वाल्मीकि रामायणम् · बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

बालकाण्डम्Bāla Kāṇḍa

सर्गः ३७ · ३२ श्लोकाःSarga 37 · 32 ślokas

गंगा से कार्तिकेय की उत्पत्ति का प्रसंग

The birth of Kārttikeya from the Gaṅgā

कार्तिकेय-जन्म

“कार्तिकेय-जन्म”
॥ १ · ३७ · २३–२८ ॥

गंगातनयं स्वर्णदीप्तं बालं कृत्तिकाः षट् स्तन्यं पाययन्ति, उपरि शिवपार्वत्यौ सस्नेहं प्रेक्षेते।

स्वर्ण-सी प्रभा से दीप्त शिशु कार्तिकेय को छहों कृत्तिकाएँ घेरे हुए हैं और उसे दूध पिला रही हैं — एक के हाथ में जल का घट है; ऊपर मेघों में त्रिशूलधारी शिव और मुकुटमयी पार्वती स्नेह से अपने इस तेजस्वी पुत्र को निहार रहे हैं, जो गंगा के गर्भ से प्रकट हुआ।

Wrapped in golden radiance, the infant Karttikeya is cradled by the six Krittikas who nurse him — one pouring water from a pitcher; above, amid the clouds, trident-bearing Shiva and crowned Parvati gaze tenderly upon the blazing child born from Ganga's womb.

॥ १ · ३७ · १ ॥
तप्यमाने तदा देवे सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः सेनापतिमभीप्सन्तः पितामहमुपागमन्

tapyamāne tadā deve sendrāḥ sāgnipurogamāḥ ।
senāpatimabhīpsantaḥ pitāmahamupāgaman ॥

जब महादेवजी तपस्या कर रहे थे, उस समय इन्द्र और अग्नि आदि सम्पूर्ण देवता अपने लिये सेनापति की इच्छा लेकर ब्रह्माजी के पास आये।

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॥ १ · ३७ · २ ॥
ततोऽब्रुवन् सुराः सर्वे भगवन्तं पितामहम् प्रणिपत्य सुरा राम सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः

tato'bruvan surāḥ sarve bhagavantaṁ pitāmaham ।
praṇipatya surā rāma sendrāḥ sāgnipurogamāḥ ॥

देवताओं को आराम देनेवाले श्रीराम! इन्द्र और अग्निसहित समस्त देवताओं ने भगवान् ब्रह्मा को प्रणाम करके इस प्रकार कहा—

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॥ १ · ३७ · ३ ॥
येन सेनापतिर्देव दत्तो भगवता पुरा तपः परमास्थाय तप्यते स्म सहोमया

yena senāpatirdeva datto bhagavatā purā ।
sa tapaḥ paramāsthāya tapyate sma sahomayā ॥

"प्रभो! पूर्वकाल में जिन भगवान् महेश्वर ने हमें (बीजरूप से) सेनापति प्रदान किया था, वे उमादेवी के साथ उत्तम तप का आश्रय लेकर तपस्या करते हैं।"

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॥ १ · ३७ · ४ ॥
यदत्रानन्तरं कार्यं लोकानां हितकाम्यया संविधत्स्व विधानज्ञ त्वं हि नः परमा गतिः

yadatrānantaraṁ kāryaṁ lokānāṁ hitakāmyayā ।
saṁvidhatsva vidhānajña tvaṁ hi naḥ paramā gatiḥ ॥

"विधि-विधान के ज्ञाता पितामह! अब लोकहित के लिये जो कर्तव्य प्राप्त हो, उसको पूर्ण कीजिये; क्योंकि आप ही हमारे परम आश्रय हैं।"

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॥ १ · ३७ · ५ ॥
देवतानां वचः श्रुत्वा सर्वलोकपितामहः सान्त्वयन् मधुरैर्वाक्यैस्त्रिदशानिदमब्रवीत्

devatānāṁ vacaḥ śrutvā sarvalokapitāmahaḥ ।
sāntvayan madhurairvākyaistridaśānidamabravīt ॥

देवताओं की यह बात सुनकर सम्पूर्ण लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने मधुर वचनोंद्वारा उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—

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॥ १ · ३७ · ६ ॥
शैलपुत्र्या यदुक्तं तन्न प्रजाः स्वासु पत्निषु तस्या वचनमक्लिष्टं सत्यमेव संशयः

śailaputryā yaduktaṁ tanna prajāḥ svāsu patniṣu ।
tasyā vacanamakliṣṭaṁ satyameva na saṁśayaḥ ॥

"देवताओ! गिरिराजकुमारी पार्वती ने जो शाप दिया है, उसके अनुसार तुम्हें अपनी पत्नियों के गर्भ से अब कोई संतान नहीं होगी। उमादेवी की वाणी अमोघ है; अतः वह सत्य होकर ही रहेगी; इसमें संशय नहीं है।"

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॥ १ · ३७ · ७ ॥
इयमाकाशगंगा यस्यां पुत्रं हुताशनः जनयिष्यति देवानां सेनापतिमरिंदमम्

iyamākāśagaṁgā ca yasyāṁ putraṁ hutāśanaḥ ।
janayiṣyati devānāṁ senāpatimariṁdamam ॥

"ये हैं उमा की बड़ी बहिन आकाशगंगा, जिनके गर्भ में शङ्करजी के उस तेज को स्थापित करके अग्निदेव एक ऐसे पुत्र को जन्म देंगे, जो देवताओं के शत्रुओं का दमन करने में समर्थ सेनापति होगा।"

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॥ १ · ३७ · ८ ॥
ज्येष्ठा शैलेन्द्रदुहिता मानयिष्यति तं सुतम् उमायास्तद्बहुमतं भविष्यति संशयः

jyeṣṭhā śailendraduhitā mānayiṣyati taṁ sutam ।
umāyāstadbahumataṁ bhaviṣyati na saṁśayaḥ ॥

"ये गंगा गिरिराज की ज्येष्ठ पुत्री हैं; अतः अपनी छोटी बहिन के उस पुत्र को अपने ही पुत्र के समान मानेंगी। उमा को भी यह बहुत प्रिय लगेगा। इसमें संशय नहीं है।"

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॥ १ · ३७ · ९ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कृतार्था रघुनन्दन प्रणिपत्य सुराः सर्वे पितामहमपूजयन्

tacchrutvā vacanaṁ tasya kṛtārthā raghunandana ।
praṇipatya surāḥ sarve pitāmahamapūjayan ॥

रघुनन्दन! ब्रह्माजी का यह वचन सुनकर सब देवता कृतकृत्य हो गये। उन्होंने ब्रह्माजी को प्रणाम करके उनका पूजन किया।

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॥ १ · ३७ · १० ॥
ते गत्वा परमं राम कैलासं धातुमण्डितम् अग्निं नियोजयामासुः पुत्रार्थं सर्वदेवताः

te gatvā paramaṁ rāma kailāsaṁ dhātumaṇḍitam ।
agniṁ niyojayāmāsuḥ putrārthaṁ sarvadevatāḥ ॥

श्रीराम! विविध धातुओं से अलंकृत उत्तम कैलास पर्वत पर जाकर उन सम्पूर्ण देवताओं ने अग्निदेव को पुत्र उत्पन्न करने के कार्य में नियुक्त किया।

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॥ १ · ३७ · ११ ॥
देवकार्यमिदं देव समाधत्स्व हुताशन शैलपुत्र्यां महातेजो गंगायां तेज उत्सृज

devakāryamidaṁ deva samādhatsva hutāśana ।
śailaputryāṁ mahātejo gaṁgāyāṁ teja utsṛja ॥

वे बोले — "देव! हुताशन! यह देवताओं का कार्य है, इसे सिद्ध कीजिये। भगवान् रुद्र के उस महान् तेज को अब आप गंगाजी में स्थापित कर दीजिये।"

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॥ १ · ३७ · १२ ॥
देवतानां प्रतिज्ञाय गंगामभ्येत्य पावकः गर्भं धारय वै देवि देवतानामिदं प्रियम्

devatānāṁ pratijñāya gaṁgāmabhyetya pāvakaḥ ।
garbhaṁ dhāraya vai devi devatānāmidaṁ priyam ॥

तब देवताओं से 'बहुत अच्छा' कहकर अग्निदेव गंगाजी के निकट आये और बोले — "देवि! आप इस गर्भ को धारण करें। यह देवताओं का प्रिय कार्य है।"

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॥ १ · ३७ · १३ ॥
इत्येतद् वचनं श्रुत्वा दिव्यं रूपमधारयत् तस्या महिमां दृष्ट्वा समन्तादवशीर्यत

ityetad vacanaṁ śrutvā divyaṁ rūpamadhārayat ।
sa tasyā mahimāṁ dṛṣṭvā samantādavaśīryata ॥

अग्निदेव की यह बात सुनकर गंगादेवी ने दिव्यरूप धारण कर लिया। उनका वह महिमा — यह रूप-वैभव देखकर अग्निदेव ने उस रुद्र-तेज को उनके सब ओर बिखेर दिया।

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॥ १ · ३७ · १४ ॥
समन्ततस्तदा देवीमभ्यषिञ्चत पावकः सर्वस्रोतांसि पूर्णानि गंगाया रघुनन्दन

samantatastadā devīmabhyaṣiñcata pāvakaḥ ।
sarvasrotāṁsi pūrṇāni gaṁgāyā raghunandana ॥

रघुनन्दन! अग्निदेव ने जब गंगादेवी को सब ओर से उस रुद्र-तेजद्वारा अभिषिक्त कर दिया, तब गंगाजी के सारे स्रोत उससे परिपूर्ण हो गये।

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॥ १ · ३७ · १५ ॥
तमुवाच ततो गंगा सर्वदेवपुरोगमम् अशक्ता धारणे देव तेजस्तव समुद्धतम् दह्यमानाग्निना तेन सम्प्रव्यथितचेतना

tamuvāca tato gaṁgā sarvadevapurogamam ।
aśaktā dhāraṇe deva tejastava samuddhatam ॥
dahyamānāgninā tena sampravyathitacetanā ।

तब गंगा ने समस्त देवताओं के अग्रगामी अग्निदेव से इस प्रकार कहा — "देव! आपके द्वारा स्थापित किये गये इस बढ़े हुए तेज को धारण करने में मैं असमर्थ हूँ। इसकी आँच से जल रही हूँ और मेरी चेतना व्यथित हो रही है।"

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॥ १ · ३७ · १६ ॥
अथाब्रवीदिदं गंगां सर्वदेवहुताशनः इह हैमवते पार्श्वे गर्भोऽयं संनिवेश्यताम्

athābravīdidaṁ gaṁgāṁ sarvadevahutāśanaḥ ॥
iha haimavate pārśve garbho'yaṁ saṁniveśyatām ।

तब सम्पूर्ण देवताओं के हविष्य को भोग लगानेवाले अग्निदेव ने गंगादेवी से कहा — "देवि! हिमालय पर्वत के पार्श्वभाग में इस गर्भ को स्थापित कर दीजिये।"

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॥ १ · ३७ · १७ ॥
श्रुत्वा त्वग्निवचो गंगा तं गर्भमतिभास्वरम् उत्ससर्ज महातेजाः स्रोतोभ्यो हि तदानघ

śrutvā tvagnivaco gaṁgā taṁ garbhamatibhāsvaram ॥
utsasarja mahātejāḥ srotobhyo hi tadānagha ।

निष्पाप रघुनन्दन! अग्नि की यह बात सुनकर महातेजस्विनी गंगा ने उस अत्यन्त प्रकाशमान गर्भ को अपने स्रोतों से निकालकर यथोचित स्थान में रख दिया।

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॥ १ · ३७ · १८ ॥
यदस्या निर्गतं तस्मात् तप्तजाम्बूनदप्रभम्

yadasyā nirgataṁ tasmāt taptajāmbūnadaprabham ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ १ · ३७ · १९ ॥
काञ्चनं धरणीं प्राप्तं हिरण्यमतुलप्रभम् ताम्रं कार्ष्णायसं चैव तैक्ष्ण्यादेवाभिजायत

kāñcanaṁ dharaṇīṁ prāptaṁ hiraṇyamatulaprabham ।
tāmraṁ kārṣṇāyasaṁ caiva taikṣṇyādevābhijāyata ॥

॥ १८–१९ ॥

गंगा के गर्भ से जो तेज निकला, वह तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्ण के समान कान्तिमान् दिखायी देने लगा (गंगा सुवर्णमय मेरुगिरि से प्रकट हुई हैं; अतः उनका बालक भी वैसे ही रूप-रंग का हुआ)। पृथ्वी पर जहाँ वह तेजस्वी गर्भ स्थापित हुआ, वहाँ की भूमि तथा प्रत्येक वस्तु सुवर्णमयी हो गयी। उसके आस-पास का स्थान अनुपम प्रभा से प्रकाशित होनेवाला रजत हो गया। उस तेज की तीक्ष्णता से ही दूरवर्ती भूभाग की वस्तुएँ ताँबे और लोहे के रूप में परिणत हो गयीं।

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॥ १ · ३७ · २० ॥
मलं तस्याभवत् तत्र त्रपु सीसकमेव तदेतद्धरणीं प्राप्य नानाधातुरवर्धत

malaṁ tasyābhavat tatra trapu sīsakameva ca ।
tadetaddharaṇīṁ prāpya nānādhāturavardhata ॥

उस तेजस्वी गर्भ का जो मल था, वह वहाँ राँगा और सीसा बना। इस प्रकार पृथ्वी पर पड़कर वह तेज नाना प्रकार के धातुओं के रूप में वृद्धि को प्राप्त हुआ।

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॥ १ · ३७ · २१ ॥
निक्षिप्तमात्रे गर्भे तु तेजोभिरभिरञ्जितम् सर्वं पर्वतसंनद्धं सौवर्णमभवद् वनम्

nikṣiptamātre garbhe tu tejobhirabhirañjitam ।
sarvaṁ parvatasaṁnaddhaṁ sauvarṇamabhavad vanam ॥

पृथ्वी पर उस गर्भ के रखे जाते ही उसके तेज से व्याप्त होकर पूर्वोक्त श्वेतपर्वत और उससे सम्बन्ध रखनेवाला सारा वन सुवर्णमय होकर जगमगाने लगा।

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॥ १ · ३७ · २२ ॥
जातरूपमिति ख्यातं तदाप्रभृति राघव सुवर्णं पुरुषव्याघ्र हुताशनसमप्रभम् तृणवृक्षलतागुल्मं सर्वं भवति काञ्चनम्

jātarūpamiti khyātaṁ tadāprabhṛti rāghava ।
suvarṇaṁ puruṣavyāghra hutāśanasamaprabham ॥
tṛṇavṛkṣalatāgulmaṁ sarvaṁ bhavati kāñcanam ।

पुरुषसिंह रघुनन्दन! तभी से अग्नि के समान प्रकाशित होनेवाले सुवर्ण का नाम जातरूप हो गया; क्योंकि उसी समय सुवर्ण का तेजस्वी रूप प्रकट हुआ था। उस गर्भ के सम्पर्क से वहाँ के तृण, वृक्ष, लता और गुल्म — सब कुछ सोने का हो गया।

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॥ १ · ३७ · २३ ॥
तं कुमारं ततो जातं सेन्द्राः सह मरुद्गणाः क्षीरसम्भावनार्थाय कृत्तिकाः समयोजयन्

taṁ kumāraṁ tato jātaṁ sendrāḥ saha marudgaṇāḥ ।
kṣīrasambhāvanārthāya kṛttikāḥ samayojayan ॥

तदनन्तर इन्द्र और मरुद्गणोंसहित सम्पूर्ण देवताओं ने वहाँ उत्पन्न हुए कुमार को दूध पिलाने के लिये छहों कृत्तिकाओं को नियुक्त किया।

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॥ १ · ३७ · २४ ॥
ताः क्षीरं जातमात्रस्य कृत्वा समयमुत्तमम् ददुः पुत्रोऽयमस्माकं सर्वासामिति निश्चिताः

tāḥ kṣīraṁ jātamātrasya kṛtvā samayamuttamam ।
daduḥ putro'yamasmākaṁ sarvāsāmiti niścitāḥ ॥

तब उन कृत्तिकाओं ने 'यह हम सब का पुत्र हो' ऐसी उत्तम शर्त रखकर और इस बात का निश्चित विश्वास लेकर उस नवजात बालक को अपना दूध प्रदान किया।

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॥ १ · ३७ · २५ ॥
ततस्तु देवताः सर्वाः कार्तिकेय इति ब्रुवन् पुत्रस्त्रैलोक्यविख्यातो भविष्यति संशयः

tatastu devatāḥ sarvāḥ kārtikeya iti bruvan ।
putrastrailokyavikhyāto bhaviṣyati na saṁśayaḥ ॥

उस समय सब देवता बोले — "यह बालक कार्तिकेय कहलायेगा और तुमलोगों का त्रिभुवनविख्यात पुत्र होगा — इसमें संशय नहीं है।"

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॥ १ · ३७ · २६ ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा स्कन्नं गर्भपरिस्रवे स्नापयन् परया लक्ष्म्या दीप्यमानं यथानलम्

teṣāṁ tad vacanaṁ śrutvā skannaṁ garbhaparisrave ।
snāpayan parayā lakṣmyā dīpyamānaṁ yathānalam ॥

देवताओं का यह अनुकूल वचन सुनकर शिव और पार्वती से स्कन्दित (स्खलित) तथा गंगाद्वारा गर्भस्राव होने पर प्रकट हुए अग्नि के समान उत्तम प्रभा से प्रकाशित होनेवाले उस बालक को कृत्तिकाओं ने नहलाया।

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॥ १ · ३७ · २७ ॥
स्कन्द इत्यब्रुवन् देवाः स्कन्नं गर्भपरिस्रवे कार्तिकेयं महाबाहुं काकुत्स्थ ज्वलनोपमम्

skanda ityabruvan devāḥ skannaṁ garbhaparisrave ।
kārtikeyaṁ mahābāhuṁ kākutstha jvalanopamam ॥

ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! अग्नितुल्य तेजस्वी महाबाहु कार्तिकेय गर्भस्रावकाल में स्कन्दित हुए थे; इसलिये देवताओं ने उन्हें स्कन्द कहकर पुकारा।

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॥ १ · ३७ · २८ ॥
प्रादुर्भूतं ततः क्षीरं कृत्तिकानामनुत्तमम् षण्णां षडाननो भूत्वा जग्राह स्तनजं पयः

prādurbhūtaṁ tataḥ kṣīraṁ kṛttikānāmanuttamam ।
ṣaṇṇāṁ ṣaḍānano bhūtvā jagrāha stanajaṁ payaḥ ॥

तदनन्तर कृत्तिकाओं के स्तनों में परम उत्तम दूध प्रकट हुआ। उस समय स्कन्द ने अपने छः मुख प्रकट करके उन छहों का एक साथ ही स्तनपान किया।

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॥ १ · ३७ · २९ ॥
गृहीत्वा क्षीरमेकाह्ना सुकुमारवपुस्तदा अजयत् स्वेन वीर्येण दैत्यसैन्यगणान् विभुः

gṛhītvā kṣīramekāhnā sukumāravapustadā ।
ajayat svena vīryeṇa daityasainyagaṇān vibhuḥ ॥

एक ही दिन दूध पीकर उस सुकुमार शरीरवाले शक्तिशाली कुमार ने अपने पराक्रम से दैत्यों की सारी सेनाओं पर विजय प्राप्त की।

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॥ १ · ३७ · ३० ॥
सुरसेनागणपतिमभ्यषिञ्चन् महाद्युतिम् ततस्तममराः सर्वे समेत्याग्निपुरोगमाः

surasenāgaṇapatimabhyaṣiñcan mahādyutim ।
tatastamamarāḥ sarve sametyāgnipurogamāḥ ॥

तत्पश्चात् अग्नि आदि सब देवताओं ने मिलकर उन महातेजस्वी स्कन्द का देवसेनापति के पद पर अभिषेक किया।

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॥ १ · ३७ · ३१ ॥
एष ते राम गंगाया विस्तरोऽभिहितो मया कुमारसम्भवश्चैव धन्यः पुण्यस्तथैव

eṣa te rāma gaṁgāyā vistaro'bhihito mayā ।
kumārasambhavaścaiva dhanyaḥ puṇyastathaiva ca ॥

श्रीराम! यह मैंने तुम्हें गंगाजी के चरित्र को विस्तारपूर्वक बताया है; साथ ही कुमार कार्तिकेय के जन्म का भी प्रसंग सुनाया है, जो श्रोता को धन्य एवं पुण्यात्मा बनानेवाला है।

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॥ १ · ३७ · ३२ ॥
भक्तश्च यः कार्तिकेये काकुत्स्थ भुवि मानवः आयुष्मान् पुत्रपौत्रैश्च स्कन्दसालोक्यतां व्रजेत्

bhaktaśca yaḥ kārtikeye kākutstha bhuvi mānavaḥ ।
āyuṣmān putrapautraiśca skandasālokyatāṁ vrajet ॥

काकुत्स्थ! इस पृथ्वी पर जो मनुष्य कार्तिकेय में भक्तिभाव रखता है, वह इस लोक में दीर्घायु तथा पुत्र-पौत्रों से सम्पन्न हो मृत्यु के पश्चात् स्कन्द के लोक में जाता है।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः ॥ ३७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३७ ॥