वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ५७ · २२ श्लोकाःSarga 57 · 22 ślokas

विश्वामित्रकी तपस्या, राजा त्रिशंकुका अपना यज्ञ करानेके लिये पहले वसिष्ठजीसे प्रार्थना करना और उनके इन्कार कर देनेपर उन्हींके पुत्रोंकी शरणमें जाना

त्रिशंकु की प्रार्थना

“त्रिशंकु की प्रार्थना”
॥ १ · ५७ · ११–१३ ॥

इक्ष्वाकुवंशी राजा त्रिशंकुः बद्धाञ्जलिः अवनतमुखः वसिष्ठं याचते — 'सशरीरं स्वर्गं गन्तुं यज्ञं कुरु' इति; अग्निसमीपे श्वेतवस्त्रः वसिष्ठः निवारयन् तिष्ठति, पृष्ठे मुनयः।

अग्नि के पास खड़े श्वेत वस्त्रधारी महर्षि वसिष्ठ के सामने इक्ष्वाकुवंशी राजा त्रिशंकु मुकुट पहने हाथ जोड़े, मुख कुछ नीचा किये यह याचना कर रहे हैं कि इसी शरीर के साथ स्वर्ग पहुँचानेवाला यज्ञ करा दें — और वसिष्ठ हाथ के संकेत से 'यह असम्भव है' कहते हुए मना कर रहे हैं; पीछे अन्य मुनि खड़े हैं।

Before the white-robed sage Vasishtha, who stands beside the sacred fire, the Ikshvaku king Trishanku — crowned, palms joined, face lowered — pleads that a sacrifice be performed to carry him to heaven in his very body, and Vasishtha, with a gesture, refuses it as impossible while other sages look on behind.

॥ १ · ५७ · १ ॥
ततः संतप्तहृदयः स्मरन्निग्रहमात्मनः विनिःश्वस्य विनिःश्वस्य कृतवैरो महात्मना

tataḥ saṁtaptahṛdayaḥ smarannigrahamātmanaḥ ।
viniḥśvasya viniḥśvasya kṛtavairo mahātmanā ॥

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॥ १ · ५७ · २ ॥
दक्षिणां दिशं गत्वा महिष्या सह राघव तताप परमं घोरं विश्वामित्रो महातपाः

sa dakṣiṇāṁ diśaṁ gatvā mahiṣyā saha rāghava ।
tatāpa paramaṁ ghoraṁ viśvāmitro mahātapāḥ ॥

॥ १–२ ॥

श्रीराम! तदनन्तर विश्वामित्र अपनी पराजय को याद करके मन-ही-मन संतप्त होने लगे। महात्मा वसिष्ठ के साथ वैर बाँधकर महातपस्वी विश्वामित्र बारम्बार लम्बी साँस खींचते हुए अपनी रानी के साथ दक्षिण दिशा में जाकर अत्यन्त उत्कृष्ट एवं भयंकर तपस्या करने लगे।

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॥ १ · ५७ · ३ ॥
फलमूलाशनो दान्तश्चचार परमं तपः अथास्य जज्ञिरे पुत्राः सत्यधर्मपरायणाः

phalamūlāśano dāntaścacāra paramaṁ tapaḥ ।
athāsya jajñire putrāḥ satyadharmaparāyaṇāḥ ॥

वहाँ मन और इन्द्रियों को वश में करके वे फल-मूल का आहार करते तथा उत्तम तपस्या में लगे रहते थे। वहीं उनके हविष्पन्द, मधुष्पन्द, दृढनेत्र और महारथ नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए, जो सत्य और धर्म में तत्पर रहनेवाले थे।

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॥ १ · ५७ · ४ ॥
हविष्पन्दो मधुष्पन्दो दृढनेत्रो महारथः पूर्णे वर्षसहस्रे तु ब्रह्मा लोकपितामहः

haviṣpando madhuṣpando dṛḍhanetro mahārathaḥ ।
pūrṇe varṣasahasre tu brahmā lokapitāmahaḥ ॥

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॥ १ · ५७ · ५ ॥
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं विश्वामित्रं तपोधनम् जिता राजर्षिलोकास्ते तपसा कुशिकात्मज

abravīnmadhuraṁ vākyaṁ viśvāmitraṁ tapodhanam ।
jitā rājarṣilokāste tapasā kuśikātmaja ॥

॥ ४–५ ॥

एक हजार वर्ष पूरे हो जाने पर लोकपितामह ब्रह्माजी ने तपस्या के धनी विश्वामित्र को दर्शन देकर मधुर वाणी में कहा—'कुशिकनन्दन! तुमने तपस्या के द्वारा राजर्षियों के लोकों पर विजय पायी है। इस तपस्या के प्रभाव से हम तुम्हें सच्चा राजर्षि समझते हैं।'

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॥ १ · ५७ · ६ ॥
अनेन तपसा त्वां हि राजर्षिरिति विद्महे एवमुक्त्वा महातेजा जगाम सह दैवतैः

anena tapasā tvāṁ hi rājarṣiriti vidmahe ।
evamuktvā mahātejā jagāma saha daivataiḥ ॥

यह कहकर सम्पूर्ण लोकों के स्वामी ब्रह्माजी देवताओं के साथ स्वर्गलोक होते हुए ब्रह्मलोक को चले गये।

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॥ १ · ५७ · ७ ॥
त्रिविष्टपं ब्रह्मलोकं लोकानां परमेश्वरः विश्वामित्रोऽपि तच्छ्रुत्वा ह्रिया किंचिदवाङ्मुखः

triviṣṭapaṁ brahmalokaṁ lokānāṁ parameśvaraḥ ।
viśvāmitro'pi tacchrutvā hriyā kiṁcidavāṅmukhaḥ ॥

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॥ १ · ५७ · ८ ॥
दुःखेन महताविष्टः समन्युरिदमब्रवीत् तपश्च सुमहत् तप्तं राजर्षिरिति मां विदुः

duḥkhena mahatāviṣṭaḥ samanyuridamabravīt ।
tapaśca sumahat taptaṁ rājarṣiriti māṁ viduḥ ॥

॥ ७–८ ॥

उनकी बात सुनकर विश्वामित्र का मुख लज्जा से कुछ झुक गया। वे बड़े दुःख से व्यथित हो दीनतापूर्वक मन-ही-मन यों कहने लगे—'अहो! मैंने इतना बड़ा तप किया तो भी ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवता मुझे राजर्षि ही समझते हैं। मालूम होता है, इस तपस्या का कोई फल नहीं हुआ।'

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॥ १ · ५७ · ९ ॥
देवाः सर्षिगणाः सर्वे नास्ति मन्ये तपः फलम् एवं निश्चित्य मनसा भूय एव महातपाः

devāḥ sarṣigaṇāḥ sarve nāsti manye tapaḥ phalam ।
evaṁ niścitya manasā bhūya eva mahātapāḥ ॥

श्रीराम! मन में ऐसा सोचकर अपने मन को वश में रखनेवाले महातपस्वी धर्मात्मा विश्वामित्र पुनः भारी तपस्या में लग गये।

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॥ १ · ५७ · १० ॥
तपश्चचार धर्मात्मा काकुत्स्थ परमात्मवान् एतस्मिन्नेव काले तु सत्यवादी जितेन्द्रियः

tapaścacāra dharmātmā kākutstha paramātmavān ।
etasminneva kāle tu satyavādī jitendriyaḥ ॥

इसी समय इक्ष्वाकुकुल की कीर्ति बढ़ानेवाले एक सत्यवादी और जितेन्द्रिय राजा राज्य करते थे। उनका नाम था त्रिशंकु।

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॥ १ · ५७ · ११ ॥
त्रिशङ्कुरिति विख्यात इक्ष्वाकुकुलवर्धनः तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना यजेयमिति राघव

triśaṅkuriti vikhyāta ikṣvākukulavardhanaḥ ।
tasya buddhiḥ samutpannā yajeyamiti rāghava ॥

रघुनन्दन! उनके मन में यह विचार हुआ कि 'मैं ऐसा कोई यज्ञ करूँ, जिससे अपने इस शरीर के साथ ही देवताओं की परम गति—स्वर्गलोक को जा पहुँचूँ।'

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॥ १ · ५७ · १२ ॥
गच्छेयं स्वशरीरेण देवतानां परां गतिम् वसिष्ठं समाहूय कथयामास चिन्तितम्

gaccheyaṁ svaśarīreṇa devatānāṁ parāṁ gatim ।
vasiṣṭhaṁ sa samāhūya kathayāmāsa cintitam ॥

तब उन्होंने वसिष्ठजी को बुलाकर अपना यह विचार उन्हें कह सुनाया। महात्मा वसिष्ठ ने उन्हें बताया कि 'ऐसा होना असम्भव है।'

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॥ १ · ५७ · १३ ॥
अशक्यमिति चाप्युक्तो वसिष्ठेन महात्मना प्रत्याख्यातो वसिष्ठेन ययौ दक्षिणां दिशम्

aśakyamiti cāpyukto vasiṣṭhena mahātmanā ।
pratyākhyāto vasiṣṭhena sa yayau dakṣiṇāṁ diśam ॥

जब वसिष्ठ ने उन्हें कोरा उत्तर दे दिया, तब वे राजा उस कर्म की सिद्धि के लिये दक्षिण दिशा में उन्हीं के पुत्रों के पास चले गये।

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॥ १ · ५७ · १४ ॥
ततस्तत्कर्मसिद्ध्यर्थं पुत्रांस्तस्य गतो नृपः वासिष्ठा दीर्घतपसस्तपो यत्र हि तेपिरे

tatastatkarmasiddhyarthaṁ putrāṁstasya gato nṛpaḥ ।
vāsiṣṭhā dīrghatapasastapo yatra hi tepire ॥

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॥ १ · ५७ · १५ ॥
त्रिशङ्कुस्तु महातेजाः शतं परमभास्वरम् वसिष्ठपुत्रान् ददृशे तप्यमानान् मनस्विनः

triśaṅkustu mahātejāḥ śataṁ paramabhāsvaram ।
vasiṣṭhaputrān dadṛśe tapyamānān manasvinaḥ ॥

॥ १४–१५ ॥

वसिष्ठजी के वे पुत्र जहाँ दीर्घकाल से तपस्या में प्रवृत्त होकर तप करते थे, उस स्थान पर पहुँचकर महातेजस्वी त्रिशंकु ने देखा कि मन को वश में रखनेवाले वे सौ परमतेजस्वी वसिष्ठकुमार तपस्या में संलग्न हैं।

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॥ १ · ५७ · १६ ॥
सोऽभिगम्य महात्मानः सर्वानेव गुरोः सुतान् अभिवाद्यानुपूर्वेण ह्रिया किंचिदवाङ्मुखः

so'bhigamya mahātmānaḥ sarvāneva guroḥ sutān ।
abhivādyānupūrveṇa hriyā kiṁcidavāṅmukhaḥ ॥

उन सभी महात्मा गुरुपुत्रों के पास जाकर उन्होंने क्रमशः उन्हें प्रणाम किया और लज्जा से अपने मुख को कुछ नीचा किये हाथ जोड़कर उन सब महात्माओं से कहा—

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॥ १ · ५७ · १७ ॥
अब्रवीत् महात्मानः सर्वानेव कृताञ्जलिः शरणं वः प्रपन्नोऽहं शरण्यान् शरणं गतः

abravīt sa mahātmānaḥ sarvāneva kṛtāñjaliḥ ।
śaraṇaṁ vaḥ prapanno'haṁ śaraṇyān śaraṇaṁ gataḥ ॥

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॥ १ · ५७ · १८ ॥
प्रत्याख्यातो हि भद्रं वो वसिष्ठेन महात्मना यष्टुकामो महायज्ञं तदनुज्ञातुमर्हथ

pratyākhyāto hi bhadraṁ vo vasiṣṭhena mahātmanā ।
yaṣṭukāmo mahāyajñaṁ tadanujñātumarhatha ॥

॥ १७–१८ ॥

'गुरुपुत्रो! आप शरणागतवत्सल हैं। मैं आपलोगों की शरण में आया हूँ, आपका कल्याण हो। महात्मा वसिष्ठ ने मेरा यज्ञ कराना अस्वीकार कर दिया है। मैं एक महान् यज्ञ करना चाहता हूँ। आपलोग उसके लिये आज्ञा दें।

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॥ १ · ५७ · १९ ॥
गुरुपुत्रानहं सर्वान् नमस्कृत्य प्रसादये शिरसा प्रणतो याचे ब्राह्मणांस्तपसि स्थितान्

guruputrānahaṁ sarvān namaskṛtya prasādaye ।
śirasā praṇato yāce brāhmaṇāṁstapasi sthitān ॥

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॥ १ · ५७ · २० ॥
ते मां भवन्तः सिद्ध्यर्थं याजयन्तु समाहिताः सशरीरो यथाहं वै देवलोकमवाप्नुयाम्

te māṁ bhavantaḥ siddhyarthaṁ yājayantu samāhitāḥ ।
saśarīro yathāhaṁ vai devalokamavāpnuyām ॥

॥ १९–२० ॥

'मैं समस्त गुरुपुत्रों को नमस्कार करके प्रसन्न करना चाहता हूँ। आपलोग तपस्या में संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण हैं। मैं आपके चरणों में मस्तक रखकर यह याचना करता हूँ कि आपलोग एकाग्रचित्त हो मुझसे मेरी अभीष्टसिद्धि के लिये ऐसा कोई यज्ञ करावें, जिससे मैं इस शरीर के साथ ही देवलोक में जा सकूँ।

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॥ १ · ५७ · २१ ॥
प्रत्याख्यातो वसिष्ठेन गतिमन्यां तपोधनाः गुरुपुत्रानृते सर्वान् नाहं पश्यामि कांचन

pratyākhyāto vasiṣṭhena gatimanyāṁ tapodhanāḥ ।
guruputrānṛte sarvān nāhaṁ paśyāmi kāṁcana ॥

'तपोधनो! महात्मा वसिष्ठ के अस्वीकार कर देने पर अब मैं अपने लिये समस्त गुरुपुत्रों की शरण में जाने के सिवा दूसरी कोई गति नहीं देखता।

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॥ १ · ५७ · २२ ॥
इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां पुरोधाः परमा गतिः तस्मादनन्तरं सर्वे भवन्तो दैवतं मम

ikṣvākūṇāṁ hi sarveṣāṁ purodhāḥ paramā gatiḥ ।
tasmādanantaraṁ sarve bhavanto daivataṁ mama ॥

'समस्त इक्ष्वाकुवंशियों के लिये पुरोहित वसिष्ठजी ही परमगति हैं। उनके बाद आप सब लोग ही मेरे परम देवता हैं।'

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः ॥ ५७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५७ ॥