वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ४० · ३० श्लोकाःSarga 40 · 30 ślokas

सगरपुत्रों के भावी विनाश की सूचना देकर ब्रह्माजी का देवताओं को शान्त करना, सगर के पुत्रों का पृथ्वी को खोदते हुए कपिलजी के पास पहुँचना और उनके रोष से जलकर भस्म होना

कपिल-कोप

“कपिल-कोप”
॥ १ · ४० · २५–३० ॥

ध्याननिमग्नः कपिलमुनिः, समीपे यज्ञियाश्वः, नेत्राग्निना सगरपुत्रान् भस्मसात् करोति।

गुफा में ध्यानमग्न बैठे मुनि कपिल के पास यज्ञ का अश्व विश्राम कर रहा है; उनकी ललाट-नेत्र से फूटी तेज-धारा ने धावा बोलते सगरपुत्रों को क्षण भर में जलाकर राख का ढेर बना दिया है — उनके हाथ अभी भी उठे हुए दिखते हैं।

Seated in deep meditation within a cave, the sage Kapila is joined by the sacrificial horse at rest; a stream of fire bursting from his glance has, in an instant, reduced the charging sons of Sagara to a heap of ash — their hands still raised in mid-rush.

॥ १ · ४० · १ ॥
देवतानां वचः श्रुत्वा भगवान् वै पितामहः प्रत्युवाच सुसंत्रस्तान् कृतान्तबलमोहितान्

devatānāṁ vacaḥ śrutvā bhagavān vai pitāmahaḥ ।
pratyuvāca susaṁtrastān kṛtāntabalamohitān ॥

देवताओं की बात सुनकर भगवान् ब्रह्माजी ने कितने ही प्राणियों का अन्त करनेवाले सगरपुत्रों के बल से मोहित एवं भयभीत हुए उन देवताओं से इस प्रकार कहा—

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॥ १ · ४० · २ ॥
यस्येयं वसुधा कृत्स्ना वासुदेवस्य धीमतः महिषी माधवस्यैषा एव भगवान् प्रभुः

yasyeyaṁ vasudhā kṛtsnā vāsudevasya dhīmataḥ ।
mahiṣī mādhavasyaiṣā sa eva bhagavān prabhuḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४० · ३ ॥
कापिलं रूपमास्थाय धारयत्यनिशं धराम् तस्य कोपाग्निना दग्धा भविष्यन्ति नृपात्मजाः

kāpilaṁ rūpamāsthāya dhārayatyaniśaṁ dharām ।
tasya kopāgninā dagdhā bhaviṣyanti nṛpātmajāḥ ॥

॥ २–३ ॥

"देवगण! यह सारी पृथ्वी जिन भगवान् वासुदेव की वस्तु है तथा जिन भगवान् लक्ष्मीपति की यह रानी है, वे ही सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरि कपिल मुनि का रूप धारण करके निरन्तर इस पृथ्वी को धारण करते हैं। उनकी कोपाग्नि से ये सारे राजकुमार जलकर भस्म हो जायँगे।"

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॥ १ · ४० · ४ ॥
पृथिव्याश्चापि निर्भेदो दृष्ट एव सनातनः सगरस्य पुत्राणां विनाशो दीर्घदर्शिनाम्

pṛthivyāścāpi nirbhedo dṛṣṭa eva sanātanaḥ ।
sagarasya ca putrāṇāṁ vināśo dīrghadarśinām ॥

"पृथ्वी का यह भेदन सनातन है — प्रत्येक कल्प में अवश्यम्भावी है। (श्रुतियों और स्मृतियों में आये हुए सागर आदि शब्दों से यह बात स्पष्टरूप से ज्ञात होती है।) इसी प्रकार दूरदर्शी पुरुषों ने सगर के पुत्रों का भावी विनाश भी देखा ही है; अतः इस विषय में शोक करना अनुचित है।"

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॥ १ · ४० · ५ ॥
पितामहवचः श्रुत्वा त्रयस्त्रिंशदरिंदमाः देवाः परमसंहृष्टाः पुनर्जग्मुर्यथागतम्

pitāmahavacaḥ śrutvā trayastriṁśadariṁdamāḥ ।
devāḥ paramasaṁhṛṣṭāḥ punarjagmuryathāgatam ॥

ब्रह्माजी का यह कथन सुनकर शत्रुओं का दमन करनेवाले तैंतीस देवता बड़े हर्ष में भरकर जैसे आये थे, उसी तरह पुनः लौट गये।

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॥ १ · ४० · ६ ॥
सगरस्य पुत्राणां प्रादुरासीन्महास्वनः पृथिव्यां भिद्यमानायां निर्घातसमनिःस्वनः

sagarasya ca putrāṇāṁ prādurāsīnmahāsvanaḥ ।
pṛthivyāṁ bhidyamānāyāṁ nirghātasamaniḥsvanaḥ ॥

सगरपुत्रों के हाथ से जब पृथ्वी खोदी जा रही थी, उस समय उससे वज्रपात के समान बड़ा भयंकर शब्द होता था।

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॥ १ · ४० · ७ ॥
ततो भित्त्वा महीं सर्वां कृत्वा चापि प्रदक्षिणाम् सहिताः सागराः सर्वे पितरं वाक्यमब्रुवन्

tato bhittvā mahīṁ sarvāṁ kṛtvā cāpi pradakṣiṇām ।
sahitāḥ sāgarāḥ sarve pitaraṁ vākyamabruvan ॥

इस तरह सारी पृथ्वी खोदकर तथा उसकी परिक्रमा करके वे सभी सगरपुत्र पिता के पास खाली हाथ लौट आये और बोले—

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॥ १ · ४० · ८ ॥
परिक्रान्ता मही सर्वा सत्त्ववन्तश्च सूदिताः देवदानवरक्षांसि पिशाचोरगपन्नगाः

parikrāntā mahī sarvā sattvavantaśca sūditāḥ ।
devadānavarakṣāṁsi piśācoragapannagāḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ४० · ९ ॥
पश्यामहेऽश्वं तमश्वहर्तारमेव किं करिष्याम भद्रं ते बुद्धिरत्र विचार्यताम्

na ca paśyāmahe'śvaṁ tamaśvahartārameva ca ।
kiṁ kariṣyāma bhadraṁ te buddhiratra vicāryatām ॥

॥ ८–९ ॥

"पिताजी! हमने सारी पृथ्वी छान डाली। देवता, दानव, राक्षस, पिशाच और नाग आदि बड़े-बड़े बलवान् प्राणियों को मार डाला। फिर भी हमें न तो कहीं घोड़ा दिखायी दिया और न घोड़े का चुरानेवाला ही। आपका भला हो। अब हम क्या करें? इस विषय में आप ही कोई उपाय सोचिये।"

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॥ १ · ४० · १० ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा पुत्राणां राजसत्तमः समन्युरब्रवीद् वाक्यं सगरो रघुनन्दन

teṣāṁ tad vacanaṁ śrutvā putrāṇāṁ rājasattamaḥ ।
samanyurabravīd vākyaṁ sagaro raghunandana ॥

रघुनन्दन! पुत्रों का यह वचन सुनकर राजाओं में श्रेष्ठ सगर ने उनसे कुपित होकर कहा—

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॥ १ · ४० · ११ ॥
भूयः खनत भद्रं वो विभेद्य वसुधातलम् अश्वहर्तारमासाद्य कृतार्थाश्च निवर्तत

bhūyaḥ khanata bhadraṁ vo vibhedya vasudhātalam ।
aśvahartāramāsādya kṛtārthāśca nivartata ॥

"जाओ, फिर से सारी पृथ्वी खोदो और इसे विदीर्ण करके घोड़े के चोर का पता लगाओ। चोर तक पहुँचकर काम पूरा होने पर ही लौटना।"

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॥ १ · ४० · १२ ॥
पितुर्वचनमासाद्य सगरस्य महात्मनः षष्टिः पुत्रसहस्राणि रसातलमभिद्रवन्

piturvacanamāsādya sagarasya mahātmanaḥ ।
ṣaṣṭiḥ putrasahasrāṇi rasātalamabhidravan ॥

अपने महात्मा पिता सगर की यह आज्ञा शिरोधार्य करके वे साठ हजार राजकुमार रसातल की ओर बढ़े (और रोष में भरकर पृथ्वी खोदने लगे)।

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॥ १ · ४० · १३ ॥
खन्यमाने ततस्तस्मिन् ददृशुः पर्वतोपमम् दिशागजं विरूपाक्षं धारयन्तं महीतलम्

khanyamāne tatastasmin dadṛśuḥ parvatopamam ।
diśāgajaṁ virūpākṣaṁ dhārayantaṁ mahītalam ॥

उस खुदाई के समय ही उन्हें एक पर्वताकार दिग्गज दिखायी दिया, जिसका नाम विरूपाक्ष है। वह इस भूतल को धारण किये हुए था।

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॥ १ · ४० · १४ ॥
सपर्वतवनां कृत्स्नां पृथिवीं रघुनन्दन धारयामास शिरसा विरूपाक्षो महागजः

saparvatavanāṁ kṛtsnāṁ pṛthivīṁ raghunandana ।
dhārayāmāsa śirasā virūpākṣo mahāgajaḥ ॥

रघुनन्दन! महान् गजराज विरूपाक्ष ने पर्वत और वनोंसहित इस सम्पूर्ण पृथ्वी को अपने मस्तक पर धारण कर रखा था।

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॥ १ · ४० · १५ ॥
यदा पर्वणि काकुत्स्थ विश्रमार्थं महागजः खेदाच्चालयते शीर्षं भूमिकम्पस्तदा भवेत्

yadā parvaṇi kākutstha viśramārthaṁ mahāgajaḥ ।
khedāccālayate śīrṣaṁ bhūmikampastadā bhavet ॥

काकुत्स्थ! वह महान् दिग्गज जिस समय थककर विश्राम के लिये अपने मस्तक को इधर-उधर हटाता था, उस समय भूकम्प होने लगता था।

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॥ १ · ४० · १६ ॥
ते तं प्रदक्षिणं कृत्वा दिशापालं महागजम् मानयन्तो हि ते राम जग्मुर्भित्त्वा रसातलम्

te taṁ pradakṣiṇaṁ kṛtvā diśāpālaṁ mahāgajam ।
mānayanto hi te rāma jagmurbhittvā rasātalam ॥

श्रीराम! पूर्व दिशा की रक्षा करनेवाले विशाल गजराज विरूपाक्ष की परिक्रमा करके उसका सम्मान करते हुए वे सगरपुत्र रसातल को भेदन करके आगे बढ़ गये।

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॥ १ · ४० · १७ ॥
ततः पूर्वां दिशं भित्त्वा दक्षिणां बिभिदुः पुनः दक्षिणस्यामपि दिशि ददृशुस्ते महागजम्

tataḥ pūrvāṁ diśaṁ bhittvā dakṣiṇāṁ bibhiduḥ punaḥ ।
dakṣiṇasyāmapi diśi dadṛśuste mahāgajam ॥

पूर्व दिशा का भेदन करने के पश्चात् वे पुनः दक्षिण दिशा की भूमि को खोदने लगे। दक्षिण दिशा में भी उन्हें एक महान् दिग्गज दिखायी दिया।

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॥ १ · ४० · १८ ॥
महापद्मं महात्मानं सुमहत्पर्वतोपमम् शिरसा धारयन्तं गां विस्मयं जग्मुरुत्तमम्

mahāpadmaṁ mahātmānaṁ sumahatparvatopamam ।
śirasā dhārayantaṁ gāṁ vismayaṁ jagmuruttamam ॥

उसका नाम महापद्म था। महान् पर्वत के समान ऊँचा वह विशालकाय गजराज अपने मस्तक पर पृथ्वी को धारण करता था। उसे देखकर उन राजकुमारों को बड़ा विस्मय हुआ।

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॥ १ · ४० · १९ ॥
ते तं प्रदक्षिणं कृत्वा सगरस्य महात्मनः षष्टिः पुत्रसहस्राणि पश्चिमां बिभिदुर्दिशम्

te taṁ pradakṣiṇaṁ kṛtvā sagarasya mahātmanaḥ ।
ṣaṣṭiḥ putrasahasrāṇi paścimāṁ bibhidurdiśam ॥

महात्मा सगर के वे साठ हजार पुत्र उस दिग्गज की परिक्रमा करके पश्चिम दिशा की भूमि को भेदन करने लगे।

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॥ १ · ४० · २० ॥
पश्चिमायामपि दिशि महान्तमचलोपमम् दिशागजं सौमनसं ददृशुस्ते महाबलाः

paścimāyāmapi diśi mahāntamacalopamam ।
diśāgajaṁ saumanasaṁ dadṛśuste mahābalāḥ ॥

पश्चिम दिशा में भी उन महाबली सगरपुत्रों ने महान् पर्वताकार दिग्गज सौमनस का दर्शन किया।

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॥ १ · ४० · २१ ॥
ते तं प्रदक्षिणं कृत्वा पृष्ट्वा चापि निरामयम् खनन्तः समुपाक्रान्ता दिशं सोमवतीं तदा

te taṁ pradakṣiṇaṁ kṛtvā pṛṣṭvā cāpi nirāmayam ।
khanantaḥ samupākrāntā diśaṁ somavatīṁ tadā ॥

उसकी भी परिक्रमा करके उसका कुशल-समाचार पूछकर वे सभी राजकुमार भूमि खोदते हुए उत्तर दिशा में जा पहुँचे।

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॥ १ · ४० · २२ ॥
उत्तरस्यां रघुश्रेष्ठ ददृशुर्हिमपाण्डुरम् भद्रं भद्रेण वपुषा धारयन्तं महीमिमाम्

uttarasyāṁ raghuśreṣṭha dadṛśurhimapāṇḍuram ।
bhadraṁ bhadreṇa vapuṣā dhārayantaṁ mahīmimām ॥

रघुश्रेष्ठ! उत्तर दिशा में उन्हें हिम के समान श्वेत भद्र नामक दिग्गज दिखायी दिया, जो अपने कल्याणमय शरीर से इस पृथ्वी को धारण किये हुए था।

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॥ १ · ४० · २३ ॥
समालभ्य ततः सर्वे कृत्वा चैनं प्रदक्षिणम् षष्टिः पुत्रसहस्राणि बिभिदुर्वसुधातलम्

samālabhya tataḥ sarve kṛtvā cainaṁ pradakṣiṇam ।
ṣaṣṭiḥ putrasahasrāṇi bibhidurvasudhātalam ॥

उसका कुशल-समाचार पूछकर राजा सगर के वे सभी साठ हजार पुत्र उसकी परिक्रमा करने के पश्चात् भूमि खोदने के काम में जुट गये।

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॥ १ · ४० · २४ ॥
ततः प्रागुत्तरां गत्वा सागराः प्रथितां दिशम् रोषादभ्यखनन् सर्वे पृथिवीं सगरात्मजाः

tataḥ prāguttarāṁ gatvā sāgarāḥ prathitāṁ diśam ।
roṣādabhyakhanan sarve pṛthivīṁ sagarātmajāḥ ॥

तदनन्तर सुविख्यात पूर्वोत्तर दिशा में जाकर उन सगरकुमारों ने एक साथ होकर रोषपूर्वक पृथ्वी को खोदना आरम्भ किया।

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॥ १ · ४० · २५ ॥
ते तु सर्वे महात्मानो भीमवेगा महाबलाः ददृशुः कपिलं तत्र वासुदेवं सनातनम्

te tu sarve mahātmāno bhīmavegā mahābalāḥ ।
dadṛśuḥ kapilaṁ tatra vāsudevaṁ sanātanam ॥

इस बार उन सभी महामना, महाबली एवं भयानक वेगशाली राजकुमारों ने वहाँ सनातन वासुदेवस्वरूप भगवान् कपिल को देखा।

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॥ १ · ४० · २६ ॥
हयं तस्य देवस्य चरन्तमविदूरतः प्रहर्षमतुलं प्राप्ताः सर्वे ते रघुनन्दन

hayaṁ ca tasya devasya carantamavidūrataḥ ।
praharṣamatulaṁ prāptāḥ sarve te raghunandana ॥

राजा सगर के यज्ञ का वह घोड़ा भी भगवान् कपिल के पास ही चर रहा था। रघुनन्दन! उसे देखकर उन सबको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ।

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॥ १ · ४० · २७ ॥
ते तं यज्ञहनं ज्ञात्वा क्रोधपर्याकुलेक्षणाः खनित्रलाङ्गलधरा नानावृक्षशिलाधराः

te taṁ yajñahanaṁ jñātvā krodhaparyākulekṣaṇāḥ ।
khanitralāṅgaladharā nānāvṛkṣaśilādharāḥ ॥

भगवान् कपिल को अपने यज्ञ में विघ्न डालनेवाला जानकर उनकी आँखें क्रोध से लाल हो गयीं। उन्होंने अपने हाथों में खंती, हल और नाना प्रकार के वृक्ष एवं पत्थरों के टुकड़े ले रखे थे।

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॥ १ · ४० · २८ ॥
अभ्यधावन्त संक्रुद्धास्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रुवन् अस्माकं त्वं हि तुरगं यज्ञियं हृतवानसि दुर्मेधस्त्वं हि सम्प्राप्तान् विद्धि नः सगरात्मजान्

abhyadhāvanta saṁkruddhāstiṣṭha tiṣṭheti cābruvan ।
asmākaṁ tvaṁ hi turagaṁ yajñiyaṁ hṛtavānasi ॥
durmedhastvaṁ hi samprāptān viddhi naḥ sagarātmajān ।

वे अत्यन्त रोष से भरकर उनकी ओर दौड़े और बोले — "अरे! खड़ा रह, खड़ा रह। तू ही हमारे यज्ञ के घोड़े को यहाँ चुरा लाया है। दुर्बुद्धे! अब हम आ गये। तू समझ ले, हम महाराज सगर के पुत्र हैं।"

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॥ १ · ४० · २९ ॥
श्रुत्वा तद् वचनं तेषां कपिलो रघुनन्दन रोषेण महताविष्टो हुङ्कारमकरोत् तदा

śrutvā tad vacanaṁ teṣāṁ kapilo raghunandana ॥
roṣeṇa mahatāviṣṭo huṅkāramakarot tadā ।

रघुनन्दन! उनकी बात सुनकर भगवान् कपिल को बड़ा रोष हुआ और उस रोष के आवेश में ही उनके मुँह से एक हुंकार निकल पड़ा।

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॥ १ · ४० · ३० ॥
ततस्तेनाप्रमेयेण कपिलेन महात्मना भस्मराशीकृताः सर्वे काकुत्स्थ सगरात्मजाः

tatastenāprameyeṇa kapilena mahātmanā ।
bhasmarāśīkṛtāḥ sarve kākutstha sagarātmajāḥ ॥

श्रीराम! उस हुंकार के साथ ही उन अनन्त प्रभावशाली महात्मा कपिल ने उन सभी सगरपुत्रों को जलाकर राख का ढेर कर दिया।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४० ॥