पितृदेवताओंद्वारा इन्द्रको भेड़ेके अण्डकोषसे युक्त करना तथा भगवान् श्रीरामके द्वारा अहल्याका उद्धार एवं उन दोनों दम्पतिके द्वारा इनका सत्कार
“अहल्या-उद्धार”
॥ १ · ४९ · १३–१७ ॥
गौतमस्य सूने आश्रमे तपोदीप्ता अहल्या जानुभ्यां स्थित्वा बद्धाञ्जलिः नीलवर्णं रामम् ईक्षते, यस्य दर्शनात् सा शापमुक्ता; पार्श्वे लक्ष्मणः विश्वामित्रः गौतमश्च।
महर्षि गौतम के सूने आश्रम में तपस्या से देदीप्यमान अहल्या घुटनों के बल बैठीं, हाथ जोड़े नीलवर्ण श्रीराम की ओर देख रही हैं, जिनके दर्शनमात्र से उनका शाप मिट गया; पास ही धनुर्धारी लक्ष्मण, विश्वामित्र और लौटते महर्षि गौतम खड़े हैं।
In Gautama's deserted hermitage the penance-radiant Ahalya kneels with palms joined, gazing up at the blue-hued Rama whose mere sight has lifted her curse; beside them stand the bow-bearing Lakshmana, Vishvamitra, and the returning sage Gautama.
aphalastu tataḥ śakro devānagnipurogamān ।
abravīt trastanayanaḥ siddhagandharvacāraṇān ॥
तदनन्तर इन्द्र अण्डकोष से रहित होकर बहुत डर गये। उनके नेत्रों में त्रास छा गया। वे अग्नि आदि देवताओं, सिद्धों, गन्धर्वों और चारणों से इस प्रकार बोले—
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kurvatā tapaso vighnaṁ gautamasya mahātmanaḥ ।
krodhamutpādya hi mayā surakāryamidaṁ kṛtam ॥
"देवताओ! महात्मा गौतम की तपस्या में विघ्न डालने के लिये मैंने उन्हें क्रोध दिलाया है। ऐसा करके मैंने यह देवताओं का कार्य ही सिद्ध किया है।"
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aphalo'smi kṛtastena krodhāt sā ca nirākṛtā ।
śāpamokṣeṇa mahatā tapo'syāpahataṁ mayā ॥
"मुनि ने क्रोधपूर्वक भारी शाप देकर मुझे अण्डकोष से रहित कर दिया और अपनी पत्नी का भी परित्याग कर दिया। इससे मेरे द्वारा उनकी तपस्या का अपहरण हुआ है।"
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tanmāṁ suravarāḥ sarve sarṣisaṅghāḥ sacāraṇāḥ ।
surakāryakaraṁ yūyaṁ saphalaṁ kartumarhatha ॥
"(यदि मैं उनकी तपस्या में विघ्न नहीं डालता तो वे देवताओं का राज्य ही छीन लेते। अतः ऐसा करके) मैंने देवताओं का ही कार्य सिद्ध किया है। इसलिये श्रेष्ठ देवताओ! तुम सब लोग, ऋषिसमुदाय और चारणगण मिलकर मुझे अण्डकोष से युक्त करने का प्रयत्न करो।"
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śatakratorvacaḥ śrutvā devāḥ sāgnipurogamāḥ ।
pitṛdevānupetyāhuḥ sarve saha marudgaṇaiḥ ॥
इन्द्र का यह वचन सुनकर मरुद्गणोंसहित अग्नि आदि समस्त देवता कव्यवाहन आदि पितृदेवताओं के पास जाकर बोले—
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ayaṁ meṣaḥ savṛṣaṇaḥ śakro hyavṛṣaṇaḥ kṛtaḥ ।
meṣasya vṛṣaṇau gṛhya śakrāyāśu prayacchata ॥
"पितृगण! यह आपका भेड़ा अण्डकोष से युक्त है और इन्द्र अण्डकोषरहित कर दिये गये हैं। अतः इस भेड़े के दोनों अण्डकोषों को लेकर आप शीघ्र ही इन्द्र को अर्पित कर दें।"
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aphalastu kṛto meṣaḥ parāṁ tuṣṭiṁ pradāsyati ।
bhavatāṁ harṣaṇārthaṁ ca ye ca dāsyanti mānavāḥ ।
akṣayaṁ hi phalaṁ teṣāṁ yūyaṁ dāsyatha puṣkalam ॥
"अण्डकोष से रहित किया हुआ यह भेड़ा इसी स्थान में आपलोगों को परम संतोष प्रदान करेगा। अतः जो मनुष्य आपलोगों की प्रसन्नता के लिये अण्डकोषरहित भेड़ा दान करेंगे, उन्हें आपलोग उस दान का उत्तम एवं पूर्ण फल प्रदान करेंगे।"
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agnestu vacanaṁ śrutvā pitṛdevāḥ samāgatāḥ ।
utpāṭya meṣavṛṣaṇau sahasrākṣe nyaveśayan ॥
अग्नि की यह बात सुनकर पितृदेवताओं ने एकत्र हो भेड़े के अण्डकोषों को उखाड़कर इन्द्र के शरीर में उचित स्थान पर जोड़ दिया।
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tadāprabhṛti kākutstha pitṛdevāḥ samāgatāḥ ।
aphalān bhuñjate meṣān phalaisteṣāmayojayan ॥
ककुत्स्थनन्दन श्रीराम! तभी से वहाँ आये हुए समस्त पितृ-देवता अण्डकोषरहित भेड़ों को ही उपयोग में लाते हैं और दाताओं को उनके दानजनित फलों के भागी बनाते हैं।
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indrastu meṣavṛṣaṇastadāprabhṛti rāghava ।
gautamasya prabhāveṇa tapasā ca mahātmanaḥ ॥
रघुनन्दन! उसी समय से महात्मा गौतम के तपस्याजनित प्रभाव से इन्द्र को भेड़ों के अण्डकोष धारण करने पड़े।
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tadāgaccha mahāteja āśramaṁ puṇyakarmaṇaḥ ।
tārayaināṁ mahābhāgāmahalyāṁ devarūpiṇīm ॥
महातेजस्वी श्रीराम! अब तुम पुण्यकर्मा महर्षि गौतम के इस आश्रम पर चलो और इन देवरूपिणी महाभागा अहल्या का उद्धार करो।
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viśvāmitravacaḥ śrutvā rāghavaḥ sahalakṣmaṇaḥ ।
viśvāmitraṁ puraskṛtya āśramaṁ praviveśa ha ॥
विश्वामित्रजी का यह वचन सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीराम ने उन महर्षि को आगे करके उस आश्रम में प्रवेश किया।
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dadarśa ca mahābhāgāṁ tapasā dyotitaprabhām ।
lokairapi samāgamya durnirīkṣyāṁ surāsuraiḥ ॥
वहाँ जाकर उन्होंने देखा—महासौभाग्यशालिनी अहल्या अपनी तपस्या से देदीप्यमान हो रही हैं। इस लोक के मनुष्य तथा सम्पूर्ण देवता और असुर भी वहाँ आकर उन्हें देख नहीं सकते थे।
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prayatnānnirmitāṁ dhātrā divyāṁ māyāmayīmiva ।
dhūmenābhiparītāṁgīṁ dīptāmagniśikhāmiva ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
satuṣārāvṛtāṁ sābhrāṁ pūrṇacandraprabhāmiva ।
madhye'mbhaso durādharṣāṁ dīptāṁ sūryaprabhāmiva ॥
उनका स्वरूप दिव्य था। विधाता ने बड़े प्रयत्न से उनके अंगों का निर्माण किया था। वे मायामयी-सी प्रतीत होती थीं। धूम से घिरी हुई प्रज्वलित अग्निशिखा-सी जान पड़ती थीं। ओले और बादलों से ढकी हुई पूर्ण चन्द्रमा की प्रभा-सी दिखायी देती थीं तथा जल के भीतर उद्भासित होनेवाली सूर्य की दुर्धर्ष प्रभा के समान दृष्टिगोचर होती थीं।
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sā hi gautamavākyena durnirīkṣyā babhūva ha ।
trayāṇāmapi lokānāṁ yāvad rāmasya darśanam ।
śāpasyāntamupāgamya teṣāṁ darśanamāgatā ॥
गौतम के शापवश श्रीरामचन्द्रजी का दर्शन होने से पहले तीनों लोकों के किसी भी प्राणी के लिये उनका दर्शन होना कठिन था। श्रीराम का दर्शन मिल जाने से जब उनके शाप का अन्त हो गया, तब वे उन सबको दिखायी देने लगीं।
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rāghavau tu tadā tasyāḥ pādau jagṛhaturmudā ।
smarantī gautamavacaḥ pratijagrāha sā hi tau ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
pādyamarghyaṁ tathā''tithyaṁ cakāra susamāhitā ।
pratijagrāha kākutstho vidhidṛṣṭena karmaṇā ॥
उस समय श्रीराम और लक्ष्मण ने बड़ी प्रसन्नता के साथ अहल्या के दोनों चरणों का स्पर्श किया। महर्षि गौतम के वचनों का स्मरण करके अहल्या ने बड़ी सावधानी के साथ उन दोनों भाइयों को आदरणीय अतिथि के रूप में अपनाया और पाद्य, अर्घ्य आदि अर्पित करके उनका आतिथ्य-सत्कार किया। श्रीरामचन्द्रजी ने शास्त्रीय विधि के अनुसार अहल्या का वह आतिथ्य ग्रहण किया।
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puṣpavṛṣṭirmahatyāsīd devadundubhiniḥsvanaiḥ ।
gandharvāpsarasāṁ caiva mahānāsīt samutsavaḥ ॥
उस समय देवताओं की दुन्दुभि बज उठी। साथ ही आकाश से फूलों की बड़ी भारी वर्षा होने लगी। गन्धर्वों और अप्सराओंद्वारा महान् उत्सव मनाया जाने लगा।
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sādhu sādhviti devāstāmahalyāṁ samapūjayan ।
tapobalaviśuddhāṁgīṁ gautamasya vaśānugām ॥
महर्षि गौतम के अधीन रहनेवाली अहल्या अपनी तपःशक्ति से विशुद्ध स्वरूप को प्राप्त हुई—यह देख सम्पूर्ण देवता उन्हें साधुवाद देते हुए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।
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gautamo'pi mahātejā ahalyāsahitaḥ sukhī ।
rāmaṁ sampūjya vidhivat tapastepe mahātapāḥ ॥
महातेजस्वी, महातपस्वी गौतम भी अहल्या को अपने साथ पाकर सुखी हो गये। उन्होंने श्रीराम की विधिवत् पूजा करके तपस्या आरम्भ की।
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rāmo'pi paramāṁ pūjāṁ gautamasya mahāmuneḥ ।
sakāśād vidhivat prāpya jagāma mithilāṁ tataḥ ॥
महामुनि गौतम की ओर से विधिपूर्वक उत्तम पूजा-आदर-सत्कार पाकर श्रीराम भी मुनिवर विश्वामित्रजी के साथ मिथिलापुरी को चले गये।
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः ॥ ४९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४९ ॥