वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ५९ · २२ श्लोकाःSarga 59 · 22 ślokas

विश्वामित्रका त्रिशंकुको आश्वासन देकर उनका यज्ञ करानेके लिये ऋषि-मुनियोंको आमन्त्रित करना और उनकी बात न माननेवाले महोदय तथा ऋषिपुत्रोंको शाप देकर नष्ट करना

ऋषि-आमन्त्रण

“ऋषि-आमन्त्रण”
॥ १ · ५९ · ३–९ ॥

विश्वामित्रः बाहुमुद्यम्य ऋत्विजः ब्रह्मवादिनः च यज्ञार्थमाह्वयति; प्रदीप्ते वेद्यग्नौ फलपुष्पाणि विकीर्णानि, त्रिशङ्कुश्च कृताञ्जलिः उपविष्टः।

प्रज्वलित यज्ञवेदी के पास खड़े विश्वामित्र भुजा उठाकर त्रिशंकु के यज्ञ के लिये दिशा-दिशा से ब्रह्मवादी ऋषि-मुनियों को आमन्त्रित कर रहे हैं; वेदी के सम्मुख फल-पुष्पों का अर्घ्य सजा है और चाण्डाल-रूप त्रिशंकु हाथ जोड़े बैठे हैं, जबकि कुछ मुनि पास आते और कुछ दूर हटते दिखते हैं।

Standing by the blazing fire-altar, Vishvamitra raises his arm to summon brahmin sages from every quarter for Trishanku's sacrifice; baskets of fruit and flowers lie before the altar and the chandala-king kneels with folded hands, while some sages draw near and others turn away.

॥ १ · ५९ · १ ॥
उक्तवाक्यं तु राजानं कृपया कुशिकात्मजः अब्रवीन्मधुरं वाक्यं साक्षाच्चण्डालतां गतम्

uktavākyaṁ tu rājānaṁ kṛpayā kuśikātmajaḥ ।
abravīnmadhuraṁ vākyaṁ sākṣāccaṇḍālatāṁ gatam ॥

[शतानन्दजी कहते हैं—श्रीराम!] साक्षात् चाण्डाल के स्वरूप को प्राप्त हुए राजा त्रिशंकु के पूर्वोक्त वचन को सुनकर कुशिकनन्दन विश्वामित्रजी ने दया से द्रवित होकर उनसे मधुर वाणी में कहा—

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॥ १ · ५९ · २ ॥
इक्ष्वाको स्वागतं वत्स जानामि त्वां सुधार्मिकम् शरणं ते प्रदास्यामि मा भैषीर्नृपपुंगव

ikṣvāko svāgataṁ vatsa jānāmi tvāṁ sudhārmikam ।
śaraṇaṁ te pradāsyāmi mā bhaiṣīrnṛpapuṁgava ॥

'वत्स! इक्ष्वाकुकुलनन्दन! तुम्हारा स्वागत है। मैं जानता हूँ, तुम बड़े धर्मात्मा हो। नृपप्रवर! डरो मत, मैं तुम्हें शरण दूँगा।

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॥ १ · ५९ · ३ ॥
अहमामन्त्रये सर्वान् महर्षीन् पुण्यकर्मणः यज्ञसाह्यकरान् राजंस्ततो यक्ष्यसि निर्वृतः

ahamāmantraye sarvān maharṣīn puṇyakarmaṇaḥ ।
yajñasāhyakarān rājaṁstato yakṣyasi nirvṛtaḥ ॥

'राजन्! तुम्हारे यज्ञ में सहायता करनेवाले समस्त पुण्यकर्मा महर्षियों को मैं आमन्त्रित करता हूँ। फिर तुम आनन्दपूर्वक यज्ञ करना।

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॥ १ · ५९ · ४ ॥
गुरुशापकृतं रूपं यदिदं त्वयि वर्तते अनेन सह रूपेण सशरीरो गमिष्यसि

guruśāpakṛtaṁ rūpaṁ yadidaṁ tvayi vartate ।
anena saha rūpeṇa saśarīro gamiṣyasi ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ५९ · ५ ॥
हस्तप्राप्तमहं मन्ये स्वर्गं तव नराधिप यस्त्वं कौशिकमागम्य शरण्यं शरणागतः

hastaprāptamahaṁ manye svargaṁ tava narādhipa ।
yastvaṁ kauśikamāgamya śaraṇyaṁ śaraṇāgataḥ ॥

॥ ४–५ ॥

'गुरु के शाप से तुम्हें जो यह नवीन रूप प्राप्त हुआ है इसके साथ ही तुम सदेह स्वर्गलोक को जाओगे। नरेश्वर! तुम जो शरणागतवत्सल विश्वामित्र की शरण में आ गये, इससे मैं यह समझता हूँ कि स्वर्गलोक तुम्हारे हाथ में आ गया है।'

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॥ १ · ५९ · ६ ॥
एवमुक्त्वा महातेजाः पुत्रान् परमधार्मिकान् व्यादिदेश महाप्राज्ञान् यज्ञसम्भारकारणात्

evamuktvā mahātejāḥ putrān paramadhārmikān ।
vyādideśa mahāprājñān yajñasambhārakāraṇāt ॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी विश्वामित्र ने अपने परम धर्मपरायण महाज्ञानी पुत्रों को यज्ञ की सामग्री जुटाने की आज्ञा दी।

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॥ १ · ५९ · ७ ॥
सर्वान् शिष्यान् समाहूय वाक्यमेतदुवाच सर्वानृषीन् सवासिष्ठानानयध्वं ममाज्ञया

sarvān śiṣyān samāhūya vākyametaduvāca ha ।
sarvānṛṣīn savāsiṣṭhānānayadhvaṁ mamājñayā ॥

तत्पश्चात् समस्त शिष्यों को बुलाकर उनसे यह बात कही—'तुमलोग मेरी आज्ञा से अनेक विषयों के ज्ञाता समस्त ऋषि-मुनियों को, जिनमें वसिष्ठ के पुत्र भी सम्मिलित हैं, उनके शिष्यों, सुहृदों तथा ऋत्विजोंसहित बुला लाओ।

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॥ १ · ५९ · ८ ॥
यदन्यो वचनं ब्रूयान्मद्वाक्यबलचोदितः तत् सर्वमखिलेनोक्तं ममाख्येयमनादृतम्

yadanyo vacanaṁ brūyānmadvākyabalacoditaḥ ।
tat sarvamakhilenoktaṁ mamākhyeyamanādṛtam ॥

'जिसे मेरा संदेश देकर बुलाया गया हो वह अथवा दूसरा कोई यदि इस यज्ञ के विषय में कोई अवहेलनापूर्ण बात कहे तो तुमलोग वह सब पूरा-पूरा मुझसे आकर कहना।'

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॥ १ · ५९ · ९ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा दिशो जग्मुस्तदाज्ञया आजग्मुरथ देशेभ्यः सर्वेभ्यो ब्रह्मवादिनः

tasya tad vacanaṁ śrutvā diśo jagmustadājñayā ।
ājagmuratha deśebhyaḥ sarvebhyo brahmavādinaḥ ॥

उनको आज्ञा मानकर सभी शिष्य चारों दिशाओं में चले गये। फिर तो सब देशों से ब्रह्मवादी मुनि आने लगे।

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॥ १ · ५९ · १० ॥
ते शिष्याः समागम्य मुनिं ज्वलिततेजसम् ऊचुश्च वचनं सर्वं सर्वेषां ब्रह्मवादिनाम्

te ca śiṣyāḥ samāgamya muniṁ jvalitatejasam ।
ūcuśca vacanaṁ sarvaṁ sarveṣāṁ brahmavādinām ॥

विश्वामित्र के वे शिष्य उन प्रज्वलित तेजवाले महर्षि के पास सबसे पहले लौट आये और समस्त ब्रह्मवादियों ने जो बातें कही थीं, उन्हें सबने विश्वामित्रजी से कह सुनाया।

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॥ १ · ५९ · ११ ॥
श्रुत्वा ते वचनं सर्वे समायान्ति द्विजातयः सर्वदेशेषु चागच्छन् वर्जयित्वा महोदयम्

śrutvā te vacanaṁ sarve samāyānti dvijātayaḥ ।
sarvadeśeṣu cāgacchan varjayitvā mahodayam ॥

वे बोले—'गुरुदेव! आपका आदेश या संदेश सुनकर प्रायः सम्पूर्ण देशों में रहनेवाले सभी ब्राह्मण आ रहे हैं। केवल महोदय नामक ऋषि तथा वसिष्ठ-पुत्रों को छोड़कर सभी महर्षि यहाँ आने के लिये प्रस्थान कर चुके हैं।

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॥ १ · ५९ · १२ ॥
वासिष्ठं यच्छतं सर्वं क्रोधपर्याकुलाक्षरम् यथाह वचनं सर्वं श्रृणु त्वं मुनिपुंगव

vāsiṣṭhaṁ yacchataṁ sarvaṁ krodhaparyākulākṣaram ।
yathāha vacanaṁ sarvaṁ śrṛṇu tvaṁ munipuṁgava ॥

'मुनिश्रेष्ठ! वसिष्ठ के जो सौ पुत्र हैं, उन सबने क्रोधभरी वाणी में जो कुछ कहा है, वह सब आप सुनिये।

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॥ १ · ५९ · १३ ॥
क्षत्रियो याजको यस्य चण्डालस्य विशेषतः कथं सदसि भोक्तारो हविस्तस्य सुरर्षयः

kṣatriyo yājako yasya caṇḍālasya viśeṣataḥ ।
kathaṁ sadasi bhoktāro havistasya surarṣayaḥ ॥

'वे कहते हैं—जो विशेषतः चण्डाल है और जिसका यज्ञ करानेवाला आचार्य क्षत्रिय है, उसके यज्ञ में देवर्षि अथवा महात्मा ब्राह्मण हविष्य का भोजन कैसे कर सकते हैं?

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॥ १ · ५९ · १४ ॥
ब्राह्मणा वा महात्मानो भुक्त्वा चाण्डालभोजनम् कथं स्वर्गं गमिष्यन्ति विश्वामित्रेण पालिताः

brāhmaṇā vā mahātmāno bhuktvā cāṇḍālabhojanam ।
kathaṁ svargaṁ gamiṣyanti viśvāmitreṇa pālitāḥ ॥

अथवा चण्डाल का अन्न खाकर विश्वामित्र से पालित हुए ब्राह्मण स्वर्ग में कैसे जा सकेंगे?'

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॥ १ · ५९ · १५ ॥
एतद् वचननैष्ठुर्यमूचुः संरक्तलोचनाः वासिष्ठा मुनिशार्दूल सर्वे सहमहोदयाः

etad vacananaiṣṭhuryamūcuḥ saṁraktalocanāḥ ।
vāsiṣṭhā muniśārdūla sarve sahamahodayāḥ ॥

'मुनिप्रवर! महोदय के साथ वसिष्ठ के सभी पुत्रों ने क्रोध से लाल आँखें करके ये उपर्युक्त निष्ठुरतापूर्ण बातें कही थीं।'

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॥ १ · ५९ · १६ ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा सर्वेषां मुनिपुंगवः क्रोधसंरक्तनयनः सरोषमिदमब्रवीत्

teṣāṁ tad vacanaṁ śrutvā sarveṣāṁ munipuṁgavaḥ ।
krodhasaṁraktanayanaḥ saroṣamidamabravīt ॥

उन सबको वह बात सुनकर मुनिवर विश्वामित्र के दोनों नेत्र क्रोध से लाल हो गये और वे रोषपूर्वक इस प्रकार बोले—

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॥ १ · ५९ · १७ ॥
यद् दूषयन्त्यदुष्टं मां तप उग्रं समास्थितम् भस्मीभूता दुरात्मानो भविष्यन्ति संशयः

yad dūṣayantyaduṣṭaṁ māṁ tapa ugraṁ samāsthitam ।
bhasmībhūtā durātmāno bhaviṣyanti na saṁśayaḥ ॥

'मैं उग्र तपस्या में लगा हूँ और दोष या दुर्भावना से रहित हूँ तो भी जो मुझपर दोषारोपण करते हैं, वे दुरात्मा भस्मीभूत हो जायंगे, इसमें संशय नहीं है।

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॥ १ · ५९ · १८ ॥
अद्य ते कालपाशेन नीता वैवस्वतक्षयम् सप्तजातिशतान्येव मृतपाः सम्भवन्तु ते

adya te kālapāśena nītā vaivasvatakṣayam ।
saptajātiśatānyeva mṛtapāḥ sambhavantu te ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ५९ · १९ ॥
श्वमांसनियताहारा मुष्टिका नाम निर्घृणाः विकृताश्च विरूपाश्च लोकाननुचरन्त्विमान्

śvamāṁsaniyatāhārā muṣṭikā nāma nirghṛṇāḥ ।
vikṛtāśca virūpāśca lokānanucarantvimān ॥

॥ १८–१९ ॥

'आज कालपाश से बँधकर वे यमलोक में पहुँचा दिये गये। अब ये सात सौ जन्मों तक मुर्दों की रखवाली करनेवाली, निश्चितरूप से कुत्ते का मांस खानेवाली मुष्टिक नामक प्रसिद्ध निर्दय चण्डाल-जाति में जन्म ग्रहण करें।

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॥ १ · ५९ · २० ॥
महोदयश्च दुर्बुद्धिर्मामदूष्यं ह्यदूषयत् दूषितः सर्वलोकेषु निषादत्वं गमिष्यति

mahodayaśca durbuddhirmāmadūṣyaṁ hyadūṣayat ।
dūṣitaḥ sarvalokeṣu niṣādatvaṁ gamiṣyati ॥

'वे लोग विकृत एवं विरूप होकर इन लोकों में विचरें। साथ ही दुर्बुद्धि महोदय भी, जिसने मुझ दोषहीन को भी दूषित किया है, मेरे क्रोध से दीर्घकालतक सब लोगों में निन्दित,

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॥ १ · ५९ · २१ ॥
प्राणातिपातनिरतो निरनुक्रोशतां गतः दीर्घकालं मम क्रोधाद् दुर्गतिं वर्तयिष्यति

prāṇātipātanirato niranukrośatāṁ gataḥ ।
dīrghakālaṁ mama krodhād durgatiṁ vartayiṣyati ॥

दूसरे प्राणियों की हिंसा में तत्पर और दयाशून्य निषादयोनि को प्राप्त करके दुर्गति भोगेगा।'

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॥ १ · ५९ · २२ ॥
एतावदुक्त्वा वचनं विश्वामित्रो महातपाः विरराम महातेजा ऋषिमध्ये महामुनिः

etāvaduktvā vacanaṁ viśvāmitro mahātapāḥ ।
virarāma mahātejā ṛṣimadhye mahāmuniḥ ॥

ऋषियों के बीच में ऐसा कहकर महातपस्वी, महातेजस्वी एवं महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः ॥ ५९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५९ ॥