वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ५२ · २३ श्लोकाःSarga 52 · 23 ślokas

महर्षि वसिष्ठद्वारा विश्वामित्रका सत्कार और कामधेनुको अभीष्ट वस्तुओंकी सृष्टि करनेका आदेश

कामधेनु का सत्कार

“कामधेनु का सत्कार”
॥ १ · ५२ · २०–२३ ॥

वसिष्ठः कमण्डलुधरः शबलाम् आह्वयति, या पुष्पमालिनी दिव्यप्रभया दीप्ता षड्रसान्नराशिं सृजति; पार्श्वे मुकुटी विश्वामित्रः ससैन्यः विस्मितः तिष्ठति।

कमण्डलु लिये महर्षि वसिष्ठ ने अपनी चितकबरी होम-धेनु शबला को बुलाया है — पुष्पमाला पहने वह दिव्य कामधेनु सुनहरी प्रभा बिखेरती खड़ी है और उसके चारों ओर थालियों में फल तथा षड्रस भोजन के ढेर प्रकट हो रहे हैं; पीछे मुकुटधारी विश्वामित्र अपनी सेना के साथ इस चमत्कार को विस्मय से देख रहे हैं।

Kamandalu in hand, the sage Vasishtha has summoned his dappled cow Shabala — the divine Kamadhenu, garlanded with flowers, stands wrapped in golden radiance as heaped platters of fruit and the six-flavoured feast appear around her, while the crowned Vishvamitra and his army look on in wonder.

॥ १ · ५२ · १ ॥
तं दृष्ट्वा परमप्रीतो विश्वामित्रो महाबलः प्रणतो विनयाद् वीरो वसिष्ठं जपतां वरम्

taṁ dṛṣṭvā paramaprīto viśvāmitro mahābalaḥ ।
praṇato vinayād vīro vasiṣṭhaṁ japatāṁ varam ॥

जप करनेवालों में श्रेष्ठ वसिष्ठ का दर्शन करके महाबली वीर विश्वामित्र बड़े प्रसन्न हुए और विनयपूर्वक उन्होंने उनके चरणों में प्रणाम किया।

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॥ १ · ५२ · २ ॥
स्वागतं तव चेत्युक्तो वसिष्ठेन महात्मना आसनं चास्य भगवान् वसिष्ठो व्यादिदेश

svāgataṁ tava cetyukto vasiṣṭhena mahātmanā ।
āsanaṁ cāsya bhagavān vasiṣṭho vyādideśa ha ॥

तब महात्मा वसिष्ठ ने कहा—'राजन्! तुम्हारा स्वागत है।' ऐसा कहकर भगवान् वसिष्ठ ने उन्हें बैठने के लिये आसन दिया।

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॥ १ · ५२ · ३ ॥
उपविष्टाय तदा विश्वामित्राय धीमते यथान्यायं मुनिवरः फलमूलमुपाहरत्

upaviṣṭāya ca tadā viśvāmitrāya dhīmate ।
yathānyāyaṁ munivaraḥ phalamūlamupāharat ॥

जब बुद्धिमान् विश्वामित्र आसन पर विराजमान हुए, तब मुनिवर वसिष्ठ ने उन्हें विधिपूर्वक फल-मूल का उपहार अर्पित किया।

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॥ १ · ५२ · ४ ॥
प्रतिगृह्य तु तां पूजां वसिष्ठाद् राजसत्तमः तपोऽग्निहोत्रशिष्येषु कुशलं पर्यपृच्छत

pratigṛhya tu tāṁ pūjāṁ vasiṣṭhād rājasattamaḥ ।
tapo'gnihotraśiṣyeṣu kuśalaṁ paryapṛcchata ॥

वसिष्ठजी से वह आतिथ्य-सत्कार ग्रहण करके राजशिरोमणि महातेजस्वी विश्वामित्र ने उनके तप, अग्निहोत्र, शिष्यवर्ग और लता-वृक्ष आदि का कुशल-समाचार पूछा।

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॥ १ · ५२ · ५ ॥
विश्वामित्रो महातेजा वनस्पतिगणे तदा सर्वत्र कुशलं प्राह वसिष्ठो राजसत्तमम्

viśvāmitro mahātejā vanaspatigaṇe tadā ।
sarvatra kuśalaṁ prāha vasiṣṭho rājasattamam ॥

फिर वसिष्ठजी ने उन नृपश्रेष्ठ से सबके सकुशल होने की बात बतायी।

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॥ १ · ५२ · ६ ॥
सुखोपविष्टं राजानं विश्वामित्रं महातपाः पप्रच्छ जपतां श्रेष्ठो वसिष्ठो ब्रह्मणः सुतः

sukhopaviṣṭaṁ rājānaṁ viśvāmitraṁ mahātapāḥ ।
papraccha japatāṁ śreṣṭho vasiṣṭho brahmaṇaḥ sutaḥ ॥

फिर जप करनेवालों में श्रेष्ठ ब्रह्मकुमार महातपस्वी वसिष्ठ ने वहाँ सुखपूर्वक बैठे हुए राजा विश्वामित्र से इस प्रकार पूछा—

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॥ १ · ५२ · ७ ॥
कच्चित्ते कुशलं राजन् कच्चिद् धर्मेण रञ्जयन् प्रजाः पालयसे राजन् राजवृत्तेन धार्मिक

kaccitte kuśalaṁ rājan kaccid dharmeṇa rañjayan ।
prajāḥ pālayase rājan rājavṛttena dhārmika ॥

'राजन्! तुम सकुशल तो हो न? धर्मात्मा नरेश! क्या तुम धर्मपूर्वक प्रजा को प्रसन्न रखते हुए राजोचित रीति-नीति से प्रजावर्ग का पालन करते हो?'

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॥ १ · ५२ · ८ ॥
कच्चित्ते सम्भृता भृत्याः कच्चित् तिष्ठन्ति शासने कच्चित्ते विजिता सर्वे रिपवो रिपुसूदन

kaccitte sambhṛtā bhṛtyāḥ kaccit tiṣṭhanti śāsane ।
kaccitte vijitā sarve ripavo ripusūdana ॥

'शत्रुसूदन! क्या तुमने अपने भृत्यों का अच्छी तरह भरण-पोषण किया है? क्या वे तुम्हारी आज्ञा के अधीन रहते हैं? क्या तुमने समस्त शत्रुओं पर विजय पा ली है?'

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॥ १ · ५२ · ९ ॥
कच्चिद् बलेषु कोशेषु मित्रेषु परंतप कुशलं ते नरव्याघ्र पुत्रपौत्रे तथानघ

kaccid baleṣu kośeṣu mitreṣu ca paraṁtapa ।
kuśalaṁ te naravyāghra putrapautre tathānagha ॥

'शत्रुओं को संताप देनेवाले पुरुषसिंह निष्पाप नरेश! क्या तुम्हारी सेना, कोश, मित्रवर्ग तथा पुत्र-पौत्र आदि सब सकुशल हैं?'

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॥ १ · ५२ · १० ॥
सर्वत्र कुशलं राजा वसिष्ठं प्रत्युदाहरत् विश्वामित्रो महातेजा वसिष्ठं विनयान्वितम्

sarvatra kuśalaṁ rājā vasiṣṭhaṁ pratyudāharat ।
viśvāmitro mahātejā vasiṣṭhaṁ vinayānvitam ॥

तब महातेजस्वी राजा विश्वामित्र ने विनयशील महर्षि वसिष्ठ को उत्तर दिया—'हाँ भगवन्! मेरे यहाँ सर्वत्र कुशल है।'

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॥ १ · ५२ · ११ ॥
कृत्वा तौ सुचिरं कालं धर्मिष्ठौ ताः कथास्तदा मुदा परमया युक्तौ प्रीयेतां तौ परस्परम्

kṛtvā tau suciraṁ kālaṁ dharmiṣṭhau tāḥ kathāstadā ।
mudā paramayā yuktau prīyetāṁ tau parasparam ॥

तत्पश्चात् वे दोनों धर्मात्मा पुरुष बड़ी प्रसन्नता के साथ बहुत देर तक परस्पर वार्तालाप करते रहे। उस समय एक का दूसरे के साथ बड़ा प्रेम हो गया।

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॥ १ · ५२ · १२ ॥
ततो वसिष्ठो भगवान् कथान्ते रघुनन्दन विश्वामित्रमिदं वाक्यमुवाच प्रहसन्निव

tato vasiṣṭho bhagavān kathānte raghunandana ।
viśvāmitramidaṁ vākyamuvāca prahasanniva ॥

रघुनन्दन! बातचीत करने के पश्चात् भगवान् वसिष्ठ ने विश्वामित्र से हँसते-से इस प्रकार कहा—

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॥ १ · ५२ · १३ ॥
आतिथ्यं कर्तुमिच्छामि बलस्यास्य महाबल तव चैवाप्रमेयस्य यथार्हं सम्प्रतीच्छ मे

ātithyaṁ kartumicchāmi balasyāsya mahābala ।
tava caivāprameyasya yathārhaṁ sampratīccha me ॥

'महाबली नरेश! तुम्हारा प्रभाव असीम है। मैं तुम्हारा और तुम्हारी इस सेना का यथायोग्य आतिथ्य-सत्कार करना चाहता हूँ। तुम मेरे इस अनुरोध को स्वीकार करो।'

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॥ १ · ५२ · १४ ॥
सत्क्रियां हि भवानेतां प्रतीच्छतु मया कृताम् राजंस्त्वमतिथिश्रेष्ठः पूजनीयः प्रयत्नतः

satkriyāṁ hi bhavānetāṁ pratīcchatu mayā kṛtām ।
rājaṁstvamatithiśreṣṭhaḥ pūjanīyaḥ prayatnataḥ ॥

'राजन्! तुम अतिथियों में श्रेष्ठ हो, इसलिये यत्नपूर्वक तुम्हारा सत्कार करना मेरा कर्तव्य है। अतः मेरे द्वारा किये गये इस सत्कार को तुम ग्रहण करो।'

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॥ १ · ५२ · १५ ॥
एवमुक्तो वसिष्ठेन विश्वामित्रो महामतिः कृतमित्यब्रवीद् राजा पूजावाक्येन मे त्वया

evamukto vasiṣṭhena viśvāmitro mahāmatiḥ ।
kṛtamityabravīd rājā pūjāvākyena me tvayā ॥

वसिष्ठ के ऐसा कहने पर महाबुद्धिमान् राजा विश्वामित्र ने कहा—'मुने! आपके सत्कारपूर्ण वचनों से ही मेरा पूजा-सत्कार हो गया।'

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॥ १ · ५२ · १६ ॥
फलमूलेन भगवन् विद्यते यत् तवाश्रमे पाद्येनाचमनीयेन भगवद्दर्शनेन

phalamūlena bhagavan vidyate yat tavāśrame ।
pādyenācamanīyena bhagavaddarśanena ca ॥

'भगवन्! आपके आश्रम पर जो विद्यमान हैं, उन फल-मूल, पाद्य और आचमनीय आदि वस्तुओं से मेरा भलीभाँति आदर-सत्कार हुआ। सबसे बढ़कर जो आपका दर्शन हुआ, इससे मेरी पूजा हो गयी।'

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॥ १ · ५२ · १७ ॥
सर्वथा महाप्राज्ञ पूजार्हेण सुपूजितः नमस्तेऽस्तु गमिष्यामि मैत्रेणेक्षस्व चक्षुषा

sarvathā ca mahāprājña pūjārheṇa supūjitaḥ ।
namaste'stu gamiṣyāmi maitreṇekṣasva cakṣuṣā ॥

'महाज्ञानी महर्षे! आप सर्वथा मेरे पूजनीय हैं तो भी आपने मेरा भलीभाँति पूजन किया। आपको नमस्कार है। अब मैं यहाँ से जाऊँगा। आप मैत्रीपूर्ण दृष्टि से मेरी ओर देखिये।'

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॥ १ · ५२ · १८ ॥
एवं ब्रुवन्तं राजानं वसिष्ठः पुनरेव हि न्यमन्त्रयत धर्मात्मा पुनः पुनरुदारधीः

evaṁ bruvantaṁ rājānaṁ vasiṣṭhaḥ punareva hi ।
nyamantrayata dharmātmā punaḥ punarudāradhīḥ ॥

ऐसा कहते हुए राजा विश्वामित्र से उदारचेता धर्मात्मा वसिष्ठ ने निमन्त्रण स्वीकार करने के लिये बारम्बार आग्रह किया।

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॥ १ · ५२ · १९ ॥
बाढमित्येव गाधेयो वसिष्ठं प्रत्युवाच यथाप्रियं भगवतस्तथास्तु मुनिपुंगव

bāḍhamityeva gādheyo vasiṣṭhaṁ pratyuvāca ha ।
yathāpriyaṁ bhagavatastathāstu munipuṁgava ॥

तब गाधिनन्दन विश्वामित्र ने उन्हें उत्तर देते हुए कहा—'बहुत अच्छा। मुझे आपकी आज्ञा स्वीकार है। मुनिप्रवर! आप मेरे पूज्य हैं। आपकी जैसी रुचि हो—आपको जो प्रिय लगे, वही हो।'

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॥ १ · ५२ · २० ॥
एवमुक्तस्तथा तेन वसिष्ठो जपतां वरः आजुहाव ततः प्रीतः कल्मार्षीं धूतकल्मषाम्

evamuktastathā tena vasiṣṭho japatāṁ varaḥ ।
ājuhāva tataḥ prītaḥ kalmārṣīṁ dhūtakalmaṣām ॥

राजा के ऐसा कहने पर जप करनेवालों में श्रेष्ठ मुनिवर वसिष्ठ बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने अपनी उस चितकबरी होम-धेनु को बुलाया, जिसके पाप (अथवा मैल) धुल गये थे (वह कामधेनु थी)।

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॥ १ · ५२ · २१ ॥
एह्येहि शबले क्षिप्रं शृणु चापि वचो मम सबलस्यास्य राजर्षेः कर्तुं व्यवसितोऽस्म्यहम् भोजनेन महार्हेण सत्कारं संविधत्स्व मे

ehyehi śabale kṣipraṁ śṛṇu cāpi vaco mama ।
sabalasyāsya rājarṣeḥ kartuṁ vyavasito'smyaham ।
bhojanena mahārheṇa satkāraṁ saṁvidhatsva me ॥

(उसे बुलाकर ऋषि ने कहा—) 'शबले! शीघ्र आओ, आओ और मेरी यह बात सुनो—मैंने सेनासहित इन राजर्षि का महाराजाओं के योग्य उत्तम भोजन आदि के द्वारा आतिथ्य-सत्कार करने का निश्चय किया है। तुम मेरे इस मनोरथ को सफल करो।'

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॥ १ · ५२ · २२ ॥
यस्य यस्य यथाकामं षड्रसेष्वभिपूजितम् तत्सर्वं कामधुग् दिव्ये अभिवर्ष कृते मम

yasya yasya yathākāmaṁ ṣaḍraseṣvabhipūjitam ।
tatsarvaṁ kāmadhug divye abhivarṣa kṛte mama ॥

'षड्रस भोजनों में से जिसको जो-जो पसंद हो, उसके लिये वह सब प्रस्तुत कर दो। दिव्य कामधेनो! आज मेरे कहने से इन अतिथियों के लिये अभीष्ट वस्तुओं की वर्षा करो।'

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॥ १ · ५२ · २३ ॥
रसेनान्नेन पानेन लेह्यचोष्येण संयुतम् अन्नानां निचयं सर्वं सृजस्व शबले त्वर

rasenānnena pānena lehyacoṣyeṇa saṁyutam ।
annānāṁ nicayaṁ sarvaṁ sṛjasva śabale tvara ॥

'शबले! सरस पदार्थ, अन्न, पान, लेह्य (चटनी आदि) और चोष्य (चूसने की वस्तु) से युक्त भाँति-भाँति के अन्नों की ढेरी लगा दो। सभी आवश्यक वस्तुओं की सृष्टि कर दो। शीघ्रता करो—विलम्ब न होने पावे।'

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः ॥ ५२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५२ ॥