वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ५३ · २५ श्लोकाःSarga 53 · 25 ślokas

कामधेनुकी सहायतासे उत्तम अन्न-पानद्वारा सेनासहित तृप्त हुए विश्वामित्रका वसिष्ठसे उनकी कामधेनुको माँगना और उनका देनेसे अस्वीकार करना

शबला का अस्वीकार

“शबला का अस्वीकार”
॥ १ · ५३ · ९–११ ॥

मुकुटी विश्वामित्रः करं प्रसार्य शबलां याचते, किन्तु श्वेतवस्त्रः वसिष्ठः दण्डं धृत्वा उत्तानहस्तेन निषेधति — 'नैव दास्यामि' इति।

मुकुट और राजसी वस्त्र धारण किये विश्वामित्र हाथ बढ़ाकर शबला गौ की याचना कर रहे हैं, पर उनके और चितकबरी गौ के बीच खड़े श्वेतवस्त्रधारी महर्षि वसिष्ठ हाथ में दण्ड लिये हथेली ऊपर उठाकर स्पष्ट इनकार कर रहे हैं — यह गौ किसी मूल्य पर नहीं दी जा सकती।

Crowned and royally robed, Vishvamitra stretches out his hand to ask for the cow Shabala, but the white-robed sage Vasishtha, standing between him and the dappled cow with a staff in his grip, raises an open palm in firm refusal — she is not his to give at any price.

॥ १ · ५३ · १ ॥
एवमुक्ता वसिष्ठेन शबला शत्रुसूदन विदधे कामधुक् कामान् यस्य यस्येप्सितं यथा

evamuktā vasiṣṭhena śabalā śatrusūdana ।
vidadhe kāmadhuk kāmān yasya yasyepsitaṁ yathā ॥

शत्रुसूदन! महर्षि वसिष्ठ के ऐसा कहने पर चितकबरे रंग की उस कामधेनु ने जिसकी जैसी इच्छा थी, उसके लिये वैसी ही सामग्री जुटा दी।

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॥ १ · ५३ · २ ॥
इक्षून् मधूंस्तथा लाजान् मैरेयांश्च वरासवान् पानानि महार्हाणि भक्ष्यांश्चोच्चावचानपि

ikṣūn madhūṁstathā lājān maireyāṁśca varāsavān ।
pānāni ca mahārhāṇi bhakṣyāṁścoccāvacānapi ॥

'ईख, मधु, लावा, मैरेय, श्रेष्ठ आसव, पानक रस आदि नाना प्रकार के बहुमूल्य भक्ष्य-पदार्थ प्रस्तुत कर दिये।

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॥ १ · ५३ · ३ ॥
उष्णाढ्यस्यौदनस्यात्र राशयः पर्वतोपमाः मृष्टान्यन्नानि सूपांश्च दधिकुल्यास्तथैव

uṣṇāḍhyasyaudanasyātra rāśayaḥ parvatopamāḥ ।
mṛṣṭānyannāni sūpāṁśca dadhikulyāstathaiva ca ॥

'गरम-गरम भात के पर्वत के सदृश ढेर लग गये। मिष्टान्न (खीर) और दाल भी तैयार हो गयी। दूध, दही और चीकी तो नहरें बह चलीं।

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॥ १ · ५३ · ४ ॥
नानास्वादुरसानां खाण्डवानां तथैव भोजनानि सुपूर्णानि गौडानि सहस्रशः

nānāsvādurasānāṁ ca khāṇḍavānāṁ tathaiva ca ।
bhojanāni supūrṇāni gauḍāni ca sahasraśaḥ ॥

'भाँति-भाँति के सुस्वादु रस, खाण्डव तथा नाना प्रकार के भोजनों से भरी हुई चाँदी की सहस्रों थालियाँ सज गयीं।

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॥ १ · ५३ · ५ ॥
सर्वमासीत् सुसंतुष्टं हृष्टपुष्टजनायुतम् विश्वामित्रबलं राम वसिष्ठेन सुतर्पितम्

sarvamāsīt susaṁtuṣṭaṁ hṛṣṭapuṣṭajanāyutam ।
viśvāmitrabalaṁ rāma vasiṣṭhena sutarpitam ॥

श्रीराम! महर्षि वसिष्ठ ने विश्वामित्रजी की सारी सेना के लोगों को भलीभाँति तृप्त किया। उस सेना में बहुत-से हृष्ट-पुष्ट सैनिक थे। उन सबको वह दिव्य भोजन पाकर बड़ा संतोष हुआ।

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॥ १ · ५३ · ६ ॥
विश्वामित्रोऽपि राजर्षिर्हृष्टपुष्टस्तदाभवत् सान्तःपुरवरो राजा सब्राह्मणपुरोहितः

viśvāmitro'pi rājarṣirhṛṣṭapuṣṭastadābhavat ।
sāntaḥpuravaro rājā sabrāhmaṇapurohitaḥ ॥

'राजर्षि विश्वामित्र भी उस समय अन्तःपुर की रानियों, ब्राह्मणों और पुरोहितों के साथ बहुत ही हृष्ट-पुष्ट हो गये।

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॥ १ · ५३ · ७ ॥
सामात्यो मन्त्रिसहितः सभृत्यः पूजितस्तदा युक्तः परमहर्षेण वसिष्ठमिदमब्रवीत्

sāmātyo mantrisahitaḥ sabhṛtyaḥ pūjitastadā ।
yuktaḥ paramaharṣeṇa vasiṣṭhamidamabravīt ॥

'अमात्य, मन्त्री और भृत्योंसहित पूजित हो वे बहुत प्रसन्न हुए और वसिष्ठजी से इस प्रकार बोले—

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॥ १ · ५३ · ८ ॥
पूजितोऽहं त्वया ब्रह्मन् पूजार्हेण सुसत्कृतः श्रूयतामभिधास्यामि वाक्यं वाक्यविशारद

pūjito'haṁ tvayā brahman pūjārheṇa susatkṛtaḥ ।
śrūyatāmabhidhāsyāmi vākyaṁ vākyaviśārada ॥

'ब्रह्मन्! आप स्वयं मेरे पूजनीय हैं तो भी आपने मेरा पूजन किया, भलीभाँति स्वागत-सत्कार किया। बातचीत करने में कुशल महर्षे! अब मैं एक बात कहता हूँ, उसे सुनिये।

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॥ १ · ५३ · ९ ॥
गवां शतसहस्रेण दीयतां शबला मम रत्नं हि भगवन्नेतद् रत्नहारी पार्थिवः

gavāṁ śatasahasreṇa dīyatāṁ śabalā mama ।
ratnaṁ hi bhagavannetad ratnahārī ca pārthivaḥ ॥

'भगवन्! आप मुझसे एक लाख गौएँ लेकर यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये; क्योंकि यह गौ रत्नरूप है और रत्न लेने का अधिकारी राजा होता है। ब्रह्मन्! मेरे इस कथन पर ध्यान देकर मुझे यह शबला गौ दे दीजिये; क्योंकि यह धर्मतः मेरी ही वस्तु है।'

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॥ १ · ५३ · १० ॥
तस्मान्मे शबलां देहि ममैषा धर्मतो द्विज एवमुक्तस्तु भगवान् वसिष्ठो मुनिपुंगवः

tasmānme śabalāṁ dehi mamaiṣā dharmato dvija ।
evamuktastu bhagavān vasiṣṭho munipuṁgavaḥ ॥

विश्वामित्र के ऐसा कहने पर धर्मात्मा मुनिवर भगवान् वसिष्ठ राजा को उत्तर देते हुए बोले—

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॥ १ · ५३ · ११ ॥
नाहं शतसहस्रेण नापि कोटिशतैर्गवाम् राजन् दास्यामि शबलां राशिभी रजतस्य वा

nāhaṁ śatasahasreṇa nāpi koṭiśatairgavām ।
rājan dāsyāmi śabalāṁ rāśibhī rajatasya vā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ५३ · १२ ॥
परित्यागमर्हेयं मत्सकाशादरिंदम

na parityāgamarheyaṁ matsakāśādariṁdama ॥

॥ ११–१२ ॥

'शत्रुओं का दमन करनेवाले नरेश्वर! मैं एक लाख या सौ करोड़ अथवा चाँदी के ढेर लेकर भी बदले में इस शबला गौ को नहीं दूँगा। यह मेरे पास से अलग होने योग्य नहीं है।'

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॥ १ · ५३ · १३ ॥
शाश्वती शबला मह्यं कीर्तिरात्मवतो यथा अस्या हव्यं कव्यं प्राणयात्रा तथैव

śāśvatī śabalā mahyaṁ kīrtirātmavato yathā ।
asyā havyaṁ ca kavyaṁ ca prāṇayātrā tathaiva ca ॥

'जैसे मनस्वी पुरुष की अक्षय कीर्ति कभी उससे अलग नहीं रह सकती, उसी प्रकार यह सदा मेरे साथ सम्बन्ध रखनेवाली शबला गौ मुझसे पृथक् नहीं रह सकती। मेरा हव्य-कव्य और जीवन-निर्वाह इसी पर निर्भर है।

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॥ १ · ५३ · १४ ॥
आयत्तमग्निहोत्रं बलिर्होमस्तथैव स्वाहाकारवषट्कारौ विद्याश्च विविधास्तथा

āyattamagnihotraṁ ca balirhomastathaiva ca ।
svāhākāravaṣaṭkārau vidyāśca vividhāstathā ॥

'मेरे अग्निहोत्र, बलि, होम, स्वाहा, वषट्कार और भाँति-भाँति की विद्याएँ इस कामधेनु के ही अधीन हैं।

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॥ १ · ५३ · १५ ॥
आयत्तमत्र राजर्षे सर्वमेतन्न संशयः सर्वस्वमेतत् सत्येन मम तुष्टिकरी तथा

āyattamatra rājarṣe sarvametanna saṁśayaḥ ।
sarvasvametat satyena mama tuṣṭikarī tathā ॥

'राजर्षे! मेरा सब कुछ इस गौ के ही अधीन है, इसमें संशय नहीं है। मैं सच कहता हूँ—यह गौ ही मेरा सर्वस्व है और यही मुझे सब प्रकार से संतुष्ट करनेवाली है। राजन्! बहुत-से ऐसे कारण हैं, जिनसे बाध्य होकर मैं यह शबला गौ आपको नहीं दे सकता।'

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॥ १ · ५३ · १६ ॥
कारणैर्बहुभी राजन् दास्ये शबलां तव वसिष्ठेनैवमुक्तस्तु विश्वामित्रोऽब्रवीत् तदा

kāraṇairbahubhī rājan na dāsye śabalāṁ tava ।
vasiṣṭhenaivamuktastu viśvāmitro'bravīt tadā ॥

वसिष्ठजी के ऐसा कहने पर बोलने में कुशल विश्वामित्र अत्यन्त क्रोधपूर्वक इस प्रकार बोले—

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॥ १ · ५३ · १७ ॥
हैरण्यकक्ष्याग्रैवेयान् सुवर्णाङ्कुशभूषितान् ददामि कुञ्जराणां ते सहस्राणि चतुर्दश

hairaṇyakakṣyāgraiveyān suvarṇāṅkuśabhūṣitān ।
dadāmi kuñjarāṇāṁ te sahasrāṇi caturdaśa ॥

'मुने! मैं आपको चौदह हजार ऐसे हाथी दे रहा हूँ, जिनके कसनेवाले रस्से, गले के आभूषण और अंकुश भी सोने के बने होंगे और उन सबसे वे हाथी विभूषित होंगे।

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॥ १ · ५३ · १८ ॥
हैरण्यानां रथानां श्वेताश्वानां चतुर्युजाम् ददामि ते शतान्यष्टौ किंकिणीकविभूषितान्

hairaṇyānāṁ rathānāṁ ca śvetāśvānāṁ caturyujām ।
dadāmi te śatānyaṣṭau kiṁkiṇīkavibhūṣitān ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ५३ · १९ ॥
हयानां देशजातानां कुलजानां महौजसाम् सहस्रमेकं दश ददामि तव सुव्रत

hayānāṁ deśajātānāṁ kulajānāṁ mahaujasām ।
sahasramekaṁ daśa ca dadāmi tava suvrata ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ५३ · २० ॥
नानावर्णविभक्तानां वयःस्थानां तथैव ददाम्येकां गवां कोटिं शबला दीयतां मम

nānāvarṇavibhaktānāṁ vayaḥsthānāṁ tathaiva ca ।
dadāmyekāṁ gavāṁ koṭiṁ śabalā dīyatāṁ mama ॥

॥ १८–२० ॥

'उत्तम व्रत का पालन करनेवाले मुनीश्वर! इनके सिवा मैं आठ सौ सुवर्णमय रथ प्रदान करूँगा; जिनमें शोभा के लिये सोने के घुँघुरू लगे होंगे और हर एक रथ में चार-चार सफेद रंग के घोड़े जुते हुए होंगे तथा अच्छी जाति और उत्तम देशों में उत्पन्न महातेजस्वी ग्यारह हजार घोड़े भी आपकी सेवा में अर्पित करूँगा। इतना ही नहीं, नाना प्रकार के रंगवाली नयी अवस्था की एक करोड़ गौएँ भी दूँगा, परंतु यह शबला गौ मुझे दे दीजिये।'

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॥ १ · ५३ · २१ ॥
यावदिच्छसि रत्नानि हिरण्यं वा द्विजोत्तम तावद् ददामि ते सर्वं दीयतां शबला मम

yāvadicchasi ratnāni hiraṇyaṁ vā dvijottama ।
tāvad dadāmi te sarvaṁ dīyatāṁ śabalā mama ॥

'द्विजश्रेष्ठ! इनके अतिरिक्त भी आप जितने रत्न या सुवर्ण लेना चाहें, वह सब आपको देने के लिये मैं तैयार हूँ; किंतु यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये।'

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॥ १ · ५३ · २२ ॥
एवमुक्तस्तु भगवान् विश्वामित्रेण धीमता दास्यामीति शबलां प्राह राजन् कथंचन

evamuktastu bhagavān viśvāmitreṇa dhīmatā ।
na dāsyāmīti śabalāṁ prāha rājan kathaṁcana ॥

'बुद्धिमान् विश्वामित्र के ऐसा कहने पर भगवान् वसिष्ठ बोले—'राजन्! मैं यह चितकबरी गाय तुम्हें किसी तरह भी नहीं दूँगा।'

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॥ १ · ५३ · २३ ॥
एतदेव हि मे रत्नमेतदेव हि मे धनम् एतदेव हि सर्वस्वमेतदेव हि जीवितम्

etadeva hi me ratnametadeva hi me dhanam ।
etadeva hi sarvasvametadeva hi jīvitam ॥

'यही मेरा रत्न है, यही मेरा धन है, यही मेरा सर्वस्व है और यही मेरा जीवन है।

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॥ १ · ५३ · २४ ॥
दर्शश्च पौर्णमासश्च यज्ञाश्चैवाप्तदक्षिणाः एतदेव हि मे राजन् विविधाश्च क्रियास्तथा

darśaśca paurṇamāsaśca yajñāścaivāptadakṣiṇāḥ ।
etadeva hi me rājan vividhāśca kriyāstathā ॥

'राजन्! मेरे दर्श, पौर्णमास, प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञ तथा भाँति-भाँति के पुण्यकर्म—यह गौ ही है। इसी पर ही मेरा सब कुछ निर्भर है।

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॥ १ · ५३ · २५ ॥
अतोमूला क्रियाः सर्वा मम राजन् संशयः बहुना किं प्रलापेन दास्ये कामदोहिनीम्

atomūlā kriyāḥ sarvā mama rājan na saṁśayaḥ ।
bahunā kiṁ pralāpena na dāsye kāmadohinīm ॥

'नरेश्वर! मेरे सारे शुभ कर्मों का मूल यही है, इसमें संशय नहीं है। बहुत व्यर्थ बात करने से क्या लाभ। मैं इस कामधेनु को कदापि नहीं दूँगा।'

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः ॥ ५३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५३ ॥