वाल्मीकि रामायणम् · युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

सर्गः ४० · ३० श्लोकाःSarga 40 · 30 ślokas

सुग्रीव और रावणका मल्लयुद्ध

॥ ६ · ४० · १ ॥
ततो रामः सुवेलाग्रं योजनद्वयमण्डलम्। उपारोहत् ससुग्रीवो हरियूथैः समन्वितः॥

tato rāmaḥ suvelāgraṁ yojanadvayamaṇḍalam।
upārohat sasugrīvo hariyūthaiḥ samanvitaḥ॥

तदनन्तर वानरयूथों से युक्त सुग्रीवसहित श्रीराम सुवेल पर्वत के सबसे ऊँचे शिखर पर चढ़े, जिसका विस्तार दो योजन का था

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · २ ॥
स्थित्वा मुहूर्तं तत्रैव दिशो दश विलोकयन्। त्रिकूटशिखरे रम्ये निर्मितां विश्वकर्मणा॥ ददर्श लङ्कां सुन्यस्तां रम्यकाननशोभिताम्।

sthitvā muhūrtaṁ tatraiva diśo daśa vilokayan।
trikūṭaśikhare ramye nirmitāṁ viśvakarmaṇā॥
dadarśa laṅkāṁ sunyastāṁ ramyakānanaśobhitām।

वहाँ दो घड़ी ठहरकर दसों दिशाओं की ओर दृष्टिपात करते हुए श्रीराम ने त्रिकूट पर्वत के रमणीय शिखर पर सुन्दर ढंग से बसी हुई विश्वकर्माद्वारा निर्मित लङ्कापुरी को देखा, जो मनोहर काननों से सुशोभित थी

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · ३ ॥
तस्य गोपुरशृङ्गस्थं राक्षसेन्द्रं दुरासदम्॥

tasya gopuraśṛṅgasthaṁ rākṣasendraṁ durāsadam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ६ · ४० · ४ ॥
श्वेतचामरपर्यन्तं विजयच्छत्रशोभितम्। रक्तचन्दनसंलिप्तं रत्नाभरणभूषितम्॥

śvetacāmaraparyantaṁ vijayacchatraśobhitam।
raktacandanasaṁliptaṁ ratnābharaṇabhūṣitam॥

॥ ३–४ ॥

उस नगर के गोपुर की छत पर उन्हें दुर्जय राक्षसराज रावण बैठा दिखायी दिया, जिसके दोनों ओर श्वेत चँवर डुलाये जा रहे थे, सिर पर विजय-छत्र शोभा दे रहा था। रावण का सारा शरीर रक्तचन्दन से चर्चित था। उसके अङ्ग लाल रंग के आभूषणों से विभूषित थे

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · ५ ॥
नीलजीमूतसंकाशं हेमसंछादिताम्बरम्। ऐरावतविषाणाग्रैरुत्कृष्टकिणवक्षसम्॥

nīlajīmūtasaṁkāśaṁ hemasaṁchāditāmbaram।
airāvataviṣāṇāgrairutkṛṣṭakiṇavakṣasam॥

वह काले मेघ के समान जान पड़ता था। उसके वस्त्रों पर सोने के काम किये गये थे। ऐरावत हाथी के दाँतों के अग्रभाग से आहत होने के कारण उसके वक्षःस्थल में आघातचिह्न बन गया था

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · ६ ॥
शशलोहितरागेण संवीतं रक्तवाससा। संध्यातपेन संछन्नं मेघराशिमिवाम्बरे॥

śaśalohitarāgeṇa saṁvītaṁ raktavāsasā।
saṁdhyātapena saṁchannaṁ megharāśimivāmbare॥

खरगोश के रक्त के समान लाल रंग से रँगे हुए वस्त्र से आच्छादित होकर वह आकाश में संध्याकाल की धूप से ढकी हुई मेघमाला के समान दिखायी देता था

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · ७ ॥
पश्यतां वानरेन्द्राणां राघवस्यापि पश्यतः। दर्शनाद् राक्षसेन्द्रस्य सुग्रीवः सहसोत्थितः॥

paśyatāṁ vānarendrāṇāṁ rāghavasyāpi paśyataḥ।
darśanād rākṣasendrasya sugrīvaḥ sahasotthitaḥ॥

मुख्य-मुख्य वानरों तथा श्रीरघुनाथजी के सामने ही राक्षसराज रावण पर दृष्टि पड़ते ही सुग्रीव सहसा खड़े हो गये

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · ८ ॥
क्रोधवेगेन संयुक्तः सत्त्वेन बलेन च। अचलाग्रादथोत्थाय पुप्लुवे गोपुरस्थले॥

krodhavegena saṁyuktaḥ sattvena ca balena ca।
acalāgrādathotthāya pupluve gopurasthale॥

वे क्रोध के वेग से युक्त और शारीरिक एवं मानसिक बल से प्रेरित हो सुवेल के शिखर से उठकर उस गोपुर की छत पर कूद पड़े

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · ९ ॥
स्थित्वा मुहूर्तं सम्प्रेक्ष्य निर्भयेनान्तरात्मना। तृणीकृत्य तद् रक्षः सोऽब्रवीत् परुषं वचः॥

sthitvā muhūrtaṁ samprekṣya nirbhayenāntarātmanā।
tṛṇīkṛtya ca tad rakṣaḥ so'bravīt paruṣaṁ vacaḥ॥

वहाँ खड़े होकर वे कुछ देर तो रावण को देखते रहे। फिर निर्भय चित्त से उस राक्षस को तिनके के समान समझकर वे कठोर वाणी में बोले—

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · १० ॥
लोकनाथस्य रामस्य सखा दासोऽस्मि राक्षस। मया मोक्ष्यसेऽद्य त्वं पार्थिवेन्द्रस्य तेजसा॥

lokanāthasya rāmasya sakhā dāso'smi rākṣasa।
na mayā mokṣyase'dya tvaṁ pārthivendrasya tejasā॥

‘राक्षस! मैं लोकनाथ भगवान् श्रीराम का सखा और दास हूँ। महाराज श्रीराम के तेज से आज तू मेरे हाथ से छूट नहीं सकेगा’

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · ११ ॥
इत्युक्त्वा सहसोत्पत्य पुप्लुवे तस्य चोपरि। आकृष्य मुकुटं चित्रं पातयामास तद् भुवि॥

ityuktvā sahasotpatya pupluve tasya copari।
ākṛṣya mukuṭaṁ citraṁ pātayāmāsa tad bhuvi॥

ऐसा कहकर वे अकस्मात् उछलकर रावण के ऊपर जा कूदे और उसके विचित्र मुकुटों को खींचकर उन्होंने पृथ्वी पर गिरा दिया

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · १२ ॥
समीक्ष्य तूर्णमायान्तं बभाषे तं निशाचरः। सुग्रीवस्त्वं परोक्षं मे हीनग्रीवो भविष्यसि॥

samīkṣya tūrṇamāyāntaṁ babhāṣe taṁ niśācaraḥ।
sugrīvastvaṁ parokṣaṁ me hīnagrīvo bhaviṣyasi॥

उन्हें इस प्रकार तीव्र गति से अपने ऊपर आक्रमण करते देख रावण ने कहा—‘अरे! जबतक तू मेरे सामने नहीं आया था, तभीतक सुग्रीव (सुन्दर कण्ठ से युक्त) था। अब तो तू अपनी इस ग्रीवा से रहित हो जायगा’

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · १३ ॥
इत्युक्त्वोत्थाय तं क्षिप्रं बाहुभ्यामाक्षिपत् तले। कन्दुवत् समुत्थाय बाहुभ्यामाक्षिपद्धरिः॥

ityuktvotthāya taṁ kṣipraṁ bāhubhyāmākṣipat tale।
kanduvat sa samutthāya bāhubhyāmākṣipaddhariḥ॥

ऐसा कहकर रावण ने अपनी दो भुजाओंद्वारा उन्हें शीघ्र ही उठाकर उस छत की फर्श पर दे मारा। फिर वानरराज सुग्रीव ने भी गेंद की तरह उछलकर रावण को दोनों भुजाओं से उठा लिया और उसी फर्श पर जोर से पटक दिया

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · १४ ॥
परस्परं स्वेदविदिग्धगात्रौ परस्परं शोणितरक्तदेहौ। परस्परं श्लिष्टनिरुद्धचेष्टौ परस्परं शाल्मलिकिंशुकाविव॥

parasparaṁ svedavidigdhagātrau
parasparaṁ śoṇitaraktadehau।
parasparaṁ śliṣṭaniruddhaceṣṭau
parasparaṁ śālmalikiṁśukāviva॥

फिर तो वे दोनों आपस में गुँथ गये। दोनों के ही शरीर पसीने से तर और खून से लथपथ हो गये तथा दोनों ही एक-दूसरे की पकड़ में आने के कारण निश्चेष्ट होकर खिले हुए सेमल और पलाश नामक वृक्षों के समान दिखायी देने लगे

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · १५ ॥
मुष्टिप्रहारैश्च तलप्रहारै- ररत्निघातैश्च कराग्रघातैः। तौ चक्रतुर्युद्धमसह्यरूपं महाबलौ राक्षसवानरेन्द्रौ॥

muṣṭiprahāraiśca talaprahārai-
raratnighātaiśca karāgraghātaiḥ।
tau cakraturyuddhamasahyarūpaṁ
mahābalau rākṣasavānarendrau॥

राक्षसराज रावण और वानरराज सुग्रीव दोनों ही बड़े बलवान् थे, अतः दोनों घूँसे, थप्पड़, कोहनी और पंजों की मार के साथ बड़ा असह्य युद्ध करने लगे

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · १६ ॥
कृत्वा नियुद्धं भृशमुग्रवेगौ कालं चिरं गोपुरवेदिमध्ये। उत्क्षिप्य चोत्क्षिप्य विनम्य देहौ पादक्रमाद् गोपुरवेदिलग्नौ॥

kṛtvā niyuddhaṁ bhṛśamugravegau
kālaṁ ciraṁ gopuravedimadhye।
utkṣipya cotkṣipya vinamya dehau
pādakramād gopuravedilagnau॥

गोपुर के चबूतरे पर बहुत देरतक भारी मल्लयुद्ध करके वे भयानक वेगवाले दोनों वीर बार-बार एक-दूसरे को उछालते और झुकाते हुए पैरों को विशेष दाँव-पेंच के साथ चलाते-चलाते उस चबूतरे से जा लगे

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · १७ ॥
अन्योन्यमापीड्य विलग्नदेहौ तौ पेततुः सालनिखातमध्ये। उत्पेततुर्भूमितलं स्पृशन्तौ स्थित्वा मुहूर्तं त्वभिनिःश्वसन्तौ॥

anyonyamāpīḍya vilagnadehau
tau petatuḥ sālanikhātamadhye।
utpetaturbhūmitalaṁ spṛśantau
sthitvā muhūrtaṁ tvabhiniḥśvasantau॥

एक-दूसरे को दबाकर परस्पर सटे हुए शरीरवाले वे दोनों योद्धा किले के परकोटे और खाई के बीच में गिर गये। वहाँ हाँफते हुए दो घड़ीतक पृथ्वी का आलिङ्गन किये पड़े रहे। तत्पश्चात् उछलकर खड़े हो गये

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · १८ ॥
आलिङ्ग्य चालिङ्ग्य बाहुयोक्त्रैः संयोजयामासतुराहवे तौ। संरम्भशिक्षाबलसम्प्रयुक्तौ सुचेरतुः सम्प्रति युद्धमार्गैः॥

āliṅgya cāliṅgya ca bāhuyoktraiḥ
saṁyojayāmāsaturāhave tau।
saṁrambhaśikṣābalasamprayuktau
suceratuḥ samprati yuddhamārgaiḥ॥

फिर वे एक-दूसरे का बार-बार आलिङ्गन करके उसे बाहुपाश में जकड़ने लगे। दोनों ही क्रोध, शिक्षा (मल्लयुद्ध-विषयक अभ्यास) तथा शारीरिक बल से सम्पन्न थे; अतः उस युद्धस्थल में कुश्ती के अनेक दाँव-पेंच दिखाते हुए भ्रमण करने लगे

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · १९ ॥
शार्दूलसिंहाविव जातदंष्ट्रौ गजेन्द्रपोताविव सम्प्रयुक्तौ। संहत्य संवेद्य तौ कराभ्यां तौ पेततुर्वै युगपद् धरायाम्॥

śārdūlasiṁhāviva jātadaṁṣṭrau
gajendrapotāviva samprayuktau।
saṁhatya saṁvedya ca tau karābhyāṁ
tau petaturvai yugapad dharāyām॥

जिनके नये-नये दाँत निकले हों, ऐसे बाघ और सिंह के बच्चों तथा परस्पर लड़ते हुए गजराज के छोटे छौनों के समान वे दोनों वीर अपने वक्षःस्थल से एक-दूसरे को दबाते और हाथों से परस्पर बल आजमाते हुए एक साथ ही पृथ्वी पर गिर पड़े

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · २० ॥
उद्यम्य चान्योन्यमधिक्षिपन्तौ संचक्रमाते बहु युद्धमार्गे। व्यायामशिक्षाबलसम्प्रयुक्तौ क्लमं तौ जग्मतुराशु वीरौ॥

udyamya cānyonyamadhikṣipantau
saṁcakramāte bahu yuddhamārge।
vyāyāmaśikṣābalasamprayuktau
klamaṁ na tau jagmaturāśu vīrau॥

दोनों ही कसरती जवान थे और युद्ध की शिक्षा तथा बल से सम्पन्न थे। अतः युद्ध जीतने के लिये उद्यमशील हो एक-दूसरे पर आक्षेप करते हुए युद्धमार्ग पर अनेक प्रकार से विचरण करते थे तथापि उन वीरों को जल्दी थकावट नहीं होती थी

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · २१ ॥
बाहूत्तमैर्वारणवारणाभै- र्निवारयन्तौ परवारणाभौ। चिरेण कालेन भृशं प्रयुद्धौ संचेरतुर्मण्डलमार्गमाशु॥

bāhūttamairvāraṇavāraṇābhai-
rnivārayantau paravāraṇābhau।
cireṇa kālena bhṛśaṁ prayuddhau
saṁceraturmaṇḍalamārgamāśu॥

मतवाले हाथियों के समान सुग्रीव और रावण गजराज के शुण्ड-दण्ड की भाँति मोटे एवं बलिष्ठ बाहुदण्डोंद्वारा एक-दूसरे के दाँव को रोकते हुए बहुत देरतक बड़े आवेश के साथ युद्ध करते और शीघ्रतापूर्वक पैंतरे बदलते रहे

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · २२ ॥
तौ परस्परमासाद्य यत्तावन्योन्यसूदने। मार्जाराविव भक्षार्थेऽवतस्थाते मुहुर्मुहुः॥

tau parasparamāsādya yattāvanyonyasūdane।
mārjārāviva bhakṣārthe'vatasthāte muhurmuhuḥ॥

वे परस्पर भिड़कर एक-दूसरे को मार डालने का प्रयत्न कर रहे थे। जैसे दो बिलाव किसी भक्ष्य वस्तु के लिये क्रोधपूर्वक स्थित हो परस्पर दृष्टिपात कर बारंबार गुर्राते रहते हैं, उसी तरह रावण और सुग्रीव भी लड़ रहे थे

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · २३ ॥
मण्डलानि विचित्राणि स्थानानि विविधानि च। गोमूत्रकाणि चित्राणि गतप्रत्यागतानि च॥

maṇḍalāni vicitrāṇi sthānāni vividhāni ca।
gomūtrakāṇi citrāṇi gatapratyāgatāni ca॥

विचित्र मण्डल और भाँति-भाँति के स्थान का प्रदर्शन करते हुए गोमूत्र की रेखा के समान कुटिल गति से चलते और विचित्र रीति से कभी आगे बढ़ते और कभी पीछे हटते थे

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · २४ ॥
तिरश्चीनगतान्येव तथा वक्रगतानि च। परिमोक्षं प्रहाराणां वर्जनं परिधावनम्॥

tiraścīnagatānyeva tathā vakragatāni ca।
parimokṣaṁ prahārāṇāṁ varjanaṁ paridhāvanam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ६ · ४० · २५ ॥
अभिद्रवणमाप्लावमवस्थानं सविग्रहम्। परावृत्तमपावृत्तमपद्रुतमवप्लुतम्॥

abhidravaṇamāplāvamavasthānaṁ savigraham।
parāvṛttamapāvṛttamapadrutamavaplutam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ६ · ४० · २६ ॥
उपन्यस्तमपन्यस्तं युद्धमार्गविशारदौ। तौ विचेरतुरन्योन्यं वानरेन्द्रश्च रावणः॥

upanyastamapanyastaṁ yuddhamārgaviśāradau।
tau viceraturanyonyaṁ vānarendraśca rāvaṇaḥ॥

॥ २४–२६ ॥

वे कभी तिरछी चाल से चलते, कभी टेढ़ी चाल से दायें-बायें घूम जाते, कभी अपने स्थान से हटकर शत्रु के प्रहार को व्यर्थ कर देते, कभी बदले में स्वयं भी दाँव-पेंच का प्रयोग करके शत्रु के आक्रमण से अपनेको बचा लेते, कभी एक खड़ा रहता तो दूसरा उसके चारों ओर दौड़ लगाता, कभी दोनों एक-दूसरे के सम्मुख शीघ्रतापूर्वक दौड़कर आक्रमण करते, कभी झुककर या मेढक की भाँति धीरे से उछलकर चलते, कभी लड़ते हुए एक ही जगह पर स्थिर रहते, कभी पीछे की ओर लौट पड़ते, कभी सामने खड़े-खड़े ही पीछे हटते, कभी विपक्षी को पकड़ने की इच्छा से अपने शरीर को सिकोड़कर या झुकाकर उसकी ओर दौड़ते, कभी प्रतिद्वन्द्वी पर पैर से प्रहार करने के लिये नीचे मुँह किये उसपर टूट पड़ते, कभी प्रतिपक्षी योद्धा की बाँह पकड़ने के लिये अपनी बाँह फैला देते और कभी विरोधी की पकड़ से बचने के लिये अपनी बाहों को पीछे खींच लेते। इस प्रकार मल्लयुद्ध की कला में परम प्रवीण वानरराज सुग्रीव तथा रावण एक दूसरे पर आघात करने के लिये मण्डलाकार विचर रहे थे

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · २७ ॥
एतस्मिन्नन्तरे रक्षो मायाबलमथात्मनः। आरब्धुमुपसम्पेदे ज्ञात्वा तं वानराधिपः॥

etasminnantare rakṣo māyābalamathātmanaḥ।
ārabdhumupasampede jñātvā taṁ vānarādhipaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ६ · ४० · २८ ॥
उत्पपात तदाऽऽकाशं जितकाशी जितक्लमः। रावणः स्थित एवात्र हरिराजेन वञ्चितः॥

utpapāta tadā''kāśaṁ jitakāśī jitaklamaḥ।
rāvaṇaḥ sthita evātra harirājena vañcitaḥ॥

॥ २७–२८ ॥

इसी बीच में राक्षस रावण ने अपनी मायाशक्ति से काम लेने का विचार किया। वानरराज सुग्रीव इस बात को ताड़ गये; इसलिये सहसा आकाश में उछल पड़े। वे विजयोल्लास से सुशोभित होते थे और थकावट को जीत चुके थे। वानरराज रावण को चकमा देकर निकल गये और वह खड़ा-खड़ा देखता ही रह गया

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · २९ ॥
अथ हरिवरनाथः प्राप्तसंग्रामकीर्ति- र्निशिचरपतिमाजौ योजयित्वा श्रमेण। गगनमतिविशालं लङ्घयित्वार्कसूनु- र्हरिगणबलमध्ये रामपार्श्वं जगाम॥

atha harivaranāthaḥ prāptasaṁgrāmakīrti-
rniśicarapatimājau yojayitvā śrameṇa।
gaganamativiśālaṁ laṅghayitvārkasūnu-
rharigaṇabalamadhye rāmapārśvaṁ jagāma॥

जिन्हें संग्राम में कीर्ति प्राप्त हुई थी, वे वानरराज सूर्यपुत्र सुग्रीव निशाचरपति रावण को युद्ध में थकाकर अत्यन्त विशाल आकाशमार्ग का लङ्घन करके वानरों की सेना के बीच श्रीरामचन्द्रजी के पास आ पहुँचे

English translation coming soon.

॥ ६ · ४० · ३० ॥
इति सवितृसूनुस्तत्र तत् कर्म कृत्वा पवनगतिरनीकं प्राविशत् सम्प्रहृष्टः। रघुवरनृपसूनोर्वर्धयन् युद्धहर्षं तरुमृगगणमुख्यैः पूज्यमानो हरीन्द्रः॥

iti sa savitṛsūnustatra tat karma kṛtvā
pavanagatiranīkaṁ prāviśat samprahṛṣṭaḥ।
raghuvaranṛpasūnorvardhayan yuddhaharṣaṁ
tarumṛgagaṇamukhyaiḥ pūjyamāno harīndraḥ॥

इस प्रकार वहाँ अद्भुत कर्म करके वायु के समान शीघ्रगामी सूर्यपुत्र सुग्रीव ने दशरथराजकुमार श्रीराम के युद्धविषयक उत्साह को बढ़ाते हुए बड़े हर्ष के साथ वानरसेना में प्रवेश किया। उस समय प्रधान-प्रधान वानरों ने वानरराज का अभिनन्दन किया

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः॥ ४० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४० ॥