वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ९ · २० श्लोकाःSarga 9 · 20 ślokas

सुमन्त्र का राजा को ऋष्यशृंग मुनि को बुलाने की सलाह देते हुए उनके अंगदेश में जाने और शान्ता के साथ विवाह करने का प्रसंग सुनाना

Sumantra counsels inviting Ṛṣyaśṛṅga, and tells of his coming to Aṅga and marriage to Śāntā

सुमन्त्र की मन्त्रणा

“सुमन्त्र की मन्त्रणा”
॥ १ · ९ · १–१९ ॥

दीपप्रभायां सूतमन्त्री सुमन्त्रो राज्ञः समीपमुपसृत्य गाढं मन्त्रयते — ऋष्यशृंगमुनिराह्वीयतामिति; तयोरुपरि स्मृतकथेव हरितारण्ये तरुणस्य शृंगिमुनेर्मृदुप्रभा विभाति; राजा नूतनाशया शृणोति।

दीप-प्रभा में सूत-मन्त्री सुमन्त्र राजा के समीप आकर गम्भीरता से सलाह दे रहे हैं कि ऋष्यशृंग मुनि को बुलाया जाय; उनके ऊपर स्मरण की हुई कथा-सी हरे वन में उस तरुण शृंगधारी मुनि की कोमल प्रभा झलक रही है; राजा नयी आशा से सुन रहे हैं।

By lamplight the charioteer-minister Sumantra leans close to the seated king, counselling earnestly that the young sage Rishyashringa be invited; above them, soft as a remembered tale, glows a vision of that innocent horn-browed hermit in a green forest — the legend Sumantra narrates — while the king listens with dawning hope.

॥ १ · ९ · १ ॥
एतच्छ्रुत्वा रहः सूतो राजानमिदमब्रवीत् श्रूयतां तत् पुरावृत्तं पुराणे मया श्रुतम्

etacchrutvā rahaḥ sūto rājānamidamabravīt ।
śrūyatāṁ tat purāvṛttaṁ purāṇe ca mayā śrutam ॥

पुत्र के लिये अश्वमेध यज्ञ करने की बात सुनकर सुमन्त्र ने राजा से एकान्त में कहा — "महाराज! एक पुराना इतिहास सुनिये। मैंने पुराण में भी इसका वर्णन सुना है।"

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॥ १ · ९ · २ ॥
ऋत्विग्भिरुपदिष्टोऽयं पुरावृत्तो मया श्रुतः सनत्कुमारो भगवान् पूर्वं कथितवान् कथाम् ऋषीणां संनिधौ राजंस्तव पुत्रागमं प्रति

ṛtvigbhirupadiṣṭo'yaṁ purāvṛtto mayā śrutaḥ ।
sanatkumāro bhagavān pūrvaṁ kathitavān kathām ॥
ṛṣīṇāṁ saṁnidhau rājaṁstava putrāgamaṁ prati ।

"ऋत्विजों ने पुत्र-प्राप्ति के लिये इस अश्वमेधरूप उपाय का उपदेश किया है; परंतु मैंने इतिहास के रूप में कुछ विशेष बात सुनी है। राजन्! पूर्वकाल में भगवान् सनत्कुमार ने ऋषियों के निकट एक कथा सुनायी थी। वह आपकी पुत्रप्राप्ति से सम्बन्ध रखनेवाली है।"

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॥ १ · ९ · ३ ॥
काश्यपस्य पुत्रोऽस्ति विभाण्डक इति श्रुतः

kāśyapasya ca putro'sti vibhāṇḍaka iti śrutaḥ ॥

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॥ १ · ९ · ४ ॥
ऋष्यशृंग इति ख्यातस्तस्य पुत्रो भविष्यति वने नित्यसंवृद्धो मुनिर्वनचरः सदा

ṛṣyaśṛṁga iti khyātastasya putro bhaviṣyati ।
sa vane nityasaṁvṛddho munirvanacaraḥ sadā ॥

॥ ३–४ ॥

"उन्होंने कहा था — मुनिवरो! महर्षि काश्यप के विभाण्डक नाम से प्रसिद्ध एक पुत्र हैं। उनके भी एक पुत्र होगा, जिसकी लोगों में ऋष्यशृंग नाम से प्रसिद्धि होगी। वे ऋष्यशृंग मुनि सदा वन में ही रहेंगे और वन में ही सदा लालन-पालन पाकर वे बड़े होंगे।"

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॥ १ · ९ · ५ ॥
नान्यं जानाति विप्रेन्द्रो नित्यं पित्रनुवर्तनात् द्वैविध्यं ब्रह्मचर्यस्य भविष्यति महात्मनः लोकेषु प्रथितं राजन् विप्रैश्च कथितं सदा

nānyaṁ jānāti viprendro nityaṁ pitranuvartanāt ।
dvaividhyaṁ brahmacaryasya bhaviṣyati mahātmanaḥ ॥
lokeṣu prathitaṁ rājan vipraiśca kathitaṁ sadā ।

"सदा पिता के ही साथ रहने के कारण विप्रवर ऋष्यशृंग दूसरे किसी को नहीं जानेंगे। राजन्! लोक में ब्रह्मचर्य के दो रूप विख्यात हैं और ब्राह्मणों ने सदा उन दोनों स्वरूपों का वर्णन किया है। एक तो है दण्ड, मेखला आदि धारणरूप मुख्य ब्रह्मचर्य और दूसरा है ऋतुकाल में पत्नी-समागमरूप गौण ब्रह्मचर्य। उन महात्मा के द्वारा उक्त दोनों प्रकार के ब्रह्मचर्यों का पालन होगा।"

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॥ १ · ९ · ६ ॥
तस्यैवं वर्तमानस्य कालः समभिवर्तत अग्निं शुश्रूषमाणस्य पितरं यशस्विनम्

tasyaivaṁ vartamānasya kālaḥ samabhivartata ॥
agniṁ śuśrūṣamāṇasya pitaraṁ ca yaśasvinam ।

"इस प्रकार रहते हुए मुनि का समय अग्नि तथा यशस्वी पिता की सेवा में ही व्यतीत होगा।"

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॥ १ · ९ · ७ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु रोमपादः प्रतापवान्

etasminneva kāle tu romapādaḥ pratāpavān ॥

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॥ १ · ९ · ८ ॥
अंगेषु प्रथितो राजा भविष्यति महाबलः तस्य व्यतिक्रमाद् राज्ञो भविष्यति सुदारुणः अनावृष्टिः सुघोरा वै सर्वलोकभयावहा

aṁgeṣu prathito rājā bhaviṣyati mahābalaḥ ।
tasya vyatikramād rājño bhaviṣyati sudāruṇaḥ ॥
anāvṛṣṭiḥ sughorā vai sarvalokabhayāvahā ।

॥ ७–८ ॥

"उसी समय अंगदेश में रोमपाद नामक एक बड़े प्रतापी और बलवान् राजा होंगे; उनके द्वारा धर्म का उल्लङ्घन हो जाने के कारण उस देश में घोर अनावृष्टि हो जायगी, जो सब लोगों को अत्यन्त भयभीत कर देगी।"

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॥ १ · ९ · ९ ॥
अनावृष्ट्यां तु वृत्तायां राजा दुःखसमन्वितः

anāvṛṣṭyāṁ tu vṛttāyāṁ rājā duḥkhasamanvitaḥ ॥

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॥ १ · ९ · १० ॥
ब्राह्मणाञ्छ्रुतसंवृद्धान् समानीय प्रवक्ष्यति भवन्तः श्रुतकर्माणो लोकचारित्रवेदिनः समादिशन्तु नियमं प्रायश्चित्तं यथा भवेत्

brāhmaṇāñchrutasaṁvṛddhān samānīya pravakṣyati ।
bhavantaḥ śrutakarmāṇo lokacāritravedinaḥ ॥
samādiśantu niyamaṁ prāyaścittaṁ yathā bhavet ।

॥ ९–१० ॥

"वर्षा बंद हो जाने से राजा रोमपाद को भी बहुत दुःख होगा। वे शास्त्रज्ञान में बढ़े-चढ़े ब्राह्मणों को बुलाकर कहेंगे — 'विप्रवरो! आपलोग वेद-शास्त्र के अनुसार कर्म करनेवाले तथा लोगों के आचार-विचार को जाननेवाले हैं; अतः कृपा करके मुझे ऐसा कोई नियम बताइये, जिससे मेरे पाप का प्रायश्चित्त हो जाय।'"

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॥ १ · ९ · ११ ॥
इत्युक्तास्ते ततो राज्ञा सर्वे ब्राह्मणसत्तमाः वक्ष्यन्ति ते महीपालं ब्राह्मणा वेदपारगाः

ityuktāste tato rājñā sarve brāhmaṇasattamāḥ ॥
vakṣyanti te mahīpālaṁ brāhmaṇā vedapāragāḥ ।

"राजा के ऐसा कहने पर वे वेदों के पारंगत विद्वान् — सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण उन्हें इस प्रकार सलाह देंगे—"

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॥ १ · ९ · १२ ॥
विभाण्डकसुतं राजन् सर्वोपायैरिहानय

vibhāṇḍakasutaṁ rājan sarvopāyairihānaya ॥

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॥ १ · ९ · १३ ॥
आनाय्य तु महीपाल ऋष्यशृंगं सुसत्कृतम् विभाण्डकसुतं राजन् ब्राह्मणं वेदपारगम् प्रयच्छ कन्यां शान्तां वै विधिना सुसमाहितः

ānāyya tu mahīpāla ṛṣyaśṛṁgaṁ susatkṛtam ।
vibhāṇḍakasutaṁ rājan brāhmaṇaṁ vedapāragam ।
prayaccha kanyāṁ śāntāṁ vai vidhinā susamāhitaḥ ॥

॥ १२–१३ ॥

"राजन्! विभाण्डक के पुत्र ऋष्यशृंग वेदों के पारगामी विद्वान् हैं। भूपाल! आप सभी उपायों से उन्हें यहाँ ले आइये। बुलाकर उनका भलीभाँति सत्कार कीजिये। फिर एकाग्रचित्त हो वैदिक विधि के अनुसार उनके साथ अपनी कन्या शान्ता का विवाह कर दीजिये।"

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॥ १ · ९ · १४ ॥
तेषां तु वचनं श्रुत्वा राजा चिन्तां प्रपत्स्यते केनोपायेन वै शक्यमिहानेतुं वीर्यवान्

teṣāṁ tu vacanaṁ śrutvā rājā cintāṁ prapatsyate ।
kenopāyena vai śakyamihānetuṁ sa vīryavān ॥

"उनकी बात सुनकर राजा इस चिन्ता में पड़ जायँगे कि किस उपाय से उन शक्तिशाली महर्षि को यहाँ लाया जा सकता है।"

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॥ १ · ९ · १५ ॥
ततो राजा विनिश्चित्य सह मन्त्रिभिरात्मवान् पुरोहितममात्यांश्च प्रेषयिष्यति सत्कृतान्

tato rājā viniścitya saha mantribhirātmavān ।
purohitamamātyāṁśca preṣayiṣyati satkṛtān ॥

"फिर वे मनस्वी नरेश मन्त्रियों के साथ निश्चय करके अपने पुरोहित और मन्त्रियों को सत्कारपूर्वक वहाँ भेजेंगे।"

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॥ १ · ९ · १६ ॥
ते तु राज्ञो वचः श्रुत्वा व्यथिता विनतानानाः गच्छेम ऋषेर्भीता अनुनेष्यन्ति तं नृपम्

te tu rājño vacaḥ śrutvā vyathitā vinatānānāḥ ।
na gacchema ṛṣerbhītā anuneṣyanti taṁ nṛpam ॥

"राजा की बात सुनकर वे मन्त्री और पुरोहित मुँह लटकाकर दुःखी हो यों कहने लगेंगे कि 'हम महर्षि से डरते हैं, इसलिये वहाँ नहीं जायँगे।' यों कहकर वे राजा से बड़ी अनुनय-विनय करेंगे।"

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॥ १ · ९ · १७ ॥
वक्ष्यन्ति चिन्तयित्वा ते तस्योपायांश्च तान् क्षमान् आनेष्यामो वयं विप्रं दोषो भविष्यति

vakṣyanti cintayitvā te tasyopāyāṁśca tān kṣamān ।
āneṣyāmo vayaṁ vipraṁ na ca doṣo bhaviṣyati ॥

"इसके बाद सोच-विचारकर वे राजा को योग्य उपाय बतायेंगे और कहेंगे कि 'हम उन ब्राह्मणकुमार को किसी उपाय से यहाँ ले आयेंगे। ऐसा करने से कोई दोष नहीं घटित होगा।'"

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॥ १ · ९ · १८ ॥
एवमंगाधिपेनैव गणिकाभिर्ऋषेः सुतः आनीतोऽवर्षयद् देवः शान्ता चास्मै प्रदीयते

evamaṁgādhipenaiva gaṇikābhirṛṣeḥ sutaḥ ।
ānīto'varṣayad devaḥ śāntā cāsmai pradīyate ॥

"इस प्रकार वेश्याओं की सहायता से अंगराज मुनिकुमार ऋष्यशृंग को अपने यहाँ बुलायेंगे। उनके आते ही इन्द्रदेव उस राज्य में वर्षा करेंगे। फिर राजा उन्हें अपनी पुत्री शान्ता समर्पित कर देंगे।"

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॥ १ · ९ · १९ ॥
ऋष्यशृंगस्तु जामाता पुत्रांस्तव विधास्यति सनत्कुमारकथितमेतावद् व्याहृतं मया

ṛṣyaśṛṁgastu jāmātā putrāṁstava vidhāsyati ।
sanatkumārakathitametāvad vyāhṛtaṁ mayā ॥

"इस तरह ऋष्यशृंग आपके जामाता हुए। वे ही आपके लिये पुत्रों को सुलभ करानेवाले यज्ञकर्म का सम्पादन करेंगे। यह सनत्कुमारजी की कही हुई बात मैंने आपसे निवेदन की है।"

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॥ १ · ९ · २० ॥
अथ हृष्टो दशरथः सुमन्त्रं प्रत्यभाषत यथर्ष्यशृंगस्त्वानीतो येनोपायेन सोच्यताम्

atha hṛṣṭo daśarathaḥ sumantraṁ pratyabhāṣata ।
yatharṣyaśṛṁgastvānīto yenopāyena socyatām ॥

यह सुनकर राजा दशरथ को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने सुमन्त्र से कहा — "मुनिकुमार ऋष्यशृंग को वहाँ जिस प्रकार और जिस उपाय से बुलाया गया, वह स्पष्टरूप से बताओ।"

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में नवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ॥