वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः २० · २८ श्लोकाःSarga 20 · 28 ślokas

राजा दशरथ का विश्वामित्र को अपना पुत्र देने से इनकार करना और विश्वामित्र का कुपित होना

Daśaratha refuses to give his son; Viśvāmitra’s anger

पुत्र देने से इनकार

“पुत्र देने से इनकार”
॥ १ · २० · १–१६ ॥

वृद्धो राजा दशरथः करौ बद्ध्वा दीनं याचते, प्रियं बालपुत्रं दातुमनिच्छन्, पितृभयव्याकुलमुखः; पुरतो महामुनिर्विश्वामित्रः क्रोधेन ज्वलितुमारभते, उन्नतकायो दीप्तनेत्रः, परितस्तेजःकम्पितं वायुमण्डलम्; मध्ये सभा संकुचति।

वृद्ध राजा दशरथ हाथ जोड़े दीनता से याचना कर रहे हैं, अपने प्रिय बालपुत्र को देने से इनकार करते हुए, मुख पर पिता का भय; सामने महामुनि विश्वामित्र क्रोध से जलने लगते हैं — उन्नत शरीर, दीप्त नेत्र, चारों ओर तेज से काँपता वायुमण्डल; बीच में सारी सभा सिमट जाती है।

The aged King Dasharatha clasps his hands in desperate pleading, refusing to give up his young son, his face all a father's fear; before him the great sage Vishvamitra begins to blaze with anger — drawing himself up, eyes kindling, the very air about him trembling with gathering power — as the court shrinks back between them in the calm before a storm.

॥ १ · २० · १ ॥
तच्छ्रुत्वा राजशार्दूलो विश्वामित्रस्य भाषितम् मुहूर्तमिव निःसंज्ञः संज्ञावानिदमब्रवीत्

tacchrutvā rājaśārdūlo viśvāmitrasya bhāṣitam ।
muhūrtamiva niḥsaṁjñaḥ saṁjñāvānidamabravīt ॥

विश्वामित्रजी का वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ दशरथ दो घड़ी के लिये संज्ञाशून्य-से हो गये। फिर सचेत होकर इस प्रकार बोले—

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॥ १ · २० · २ ॥
ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचनः युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसैः

ūnaṣoḍaśavarṣo me rāmo rājīvalocanaḥ ।
na yuddhayogyatāmasya paśyāmi saha rākṣasaiḥ ॥

"महर्षे! मेरा कमलनयन राम अभी पूरे सोलह वर्ष का भी नहीं हुआ है। मैं इसमें राक्षसों के साथ युद्ध करने की योग्यता नहीं देखता।"

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॥ १ · २० · ३ ॥
इयमक्षौहिणी सेना यस्याहं पतिरीश्वरः अनया सहितो गत्वा योद्धाहं तैर्निशाचरैः

iyamakṣauhiṇī senā yasyāhaṁ patirīśvaraḥ ।
anayā sahito gatvā yoddhāhaṁ tairniśācaraiḥ ॥

"यह मेरी अक्षौहिणी सेना है, जिसका मैं पालक और स्वामी भी हूँ। इस सेना के साथ मैं स्वयं ही चलकर उन निशाचरों के साथ युद्ध करूँगा।"

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॥ १ · २० · ४ ॥
इमे शूराश्च विक्रान्ता भृत्या मेऽस्त्रविशारदाः योग्या रक्षोगणैर्योद्धुं रामं नेतुमर्हसि

ime śūrāśca vikrāntā bhṛtyā me'straviśāradāḥ ।
yogyā rakṣogaṇairyoddhuṁ na rāmaṁ netumarhasi ॥

"ये मेरे शूरवीर सैनिक, जो अस्त्रविद्या में कुशल और पराक्रमी हैं, राक्षसों के साथ जूझने की योग्यता रखते हैं; अतः इन्हें ही ले जाइये; राम को ले जाना उचित नहीं होगा।"

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॥ १ · २० · ५ ॥
अहमेव धनुष्पाणिर्गोप्ता समरमूर्धनि यावत् प्राणान् धरिष्यामि तावद् योत्स्ये निशाचरैः

ahameva dhanuṣpāṇirgoptā samaramūrdhani ।
yāvat prāṇān dhariṣyāmi tāvad yotsye niśācaraiḥ ॥

"मैं स्वयं ही हाथ में धनुष ले युद्ध के मुहाने पर रहकर आपके यज्ञ की रक्षा करूँगा और जब तक इस शरीर में प्राण रहेंगे तब तक निशाचरों के साथ लड़ता रहूँगा।"

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॥ १ · २० · ६ ॥
निर्विघ्ना व्रतचर्या सा भविष्यति सुरक्षिता अहं तत्र गमिष्यामि रामं नेतुमर्हसि

nirvighnā vratacaryā sā bhaviṣyati surakṣitā ।
ahaṁ tatra gamiṣyāmi na rāmaṁ netumarhasi ॥

"मेरे द्वारा सुरक्षित होकर आपका नियमानुष्ठान बिना किसी विघ्न-बाधा के पूर्ण होगा; अतः मैं ही वहाँ आपके साथ चलूँगा। आप राम को न ले जाइये।"

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॥ १ · २० · ७ ॥
बालो ह्यकृतविद्यश्च वेत्ति बलाबलम् चास्त्रबलसंयुक्तो युद्धविशारदः

bālo hyakṛtavidyaśca na ca vetti balābalam ।
na cāstrabalasaṁyukto na ca yuddhaviśāradaḥ ॥

"मेरा राम अभी बालक है। इसने अभी तक युद्ध की विद्या ही नहीं सीखी है। यह दूसरे के बलाबल को नहीं जानता है। न तो यह अस्त्र-बल से सम्पन्न है और न युद्ध की कला में निपुण ही।"

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॥ १ · २० · ८ ॥
चासौ रक्षसां योग्यः कूटयुद्धा हि राक्षसाः विप्रयुक्तो हि रामेण मुहूर्तमपि नोत्सहे

na cāsau rakṣasāṁ yogyaḥ kūṭayuddhā hi rākṣasāḥ ।
viprayukto hi rāmeṇa muhūrtamapi notsahe ॥

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॥ १ · २० · ९ ॥
जीवितुं मुनिशार्दूल रामं नेतुमर्हसि यदि वा राघवं ब्रह्मन् नेतुमिच्छसि सुव्रत चतुरंगसमायुक्तं मया सह तं नय

jīvituṁ muniśārdūla na rāmaṁ netumarhasi ।
yadi vā rāghavaṁ brahman netumicchasi suvrata ॥
caturaṁgasamāyuktaṁ mayā saha ca taṁ naya ।

॥ ८–९ ॥

"अतः यह राक्षसों से युद्ध करने योग्य नहीं है; क्योंकि राक्षस माया से — छल-कपट से युद्ध करते हैं। इसके सिवा राम से वियोग हो जाने पर मैं दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता; मुनिशार्दूल! इसलिये आप राम को न ले जाइये। अथवा ब्रह्मन्! यदि आपकी इच्छा राम को ही ले जाने की हो तो चतुरङ्गिणी सेना के साथ मैं भी चलता हूँ। मेरे साथ इसे ले चलिये।"

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॥ १ · २० · १० ॥
षष्टिर्वर्षसहस्राणि जातस्य मम कौशिक कृच्छ्रेणोत्पादितश्चायं रामं नेतुमर्हसि

ṣaṣṭirvarṣasahasrāṇi jātasya mama kauśika ॥
kṛcchreṇotpāditaścāyaṁ na rāmaṁ netumarhasi ।

"कुशिकनन्दन! मेरी अवस्था साठ हजार वर्ष की हो गयी। इस बुढ़ापे में बड़ी कठिनाइयों से मुझे पुत्रों की प्राप्ति हुई है, अतः आप राम को न ले जाइये।"

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॥ १ · २० · ११ ॥
चतुर्णामात्मजानां हि प्रीतिः परमिका मम ज्येष्ठे धर्मप्रधाने रामं नेतुमर्हसि

caturṇāmātmajānāṁ hi prītiḥ paramikā mama ॥
jyeṣṭhe dharmapradhāne ca na rāmaṁ netumarhasi ।

"धर्मप्रधान राम मेरे चारों पुत्रों में ज्येष्ठ है; इसलिये उस पर मेरा प्रेम सबसे अधिक है; अतः आप राम को न ले जाइये।"

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॥ १ · २० · १२ ॥
किंवीर्या राक्षसास्ते कस्य पुत्राश्च के ते

kiṁvīryā rākṣasāste ca kasya putrāśca ke ca te ॥

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॥ १ · २० · १३ ॥
कथं प्रमाणाः के चैतान् रक्षन्ति मुनिपुंगव कथं प्रतिकर्तव्यं तेषां रामेण रक्षसाम्

kathaṁ pramāṇāḥ ke caitān rakṣanti munipuṁgava ।
kathaṁ ca pratikartavyaṁ teṣāṁ rāmeṇa rakṣasām ॥

॥ १२–१३ ॥

"वे राक्षस कैसे पराक्रमी हैं, किसके पुत्र हैं और कौन हैं? उनका डीलडौल कैसा है? मुनीश्वर! उनकी रक्षा कौन करते हैं? राम उन राक्षसों का सामना कैसे कर सकता है?"

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॥ १ · २० · १४ ॥
मामकैर्वा बलैर्ब्रह्मन् मया वा कूटयोधिनाम् सर्वं मे शंस भगवन् कथं तेषां मया रणे स्थातव्यं दुष्टभावानां वीर्योत्सिक्ता हि राक्षसाः

māmakairvā balairbrahman mayā vā kūṭayodhinām ।
sarvaṁ me śaṁsa bhagavan kathaṁ teṣāṁ mayā raṇe ॥
sthātavyaṁ duṣṭabhāvānāṁ vīryotsiktā hi rākṣasāḥ ।

"ब्रह्मन्! मेरे सैनिकों को या स्वयं मुझे ही उन मायायोधी राक्षसों का प्रतीकार कैसे करना चाहिये? भगवन्! ये सारी बातें आप मुझे बताइये। उन दुष्टों के साथ युद्ध में मुझे कैसे खड़ा होना चाहिये? क्योंकि राक्षस बड़े बलाभिमानी होते हैं।"

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॥ १ · २० · १५ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत

tasya tad vacanaṁ śrutvā viśvāmitro'bhyabhāṣata ॥

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॥ १ · २० · १६ ॥
पौलस्त्यवंशप्रभवो रावणो नाम राक्षसः ब्रह्मणा दत्तवरस्त्रैलोक्यं बाधते भृशम्

paulastyavaṁśaprabhavo rāvaṇo nāma rākṣasaḥ ।
sa brahmaṇā dattavarastrailokyaṁ bādhate bhṛśam ॥

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॥ १ · २० · १७ ॥
महाबलो महावीर्यो राक्षसैर्बहुभिर्वृतः श्रूयते महाराज रावणो राक्षसाधिपः साक्षाद् वैश्रवणभ्राता पुत्रो विश्रवसो मुनेः

mahābalo mahāvīryo rākṣasairbahubhirvṛtaḥ ।
śrūyate ca mahārāja rāvaṇo rākṣasādhipaḥ ॥
sākṣād vaiśravaṇabhrātā putro viśravaso muneḥ ।

॥ १५–१७ ॥

राजा दशरथ की इस बात को सुनकर विश्वामित्रजी बोले — "महाराज! रावण नाम से प्रसिद्ध एक राक्षस है, जो महर्षि पुलस्त्य के कुल में उत्पन्न हुआ है। उसे ब्रह्माजी से मुँहमाँगा वरदान प्राप्त हुआ है; जिससे वह महान् बलशाली और महापराक्रमी होकर बहुसंख्यक राक्षसों से घिरा हुआ वह निशाचर तीनों लोकों के निवासियों को अत्यन्त कष्ट दे रहा है। सुना जाता है कि राक्षसराज रावण विश्रवा मुनि का औरस पुत्र तथा साक्षात् कुबेर का भाई है।"

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॥ १ · २० · १८ ॥
यदा खलु यज्ञस्य विघ्नकर्ता महाबलः

yadā na khalu yajñasya vighnakartā mahābalaḥ ॥

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॥ १ · २० · १९ ॥
तेन संचोदितौ तौ तु राक्षसौ महाबलौ मारीचश्च सुबाहुश्च यज्ञविघ्नं करिष्यतः

tena saṁcoditau tau tu rākṣasau ca mahābalau ।
mārīcaśca subāhuśca yajñavighnaṁ kariṣyataḥ ॥

॥ १८–१९ ॥

"वह महाबली निशाचर इच्छा रहते हुए भी स्वयं आकर यज्ञ में विघ्न नहीं डालता (अपने लिये इसे तुच्छ कार्य समझता है); इसलिये उसीकी प्रेरणा से दो महान् बलवान् राक्षस मारीच और सुबाहु यज्ञों में विघ्न डाला करते हैं।"

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॥ १ · २० · २० ॥
इत्युक्तो मुनिना तेन राजोवाच मुनिं तदा नहि शक्तोऽस्मि संग्रामे स्थातुं तस्य दुरात्मनः

ityukto muninā tena rājovāca muniṁ tadā ।
nahi śakto'smi saṁgrāme sthātuṁ tasya durātmanaḥ ॥

विश्वामित्र मुनि के ऐसा कहने पर राजा दशरथ उनसे इस प्रकार बोले — "मुनिवर! मैं उस दुरात्मा रावण के सामने युद्ध में नहीं ठहर सकता।"

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॥ १ · २० · २१ ॥
त्वं प्रसादं धर्मज्ञ कुरुष्व मम पुत्रके मम चैवाल्पभाग्यस्य दैवतं हि भवान् गुरुः

sa tvaṁ prasādaṁ dharmajña kuruṣva mama putrake ।
mama caivālpabhāgyasya daivataṁ hi bhavān guruḥ ॥

"धर्मज्ञ महर्षे! आप मेरे पुत्र पर तथा मुझ मन्दभागी दशरथ पर भी कृपा कीजिये; क्योंकि आप मेरे देवता तथा गुरु हैं।"

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॥ १ · २० · २२ ॥
देवदानवगन्धर्वा यक्षाः पतगपन्नगाः शक्ता रावणं सोढुं किं पुनर्मानवा युधि

devadānavagandharvā yakṣāḥ patagapannagāḥ ।
na śaktā rāvaṇaṁ soḍhuṁ kiṁ punarmānavā yudhi ॥

"युद्ध में रावण का वेग तो देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, गरुड़ और नाग भी नहीं सह सकते; फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या है।"

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॥ १ · २० · २३ ॥
तु वीर्यवतां वीर्यमादत्ते युधि रावणः तेन चाहं शक्तोऽस्मि संयोद्धुं तस्य वा बलैः सबलो वा मुनिश्रेष्ठ सहितो वा ममात्मजैः

sa tu vīryavatāṁ vīryamādatte yudhi rāvaṇaḥ ।
tena cāhaṁ na śakto'smi saṁyoddhuṁ tasya vā balaiḥ ॥
sabalo vā muniśreṣṭha sahito vā mamātmajaiḥ ।

"मुनिश्रेष्ठ! रावण समराङ्गण में बलवानों के बल का अपहरण कर लेता है, अतः मैं अपनी सेना और पुत्रों के साथ रहकर भी उससे तथा उसके सैनिकों से युद्ध करने में असमर्थ हूँ।"

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॥ १ · २० · २४ ॥
कथमप्यमरप्रख्यं संग्रामाणामकोविदम् बालं मे तनयं ब्रह्मन् नैव दास्यामि पुत्रकम्

kathamapyamaraprakhyaṁ saṁgrāmāṇāmakovidam ॥
bālaṁ me tanayaṁ brahman naiva dāsyāmi putrakam ।

"ब्रह्मन्! यह मेरा देवोपम पुत्र युद्ध की कला से सर्वथा अनभिज्ञ है। इसकी अवस्था भी अभी बहुत थोड़ी है; इसलिये मैं इसे किसी तरह नहीं दूँगा।"

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॥ १ · २० · २५ ॥
अथ कालोपमौ युद्धे सुतौ सुन्दोपसुन्दयोः

atha kālopamau yuddhe sutau sundopasundayoḥ ॥

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॥ १ · २० · २६ ॥
यज्ञविघ्नकरौ तौ ते नैव दास्यामि पुत्रकम् मारीचश्च सुबाहुश्च वीर्यवन्तौ सुशिक्षितौ

yajñavighnakarau tau te naiva dāsyāmi putrakam ।
mārīcaśca subāhuśca vīryavantau suśikṣitau ॥

॥ २५–२६ ॥

"मारीच और सुबाहु सुप्रसिद्ध दैत्य सुन्द और उपसुन्द के पुत्र हैं। वे दोनों युद्ध में यमराज के समान हैं। यदि वे ही आपके यज्ञ में विघ्न डालनेवाले हैं तो मैं उनका सामना करने के लिये अपने पुत्र को नहीं दूँगा; क्योंकि वे दोनों प्रबल पराक्रमी और युद्धविषयक उत्तम शिक्षा से सम्पन्न हैं।"

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॥ १ · २० · २७ ॥
तयोरन्यतरं योद्धुं यास्यामि ससुहृद्गणः अन्यथा त्वनुनेष्यामि भवन्तं सहबान्धवः

tayoranyataraṁ yoddhuṁ yāsyāmi sasuhṛdgaṇaḥ ।
anyathā tvanuneṣyāmi bhavantaṁ sahabāndhavaḥ ॥

"मैं उन दोनों में से किसी एक के साथ युद्ध करने के लिये अपने सुहृदों के साथ चलूँगा; अन्यथा — यदि आप मुझे न ले जाना चाहें तो मैं भाई-बन्धुओंसहित आपसे अनुनय-विनय करूँगा कि आप राम को छोड़ दें।"

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॥ १ · २० · २८ ॥
इति नरपतिजल्पनाद् द्विजेन्द्रं कुशिकसुतं सुमहान् विवेश मन्युः सुहुत इव मखेऽग्निराज्यसिक्तः समभवदुज्ज्वलितो महर्षिवह्निः

iti narapatijalpanād dvijendraṁ kuśikasutaṁ sumahān viveśa manyuḥ ।
suhuta iva makhe'gnirājyasiktaḥ samabhavadujjvalito maharṣivahniḥ ॥

राजा दशरथ के ऐसे वचन सुनकर विप्रवर कुशिकनन्दन विश्वामित्र के मन में महान् क्रोध का आवेश हो आया, जैसे यज्ञशाला में अग्नि को भलीभाँति आहुति देकर घी की धारा से अभिषिक्त कर दिया जाय और वह प्रज्वलित हो उठे, उसी तरह अग्नितुल्य तेजस्वी महर्षि विश्वामित्रजी क्रोध से जल उठे।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे विंशः सर्गः ॥ २० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २० ॥