वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ५१ · २८ श्लोकाःSarga 51 · 28 ślokas

शतानन्दके पूछनेपर विश्वामित्रका उन्हें श्रीरामके द्वारा अहल्याके उद्धारका समाचार बताना तथा शतानन्दद्वारा श्रीरामका अभिनन्दन करते हुए विश्वामित्रजीके पूर्वचरित्रका वर्णन

वसिष्ठ-आश्रम में विश्वामित्र

“वसिष्ठ-आश्रम में विश्वामित्र”
॥ १ · ५१ · २२–२४ ॥

श्वेताश्वारूढः सुवर्णकवची राजा विश्वामित्रः ससैन्यः वसिष्ठस्य रम्यम् आश्रमम् आगच्छति, यत्र श्वेतवस्त्रः वसिष्ठः बद्धाञ्जलिः तम् अभिनन्दति।

सोने के कवच और मुकुट से सज्जित राजा विश्वामित्र श्वेत अश्व पर सवार, पीछे ध्वजाओं, हाथी और अक्षौहिणी सेना के साथ वसिष्ठ के उस रमणीय आश्रम में आ पहुँचे हैं — और श्वेत वस्त्र धारण किये, श्वेत श्मश्रुवाले महर्षि वसिष्ठ हाथ जोड़े राजर्षि का स्वागत कर रहे हैं।

Clad in golden armour and crown, King Vishvamitra rides his white horse into Vasishtha's lovely hermitage, his banners, elephant and vast army massed behind him — while the white-robed, white-bearded sage Vasishtha, palms joined, greets the royal visitor at the forest's edge.

॥ १ · ५१ · १ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रस्य धीमतः हृष्टरोमा महातेजाः शतानन्दो महातपाः

tasya tad vacanaṁ śrutvā viśvāmitrasya dhīmataḥ ।
hṛṣṭaromā mahātejāḥ śatānando mahātapāḥ ॥

परम बुद्धिमान् विश्वामित्रजी की वह बात सुनकर महातेजस्वी महातपस्वी शतानन्दजी के शरीर में रोमाञ्च हो आया।

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॥ १ · ५१ · २ ॥
गौतमस्य सुतो ज्येष्ठस्तपसा द्योतितप्रभः रामसंदर्शनादेव परं विस्मयमागतः

gautamasya suto jyeṣṭhastapasā dyotitaprabhaḥ ।
rāmasaṁdarśanādeva paraṁ vismayamāgataḥ ॥

वे गौतम के ज्येष्ठ पुत्र थे। तपस्या से उनकी कान्ति प्रकाशित हो रही थी। वे श्रीरामचन्द्रजी के दर्शनमात्र से ही बड़े विस्मित हुए।

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॥ १ · ५१ · ३ ॥
एतौ निषण्णौ सम्प्रेक्ष्य शतानन्दो नृपात्मजौ सुखासीनौ मुनिश्रेष्ठं विश्वामित्रमथाब्रवीत्

etau niṣaṇṇau samprekṣya śatānando nṛpātmajau ।
sukhāsīnau muniśreṣṭhaṁ viśvāmitramathābravīt ॥

उन दोनों राजकुमारों को सुखपूर्वक बैठे देख शतानन्द ने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रजी से पूछा—

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॥ १ · ५१ · ४ ॥
अपि ते मुनिशार्दूल मम माता यशस्विनी दर्शिता राजपुत्राय तपोदीर्घमुपागता

api te muniśārdūla mama mātā yaśasvinī ।
darśitā rājaputrāya tapodīrghamupāgatā ॥

"मुनिप्रवर! मेरी यशस्विनी माता अहल्या बहुत दिनों से तपस्या कर रही थीं। क्या आपने राजकुमार श्रीराम को उनका दर्शन कराया?"

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॥ १ · ५१ · ५ ॥
अपि रामे महातेजा मम माता यशस्विनी वन्यैरुपाहरत् पूजां पूजाहे सर्वदेहिनाम्

api rāme mahātejā mama mātā yaśasvinī ।
vanyairupāharat pūjāṁ pūjāhe sarvadehinām ॥

"क्या मेरी महातेजस्विनी एवं यशस्विनी माता अहल्या ने वन में होनेवाले फल-फूल आदि से समस्त देहधारियों के लिये पूजनीय श्रीरामचन्द्रजी का पूजन (आदर-सत्कार) किया था?"

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॥ १ · ५१ · ६ ॥
अपि रामाय कथितं यद् वृत्तं तत् पुरातनम् मम मातुर्महातेजो देवेन दुरनुष्ठितम्

api rāmāya kathitaṁ yad vṛttaṁ tat purātanam ।
mama māturmahātejo devena duranuṣṭhitam ॥

"महातेजस्वी मुने! क्या आपने श्रीराम से वह प्राचीन वृत्तान्त कहा था, जो मेरी माता के प्रति देवराज इन्द्रद्वारा किये गये छल-कपट एवं दुराचारद्वारा घटित हुआ था?"

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॥ १ · ५१ · ७ ॥
अपि कौशिक भद्रं ते गुरुणा मम संगता मम माता मुनिश्रेष्ठ रामसंदर्शनादितः

api kauśika bhadraṁ te guruṇā mama saṁgatā ।
mama mātā muniśreṣṭha rāmasaṁdarśanāditaḥ ॥

"मुनिश्रेष्ठ कौशिक! आपका कल्याण हो। क्या श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन आदि के प्रभाव से मेरी माता शापमुक्त हो पिताजी से जा मिलीं?"

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॥ १ · ५१ · ८ ॥
अपि मे गुरुणा रामः पूजितः कुशिकात्मज इहागतो महातेजाः पूजां प्राप्य महात्मनः

api me guruṇā rāmaḥ pūjitaḥ kuśikātmaja ।
ihāgato mahātejāḥ pūjāṁ prāpya mahātmanaḥ ॥

"कुशिकनन्दन! क्या मेरे पिता ने श्रीराम का पूजन किया था? क्या उन महात्मा की पूजा ग्रहण करके ये महातेजस्वी श्रीराम यहाँ पधारे हैं?"

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॥ १ · ५१ · ९ ॥
अपि शान्तेन मनसा गुरुमे कुशिकात्मज इहागतेन रामेण पूजितेनाभिवादितः

api śāntena manasā gurume kuśikātmaja ।
ihāgatena rāmeṇa pūjitenābhivāditaḥ ॥

"विश्वामित्रजी! क्या यहाँ आकर मेरे माता-पिताद्वारा सम्मानित हुए श्रीराम ने मेरे पूज्य पिता का शान्त चित्त से अभिवादन किया था?"

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॥ १ · ५१ · १० ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य विश्वामित्रो महामुनिः प्रत्युवाच शतानन्दं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम्

tacchrutvā vacanaṁ tasya viśvāmitro mahāmuniḥ ।
pratyuvāca śatānandaṁ vākyajño vākyakovidam ॥

शतानन्द का यह प्रश्न सुनकर बोलने की कला जाननेवाले महामुनि विश्वामित्र ने बातचीत करने में कुशल शतानन्द को इस प्रकार उत्तर दिया—

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॥ १ · ५१ · ११ ॥
नातिक्रान्तं मुनिश्रेष्ठ यत्कर्तव्यं कृतं मया संगता मुनिना पत्नी भार्गवेणेव रेणुका

nātikrāntaṁ muniśreṣṭha yatkartavyaṁ kṛtaṁ mayā ।
saṁgatā muninā patnī bhārgaveṇeva reṇukā ॥

"मुनिश्रेष्ठ! मैंने कुछ उठा नहीं रखा है। मेरा जो कर्तव्य था, उसे मैंने पूरा किया। महर्षि गौतम से उनकी पत्नी अहल्या उसी प्रकार जा मिली हैं, जैसे भृगुवंशी जमदग्नि से रेणुका मिली है।"

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॥ १ · ५१ · १२ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य विश्वामित्रस्य धीमतः शतानन्दो महातेजा रामं वचनमब्रवीत्

tacchrutvā vacanaṁ tasya viśvāmitrasya dhīmataḥ ।
śatānando mahātejā rāmaṁ vacanamabravīt ॥

बुद्धिमान् विश्वामित्र की यह बात सुनकर महातेजस्वी शतानन्द ने श्रीरामचन्द्रजी से यह बात कही—

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॥ १ · ५१ · १३ ॥
स्वागतं ते नरश्रेष्ठ दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव विश्वामित्रं पुरस्कृत्य महर्षिमपराजितम्

svāgataṁ te naraśreṣṭha diṣṭyā prāpto'si rāghava ।
viśvāmitraṁ puraskṛtya maharṣimaparājitam ॥

"नरश्रेष्ठ! आपका स्वागत है। रघुनन्दन! मेरा अहोभाग्य जो आपने किसी से पराजित न होनेवाले महर्षि विश्वामित्र को आगे करके यहाँतक पधारने का कष्ट उठाया।"

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॥ १ · ५१ · १४ ॥
अचिन्त्यकर्मा तपसा ब्रह्मर्षिरमितप्रभः विश्वामित्रो महातेजा वेद्म्येनं परमां गतिम्

acintyakarmā tapasā brahmarṣiramitaprabhaḥ ।
viśvāmitro mahātejā vedmyenaṁ paramāṁ gatim ॥

"महर्षि विश्वामित्र के कर्म अचिन्त्य हैं। ये तपस्या से ब्रह्मर्षिपद को प्राप्त हुए हैं। इनकी कान्ति असीम है और ये महातेजस्वी हैं। मैं इनको जानता हूँ। ये जगत् के परम आश्रय (हितैषी) हैं।"

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॥ १ · ५१ · १५ ॥
नास्ति धन्यतरो राम त्वत्तोऽन्यो भुवि कश्चन गोप्ता कुशिकपुत्रस्ते येन तप्तं महत्तपः

nāsti dhanyataro rāma tvatto'nyo bhuvi kaścana ।
goptā kuśikaputraste yena taptaṁ mahattapaḥ ॥

"श्रीराम! इस पृथ्वी पर आपसे बढ़कर धन्यातिधन्य पुरुष दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि कुशिकनन्दन विश्वामित्र आपके रक्षक हैं, जिन्होंने बड़ी भारी तपस्या की है।"

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॥ १ · ५१ · १६ ॥
श्रूयतां चाभिधास्यामि कौशिकस्य महात्मनः यथाबलं यथातत्त्वं तन्मे निगदतः शृणु

śrūyatāṁ cābhidhāsyāmi kauśikasya mahātmanaḥ ।
yathābalaṁ yathātattvaṁ tanme nigadataḥ śṛṇu ॥

"मैं महात्मा कौशिक के बल और स्वरूप का यथार्थ वर्णन करता हूँ। आप ध्यान देकर मुझसे यह सब सुनिये।"

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॥ १ · ५१ · १७ ॥
राजाऽऽसीदेष धर्मात्मा दीर्घकालमरिंदमः धर्मज्ञः कृतविद्यश्च प्रजानां हिते रतः

rājā''sīdeṣa dharmātmā dīrghakālamariṁdamaḥ ।
dharmajñaḥ kṛtavidyaśca prajānāṁ ca hite rataḥ ॥

"ये विश्वामित्र पहले एक धर्मात्मा राजा थे। इन्होंने शत्रुओं के दमनपूर्वक दीर्घकालतक राज्य किया था। ये धर्मज्ञ और विद्वान् होने के साथ ही प्रजावर्ग के हितसाधन में तत्पर रहते थे।"

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॥ १ · ५१ · १८ ॥
प्रजापतिसुतस्त्वासीत् कुशो नाम महीपतिः कुशस्य पुत्रो बलवान् कुशनाभः सुधार्मिकः

prajāpatisutastvāsīt kuśo nāma mahīpatiḥ ।
kuśasya putro balavān kuśanābhaḥ sudhārmikaḥ ॥

"प्राचीनकाल में कुश नाम से प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे प्रजापति के पुत्र थे। कुश के बलवान् पुत्र का नाम कुशनाभ हुआ। वह बड़ा ही धर्मात्मा था।"

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॥ १ · ५१ · १९ ॥
कुशनाभसुतस्त्वासीद् गाधिरित्येव विश्रुतः गाधेः पुत्रो महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः

kuśanābhasutastvāsīd gādhirityeva viśrutaḥ ।
gādheḥ putro mahātejā viśvāmitro mahāmuniḥ ॥

"कुशनाभ के पुत्र गाधि नाम से विख्यात थे। उन्हीं गाधि के महातेजस्वी पुत्र ये महामुनि विश्वामित्र हैं।"

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॥ १ · ५१ · २० ॥
विश्वामित्रो महातेजाः पालयामास मेदिनीम् बहुवर्षसहस्राणि राजा राज्यमकारयत्

viśvāmitro mahātejāḥ pālayāmāsa medinīm ।
bahuvarṣasahasrāṇi rājā rājyamakārayat ॥

"महातेजस्वी राजा विश्वामित्र ने कई हजार वर्षों तक इस पृथ्वी का पालन तथा राज्य का शासन किया।"

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॥ १ · ५१ · २१ ॥
कदाचित् तु महातेजा योजयित्वा वरूथिनीम् अक्षौहिणीपरिवृतः परिचक्राम मेदिनीम्

kadācit tu mahātejā yojayitvā varūthinīm ।
akṣauhiṇīparivṛtaḥ paricakrāma medinīm ॥

"एक समय की बात है—महातेजस्वी राजा विश्वामित्र सेना एकत्र करके एक अक्षौहिणी सेना के साथ पृथ्वी पर विचरने लगे।"

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॥ १ · ५१ · २२ ॥
नगराणि राष्ट्राणि सरितश्च महागिरीन् आश्रमान् क्रमशो राजा विचरन्नाजगाम

nagarāṇi ca rāṣṭrāṇi saritaśca mahāgirīn ।
āśramān kramaśo rājā vicarannājagāma ha ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ५१ · २३ ॥
वसिष्ठस्याश्रमपदं नानापुष्पलताद्रुमम् नानामृगगणाकीर्णं सिद्धचारणसेवितम्

vasiṣṭhasyāśramapadaṁ nānāpuṣpalatādrumam ।
nānāmṛgagaṇākīrṇaṁ siddhacāraṇasevitam ॥

॥ २२–२३ ॥

"वे अनेकानेक नगरों, राष्ट्रों, नदियों, बड़े-बड़े पर्वतों और आश्रमों में क्रमशः विचरते हुए महर्षि वसिष्ठ के आश्रम पर आ पहुँचे, जो नाना प्रकार के फूलों, लताओं और वृक्षों से शोभा पा रहा था। नाना प्रकार के मृग (वन्यपशु) वहाँ सब ओर फैले हुए थे तथा सिद्ध और चारण उस आश्रम में निवास करते थे।"

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॥ १ · ५१ · २४ ॥
देवदानवगन्धर्वैः किंनरैरुपशोभितम् प्रशान्तहरिणाकीर्णं द्विजसङ्घनिषेवितम्

devadānavagandharvaiḥ kiṁnarairupaśobhitam ।
praśāntahariṇākīrṇaṁ dvijasaṅghaniṣevitam ॥

"देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर उसकी शोभा बढ़ाते थे। शान्त मृग वहाँ भरे रहते थे। बहुत-से ब्राह्मणों, ब्रह्मर्षियों और देवर्षियों के समुदाय उसका सेवन करते थे।"

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॥ १ · ५१ · २५ ॥
ब्रह्मर्षिगणसंकीर्णं देवर्षिगणसेवितम् तपश्चरणसंसिद्धैरग्निकल्पैर्महात्मभिः

brahmarṣigaṇasaṁkīrṇaṁ devarṣigaṇasevitam ।
tapaścaraṇasaṁsiddhairagnikalpairmahātmabhiḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ५१ · २६ ॥
सततं संकुलं श्रीमद्ब्रह्मकल्पैर्महात्मभिः अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च शीर्णपर्णाशनैस्तथा

satataṁ saṁkulaṁ śrīmadbrahmakalpairmahātmabhiḥ ।
abbhakṣairvāyubhakṣaiśca śīrṇaparṇāśanaistathā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ५१ · २७ ॥
फलमूलाशनैर्दान्तैर्जितदोषैर्जितेन्द्रियैः ऋषिभिर्वालखिल्यैश्च जपहोमपरायणैः

phalamūlāśanairdāntairjitadoṣairjitendriyaiḥ ।
ṛṣibhirvālakhilyaiśca japahomaparāyaṇaiḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ५१ · २८ ॥
अन्यैर्वैखानसैश्चैव समन्तादुपशोभितम् वसिष्ठस्याश्रमपदं ब्रह्मलोकमिवापरम् ददर्श जयतां श्रेष्ठो विश्वामित्रो महाबलः

anyairvaikhānasaiścaiva samantādupaśobhitam ।
vasiṣṭhasyāśramapadaṁ brahmalokamivāparam ।
dadarśa jayatāṁ śreṣṭho viśvāmitro mahābalaḥ ॥

॥ २५–२८ ॥

"तपस्या से सिद्ध हुए अग्नि के समान तेजस्वी महात्मा तथा ब्रह्मा के समान महामहिम महात्मा सदा उस आश्रम में भरे रहते थे। उनमें से कोई जल पीकर रहता था तो कोई हवा पीकर। कितने ही महात्मा फल-मूल खाकर अथवा सूखे पत्ते चबाकर रहते थे। राग आदि दोषों को और इन्द्रियों पर काबू रखनेवाले बहुत-से ऋषि जप-होम में लगे थे। वालखिल्य मुनिगण तथा अन्यान्य वैखानस महात्मा सब ओर से उस आश्रम की शोभा बढ़ाते थे। इन सब विशेषताओं के कारण महर्षि वसिष्ठ का वह आश्रम दूसरे ब्रह्मलोक के समान जान पड़ता था। विजयी वीरों में श्रेष्ठ महाबली विश्वामित्र ने उसका दर्शन किया।"

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः ॥ ५१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५१ ॥