वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ४२ · २५ श्लोकाःSarga 42 · 25 ślokas

अंशुमान् और भगीरथ की तपस्या, ब्रह्माजी का भगीरथ को अभीष्ट वर देकर गंगाजी को धारण करने के लिये भगवान् शङ्कर को राजी करने के निमित्त प्रयत्न करने की सलाह देना

भगीरथ-तपस्या

“भगीरथ-तपस्या”
॥ १ · ४२ · १३–१६ ॥

भगीरथः पञ्चाग्निमध्ये ऊर्ध्वबाहुः हिमवच्छिखरे घोरं तपः चरति; उपरि मेघेषु चतुर्मुखो ब्रह्मा प्रसन्नो वरं दातुम् आविर्भवति।

हिमालय के शिखर पर पंचाग्नि के बीच दोनों भुजाएँ ऊपर उठाए वल्कलधारी भगीरथ घोर तपस्या में लीन हैं; उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ऊपर मेघों में चतुर्मुख ब्रह्मा देवताओंसहित प्रकट हुए हैं और हाथ उठाकर वर देने को उद्यत हैं।

On a Himalayan peak, ringed by five fires and arms uplifted, the bark-clad Bhagiratha is sunk in fierce austerity; pleased by his penance, the four-faced Brahma appears amid the clouds above, hand raised, ready to grant his boon.

॥ १ · ४२ · १ ॥
कालधर्मं गते राम सगरे प्रकृतीजनाः राजानं रोचयामासुरंशुमन्तं सुधार्मिकम्

kāladharmaṁ gate rāma sagare prakṛtījanāḥ ।
rājānaṁ rocayāmāsuraṁśumantaṁ sudhārmikam ॥

श्रीराम! सगर की मृत्यु हो जाने पर प्रजाजनों ने परम धर्मात्मा अंशुमान् को राजा बनाने की रुचि प्रकट की।

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॥ १ · ४२ · २ ॥
राजा सुमहानासीदंशुमान् रघुनन्दन तस्य पुत्रो महानासीद् दिलीप इति विश्रुतः

sa rājā sumahānāsīdaṁśumān raghunandana ।
tasya putro mahānāsīd dilīpa iti viśrutaḥ ॥

रघुनन्दन! अंशुमान् बड़े प्रतापी राजा हुए। उनके पुत्र का नाम दिलीप था। वह भी एक महान् पुरुष था।

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॥ १ · ४२ · ३ ॥
तस्मै राज्यं समादिश्य दिलीपे रघुनन्दन हिमवच्छिखरे रम्ये तपस्तेपे सुदारुणम्

tasmai rājyaṁ samādiśya dilīpe raghunandana ।
himavacchikhare ramye tapastepe sudāruṇam ॥

रघुकुल को आनन्दित करनेवाले वीर! अंशुमान् दिलीप को राज्य देकर हिमालय के रमणीय शिखर पर चले गये और वहाँ अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे।

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॥ १ · ४२ · ४ ॥
द्वात्रिंशच्छतसाहस्रं वर्षाणि सुमहायशाः तपोवनगतो राजा स्वर्गं लेभे तपोधनः

dvātriṁśacchatasāhasraṁ varṣāṇi sumahāyaśāḥ ।
tapovanagato rājā svargaṁ lebhe tapodhanaḥ ॥

महान् यशस्वी राजा अंशुमान् ने उस तपोवन में जाकर बत्तीस हजार वर्षों तक तप किया। तपस्या के धन से सम्पन्न हुए उस नरेश ने वहाँ शरीर त्यागकर स्वर्गलोक प्राप्त किया।

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॥ १ · ४२ · ५ ॥
दिलीपस्तु महातेजाः श्रुत्वा पैतामहं वधम् दुःखोपहतया बुद्ध्या निश्चयं नाध्यगच्छत

dilīpastu mahātejāḥ śrutvā paitāmahaṁ vadham ।
duḥkhopahatayā buddhyā niścayaṁ nādhyagacchata ॥

अपने पितामहों के वध का वृत्तान्त सुनकर महातेजस्वी दिलीप भी बहुत दुःखी रहते थे। अपनी बुद्धि से बहुत सोचने-विचारने के बाद भी वे किसी निश्चय पर नहीं पहुँच सके।

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॥ १ · ४२ · ६ ॥
कथं गंगावतरणं कथं तेषां जलक्रिया तारयेयं कथं चैतानिति चिन्तापरोऽभवत्

kathaṁ gaṁgāvataraṇaṁ kathaṁ teṣāṁ jalakriyā ।
tārayeyaṁ kathaṁ caitāniti cintāparo'bhavat ॥

वे सदा इसी चिन्ता में डूबे रहते थे कि किस प्रकार पृथ्वी पर गंगाजी का उतरना सम्भव होगा? कैसे गंगाजलद्वारा उन्हें जलाञ्जलि दी जायेगी और किस प्रकार मैं अपने उन पितरों का उद्धार कर सकूँगा?

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॥ १ · ४२ · ७ ॥
तस्य चिन्तयतो नित्यं धर्मेण विदितात्मनः पुत्रो भगीरथो नाम जज्ञे परमधार्मिकः

tasya cintayato nityaṁ dharmeṇa viditātmanaḥ ।
putro bhagīratho nāma jajñe paramadhārmikaḥ ॥

प्रतिदिन इन्हीं सब चिन्ताओं में पड़े हुए राजा दिलीप को, जो अपने धर्माचरण से बहुत विख्यात थे, भगीरथ नामक एक परम धर्मात्मा पुत्र प्राप्त हुआ।

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॥ १ · ४२ · ८ ॥
दिलीपस्तु महातेजा यज्ञैर्बहुभिरिष्टवान् त्रिंशद्वर्षसहस्राणि राजा राज्यमकारयत्

dilīpastu mahātejā yajñairbahubhiriṣṭavān ।
triṁśadvarṣasahasrāṇi rājā rājyamakārayat ॥

महातेजस्वी दिलीप ने बहुत-से यज्ञों का अनुष्ठान तथा तीस हजार वर्षों तक राज्य किया।

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॥ १ · ४२ · ९ ॥
अगत्वा निश्चयं राजा तेषामुद्धरणं प्रति व्याधिना नरशार्दूल कालधर्ममुपेयिवान्

agatvā niścayaṁ rājā teṣāmuddharaṇaṁ prati ।
vyādhinā naraśārdūla kāladharmamupeyivān ॥

पुरुषसिंह! उन पितरों के उद्धार के विषय में किसी निश्चय को न पहुँचकर राजा दिलीप रोग से पीड़ित हो मृत्यु को प्राप्त हो गये।

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॥ १ · ४२ · १० ॥
इन्द्रलोकं गतो राजा स्वार्जितेनैव कर्मणा राज्ये भगीरथं पुत्रमभिषिच्य नरर्षभः

indralokaṁ gato rājā svārjitenaiva karmaṇā ।
rājye bhagīrathaṁ putramabhiṣicya nararṣabhaḥ ॥

पुत्र भगीरथ को राज्य पर अभिषिक्त करके नरश्रेष्ठ राजा दिलीप अपने किये हुए पुण्यकर्म के प्रभाव से इन्द्रलोक में गये।

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॥ १ · ४२ · ११ ॥
भगीरथस्तु राजर्षिर्धार्मिको रघुनन्दन अनपत्यो महाराजः प्रजाकामः प्रजाः

bhagīrathastu rājarṣirdhārmiko raghunandana ।
anapatyo mahārājaḥ prajākāmaḥ sa ca prajāḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४२ · १२ ॥
मन्त्रिष्वाधाय तद् राज्यं गंगावतरणे रतः तपो दीर्घं समातिष्ठद् गोकर्णे रघुनन्दन

mantriṣvādhāya tad rājyaṁ gaṁgāvataraṇe rataḥ ।
tapo dīrghaṁ samātiṣṭhad gokarṇe raghunandana ॥

॥ ११–१२ ॥

रघुनन्दन! धर्मात्मा राजर्षि महाराज भगीरथ के कोई संतान नहीं थी। वे संतान-प्राप्ति की इच्छा रखते थे तो भी प्रजा और राज्य की रक्षा का भार मन्त्रियों पर रखकर गंगाजी को पृथ्वी पर उतारने के प्रयत्न में लग गये और गोकर्णतीर्थ में बड़ी भारी तपस्या करने लगे।

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॥ १ · ४२ · १३ ॥
ऊर्ध्वबाहुः पञ्चतपा मासाहारो जितेन्द्रियः तस्य वर्षसहस्राणि घोरे तपसि तिष्ठतः अतीतानि महाबाहो तस्य राज्ञो महात्मनः

ūrdhvabāhuḥ pañcatapā māsāhāro jitendriyaḥ ।
tasya varṣasahasrāṇi ghore tapasi tiṣṭhataḥ ॥
atītāni mahābāho tasya rājño mahātmanaḥ ।

महाबाहो! वे अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर पञ्चाग्नि का सेवन करते और इन्द्रियों को काबू में रखकर एक-एक महीने पर आहार ग्रहण करते थे। इस प्रकार घोर तपस्या में लगे हुए महात्मा राजा भगीरथ के एक हजार वर्ष व्यतीत हो गये।

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॥ १ · ४२ · १४ ॥
सुप्रीतो भगवान् ब्रह्मा प्रजानां प्रभुरीश्वरः

suprīto bhagavān brahmā prajānāṁ prabhurīśvaraḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४२ · १५ ॥
ततः सुरगणैः सार्धमुपागम्य पितामहः भगीरथं महात्मानं तप्यमानमथाब्रवीत्

tataḥ suragaṇaiḥ sārdhamupāgamya pitāmahaḥ ।
bhagīrathaṁ mahātmānaṁ tapyamānamathābravīt ॥

॥ १४–१५ ॥

इससे प्रजाओं के स्वामी भगवान् ब्रह्माजी उन पर बहुत प्रसन्न हुए। पितामह ब्रह्मा ने देवताओं के साथ वहाँ आकर तपस्या में लगे हुए महात्मा भगीरथ से इस प्रकार कहा—

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॥ १ · ४२ · १६ ॥
भगीरथ महाराज प्रीतस्तेऽहं जनाधिप तपसा सुतप्तेन वरं वरय सुव्रत

bhagīratha mahārāja prītaste'haṁ janādhipa ।
tapasā ca sutaptena varaṁ varaya suvrata ॥

"महाराज भगीरथ! तुम्हारी इस उत्तम तपस्या से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। श्रेष्ठ व्रत का पालन करनेवाले नरेश्वर! तुम कोई वर माँगो।"

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॥ १ · ४२ · १७ ॥
तमुवाच महातेजाः सर्वलोकपितामहम् भगीरथो महाबाहुः कृताञ्जलिपुटः स्थितः

tamuvāca mahātejāḥ sarvalokapitāmaham ।
bhagīratho mahābāhuḥ kṛtāñjalipuṭaḥ sthitaḥ ॥

तब महातेजस्वी महाबाहु भगीरथ हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गये और उन सर्वलोकपितामह ब्रह्मा से इस प्रकार बोले—

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॥ १ · ४२ · १८ ॥
यदि मे भगवन् प्रीतो यद्यस्ति तपसः फलम् सगरस्यात्मजाः सर्वे मत्तः सलिलमाप्नुयुः

yadi me bhagavan prīto yadyasti tapasaḥ phalam ।
sagarasyātmajāḥ sarve mattaḥ salilamāpnuyuḥ ॥

"भगवन्! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और यदि इस तपस्या का कोई उत्तम फल है तो सगर के सभी पुत्रों को मेरे हाथ से गंगाजी का जल प्राप्त हो।"

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॥ १ · ४२ · १९ ॥
गंगायाः सलिलक्लिन्ने भस्मन्येषां महात्मनाम् स्वर्गं गच्छेयुरत्यन्तं सर्वे प्रपितामहाः

gaṁgāyāḥ salilaklinne bhasmanyeṣāṁ mahātmanām ।
svargaṁ gaccheyuratyantaṁ sarve ca prapitāmahāḥ ॥

"इन महात्माओं की भस्मराशि के गंगाजी के जल से भीग जाने पर मेरे उन सभी प्रपितामहों को अक्षय स्वर्गलोक मिले।"

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॥ १ · ४२ · २० ॥
देव याचे संतत्यै नावसीदेत् कुलं नः इक्ष्वाकूणां कुले देव एष मेऽस्तु वरः परः

deva yāce ha saṁtatyai nāvasīdet kulaṁ ca naḥ ।
ikṣvākūṇāṁ kule deva eṣa me'stu varaḥ paraḥ ॥

"देव! मैं संतति के लिये भी आपसे प्रार्थना करता हूँ। हमारे कुल की परम्परा कभी नष्ट न हो। भगवन्! मेरे द्वारा माँगा हुआ उत्तम वर सम्पूर्ण इक्ष्वाकुवंश के लिये लागू होना चाहिये।"

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॥ १ · ४२ · २१ ॥
उक्तवाक्यं तु राजानं सर्वलोकपितामहः प्रत्युवाच शुभां वाणीं मधुरां मधुराक्षराम्

uktavākyaṁ tu rājānaṁ sarvalokapitāmahaḥ ।
pratyuvāca śubhāṁ vāṇīṁ madhurāṁ madhurākṣarām ॥

राजा भगीरथ के ऐसा कहने पर सर्वलोकपितामह ब्रह्माजी ने मधुर अक्षरोंवाली परम कल्याणमयी मीठी वाणी में कहा—

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॥ १ · ४२ · २२ ॥
मनोरथो महानेष भगीरथ महारथ एवं भवतु भद्रं ते इक्ष्वाकुकुलवर्धन

manoratho mahāneṣa bhagīratha mahāratha ।
evaṁ bhavatu bhadraṁ te ikṣvākukulavardhana ॥

"इक्ष्वाकुवंश की वृद्धि करनेवाले महारथी भगीरथ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारा यह महान् मनोरथ इसी रूप में पूर्ण हो।"

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॥ १ · ४२ · २३ ॥
इयं हैमवती ज्येष्ठा गंगा हिमवतः सुता तां वै धारयितुं राजन् हरस्तत्र नियुज्यताम्

iyaṁ haimavatī jyeṣṭhā gaṁgā himavataḥ sutā ।
tāṁ vai dhārayituṁ rājan harastatra niyujyatām ॥

"राजन्! ये हैं हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री हैमवती गंगाजी। इनको धारण करने के लिये भगवान् शङ्कर को तैयार करो।"

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॥ १ · ४२ · २४ ॥
गंगायाः पतनं राजन् पृथिवी सहिष्यते तां वै धारयितुं राजन् नान्यं पश्यामि शूलिनः

gaṁgāyāḥ patanaṁ rājan pṛthivī na sahiṣyate ।
tāṁ vai dhārayituṁ rājan nānyaṁ paśyāmi śūlinaḥ ॥

"महाराज! गंगाजी के गिरने का वेग यह पृथ्वी नहीं सह सकेगी। मैं त्रिशूलधारी भगवान् शङ्कर के सिवा और किसी को ऐसा नहीं देखता, जो इन्हें धारण कर सके।"

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॥ १ · ४२ · २५ ॥
तमेवमुक्त्वा राजानं गंगां चाभाष्य लोककृत् जगाम त्रिदिवं देवैः सर्वैः सह मरुद्गणैः

tamevamuktvā rājānaṁ gaṁgāṁ cābhāṣya lokakṛt ।
jagāma tridivaṁ devaiḥ sarvaiḥ saha marudgaṇaiḥ ॥

राजा से ऐसा कहकर लोकस्रष्टा ब्रह्माजी ने भगवती गंगा से भी भगीरथ पर अनुग्रह करने के लिये कहा। इसके बाद वे सम्पूर्ण देवताओं तथा मरुद्गणों के साथ स्वर्गलोक को चले गये।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४२ ॥