrutya pratijñāṁ hātumicchasi ।
rāghavāṇāmayukto'yaṁ kulasyāsya viparyayaḥ ॥

"राजन्! पहले मेरी माँगी हुई वस्तु के देने की प्रतिज्ञा करके अब तुम उसे तोड़ना चाहते हो। प्रतिज्ञा का यह त्याग रघुवंशियों के योग्य तो नहीं है। यह बर्ताव तो इस कुल के विनाश का सूचक है।"

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॥ १ · २१ · ३ ॥
यदीदं ते क्षमं राजन् गमिष्यामि यथागतम् मिथ्याप्रतिज्ञः काकुत्स्थ सुखी भव सुहृद्वृतः

yadīdaṁ te kṣamaṁ rājan gamiṣyāmi yathāgatam ।
mithyāpratijñaḥ kākutstha sukhī bhava suhṛdvṛtaḥ ॥

"नरेश्वर! यदि तुम्हें ऐसा ही उचित प्रतीत होता है तो मैं जैसे आया था, वैसे ही लौट जाऊँगा। ककुत्स्थकुल के रत्न! अब तुम अपनी प्रतिज्ञा झूठी करके हितैषी सुहृदों से घिरे रहकर सुखी रहो।"

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॥ १ · २१ · ४ ॥
तस्य रोषपरीतस्य विश्वामित्रस्य धीमतः चचाल वसुधा कृत्स्ना देवानां भयं महत्

tasya roṣaparītasya viśvāmitrasya dhīmataḥ ।
cacāla vasudhā kṛtsnā devānāṁ ca bhayaṁ mahat ॥

बुद्धिमान् विश्वामित्र के कुपित होते ही सारी पृथ्वी काँप उठी और देवताओं के मन में महान् भय समा गया।

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॥ १ · २१ · ५ ॥
त्रस्तरूपं तु विज्ञाय जगत् सर्वं महानृषिः नृपतिं सुव्रतो धीरो वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्

trastarūpaṁ tu vijñāya jagat sarvaṁ mahānṛṣiḥ ।
nṛpatiṁ suvrato dhīro vasiṣṭho vākyamabravīt ॥

उनके रोष से सारे संसार को त्रस्त हुआ जान उत्तम व्रत का पालन करनेवाले धीरचित्त महर्षि वसिष्ठ ने राजा से इस प्रकार कहा—

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॥ १ · २१ · ६ ॥
इक्ष्वाकूणां कुले जातः साक्षाद् धर्म इवापरः धृतिमान् सुव्रतः श्रीमान् धर्मं हातुमर्हसि

ikṣvākūṇāṁ kule jātaḥ sākṣād dharma ivāparaḥ ।
dhṛtimān suvrataḥ śrīmān na dharmaṁ hātumarhasi ॥

"महाराज! आप इक्ष्वाकुवंशी राजाओं के कुल में साक्षात् दूसरे धर्म के समान उत्पन्न हुए हैं। धैर्यवान्, उत्तम व्रत के पालक तथा श्रीसम्पन्न हैं। आपको अपने धर्म का परित्याग नहीं करना चाहिये।"

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॥ १ · २१ · ७ ॥
त्रिषु लोकेषु विख्यातो धर्मात्मा इति राघवः स्वधर्मं प्रतिपद्यस्व नाधर्मं वोढुमर्हसि

triṣu lokeṣu vikhyāto dharmātmā iti rāghavaḥ ।
svadharmaṁ pratipadyasva nādharmaṁ voḍhumarhasi ॥

"'रघुकुलभूषण दशरथ बड़े धर्मात्मा हैं' यह बात तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। अतः आप अपने धर्म का ही पालन कीजिये; अधर्म का भार सिर पर न उठाइये।"

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॥ १ · २१ · ८ ॥
प्रतिश्रुत्य करिष्यामीत्युक्तं वाक्यमकुर्वतः इष्टापूर्तवधो भूयात् तस्माद् रामं विसर्जय

pratiśrutya kariṣyāmītyuktaṁ vākyamakurvataḥ ।
iṣṭāpūrtavadho bhūyāt tasmād rāmaṁ visarjaya ॥

"'मैं अमुक कार्य करूँगा' — ऐसी प्रतिज्ञा करके भी जो उस वचन का पालन नहीं करता, उसके यज्ञ-यागादि इष्ट तथा बावली-तालाब बनवाने आदि पूर्त कर्मों के पुण्य का नाश हो जाता है, अतः आप श्रीराम को विश्वामित्रजी के साथ भेज दीजिये।"

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॥ १ · २१ · ९ ॥
कृतास्त्रमकृतास्त्रं वा नैनं शक्ष्यन्ति राक्षसाः गुप्तं कुशिकपुत्रेण ज्वलनेनामृतं यथा

kṛtāstramakṛtāstraṁ vā nainaṁ śakṣyanti rākṣasāḥ ।
guptaṁ kuśikaputreṇa jvalanenāmṛtaṁ yathā ॥

"ये अस्त्रविद्या जानते हों या न जानते हों, राक्षस इनका सामना नहीं कर सकते। जैसे प्रज्वलित अग्निद्वारा सुरक्षित अमृत पर कोई हाथ नहीं लगा सकता, उसी प्रकार कुशिकनन्दन विश्वामित्र से सुरक्षित हुए श्रीराम का वे राक्षस कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते।"

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॥ १ · २१ · १० ॥
एष विग्रहवान् धर्म एष वीर्यवतां वरः एष विद्याधिको लोके तपसश्च परायणम्

eṣa vigrahavān dharma eṣa vīryavatāṁ varaḥ ।
eṣa vidyādhiko loke tapasaśca parāyaṇam ॥

"ये श्रीराम तथा महर्षि विश्वामित्र साक्षात् धर्म की मूर्ति हैं। ये बलवानों में श्रेष्ठ हैं। विद्या के द्वारा ही ये संसार में सबसे बढ़े-चढ़े हैं। तपस्या के तो ये विशाल भण्डार ही हैं।"

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॥ १ · २१ · ११ ॥
एषोऽस्त्रान् विविधान् वेत्ति त्रैलोक्ये सचराचरे नैनमन्यः पुमान् वेत्ति वेत्स्यन्ति केचन

eṣo'strān vividhān vetti trailokye sacarācare ।
nainamanyaḥ pumān vetti na ca vetsyanti kecana ॥

"चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकों में जो नाना प्रकार के अस्त्र हैं, उन सबको ये जानते हैं। इन्हें मेरे सिवा दूसरा कोई पुरुष न तो अच्छी तरह जानता है और न कोई जानेंगे ही।"

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॥ १ · २१ · १२ ॥
देवा नर्षयः केचिन्नामरा राक्षसाः गन्धर्वयक्षप्रवराः सकिन्नरमहोरगाः

na devā narṣayaḥ kecinnāmarā na ca rākṣasāḥ ।
gandharvayakṣapravarāḥ sakinnaramahoragāḥ ॥

"देवता, ऋषि, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर तथा बड़े-बड़े नाग भी इनके प्रभाव को नहीं जानते हैं।"

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॥ १ · २१ · १३ ॥
सर्वास्त्राणि कृशाश्वस्य पुत्राः परमधार्मिकाः कौशिकाय पुरा दत्ता यदा राज्यं प्रशासति

sarvāstrāṇi kṛśāśvasya putrāḥ paramadhārmikāḥ ।
kauśikāya purā dattā yadā rājyaṁ praśāsati ॥

"प्रायः सभी अस्त्र प्रजापति कृशाश्व के परम धर्मात्मा पुत्र हैं। उन्हें प्रजापति ने पूर्वकाल में कुशिकनन्दन विश्वामित्र को जब कि वे राज्यशासन करते थे, समर्पित कर दिया था।"

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॥ १ · २१ · १४ ॥
तेऽपि पुत्राः कृशाश्वस्य प्रजापतिसुतासुताः नैकरूपा महावीर्या दीप्तिमन्तो जयावहाः

te'pi putrāḥ kṛśāśvasya prajāpatisutāsutāḥ ।
naikarūpā mahāvīryā dīptimanto jayāvahāḥ ॥

"कृशाश्व के वे पुत्र प्रजापति दक्ष की दो पुत्रियों की संतानें हैं। उनके अनेक रूप हैं। वे सब-के-सब महान् शक्तिशाली, प्रकाशमान और विजय दिलानेवाले हैं।"

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॥ १ · २१ · १५ ॥
जया सुप्रभा चैव दक्षकन्ये सुमध्यमे ते सूतेऽस्त्राणि शस्त्राणि शतं परमभास्वरम्

jayā ca suprabhā caiva dakṣakanye sumadhyame ।
te sūte'strāṇi śastrāṇi śataṁ paramabhāsvaram ॥

"प्रजापति दक्ष की दो सुन्दरी कन्याएँ हैं, उनके नाम हैं जया और सुप्रभा। उन दोनों ने एक सौ परम प्रकाशमान अस्त्र-शस्त्रों को उत्पन्न किया है।"

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॥ १ · २१ · १६ ॥
पञ्चाशतं सुताँल्लेभे जया लब्धवरा वरान् वधायासुरसैन्यानामप्रमेयानरूपिणः

pañcāśataṁ sutām̐llebhe jayā labdhavarā varān ।
vadhāyāsurasainyānāmaprameyānarūpiṇaḥ ॥

"उनमें से जया ने वर पाकर पचास श्रेष्ठ पुत्रों को प्राप्त किया है, जो अपरिमित शक्तिशाली और रूपरहित हैं। वे सब-के-सब असुरों की सेनाओं का वध करने के लिये प्रकट हुए हैं।"

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॥ १ · २१ · १७ ॥
सुप्रभाजनयच्चापि पुत्रान् पञ्चाशतं पुनः संहारान् नाम दुर्धर्षान् दुराक्रामान् बलीयसः

suprabhājanayaccāpi putrān pañcāśataṁ punaḥ ।
saṁhārān nāma durdharṣān durākrāmān balīyasaḥ ॥

"फिर सुप्रभा ने भी संहार नामक पचास पुत्रों को जन्म दिया, जो अत्यन्त दुर्जय हैं। उन पर आक्रमण करना किसी के लिये भी सर्वथा कठिन है तथा वे सब-के-सब अत्यन्त बलिष्ठ हैं।"

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॥ १ · २१ · १८ ॥
तानि चास्त्राणि वेत्त्येष यथावत् कुशिकात्मजः अपूर्वाणां जनने शक्तो भूयश्च धर्मवित्

tāni cāstrāṇi vettyeṣa yathāvat kuśikātmajaḥ ।
apūrvāṇāṁ ca janane śakto bhūyaśca dharmavit ॥

"ये धर्मज्ञ कुशिकनन्दन उन सब अस्त्र-शस्त्रों को अच्छी तरह जानते हैं। जो अस्त्र अब तक उपलब्ध नहीं हुए हैं, उनको भी उत्पन्न करने की इनमें पूर्ण शक्ति है।"

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॥ १ · २१ · १९ ॥
तेनास्य मुनिमुख्यस्य धर्मज्ञस्य महात्मनः किञ्चिदस्त्यविदितं भूतं भव्यं राघव

tenāsya munimukhyasya dharmajñasya mahātmanaḥ ।
na kiñcidastyaviditaṁ bhūtaṁ bhavyaṁ ca rāghava ॥

"रघुनन्दन! इसलिये इन मुनिश्रेष्ठ धर्मज्ञ महात्मा विश्वामित्रजी से भूत या भविष्य की कोई बात छिपी नहीं है।"

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॥ १ · २१ · २० ॥
एवंवीर्यो महातेजा विश्वामित्रो महायशाः रामगमने राजन् संशयं गन्तुमर्हसि

evaṁvīryo mahātejā viśvāmitro mahāyaśāḥ ।
na rāmagamane rājan saṁśayaṁ gantumarhasi ॥

"राजन्! ये महातेजस्वी, महायशस्वी विश्वामित्र ऐसे प्रभावशाली हैं। अतः इनके साथ राम को भेजने में आप किसी प्रकार का संदेह न करें।"

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॥ १ · २१ · २१ ॥
तेषां निग्रहणे शक्तः स्वयं कुशिकात्मजः तव पुत्रहितार्थाय त्वामुपेत्याभियाचते

teṣāṁ nigrahaṇe śaktaḥ svayaṁ ca kuśikātmajaḥ ।
tava putrahitārthāya tvāmupetyābhiyācate ॥

"महर्षि कौशिक स्वयं भी उन राक्षसों का संहार करने में समर्थ हैं; किंतु ये आपके पुत्र का कल्याण करना चाहते हैं, इसीलिये यहाँ आकर आपसे याचना कर रहे हैं।"

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॥ १ · २१ · २२ ॥
इति मुनिवचनात् प्रसन्नचित्तो रघुवृषभश्च मुमोद पार्थिवाग्र्यः गमनमभिरुरोच राघवस्य प्रथितयशाः कुशिकात्मजाय बुद्ध्या

iti munivacanāt prasannacitto raghuvṛṣabhaśca mumoda pārthivāgryaḥ ।
gamanamabhiruroca rāghavasya prathitayaśāḥ kuśikātmajāya buddhyā ॥

महर्षि वसिष्ठ के इस वचन से विख्यात यशवाले रघुकुलशिरोमणि नृपश्रेष्ठ दशरथ का मन प्रसन्न हो गया। वे आनन्दमग्न हो गये और बुद्धि से विचार करने पर विश्वामित्रजी की प्रसन्नता के लिये उनके साथ श्रीराम का जाना उन्हें रुचि के अनुकूल प्रतीत होने लगा।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २१ ॥