वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः १९ · २२ श्लोकाःSarga 19 · 22 ślokas

विश्वामित्र के मुख से श्रीराम को साथ ले जाने की माँग सुनकर राजा दशरथ का दुःखित एवं मूर्छित होना

Viśvāmitra asks for Rāma; Daśaratha grieves and faints

दशरथ की मूर्च्छा

“दशरथ की मूर्च्छा”
॥ १ · १९ · १०–२२ ॥

राजसभायामुन्नतस्तेजस्वी मुनिर्विश्वामित्रः स्थिरो भाति, बालं रामं राक्षसवधाय याचितवान्; पुरतो वृद्धो राजा दशरथः शोकभयविह्वलः सिंहासने मूर्च्छितः, कम्पमानेन करेण ललाटं स्पृशन्; सेवका धावन्ति, सभा स्तब्धा।

राजसभा में ऊँचे, तेजस्वी मुनि विश्वामित्र स्थिर खड़े हैं, जिन्होंने अभी बालक राम को राक्षसों से युद्ध के लिये माँगा है; सामने वृद्ध राजा दशरथ शोक और भय से विह्वल सिंहासन पर मूर्च्छित हो गिर पड़े हैं, काँपते हाथ से ललाट थामे; सेवक दौड़ते हैं, सारी सभा स्तब्ध है।

In the royal court the towering, luminous sage Vishvamitra stands firm, having just asked for the boy Rama to fight the demons; before him the aged King Dasharatha reels back stricken, swooning upon his throne, a trembling hand to his brow, his face torn with grief and dread at parting from his beloved child as attendants rush to steady him and the hall falls hushed.

॥ १ · १९ · १ ॥
तच्छ्रुत्वा राजसिंहस्य वाक्यमद्भुतविस्तरम् हृष्टरोमा महातेजा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत

tacchrutvā rājasiṁhasya vākyamadbhutavistaram ।
hṛṣṭaromā mahātejā viśvāmitro'bhyabhāṣata ॥

नृपश्रेष्ठ महाराज दशरथ का यह अद्भुत विस्तार से युक्त वचन सुनकर महातेजस्वी विश्वामित्र पुलकित हो उठे और इस प्रकार बोले।

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॥ १ · १९ · २ ॥
सदृशं राजशार्दूल तवैव भुवि नान्यतः महावंशप्रसूतस्य वसिष्ठव्यपदेशिनः

sadṛśaṁ rājaśārdūla tavaiva bhuvi nānyataḥ ।
mahāvaṁśaprasūtasya vasiṣṭhavyapadeśinaḥ ॥

"राजसिंह! ये बातें आपके ही योग्य हैं। इस पृथ्वी पर दूसरे के मुख से ऐसे उदार वचन निकलने की सम्भावना नहीं है। क्यों न हो, आप महान् कुल में उत्पन्न हैं और वसिष्ठ-जैसे ब्रह्मर्षि आपके उपदेशक हैं।"

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॥ १ · १९ · ३ ॥
यत् तु मे हृद्गतं वाक्यं तस्य कार्यस्य निश्चयम् कुरुष्व राजशार्दूल भव सत्यप्रतिश्रवः

yat tu me hṛdgataṁ vākyaṁ tasya kāryasya niścayam ।
kuruṣva rājaśārdūla bhava satyapratiśravaḥ ॥

"अच्छा, अब जो बात मेरे हृदय में है, उसे सुनिये। नृपश्रेष्ठ! सुनकर उस कार्य को अवश्य पूर्ण करने का निश्चय कीजिये। आपने मेरा कार्य सिद्ध करने की प्रतिज्ञा की है। इस प्रतिज्ञा को सत्य कर दिखाइये।"

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॥ १ · १९ · ४ ॥
अहं नियममातिष्ठे सिद्ध्यर्थं पुरुषर्षभ तस्य विघ्नकरौ द्वौ तु राक्षसौ कामरूपिणौ

ahaṁ niyamamātiṣṭhe siddhyarthaṁ puruṣarṣabha ।
tasya vighnakarau dvau tu rākṣasau kāmarūpiṇau ॥

"पुरुषप्रवर! मैं सिद्धि के लिये एक नियम का अनुष्ठान करता हूँ। उसमें इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले दो राक्षस विघ्न डाल रहे हैं।"

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॥ १ · १९ · ५ ॥
व्रते तु बहुशश्चीर्णे समाप्त्यां राक्षसाविमौ मारीचश्च सुबाहुश्च वीर्यवन्तौ सुशिक्षितौ

vrate tu bahuśaścīrṇe samāptyāṁ rākṣasāvimau ।
mārīcaśca subāhuśca vīryavantau suśikṣitau ॥

"मेरे इस नियम का अधिकांश कार्य पूर्ण हो चुका है। अब उसकी समाप्ति के समय वे दो राक्षस आ धमके हैं। उनके नाम हैं मारीच और सुबाहु। वे दोनों बलवान् और सुशिक्षित हैं।"

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॥ १ · १९ · ६ ॥
तौ मांसरुधिरौघेण वेदिं तामभ्यवर्षताम् अवधूते तथाभूते तस्मिन् नियमनिश्चये कृतश्रमो निरुत्साहस्तस्माद् देशादपाक्रमे

tau māṁsarudhiraugheṇa vediṁ tāmabhyavarṣatām ।
avadhūte tathābhūte tasmin niyamaniścaye ॥
kṛtaśramo nirutsāhastasmād deśādapākrame ।

"उन्होंने मेरी यज्ञवेदी पर रक्त और मांस की वर्षा कर दी है। इस प्रकार उस समाप्तप्राय नियम में विघ्न पड़ जाने के कारण मेरा परिश्रम व्यर्थ गया और मैं उत्साहहीन होकर उस स्थान से चला आया।"

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॥ १ · १९ · ७ ॥
मे क्रोधमुत्स्रष्टुं बुद्धिर्भवति पार्थिव

na ca me krodhamutsraṣṭuṁ buddhirbhavati pārthiva ॥

"पृथ्वीनाथ! उनके ऊपर अपने क्रोध का प्रयोग करूँ — उन्हें शाप दे दूँ, ऐसा विचार मेरे मन में नहीं आता है।"

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॥ १ · १९ · ८ ॥
तथाभूता हि सा चर्या शापस्तत्र मुच्यते स्वपुत्रं राजशार्दूल रामं सत्यपराक्रमम् काकपक्षधरं वीरं ज्येष्ठं मे दातुमर्हसि

tathābhūtā hi sā caryā na śāpastatra mucyate ।
svaputraṁ rājaśārdūla rāmaṁ satyaparākramam ॥
kākapakṣadharaṁ vīraṁ jyeṣṭhaṁ me dātumarhasi ।

"क्योंकि वह नियम ही ऐसा है, जिसका आरम्भ कर देने पर किसी को शाप नहीं दिया जाता; अतः नृपश्रेष्ठ! आप अपने काकपक्षधारी, सत्यपराक्रमी, शूरवीर ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को मुझे दे दें।"

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॥ १ · १९ · ९ ॥
शक्तो ह्येष मया गुप्तो दिव्येन स्वेन तेजसा

śakto hyeṣa mayā gupto divyena svena tejasā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · १९ · १० ॥
राक्षसा ये विकर्तारस्तेषामपि विनाशने श्रेयश्चास्मै प्रदास्यामि बहुरूपं संशयः

rākṣasā ye vikartārasteṣāmapi vināśane ।
śreyaścāsmai pradāsyāmi bahurūpaṁ na saṁśayaḥ ॥

॥ ९–१० ॥

"ये मुझसे सुरक्षित रहकर अपने दिव्य तेज से उन विघ्नकारी राक्षसों का नाश करने में समर्थ हैं। मैं इन्हें अनेक प्रकार का श्रेय प्रदान करूँगा, इसमें संशय नहीं है।"

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॥ १ · १९ · ११ ॥
त्रयाणामपि लोकानां येन ख्यातिं गमिष्यति तौ राममासाद्य स्थातुं शक्तौ कथंचन

trayāṇāmapi lokānāṁ yena khyātiṁ gamiṣyati ॥
na ca tau rāmamāsādya sthātuṁ śaktau kathaṁcana ।

"उस श्रेय को पाकर ये तीनों लोकों में विख्यात होंगे। श्रीराम के सामने आकर वे दोनों राक्षस किसी तरह ठहर नहीं सकते।"

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॥ १ · १९ · १२ ॥
तौ राघवादन्यो हन्तुमुत्सहते पुमान् वीर्योत्सिक्तौ हि तौ पापौ कालपाशवशं गतौ रामस्य राजशार्दूल पर्याप्तौ महात्मनः

na ca tau rāghavādanyo hantumutsahate pumān ।
vīryotsiktau hi tau pāpau kālapāśavaśaṁ gatau ॥
rāmasya rājaśārdūla na paryāptau mahātmanaḥ ।

"इन रघुनन्दन के सिवा दूसरा कोई पुरुष उन राक्षसों को मारने का साहस नहीं कर सकता। नृपश्रेष्ठ! अपने बल का घमण्ड रखनेवाले वे दोनों पापी निशाचर कालपाश के अधीन हो गये हैं; अतः महात्मा श्रीराम के सामने नहीं टिक सकते।"

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॥ १ · १९ · १३ ॥
पुत्रगतं स्नेहं कर्तुमर्हसि पार्थिव अहं ते प्रतिजानामि हतौ तौ विद्धि राक्षसौ

na ca putragataṁ snehaṁ kartumarhasi pārthiva ॥
ahaṁ te pratijānāmi hatau tau viddhi rākṣasau ।

"भूपाल! आप पुत्रविषयक स्नेह को सामने न लाइये। मैं आपसे प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि उन दोनों राक्षसों को इनके हाथ से मरा हुआ ही समझिये।"

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॥ १ · १९ · १४ ॥
अहं वेद्मि महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् वसिष्ठोऽपि महातेजा ये चेमे तपसि स्थिताः

ahaṁ vedmi mahātmānaṁ rāmaṁ satyaparākramam ॥
vasiṣṭho'pi mahātejā ye ceme tapasi sthitāḥ ।

"सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम क्या हैं — यह मैं जानता हूँ। महातेजस्वी वसिष्ठजी तथा ये अन्य तपस्वी भी जानते हैं।"

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॥ १ · १९ · १५ ॥
यदि ते धर्मलाभं तु यशश्च परमं भुवि स्थिरमिच्छसि राजेन्द्र रामं मे दातुमर्हसि

yadi te dharmalābhaṁ tu yaśaśca paramaṁ bhuvi ॥
sthiramicchasi rājendra rāmaṁ me dātumarhasi ।

"राजेन्द्र! यदि आप इस भूमण्डल में धर्म-लाभ और उत्तम यश को स्थिर रखना चाहते हों तो श्रीराम को मुझे दे दीजिये।"

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॥ १ · १९ · १६ ॥
यद्यभ्यनुज्ञां काकुत्स्थ ददते तव मन्त्रिणः वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे ततो रामं विसर्जय

yadyabhyanujñāṁ kākutstha dadate tava mantriṇaḥ ॥
vasiṣṭhapramukhāḥ sarve tato rāmaṁ visarjaya ।

"ककुत्स्थनन्दन! यदि वसिष्ठ आदि आपके सभी मन्त्री आपको अनुमति दें तो आप श्रीराम को मेरे साथ विदा कर दीजिये।"

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॥ १ · १९ · १७ ॥
अभिप्रेतमसंसक्तमात्मजं दातुमर्हसि दशरात्रं हि यज्ञस्य रामं राजीवलोचनम्

abhipretamasaṁsaktamātmajaṁ dātumarhasi ॥
daśarātraṁ hi yajñasya rāmaṁ rājīvalocanam ।

"मुझे राम को ले जाना अभीष्ट है। ये भी बड़े होने के कारण अब आसक्तिरहित हो गये हैं; अतः आप यज्ञ के अवशिष्ट दस दिनों के लिये अपने पुत्र कमलनयन श्रीराम को मुझे दे दीजिये।"

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॥ १ · १९ · १८ ॥
नात्येति कालो यज्ञस्य यथायं मम राघव तथा कुरुष्व भद्रं ते मा शोके मनः कृथाः

nātyeti kālo yajñasya yathāyaṁ mama rāghava ॥
tathā kuruṣva bhadraṁ te mā ca śoke manaḥ kṛthāḥ ।

"रघुनन्दन! आप ऐसा कीजिये जिससे मेरे यज्ञ का समय व्यतीत न हो जाय। आपका कल्याण हो। आप अपने मन को शोक और चिन्ता में न डालिये।"

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॥ १ · १९ · १९ ॥
इत्येवमुक्त्वा धर्मात्मा धर्मार्थसहितं वचः विरराम महातेजा विश्वामित्रो महामतिः

ityevamuktvā dharmātmā dharmārthasahitaṁ vacaḥ ॥
virarāma mahātejā viśvāmitro mahāmatiḥ ।

यह धर्म और अर्थ से युक्त वचन कहकर धर्मात्मा, महातेजस्वी, परमबुद्धिमान् विश्वामित्रजी चुप हो गये।

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॥ १ · १९ · २० ॥
तन्निशम्य राजेन्द्रो विश्वामित्रवचः शुभम् शोकेन महताविष्टश्चचाल मुमोह

sa tanniśamya rājendro viśvāmitravacaḥ śubham ॥
śokena mahatāviṣṭaścacāla ca mumoha ca ।

विश्वामित्र का यह शुभ वचन सुनकर महाराज दशरथ को पुत्र-वियोग की आशङ्का से महान् दुःख हुआ। वे उससे पीड़ित हो सहसा काँप उठे और बेहोश हो गये।

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॥ १ · १९ · २१ ॥
लब्धसंज्ञस्तदोत्थाय व्यषीदत भयान्वितः

labdhasaṁjñastadotthāya vyaṣīdata bhayānvitaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · १९ · २२ ॥
इति हृदयमनोविदारणं मुनिवचनं तदतीव शुश्रुवान् नरपतिरभवन्महान् महात्मा व्यथितमनाः प्रचचाल चासनात्

iti hṛdayamanovidāraṇaṁ munivacanaṁ tadatīva śuśruvān ।
narapatirabhavanmahān mahātmā vyathitamanāḥ pracacāla cāsanāt ॥

॥ २१–२२ ॥

थोड़ी देर बाद जब उन्हें होश हुआ, तब वे भयभीत हो विषाद करने लगे। विश्वामित्र मुनि का वचन राजा के हृदय और मन को विदीर्ण करनेवाला था। उसे सुनकर उनके मन में बड़ी व्यथा हुई। वे महामनस्वी महाराज अपने आसन से विचलित हो मूर्छित हो गये।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥ १९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १९ ॥