वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ६० · ३४ श्लोकाःSarga 60 · 34 ślokas

विश्वामित्रका ऋषियोंसे त्रिशंकुका यज्ञ करानेके लिये अनुरोध, ऋषियोंद्वारा यज्ञका आरम्भ, त्रिशंकुका सशरीर स्वर्गगमन, इन्द्रद्वारा स्वर्गसे उनके गिराये जानेपर क्षुब्ध हुए विश्वामित्रका नूतन देवसर्गके लिये उद्योग, फिर देवताओंके अनुरोधसे उनका इस कार्यसे विरत होना

त्रिशंकु-स्वर्गपतन

“त्रिशंकु-स्वर्गपतन”
॥ १ · ६० · १५–१९ ॥

विश्वामित्रतपोबलेन सशरीरः स्वर्गमारूढः त्रिशङ्कुः इन्द्रेण निरस्तः अधोमुखः पतति; द्वारे मुकुटधरः इन्द्रः निवर्तनं दिशति, अधश्च विश्वामित्रः बाहू उद्यम्य 'तिष्ठ' इति वदति।

विश्वामित्र के तपोबल से सशरीर स्वर्ग चढ़े त्रिशंकु को इन्द्र ने ठुकरा दिया है, और वे 'त्राहि-त्राहि' पुकारते सिर के बल नीचे गिर रहे हैं; ऊपर स्वर्ग-द्वार पर मुकुटधारी इन्द्र उन्हें लौट जाने का संकेत करते हैं, नीचे तारों भरे आकाश में विश्वामित्र दोनों भुजाएँ उठाकर उन्हें बीच में ही ठहरा देते हैं।

Lifted bodily to heaven by Vishvamitra's austerities, Trishanku is cast out by Indra and plunges head-downward crying for help; above, the crowned Indra at the celestial gate motions him back, while below, amid a starry sky, Vishvamitra throws up both arms and halts him in mid-fall.

॥ १ · ६० · १ ॥
तपोबलहतान् ज्ञात्वा वासिष्ठान् समहोदयान् ऋषिमध्ये महातेजा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत

tapobalahatān jñātvā vāsiṣṭhān samahodayān ।
ṛṣimadhye mahātejā viśvāmitro'bhyabhāṣata ॥

[शतानन्दजी कहते हैं—श्रीराम!] महोदयसहित वसिष्ठ के पुत्रों को अपने तपोबल से नष्ट हुआ जान महातेजस्वी विश्वामित्र ने ऋषियों के बीच में इस प्रकार कहा—

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॥ १ · ६० · २ ॥
अयमिक्ष्वाकुदायादस्त्रिशङ्कुरिति विश्रुतः धर्मिष्ठश्च वदान्यश्च मां चैव शरणं गतः

ayamikṣvākudāyādastriśaṅkuriti viśrutaḥ ।
dharmiṣṭhaśca vadānyaśca māṁ caiva śaraṇaṁ gataḥ ॥

'मुनिवरो! ये इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न राजा त्रिशंकु हैं। ये विख्यात नरेश बड़े ही धर्मात्मा और दानी रहे हैं तथा इस समय मेरी शरण में आये हैं।

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॥ १ · ६० · ३ ॥
स्वेनानेन शरीरेण देवलोकजिगीषया यथायं स्वशरीरेण देवलोकं गमिष्यति

svenānena śarīreṇa devalokajigīṣayā ।
yathāyaṁ svaśarīreṇa devalokaṁ gamiṣyati ॥

'इनकी इच्छा है कि मैं अपने इसी शरीर से देवलोक पर अधिकार प्राप्त करूँ। अतः आपलोग मेरे साथ रहकर ऐसे यज्ञ का अनुष्ठान करें, जिससे इन्हें इस शरीर से ही देवलोक की प्राप्ति हो सके।'

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॥ १ · ६० · ४ ॥
तथा प्रवर्त्यतां यज्ञो भवद्भिश्च मया सह विश्वामित्रवचः श्रुत्वा सर्व एव महर्षयः

tathā pravartyatāṁ yajño bhavadbhiśca mayā saha ।
viśvāmitravacaḥ śrutvā sarva eva maharṣayaḥ ॥

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॥ १ · ६० · ५ ॥
ऊचुः समेताः सहसा धर्मज्ञा धर्मसंहितम् अयं कुशिकदायादो मुनिः परमकोपनः

ūcuḥ sametāḥ sahasā dharmajñā dharmasaṁhitam ।
ayaṁ kuśikadāyādo muniḥ paramakopanaḥ ॥

॥ ४–५ ॥

विश्वामित्रजी की यह बात सुनकर धर्म को जाननेवाले सभी महर्षियों ने सहसा एकत्र होकर आपस में धर्मयुक्त परामर्श किया—'ब्राह्मणो! कुशिक के पुत्र विश्वामित्र मुनि बड़े क्रोधी हैं। ये जो बात कह रहे हैं, उसका ठीक तरह से पालन करना चाहिये। इसमें संशय नहीं है।

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॥ १ · ६० · ६ ॥
यदाह वचनं सम्यगेतत् कार्यं संशयः अग्निकल्पो हि भगवान् शापं दास्यति रोषतः

yadāha vacanaṁ samyagetat kāryaṁ na saṁśayaḥ ।
agnikalpo hi bhagavān śāpaṁ dāsyati roṣataḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ६० · ७ ॥
तस्मात् प्रवर्त्यतां यज्ञः सशरीरो यथा दिवि गच्छेदिक्ष्वाकुदायादो विश्वामित्रस्य तेजसा

tasmāt pravartyatāṁ yajñaḥ saśarīro yathā divi ।
gacchedikṣvākudāyādo viśvāmitrasya tejasā ॥

॥ ६–७ ॥

'ये भगवान् विश्वामित्र अग्नि के समान तेजस्वी हैं। यदि इनकी बात नहीं मानी गयी तो ये रोषपूर्वक शाप दे देंगे। इसलिये ऐसे यज्ञ का आरम्भ करना चाहिये, जिससे विश्वामित्र के तेज से ये इक्ष्वाकुनन्दन त्रिशंकु सशरीर स्वर्गलोक में जा सकें।'

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॥ १ · ६० · ८ ॥
ततः प्रवर्त्यतां यज्ञः सर्वे समधितिष्ठत एवमुक्त्वा महर्षयः संजह्रुस्ताः क्रियास्तदा

tataḥ pravartyatāṁ yajñaḥ sarve samadhitiṣṭhata ।
evamuktvā maharṣayaḥ saṁjahrustāḥ kriyāstadā ॥

इस तरह विचार करके उन्होंने सर्वसम्मति से यह निश्चय किया कि 'यज्ञ आरम्भ किया जाय।' ऐसा निश्चय करके महर्षियों ने उस समय अपना-अपना कार्य आरम्भ किया।

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॥ १ · ६० · ९ ॥
याजकश्च महातेजा विश्वामित्रोऽभवत् क्रतौ ऋत्विजश्चानुपूर्व्येण मन्त्रवन्मन्त्रकोविदाः

yājakaśca mahātejā viśvāmitro'bhavat kratau ।
ṛtvijaścānupūrvyeṇa mantravanmantrakovidāḥ ॥

महातेजस्वी विश्वामित्र स्वयं ही उस यज्ञ में याजक (अध्वर्यु) हुए। फिर क्रमशः अनेक मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण ऋत्विज् हुए; जिन्होंने कल्पशास्त्र के अनुसार विधि एवं मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारे कार्य सम्पन्न किये।

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॥ १ · ६० · १० ॥
चक्रुः सर्वाणि कर्माणि यथाकल्पं यथाविधि ततः कालेन महता विश्वामित्रो महातपाः

cakruḥ sarvāṇi karmāṇi yathākalpaṁ yathāvidhi ।
tataḥ kālena mahatā viśvāmitro mahātapāḥ ॥

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॥ १ · ६० · ११ ॥
चकारावाहनं तत्र भागार्थं सर्वदेवताः नाभ्यागमंस्तदा तत्र भागार्थं सर्वदेवताः

cakārāvāhanaṁ tatra bhāgārthaṁ sarvadevatāḥ ।
nābhyāgamaṁstadā tatra bhāgārthaṁ sarvadevatāḥ ॥

॥ १०–११ ॥

तदनन्तर बहुत समयतक यज्ञपूर्वक मन्त्रपाठ करके महातपस्वी विश्वामित्र ने अपना-अपना भाग ग्रहण करने के लिये सम्पूर्ण देवताओं का आवाहन किया; परंतु उस समय वहाँ भाग लेने के लिये वे सब देवता नहीं आये।

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॥ १ · ६० · १२ ॥
ततः कोपसमाविष्टो विश्वामित्रो महामुनिः स्रुवमुद्यम्य सक्रोधस्त्रिशङ्कुमिदमब्रवीत्

tataḥ kopasamāviṣṭo viśvāmitro mahāmuniḥ ।
sruvamudyamya sakrodhastriśaṅkumidamabravīt ॥

इससे महामुनि विश्वामित्र को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने स्रुवा उठाकर रोष के साथ राजा त्रिशंकु से इस प्रकार कहा—

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॥ १ · ६० · १३ ॥
पश्य मे तपसो वीर्यं स्वार्जितस्य नरेश्वर एष त्वां स्वशरीरेण नयामि स्वर्गमोजसा

paśya me tapaso vīryaṁ svārjitasya nareśvara ।
eṣa tvāṁ svaśarīreṇa nayāmi svargamojasā ॥

'नरेश्वर! अब तुम मेरे द्वारा उपार्जित तपस्या का बल देखो। मैं अभी तुम्हें अपनी शक्ति से सशरीर स्वर्गलोक में पहुँचाता हूँ।

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॥ १ · ६० · १४ ॥
दुष्प्रापं स्वशरीरेण स्वर्गं गच्छ नरेश्वर स्वार्जितं किंचिदप्यस्ति मया हि तपसः फलम् राजंस्त्वं तेजसा तस्य सशरीरो दिवं व्रज

duṣprāpaṁ svaśarīreṇa svargaṁ gaccha nareśvara ।
svārjitaṁ kiṁcidapyasti mayā hi tapasaḥ phalam ।
rājaṁstvaṁ tejasā tasya saśarīro divaṁ vraja ॥

'राजन्! आज तुम अपने इस शरीर के साथ ही दुर्लभ स्वर्गलोक को जाओ। नरेश्वर! यदि मैंने तपस्या का कुछ भी फल प्राप्त किया है तो उसके प्रभाव से तुम सशरीर स्वर्गलोक को जाओ।'

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॥ १ · ६० · १५ ॥
उक्तवाक्ये मुनौ तस्मिन् सशरीरो नरेश्वरः

uktavākye munau tasmin saśarīro nareśvaraḥ ॥

श्रीराम! विश्वामित्र मुनि के इतना कहते ही राजा त्रिशंकु सब मुनियों के देखते-देखते उस समय अपने शरीर के साथ ही स्वर्गलोक को चले गये।

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॥ १ · ६० · १६ ॥
दिवं जगाम काकुत्स्थ मुनीनां पश्यतां तदा स्वर्गलोकं गतं दृष्ट्वा त्रिशङ्कुं पाकशासनः

divaṁ jagāma kākutstha munīnāṁ paśyatāṁ tadā ।
svargalokaṁ gataṁ dṛṣṭvā triśaṅkuṁ pākaśāsanaḥ ॥

त्रिशंकु को स्वर्गलोक में पहुँचा हुआ देख समस्त देवताओं के साथ पाकशासन इन्द्र ने उनसे इस प्रकार कहा—

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॥ १ · ६० · १७ ॥
सह सर्वैः सुरगणैरिदं वचनमब्रवीत् त्रिशङ्को गच्छ भूयस्त्वं नासि स्वर्गकृतालयः

saha sarvaiḥ suragaṇairidaṁ vacanamabravīt ।
triśaṅko gaccha bhūyastvaṁ nāsi svargakṛtālayaḥ ॥

'मूर्ख त्रिशंकु! तू फिर यहाँ से लौट जा, तेरे लिये स्वर्ग में स्थान नहीं है। तू गुरु के शाप से नष्ट हो चुका है, अतः नीचे मुँह किये पुनः पृथ्वी पर गिर जा।'

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॥ १ · ६० · १८ ॥
गुरुशापहतो मूढ पत भूमिमवाक्शिराः एवमुक्तो महेन्द्रेण त्रिशङ्कुरपतत् पुनः

guruśāpahato mūḍha pata bhūmimavākśirāḥ ।
evamukto mahendreṇa triśaṅkurapatat punaḥ ॥

इन्द्र के इतना कहते ही राजा त्रिशंकु तपोधन विश्वामित्र को पुकारकर 'त्राहि-त्राहि' की रट लगाते हुए पुनः स्वर्ग से नीचे गिरे।

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॥ १ · ६० · १९ ॥
विक्रोशमानस्त्राहीति विश्वामित्रं तपोधनम् तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य क्रोशमानस्य कौशिकः

vikrośamānastrāhīti viśvāmitraṁ tapodhanam ।
tacchrutvā vacanaṁ tasya krośamānasya kauśikaḥ ॥

चीखते-चिल्लाते हुए त्रिशंकु की वह करुण पुकार सुनकर कौशिक मुनि को बड़ा क्रोध हुआ। वे त्रिशंकु से बोले—'राजन्! वहीं ठहर जा, वहीं ठहर जा' (उनके ऐसा कहनेपर त्रिशंकु बीच में ही लटके रह गये)।

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॥ १ · ६० · २० ॥
रोषमाहारयत् तीव्रं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ऋषिमध्ये तेजस्वी प्रजापतिरिवापरः

roṣamāhārayat tīvraṁ tiṣṭha tiṣṭheti cābravīt ।
ṛṣimadhye sa tejasvī prajāpatirivāparaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ६० · २१ ॥
सृजन् दक्षिणमार्गस्थान् सप्तर्षीनपरान् पुनः नक्षत्रवंशमपरमसृजत् क्रोधमूर्च्छितः

sṛjan dakṣiṇamārgasthān saptarṣīnaparān punaḥ ।
nakṣatravaṁśamaparamasṛjat krodhamūrcchitaḥ ॥

॥ २०–२१ ॥

तत्पश्चात् तेजस्वी विश्वामित्र ने ऋषिमण्डली के बीच दूसरे प्रजापति के समान दक्षिणमार्ग के लिये नये सप्तर्षियों की सृष्टि की तथा क्रोध से भरकर उन्होंने नवीन नक्षत्रों का भी निर्माण कर डाला।

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॥ १ · ६० · २२ ॥
दक्षिणां दिशमास्थाय ऋषिमध्ये महायशाः सृष्ट्वा नक्षत्रवंशं क्रोधेन कलुषीकृतः

dakṣiṇāṁ diśamāsthāya ṛṣimadhye mahāyaśāḥ ।
sṛṣṭvā nakṣatravaṁśaṁ ca krodhena kaluṣīkṛtaḥ ॥

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॥ १ · ६० · २३ ॥
अन्यमिन्द्रं करिष्यामि लोको वा स्यादनिन्द्रकः दैवतान्यपि क्रोधात् स्रष्टुं समुपचक्रमे

anyamindraṁ kariṣyāmi loko vā syādanindrakaḥ ।
daivatānyapi sa krodhāt sraṣṭuṁ samupacakrame ॥

॥ २२–२३ ॥

वे महायशस्वी मुनि क्रोध से कलुषित हो दक्षिण दिशा में ऋषिमण्डली के बीच नूतन नक्षत्रमालाओं की सृष्टि करके यह विचार करने लगे कि 'मैं दूसरे इन्द्र की सृष्टि करूँगा अथवा मेरे द्वारा रचित स्वर्गलोक बिना इन्द्र के ही रहेगा।' ऐसा निश्चय करके उन्होंने क्रोधपूर्वक नूतन देवताओं की सृष्टि प्रारम्भ की।

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॥ १ · ६० · २४ ॥
ततः परमसम्भ्रान्ताः सर्षिसङ्घाः सुरासुराः विश्वामित्रं महात्मानमूचुः सानुनयं वचः

tataḥ paramasambhrāntāḥ sarṣisaṅghāḥ surāsurāḥ ।
viśvāmitraṁ mahātmānamūcuḥ sānunayaṁ vacaḥ ॥

इससे समस्त देवता, असुर और ऋषि-समुदाय बहुत घबराये और सभी वहाँ आकर महात्मा विश्वामित्र से विनयपूर्वक बोले—

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॥ १ · ६० · २५ ॥
अयं राजा महाभाग गुरुशापपरिक्षतः सशरीरो दिवं यातुं नार्हत्येव तपोधन

ayaṁ rājā mahābhāga guruśāpaparikṣataḥ ।
saśarīro divaṁ yātuṁ nārhatyeva tapodhana ॥

'महाभाग! ये राजा त्रिशंकु गुरु के शाप से अपना पुण्य नष्ट करके चाण्डाल हो गये हैं; अतः तपोधन! ये सशरीर स्वर्ग में जाने के कदापि अधिकारी नहीं हैं।'

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॥ १ · ६० · २६ ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा देवानां मुनिपुंगवः अब्रवीत् सुमहद् वाक्यं कौशिकः सर्वदेवताः

teṣāṁ tad vacanaṁ śrutvā devānāṁ munipuṁgavaḥ ।
abravīt sumahad vākyaṁ kauśikaḥ sarvadevatāḥ ॥

उन देवताओं की यह बात सुनकर मुनिवर कौशिक ने सम्पूर्ण देवताओं से परमोत्कृष्ट वचन कहा—

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॥ १ · ६० · २७ ॥
सशरीरस्य भद्रं वस्त्रिशङ्कोरस्य भूपतेः आरोहणं प्रतिज्ञातं नानृतं कर्तुमुत्सहे

saśarīrasya bhadraṁ vastriśaṅkorasya bhūpateḥ ।
ārohaṇaṁ pratijñātaṁ nānṛtaṁ kartumutsahe ॥

'देवगण! आपका कल्याण हो। मैंने राजा त्रिशंकु को सदेह स्वर्ग भेजने की प्रतिज्ञा कर ली है; अतः उसे मैं झूठी नहीं कर सकता।

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॥ १ · ६० · २८ ॥
स्वर्गोऽस्तु सशरीरस्य त्रिशङ्कोरस्य शाश्वतः नक्षत्राणि सर्वाणि मामकानि ध्रुवाण्यथ

svargo'stu saśarīrasya triśaṅkorasya śāśvataḥ ।
nakṣatrāṇi ca sarvāṇi māmakāni dhruvāṇyatha ॥

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॥ १ · ६० · २९ ॥
यावल्लोका धरिष्यन्ति तिष्ठन्त्वेतानि सर्वशः यत् कृतानि सुराः सर्वे तदनुज्ञातुमर्हथ

yāvallokā dhariṣyanti tiṣṭhantvetāni sarvaśaḥ ।
yat kṛtāni surāḥ sarve tadanujñātumarhatha ॥

॥ २८–२९ ॥

'इन महाराज त्रिशंकु को सदा स्वर्गलोक का सुख प्राप्त होता रहे। मैंने जिन नक्षत्रों का निर्माण किया है, वे सब सदा मौजूद रहें। जबतक संसार रहे, तबतक ये सभी वस्तुएँ, जिनकी मेरे द्वारा सृष्टि हुई है, सदा बनी रहें। देवताओ! आप सब लोग इन बातों का अनुमोदन करें।'

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॥ १ · ६० · ३० ॥
एवमुक्ताः सुराः सर्वे प्रत्यूचुर्मुनिपुंगवम् एवं भवतु भद्रं ते तिष्ठन्त्वेतानि सर्वशः

evamuktāḥ surāḥ sarve pratyūcurmunipuṁgavam ।
evaṁ bhavatu bhadraṁ te tiṣṭhantvetāni sarvaśaḥ ॥

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॥ १ · ६० · ३१ ॥
गगने तान्यनेकानि वैश्वानरपथाद् बहिः नक्षत्राणि मुनिश्रेष्ठ तेषु ज्योतिःषु जाज्वलन्

gagane tānyanekāni vaiśvānarapathād bahiḥ ।
nakṣatrāṇi muniśreṣṭha teṣu jyotiḥṣu jājvalan ॥

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॥ १ · ६० · ३२ ॥
अवाक्शिरास्त्रिशङ्कुश्च तिष्ठत्वमरसंनिभः अनुयास्यन्ति चैतानि ज्योतींषि नृपसत्तमम्

avākśirāstriśaṅkuśca tiṣṭhatvamarasaṁnibhaḥ ।
anuyāsyanti caitāni jyotīṁṣi nṛpasattamam ॥

॥ ३०–३२ ॥

उनके ऐसा कहनेपर सब देवता मुनिवर विश्वामित्र से बोले—'महर्षे! ऐसा ही हो। ये सभी वस्तुएँ बनी रहें और आपका कल्याण हो। मुनिश्रेष्ठ! आपके रचे हुए अनेक नक्षत्र आकाश में वैश्वानरपथ से बाहर प्रकाशित होंगे और उन्हीं ज्योतिर्मय नक्षत्रों के बीच में सिर नीचा किये त्रिशंकु भी प्रकाशमान रहेंगे। वहाँ इनकी स्थिति देवताओं के समान होगी और ये सभी नक्षत्र इन कृतार्थ एवं यशस्वी नृपश्रेष्ठ का स्वर्गीय पुरुष की भाँति अनुसरण करते रहेंगे।'

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॥ १ · ६० · ३३ ॥
कृतार्थं कीर्तिमन्तं स्वर्गलोकगतं यथा विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा सर्वदेवैरभिष्टुतः

kṛtārthaṁ kīrtimantaṁ ca svargalokagataṁ yathā ।
viśvāmitrastu dharmātmā sarvadevairabhiṣṭutaḥ ॥

इसके बाद सम्पूर्ण देवताओं ने ऋषियों के बीच में ही महातेजस्वी धर्मात्मा विश्वामित्र मुनि की स्तुति की। इससे प्रसन्न होकर उन्होंने 'बहुत अच्छा' कहकर देवताओं का अनुरोध स्वीकार कर लिया।

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॥ १ · ६० · ३४ ॥
ऋषिमध्ये महातेजा बाढमित्येव देवताः ततो देवा महात्मानो ऋषयश्च तपोधनाः जग्मुर्यथागतं सर्वे यज्ञस्यान्ते नरोत्तम

ṛṣimadhye mahātejā bāḍhamityeva devatāḥ ।
tato devā mahātmāno ṛṣayaśca tapodhanāḥ ।
jagmuryathāgataṁ sarve yajñasyānte narottama ॥

नरश्रेष्ठ श्रीराम! तदनन्तर यज्ञ समाप्त होनेपर सब देवता और तपोधन महर्षि जैसे आये थे, उसी प्रकार अपने-अपने स्थान को लौट गये।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षष्टितमः सर्गः ॥ ६० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में साठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६० ॥