वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ५६ · २४ श्लोकाःSarga 56 · 24 ślokas

विश्वामित्रद्वारा वसिष्ठजीपर नाना प्रकारके दिव्यास्त्रोंका प्रयोग और वसिष्ठद्वारा ब्रह्मदण्डसे ही उनका शमन एवं विश्वामित्रका ब्राह्मणत्वकी प्राप्तिके लिये तप करनेका निश्चय

ब्रह्मदण्ड

“ब्रह्मदण्ड”
॥ १ · ५६ · १३–१६ ॥

मुकुटी कवची विश्वामित्रः त्रिशूलवज्रादीनि दिव्यास्त्राणि क्षिपति, किन्तु श्वेतवस्त्रः वसिष्ठः ऊर्ध्वं धृतेन प्रज्वलता ब्रह्मदण्डेन तानि सर्वाणि शमयति।

मुकुट और कवच पहने विश्वामित्र क्रोध में त्रिशूल, वज्र और अग्निमय बाणों जैसे नाना दिव्यास्त्र छोड़ रहे हैं, पर श्वेत वस्त्रधारी महर्षि वसिष्ठ ऊपर उठाये अपने तेज से प्रज्वलित ब्रह्मदण्ड से उन सभी अस्त्रों को उसी क्षण शान्त कर रहे हैं।

Crowned and armoured, Vishvamitra in fury hurls volley after volley of celestial weapons — trident, thunderbolt and fiery missiles — but the white-robed sage Vasishtha, lifting his glowing brahmadanda staff, quenches every one of them in an instant.

॥ १ · ५६ · १ ॥
एवमुक्तो वसिष्ठेन विश्वामित्रो महाबलः आग्नेयमस्त्रमुद्दिश्य तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत्

evamukto vasiṣṭhena viśvāmitro mahābalaḥ ।
āgneyamastramuddiśya tiṣṭha tiṣṭheti cābravīt ॥

वसिष्ठ के ऐसा कहने पर महाबली विश्वामित्र आग्नेयास्त्र लेकर बोले—'अरे खड़ा रह, खड़ा रह।'

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॥ १ · ५६ · २ ॥
ब्रह्मदण्डं समुद्यम्य कालदण्डमिवापरम् वसिष्ठो भगवान् क्रोधादिदं वचनमब्रवीत्

brahmadaṇḍaṁ samudyamya kāladaṇḍamivāparam ।
vasiṣṭho bhagavān krodhādidaṁ vacanamabravīt ॥

उस समय द्वितीय कालदण्ड के समान ब्रह्मदण्ड को उठाकर भगवान् वसिष्ठ ने क्रोधपूर्वक इस प्रकार कहा—

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॥ १ · ५६ · ३ ॥
क्षत्रबन्धो स्थितोऽस्म्येष यद् बलं तद् विदर्शय नाशयाम्यद्य ते दर्पं शस्त्रस्य तव गाधिज

kṣatrabandho sthito'smyeṣa yad balaṁ tad vidarśaya ।
nāśayāmyadya te darpaṁ śastrasya tava gādhija ॥

'क्षत्रियाधम! ले, यह मैं खड़ा हूँ। तेरे पास जो बल हो, उसे दिखा। गाधिपुत्र! आज तेरे अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान का घमंड मैं अभी धूल में मिला दूँगा।

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॥ १ · ५६ · ४ ॥
क्व ते क्षत्रियबलं क्व ब्रह्मबलं महत् पश्य ब्रह्मबलं दिव्यं मम क्षत्रियपांसन

kva ca te kṣatriyabalaṁ kva ca brahmabalaṁ mahat ।
paśya brahmabalaṁ divyaṁ mama kṣatriyapāṁsana ॥

'क्षत्रियकुलकलंक! कहाँ तेरा क्षात्रबल और कहाँ महान् ब्रह्मबल। मेरे दिव्य ब्रह्मबल को देख ले।'

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॥ १ · ५६ · ५ ॥
तस्यास्त्रं गाधिपुत्रस्य घोरमाग्नेयमुत्तमम् ब्रह्मदण्डेन तच्छान्तमग्नेर्वेग इवाम्भसा

tasyāstraṁ gādhiputrasya ghoramāgneyamuttamam ।
brahmadaṇḍena tacchāntamagnervega ivāmbhasā ॥

गाधिपुत्र विश्वामित्र का वह उत्तम एवं भयंकर आग्नेयास्त्र वसिष्ठजी के ब्रह्मदण्ड से उसी प्रकार शान्त हो गया, जैसे पानी पड़ने से जलती हुई आग का वेग।

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॥ १ · ५६ · ६ ॥
वारुणं चैव रौद्रं ऐन्द्रं पाशुपतं तथा ऐषीकं चापि चिक्षेप कुपितो गाधिनन्दनः

vāruṇaṁ caiva raudraṁ ca aindraṁ pāśupataṁ tathā ।
aiṣīkaṁ cāpi cikṣepa kupito gādhinandanaḥ ॥

तब गाधिपुत्र विश्वामित्र ने कुपित होकर वारुण, रौद्र, ऐन्द्र, पाशुपत और ऐषीक नामक अस्त्रों का प्रयोग किया।

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॥ १ · ५६ · ७ ॥
मानवं मोहनं चैव गान्धर्वं स्वापनं तथा जृम्भणं मादनं चैव संतापनविलापने

mānavaṁ mohanaṁ caiva gāndharvaṁ svāpanaṁ tathā ।
jṛmbhaṇaṁ mādanaṁ caiva saṁtāpanavilāpane ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ५६ · ८ ॥
शोषणं दारणं चैव वज्रमस्त्रं सुदुर्जयम् ब्रह्मपाशं कालपाशं वारुणं पाशमेव

śoṣaṇaṁ dāraṇaṁ caiva vajramastraṁ sudurjayam ।
brahmapāśaṁ kālapāśaṁ vāruṇaṁ pāśameva ca ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ५६ · ९ ॥
पिनाकमस्त्रं दयितं शुष्कार्द्रे अशनी तथा दण्डास्त्रमथ पैशाचं क्रौञ्चमस्त्रं तथैव

pinākamastraṁ dayitaṁ śuṣkārdre aśanī tathā ।
daṇḍāstramatha paiśācaṁ krauñcamastraṁ tathaiva ca ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ५६ · १० ॥
धर्मचक्रं कालचक्रं विष्णुचक्रं तथैव वायव्यं मथनं चैव अस्त्रं हयशिरस्तथा

dharmacakraṁ kālacakraṁ viṣṇucakraṁ tathaiva ca ।
vāyavyaṁ mathanaṁ caiva astraṁ hayaśirastathā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ५६ · ११ ॥
शक्तिद्वयं चिक्षेप कङ्कालं मुसलं तथा वैद्याधरं महास्त्रं कालास्त्रमथ दारुणम्

śaktidvayaṁ ca cikṣepa kaṅkālaṁ musalaṁ tathā ।
vaidyādharaṁ mahāstraṁ ca kālāstramatha dāruṇam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ५६ · १२ ॥
त्रिशूलमस्त्रं घोरं कापालमथ कङ्कणम् एतान्यस्त्राणि चिक्षेप सर्वाणि रघुनन्दन

triśūlamastraṁ ghoraṁ ca kāpālamatha kaṅkaṇam ।
etānyastrāṇi cikṣepa sarvāṇi raghunandana ॥

॥ ७–१२ ॥

रघुनन्दन! उसके पश्चात् क्रमशः मानव, मोहन, गान्धर्व, स्वापन, जृम्भण, मादन, संतापन, विलापन, शोषण, विदारण, सुदुर्जय वज्रास्त्र, ब्रह्मपाश, कालपाश, वारुणपाश, परमप्रिय पिनाकास्त्र, सूखी-गीली दो प्रकार की अशनि, दण्डास्त्र, पैशाचास्त्र, क्रौञ्चास्त्र, धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र, वायव्यास्त्र, मन्थनास्त्र, हयशिरा, दो प्रकार की शक्ति, कङ्काल, मूसल, महान् वैद्याधरास्त्र, दारुण कालास्त्र, भयंकर त्रिशूलास्त्र, कापालास्त्र और कङ्कणास्त्र—ये सभी अस्त्र उन्होंने वसिष्ठजी के ऊपर चलाये।

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॥ १ · ५६ · १३ ॥
वसिष्ठे जपतां श्रेष्ठे तदद्भुतमिवाभवत् तानि सर्वाणि दण्डेन ग्रसते ब्रह्मणः सुतः

vasiṣṭhe japatāṁ śreṣṭhe tadadbhutamivābhavat ।
tāni sarvāṇi daṇḍena grasate brahmaṇaḥ sutaḥ ॥

जपनेवालों में श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठ पर इतने अस्त्रों का प्रहार वह एक अद्भुत-सी घटना थी, परंतु ब्रह्मा के पुत्र वसिष्ठजी ने उन सभी अस्त्रों को केवल अपने डंडे से ही नष्ट कर दिया।

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॥ १ · ५६ · १४ ॥
तेषु शान्तेषु ब्रह्मास्त्रं क्षिप्तवान् गाधिनन्दनः तदस्त्रमुद्गतं दृष्ट्वा देवाः साग्निपुरोगमाः

teṣu śānteṣu brahmāstraṁ kṣiptavān gādhinandanaḥ ।
tadastramudgataṁ dṛṣṭvā devāḥ sāgnipurogamāḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ५६ · १५ ॥
देवर्षयश्च सम्भ्रान्ता गन्धर्वाः समहोरगाः त्रैलोक्यमासीत् संत्रस्तं ब्रह्मास्त्रे समुदीरिते

devarṣayaśca sambhrāntā gandharvāḥ samahoragāḥ ।
trailokyamāsīt saṁtrastaṁ brahmāstre samudīrite ॥

॥ १४–१५ ॥

उन सब अस्त्रों के शान्त हो जाने पर गाधिनन्दन विश्वामित्र ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। ब्रह्मास्त्र को उद्गत देख अग्नि आदि देवता, देवर्षि, गन्धर्व और बड़े-बड़े नाग भी दहल गये। ब्रह्मास्त्र के ऊपर उठते ही तीनों लोकों के प्राणी थर्रा उठे।

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॥ १ · ५६ · १६ ॥
तदप्यस्त्रं महाघोरं ब्राह्मं ब्राह्मेण तेजसा वसिष्ठो ग्रसते सर्वं ब्रह्मदण्डेन राघव

tadapyastraṁ mahāghoraṁ brāhmaṁ brāhmeṇa tejasā ।
vasiṣṭho grasate sarvaṁ brahmadaṇḍena rāghava ॥

राघव! वसिष्ठजी ने अपने ब्रह्मतेज के प्रभाव से उस महाभयंकर ब्रह्मास्त्र को भी ब्रह्मदण्ड के द्वारा ही शान्त कर दिया।

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॥ १ · ५६ · १७ ॥
ब्रह्मास्त्रं ग्रसमानस्य वसिष्ठस्य महात्मनः त्रैलोक्यमोहनं रौद्रं रूपमासीत् सुदारुणम्

brahmāstraṁ grasamānasya vasiṣṭhasya mahātmanaḥ ।
trailokyamohanaṁ raudraṁ rūpamāsīt sudāruṇam ॥

उस ब्रह्मास्त्र को शान्त करते समय महात्मा वसिष्ठ का वह रौद्ररूप तीनों लोकों को मोह में डालनेवाला और अत्यन्त भयंकर जान पड़ा।

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॥ १ · ५६ · १८ ॥
रोमकूपेषु सर्वेषु वसिष्ठस्य महात्मनः मरीच्य इव निष्पेतुरग्नेर्धूमाकुलार्चिषः

romakūpeṣu sarveṣu vasiṣṭhasya mahātmanaḥ ।
marīcya iva niṣpeturagnerdhūmākulārciṣaḥ ॥

महात्मा वसिष्ठ के समस्त रोमकूपों में किरणों की भाँति धूमयुक्त आग की लपटें निकलने लगीं।

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॥ १ · ५६ · १९ ॥
प्राज्वलद् ब्रह्मदण्डश्च वसिष्ठस्य करोद्यतः विधूम इव कालाग्निर्यमदण्ड इवापरः

prājvalad brahmadaṇḍaśca vasiṣṭhasya karodyataḥ ।
vidhūma iva kālāgniryamadaṇḍa ivāparaḥ ॥

वसिष्ठजी के हाथ में उठा हुआ द्वितीय यमदण्ड के समान वह ब्रह्मदण्ड धूमरहित कालाग्नि के समान प्रज्वलित हो रहा था।

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॥ १ · ५६ · २० ॥
ततोऽस्तुवन् मुनिगणा वसिष्ठं जपतां वरम् अमोघं ते बलं ब्रह्मन् धारयात्मानं तेजसा

tato'stuvan munigaṇā vasiṣṭhaṁ japatāṁ varam ।
amoghaṁ te balaṁ brahman dhārayātmānaṁ tejasā ॥

उस समय समस्त मुनिगण मन्त्र जपनेवालों में श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनि की स्तुति करते हुए बोले—'ब्रह्मन्! आपका बल अमोघ है। आप अपने तेज को अपनी ही शक्ति से समेट लीजिये।

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॥ १ · ५६ · २१ ॥
निगृहीतस्त्वया ब्रह्मन् विश्वामित्रो महाबलः अमोघं ते बलं श्रेष्ठ लोकाः सन्तु गतव्यथाः

nigṛhītastvayā brahman viśvāmitro mahābalaḥ ।
amoghaṁ te balaṁ śreṣṭha lokāḥ santu gatavyathāḥ ॥

'महाबली विश्वामित्र आपसे पराजित हो गये। मुनिश्रेष्ठ! आपका बल अमोघ है। अब आप शान्त हो जाइये, जिससे लोगों की व्यथा दूर हो।'

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॥ १ · ५६ · २२ ॥
एवमुक्तो महातेजाः शमं चक्रे महाबलः विश्वामित्रो विनिकृतो विनिःश्वस्येदमब्रवीत्

evamukto mahātejāḥ śamaṁ cakre mahābalaḥ ।
viśvāmitro vinikṛto viniḥśvasyedamabravīt ॥

महर्षियों के ऐसा कहने पर महातेजस्वी महाबली वसिष्ठजी शान्त हो गये और पराजित विश्वामित्र लम्बी साँस खींचकर यों बोले—

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॥ १ · ५६ · २३ ॥
धिग् बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजोबलं बलम् एकेन ब्रह्मदण्डेन सर्वाण्यस्त्राणि हतानि मे

dhig balaṁ kṣatriyabalaṁ brahmatejobalaṁ balam ।
ekena brahmadaṇḍena sarvāṇyastrāṇi hatāni me ॥

'क्षत्रिय के बल को धिक्कार है। ब्रह्मतेज से प्राप्त होनेवाला बल ही वास्तव में बल है; क्योंकि आज एक ब्रह्मदण्ड ने मेरे सभी अस्त्र नष्ट कर दिये।

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॥ १ · ५६ · २४ ॥
तदेतत् प्रसमीक्ष्याहं प्रसन्नेन्द्रियमानसः तपो महत् समास्थास्ये यद् वै ब्रह्मत्वकारणम्

tadetat prasamīkṣyāhaṁ prasannendriyamānasaḥ ।
tapo mahat samāsthāsye yad vai brahmatvakāraṇam ॥

'इस घटना को प्रत्यक्ष देखकर अब मैं अपने मन और इन्द्रियों को निर्मल करके उस महान् तप का अनुष्ठान करूँगा, जो मेरे लिये ब्राह्मणत्व की प्राप्ति का कारण होगा।'

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः ॥ ५६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५६ ॥