सुग्रीव और रावणका मल्लयुद्ध
tato rāmaḥ suvelāgraṁ yojanadvayamaṇḍalam।
upārohat sasugrīvo hariyūthaiḥ samanvitaḥ॥
तदनन्तर वानरयूथों से युक्त सुग्रीवसहित श्रीराम सुवेल पर्वत के सबसे ऊँचे शिखर पर चढ़े, जिसका विस्तार दो योजन का था
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sthitvā muhūrtaṁ tatraiva diśo daśa vilokayan।
trikūṭaśikhare ramye nirmitāṁ viśvakarmaṇā॥
dadarśa laṅkāṁ sunyastāṁ ramyakānanaśobhitām।
वहाँ दो घड़ी ठहरकर दसों दिशाओं की ओर दृष्टिपात करते हुए श्रीराम ने त्रिकूट पर्वत के रमणीय शिखर पर सुन्दर ढंग से बसी हुई विश्वकर्माद्वारा निर्मित लङ्कापुरी को देखा, जो मनोहर काननों से सुशोभित थी
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tasya gopuraśṛṅgasthaṁ rākṣasendraṁ durāsadam॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
śvetacāmaraparyantaṁ vijayacchatraśobhitam।
raktacandanasaṁliptaṁ ratnābharaṇabhūṣitam॥
उस नगर के गोपुर की छत पर उन्हें दुर्जय राक्षसराज रावण बैठा दिखायी दिया, जिसके दोनों ओर श्वेत चँवर डुलाये जा रहे थे, सिर पर विजय-छत्र शोभा दे रहा था। रावण का सारा शरीर रक्तचन्दन से चर्चित था। उसके अङ्ग लाल रंग के आभूषणों से विभूषित थे
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nīlajīmūtasaṁkāśaṁ hemasaṁchāditāmbaram।
airāvataviṣāṇāgrairutkṛṣṭakiṇavakṣasam॥
वह काले मेघ के समान जान पड़ता था। उसके वस्त्रों पर सोने के काम किये गये थे। ऐरावत हाथी के दाँतों के अग्रभाग से आहत होने के कारण उसके वक्षःस्थल में आघातचिह्न बन गया था
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śaśalohitarāgeṇa saṁvītaṁ raktavāsasā।
saṁdhyātapena saṁchannaṁ megharāśimivāmbare॥
खरगोश के रक्त के समान लाल रंग से रँगे हुए वस्त्र से आच्छादित होकर वह आकाश में संध्याकाल की धूप से ढकी हुई मेघमाला के समान दिखायी देता था
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paśyatāṁ vānarendrāṇāṁ rāghavasyāpi paśyataḥ।
darśanād rākṣasendrasya sugrīvaḥ sahasotthitaḥ॥
मुख्य-मुख्य वानरों तथा श्रीरघुनाथजी के सामने ही राक्षसराज रावण पर दृष्टि पड़ते ही सुग्रीव सहसा खड़े हो गये
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krodhavegena saṁyuktaḥ sattvena ca balena ca।
acalāgrādathotthāya pupluve gopurasthale॥
वे क्रोध के वेग से युक्त और शारीरिक एवं मानसिक बल से प्रेरित हो सुवेल के शिखर से उठकर उस गोपुर की छत पर कूद पड़े
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sthitvā muhūrtaṁ samprekṣya nirbhayenāntarātmanā।
tṛṇīkṛtya ca tad rakṣaḥ so'bravīt paruṣaṁ vacaḥ॥
वहाँ खड़े होकर वे कुछ देर तो रावण को देखते रहे। फिर निर्भय चित्त से उस राक्षस को तिनके के समान समझकर वे कठोर वाणी में बोले—
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lokanāthasya rāmasya sakhā dāso'smi rākṣasa।
na mayā mokṣyase'dya tvaṁ pārthivendrasya tejasā॥
‘राक्षस! मैं लोकनाथ भगवान् श्रीराम का सखा और दास हूँ। महाराज श्रीराम के तेज से आज तू मेरे हाथ से छूट नहीं सकेगा’
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ityuktvā sahasotpatya pupluve tasya copari।
ākṛṣya mukuṭaṁ citraṁ pātayāmāsa tad bhuvi॥
ऐसा कहकर वे अकस्मात् उछलकर रावण के ऊपर जा कूदे और उसके विचित्र मुकुटों को खींचकर उन्होंने पृथ्वी पर गिरा दिया
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samīkṣya tūrṇamāyāntaṁ babhāṣe taṁ niśācaraḥ।
sugrīvastvaṁ parokṣaṁ me hīnagrīvo bhaviṣyasi॥
उन्हें इस प्रकार तीव्र गति से अपने ऊपर आक्रमण करते देख रावण ने कहा—‘अरे! जबतक तू मेरे सामने नहीं आया था, तभीतक सुग्रीव (सुन्दर कण्ठ से युक्त) था। अब तो तू अपनी इस ग्रीवा से रहित हो जायगा’
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ityuktvotthāya taṁ kṣipraṁ bāhubhyāmākṣipat tale।
kanduvat sa samutthāya bāhubhyāmākṣipaddhariḥ॥
ऐसा कहकर रावण ने अपनी दो भुजाओंद्वारा उन्हें शीघ्र ही उठाकर उस छत की फर्श पर दे मारा। फिर वानरराज सुग्रीव ने भी गेंद की तरह उछलकर रावण को दोनों भुजाओं से उठा लिया और उसी फर्श पर जोर से पटक दिया
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parasparaṁ svedavidigdhagātrau
parasparaṁ śoṇitaraktadehau।
parasparaṁ śliṣṭaniruddhaceṣṭau
parasparaṁ śālmalikiṁśukāviva॥
फिर तो वे दोनों आपस में गुँथ गये। दोनों के ही शरीर पसीने से तर और खून से लथपथ हो गये तथा दोनों ही एक-दूसरे की पकड़ में आने के कारण निश्चेष्ट होकर खिले हुए सेमल और पलाश नामक वृक्षों के समान दिखायी देने लगे
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muṣṭiprahāraiśca talaprahārai-
raratnighātaiśca karāgraghātaiḥ।
tau cakraturyuddhamasahyarūpaṁ
mahābalau rākṣasavānarendrau॥
राक्षसराज रावण और वानरराज सुग्रीव दोनों ही बड़े बलवान् थे, अतः दोनों घूँसे, थप्पड़, कोहनी और पंजों की मार के साथ बड़ा असह्य युद्ध करने लगे
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kṛtvā niyuddhaṁ bhṛśamugravegau
kālaṁ ciraṁ gopuravedimadhye।
utkṣipya cotkṣipya vinamya dehau
pādakramād gopuravedilagnau॥
गोपुर के चबूतरे पर बहुत देरतक भारी मल्लयुद्ध करके वे भयानक वेगवाले दोनों वीर बार-बार एक-दूसरे को उछालते और झुकाते हुए पैरों को विशेष दाँव-पेंच के साथ चलाते-चलाते उस चबूतरे से जा लगे
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anyonyamāpīḍya vilagnadehau
tau petatuḥ sālanikhātamadhye।
utpetaturbhūmitalaṁ spṛśantau
sthitvā muhūrtaṁ tvabhiniḥśvasantau॥
एक-दूसरे को दबाकर परस्पर सटे हुए शरीरवाले वे दोनों योद्धा किले के परकोटे और खाई के बीच में गिर गये। वहाँ हाँफते हुए दो घड़ीतक पृथ्वी का आलिङ्गन किये पड़े रहे। तत्पश्चात् उछलकर खड़े हो गये
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āliṅgya cāliṅgya ca bāhuyoktraiḥ
saṁyojayāmāsaturāhave tau।
saṁrambhaśikṣābalasamprayuktau
suceratuḥ samprati yuddhamārgaiḥ॥
फिर वे एक-दूसरे का बार-बार आलिङ्गन करके उसे बाहुपाश में जकड़ने लगे। दोनों ही क्रोध, शिक्षा (मल्लयुद्ध-विषयक अभ्यास) तथा शारीरिक बल से सम्पन्न थे; अतः उस युद्धस्थल में कुश्ती के अनेक दाँव-पेंच दिखाते हुए भ्रमण करने लगे
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śārdūlasiṁhāviva jātadaṁṣṭrau
gajendrapotāviva samprayuktau।
saṁhatya saṁvedya ca tau karābhyāṁ
tau petaturvai yugapad dharāyām॥
जिनके नये-नये दाँत निकले हों, ऐसे बाघ और सिंह के बच्चों तथा परस्पर लड़ते हुए गजराज के छोटे छौनों के समान वे दोनों वीर अपने वक्षःस्थल से एक-दूसरे को दबाते और हाथों से परस्पर बल आजमाते हुए एक साथ ही पृथ्वी पर गिर पड़े
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udyamya cānyonyamadhikṣipantau
saṁcakramāte bahu yuddhamārge।
vyāyāmaśikṣābalasamprayuktau
klamaṁ na tau jagmaturāśu vīrau॥
दोनों ही कसरती जवान थे और युद्ध की शिक्षा तथा बल से सम्पन्न थे। अतः युद्ध जीतने के लिये उद्यमशील हो एक-दूसरे पर आक्षेप करते हुए युद्धमार्ग पर अनेक प्रकार से विचरण करते थे तथापि उन वीरों को जल्दी थकावट नहीं होती थी
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bāhūttamairvāraṇavāraṇābhai-
rnivārayantau paravāraṇābhau।
cireṇa kālena bhṛśaṁ prayuddhau
saṁceraturmaṇḍalamārgamāśu॥
मतवाले हाथियों के समान सुग्रीव और रावण गजराज के शुण्ड-दण्ड की भाँति मोटे एवं बलिष्ठ बाहुदण्डोंद्वारा एक-दूसरे के दाँव को रोकते हुए बहुत देरतक बड़े आवेश के साथ युद्ध करते और शीघ्रतापूर्वक पैंतरे बदलते रहे
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tau parasparamāsādya yattāvanyonyasūdane।
mārjārāviva bhakṣārthe'vatasthāte muhurmuhuḥ॥
वे परस्पर भिड़कर एक-दूसरे को मार डालने का प्रयत्न कर रहे थे। जैसे दो बिलाव किसी भक्ष्य वस्तु के लिये क्रोधपूर्वक स्थित हो परस्पर दृष्टिपात कर बारंबार गुर्राते रहते हैं, उसी तरह रावण और सुग्रीव भी लड़ रहे थे
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maṇḍalāni vicitrāṇi sthānāni vividhāni ca।
gomūtrakāṇi citrāṇi gatapratyāgatāni ca॥
विचित्र मण्डल और भाँति-भाँति के स्थान का प्रदर्शन करते हुए गोमूत्र की रेखा के समान कुटिल गति से चलते और विचित्र रीति से कभी आगे बढ़ते और कभी पीछे हटते थे
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tiraścīnagatānyeva tathā vakragatāni ca।
parimokṣaṁ prahārāṇāṁ varjanaṁ paridhāvanam॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
abhidravaṇamāplāvamavasthānaṁ savigraham।
parāvṛttamapāvṛttamapadrutamavaplutam॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
upanyastamapanyastaṁ yuddhamārgaviśāradau।
tau viceraturanyonyaṁ vānarendraśca rāvaṇaḥ॥
वे कभी तिरछी चाल से चलते, कभी टेढ़ी चाल से दायें-बायें घूम जाते, कभी अपने स्थान से हटकर शत्रु के प्रहार को व्यर्थ कर देते, कभी बदले में स्वयं भी दाँव-पेंच का प्रयोग करके शत्रु के आक्रमण से अपनेको बचा लेते, कभी एक खड़ा रहता तो दूसरा उसके चारों ओर दौड़ लगाता, कभी दोनों एक-दूसरे के सम्मुख शीघ्रतापूर्वक दौड़कर आक्रमण करते, कभी झुककर या मेढक की भाँति धीरे से उछलकर चलते, कभी लड़ते हुए एक ही जगह पर स्थिर रहते, कभी पीछे की ओर लौट पड़ते, कभी सामने खड़े-खड़े ही पीछे हटते, कभी विपक्षी को पकड़ने की इच्छा से अपने शरीर को सिकोड़कर या झुकाकर उसकी ओर दौड़ते, कभी प्रतिद्वन्द्वी पर पैर से प्रहार करने के लिये नीचे मुँह किये उसपर टूट पड़ते, कभी प्रतिपक्षी योद्धा की बाँह पकड़ने के लिये अपनी बाँह फैला देते और कभी विरोधी की पकड़ से बचने के लिये अपनी बाहों को पीछे खींच लेते। इस प्रकार मल्लयुद्ध की कला में परम प्रवीण वानरराज सुग्रीव तथा रावण एक दूसरे पर आघात करने के लिये मण्डलाकार विचर रहे थे
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etasminnantare rakṣo māyābalamathātmanaḥ।
ārabdhumupasampede jñātvā taṁ vānarādhipaḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
utpapāta tadā''kāśaṁ jitakāśī jitaklamaḥ।
rāvaṇaḥ sthita evātra harirājena vañcitaḥ॥
इसी बीच में राक्षस रावण ने अपनी मायाशक्ति से काम लेने का विचार किया। वानरराज सुग्रीव इस बात को ताड़ गये; इसलिये सहसा आकाश में उछल पड़े। वे विजयोल्लास से सुशोभित होते थे और थकावट को जीत चुके थे। वानरराज रावण को चकमा देकर निकल गये और वह खड़ा-खड़ा देखता ही रह गया
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atha harivaranāthaḥ prāptasaṁgrāmakīrti-
rniśicarapatimājau yojayitvā śrameṇa।
gaganamativiśālaṁ laṅghayitvārkasūnu-
rharigaṇabalamadhye rāmapārśvaṁ jagāma॥
जिन्हें संग्राम में कीर्ति प्राप्त हुई थी, वे वानरराज सूर्यपुत्र सुग्रीव निशाचरपति रावण को युद्ध में थकाकर अत्यन्त विशाल आकाशमार्ग का लङ्घन करके वानरों की सेना के बीच श्रीरामचन्द्रजी के पास आ पहुँचे
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iti sa savitṛsūnustatra tat karma kṛtvā
pavanagatiranīkaṁ prāviśat samprahṛṣṭaḥ।
raghuvaranṛpasūnorvardhayan yuddhaharṣaṁ
tarumṛgagaṇamukhyaiḥ pūjyamāno harīndraḥ॥
इस प्रकार वहाँ अद्भुत कर्म करके वायु के समान शीघ्रगामी सूर्यपुत्र सुग्रीव ने दशरथराजकुमार श्रीराम के युद्धविषयक उत्साह को बढ़ाते हुए बड़े हर्ष के साथ वानरसेना में प्रवेश किया। उस समय प्रधान-प्रधान वानरों ने वानरराज का अभिनन्दन किया
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४० ॥