वाल्मीकि रामायणम् · युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

सर्गः ३९ · २८ श्लोकाःSarga 39 · 28 ślokas

वानरोंसहित श्रीरामका सुवेल-शिखरसे लङ्कापुरीका निरीक्षण करना

॥ ६ · ३९ · १ ॥
तां रात्रिमुषितास्तत्र सुवेले हरियूथपाः। लङ्कायां ददृशुर्वीरा वनान्युपवनानि च॥

tāṁ rātrimuṣitāstatra suvele hariyūthapāḥ।
laṅkāyāṁ dadṛśurvīrā vanānyupavanāni ca॥

वानर-यूथपतियों ने वह रात उस सुवेलपर्वत पर ही बितायी और वहाँ से उन वीरों ने लङ्का के वन और उपवन भी देखे

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॥ ६ · ३९ · २ ॥
समसौम्यानि रम्याणि विशालान्यायतानि च। दृष्टिरम्याणि ते दृष्ट्वा बभूवुर्जातविस्मयाः॥

samasaumyāni ramyāṇi viśālānyāyatāni ca।
dṛṣṭiramyāṇi te dṛṣṭvā babhūvurjātavismayāḥ॥

वे बड़े ही चौरस, शान्त, सुन्दर, विशाल और विस्तृत थे तथा देखने में अत्यन्त रमणीय जान पड़ते थे। उन्हें देखकर उन सब वानरों को बड़ा विस्मय हुआ

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॥ ६ · ३९ · ३ ॥
चम्पकाशोकबकुलशालतालसमाकुला। तमालवनसंछन्ना नागमालासमावृता॥

campakāśokabakulaśālatālasamākulā।
tamālavanasaṁchannā nāgamālāsamāvṛtā॥

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॥ ६ · ३९ · ४ ॥
हिन्तालैरर्जुनैर्नीपैः सप्तपर्णैः सुपुष्पितैः। तिलकैः कर्णिकारैश्च पाटलैश्च समन्ततः॥

hintālairarjunairnīpaiḥ saptaparṇaiḥ supuṣpitaiḥ।
tilakaiḥ karṇikāraiśca pāṭalaiśca samantataḥ॥

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॥ ६ · ३९ · ५ ॥
शुशुभे पुष्पिताग्रैश्च लतापरिगतैर्द्रुमैः। लङ्का बहुविधैर्दिव्यैर्यथेन्द्रस्यामरावती॥

śuśubhe puṣpitāgraiśca latāparigatairdrumaiḥ।
laṅkā bahuvidhairdivyairyathendrasyāmarāvatī॥

॥ ३–५ ॥

चम्पा, अशोक, बकुल, शाल और ताल-वृक्षों से व्याप्त, तमाल-वन से आच्छादित और नागकेसरों से आवृत लङ्कापुरी हिंताल, अर्जुन, नीप (कदम्ब), खिले हुए छितवन, तिलक, कनेर तथा पाटल आदि नाना प्रकार के दिव्य वृक्षों से जिनके अग्रभाग फूलों के भार से लदे थे तथा जिनपर लताबल्लरियाँ फैली हुई थीं, इन्द्र की अमरावती के समान शोभा पाती थी

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॥ ६ · ३९ · ६ ॥
विचित्रकुसुमोपेतै रक्तकोमलपल्लवैः। शाद्वलैश्च तथा नीलैश्चित्राभिर्वनराजिभिः॥

vicitrakusumopetai raktakomalapallavaiḥ।
śādvalaiśca tathā nīlaiścitrābhirvanarājibhiḥ॥

विचित्र फूलों से युक्त लाल कोमल पल्लवों, हरी-हरी घासों तथा विचित्र वनश्रेणियों से भी उस पुरी की बड़ी शोभा हो रही थी

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॥ ६ · ३९ · ७ ॥
गन्धाढ्यान्यतिरम्याणि पुष्पाणि फलानि च। धारयन्त्यगमास्तत्र भूषणानीव मानवाः॥

gandhāḍhyānyatiramyāṇi puṣpāṇi ca phalāni ca।
dhārayantyagamāstatra bhūṣaṇānīva mānavāḥ॥

जैसे मनुष्य आभूषण धारण करते हैं, उसी प्रकार वहाँ के वृक्ष सुगन्धित फूल और अत्यन्त रमणीय फल धारण करते थे

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॥ ६ · ३९ · ८ ॥
तच्चैत्ररथसंकाशं मनोज्ञं नन्दनोपमम्। वनं सर्वर्तुकं रम्यं शुशुभे षट्पदायुतम्॥

taccaitrarathasaṁkāśaṁ manojñaṁ nandanopamam।
vanaṁ sarvartukaṁ ramyaṁ śuśubhe ṣaṭpadāyutam॥

चैत्ररथ और नन्दनवन के समान वहाँ का मनोहर वन सभी ऋतुओं में भ्रमरों से व्याप्त हो रमणीय शोभा धारण करता था

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॥ ६ · ३९ · ९ ॥
दात्यूहकोयष्टिबकैर्नृत्यमानैश्च बर्हिणैः। रुतं परभृतानां शुश्रुवे वननिर्झरे॥

dātyūhakoyaṣṭibakairnṛtyamānaiśca barhiṇaiḥ।
rutaṁ parabhṛtānāṁ ca śuśruve vananirjhare॥

दात्यूह, कोयष्टि, बक और नाचते हुए मोर उस वन को सुशोभित करते थे। वन में झरनों के आसपास कोकिल की कूक सुनायी पड़ती थी

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॥ ६ · ३९ · १० ॥
नित्यमत्तविहंगानि भ्रमराचरितानि च। कोकिलाकुलखण्डानि विहंगाभिरुतानि च॥

nityamattavihaṁgāni bhramarācaritāni ca।
kokilākulakhaṇḍāni vihaṁgābhirutāni ca॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ६ · ३९ · ११ ॥
भृङ्गराजाधिगीतानि कुररस्वनितानि च। कोणालकविघुष्टानि सारसाभिरुतानि च। विविशुस्ते ततस्तानि वनान्युपवनानि च॥

bhṛṅgarājādhigītāni kurarasvanitāni ca।
koṇālakavighuṣṭāni sārasābhirutāni ca।
viviśuste tatastāni vanānyupavanāni ca॥

॥ १०–११ ॥

लङ्का के वन और उपवन नित्य मतवाले विहङ्गमों से विभूषित थे। वहाँ वृक्षों की डालियों पर भौंरे मँडराते रहते थे। उनके प्रत्येक खण्ड में कोकिलाएँ कुहू-कुहू बोला करती थीं। पक्षी चहचहाते रहते थे। भृङ्गराज के गीत मुखरित होते थे। कुरर के शब्द गूँजा करते थे। कोणालक के कलरव होते रहते थे तथा सारसों की स्वरलहरी सब ओर छायी रहती थी। कुछ वानरवीर उन वनों और उपवनों में घुस गये

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॥ ६ · ३९ · १२ ॥
हृष्टाः प्रमुदिता वीरा हरयः कामरूपिणः। तेषां प्रविशतां तत्र वानराणां महौजसाम्॥

hṛṣṭāḥ pramuditā vīrā harayaḥ kāmarūpiṇaḥ।
teṣāṁ praviśatāṁ tatra vānarāṇāṁ mahaujasām॥

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॥ ६ · ३९ · १३ ॥
पुष्पसंसर्गसुरभिर्ववौ घ्राणसुखोऽनिलः। अन्ये तु हरिवीराणां यूथान्निष्क्रम्य यूथपाः। सुग्रीवेणाभ्यनुज्ञाता लङ्कां जग्मुः पताकिनीम्॥

puṣpasaṁsargasurabhirvavau ghrāṇasukho'nilaḥ।
anye tu harivīrāṇāṁ yūthānniṣkramya yūthapāḥ।
sugrīveṇābhyanujñātā laṅkāṁ jagmuḥ patākinīm॥

॥ १२–१३ ॥

वे सभी वीर वानर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, उत्साही और आनन्दमग्न थे। उन महातेजस्वी वानरों के वहाँ प्रवेश करते ही फूलों के संसर्ग से सुगन्धित तथा घ्राणेन्द्रिय को सुख देनेवाली मन्द वायु चलने लगी। दूसरे बहुत-से यूथपति उन वानरवीरों के समूह से निकलकर सुग्रीव की आज्ञा ले ध्वजा-पताकाओं से अलंकृत लङ्कापुरी में गये

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॥ ६ · ३९ · १४ ॥
वित्रासयन्तो विहगान् ग्लापयन्तो मृगद्विपान्। कम्पयन्तश्च तां लङ्कां नादैः स्वैर्नदतां वराः॥

vitrāsayanto vihagān glāpayanto mṛgadvipān।
kampayantaśca tāṁ laṅkāṁ nādaiḥ svairnadatāṁ varāḥ॥

गर्जनेवाले लोगों में से श्रेष्ठ वे वानरवीर अपने सिंहनाद से पक्षियों को डराते, मृगों और हाथियों के हर्ष छीनते तथा लङ्का को कम्पित करते हुए आगे बढ़ रहे थे

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॥ ६ · ३९ · १५ ॥
कुर्वन्तस्ते महावेगा महीं चरणपीडिताम्। रजश्च सहसैवोर्ध्वं जगाम चरणोत्थितम्॥

kurvantaste mahāvegā mahīṁ caraṇapīḍitām।
rajaśca sahasaivordhvaṁ jagāma caraṇotthitam॥

वे महान् वेगशाली वानर पृथ्वी को जब चरणों से दबाते थे, उस समय उनके पैरों से उठी हुई धूल सहसा ऊपर को उड़ जाती थी

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॥ ६ · ३९ · १६ ॥
ऋक्षाः सिंहाश्च महिषा वारणाश्च मृगाः खगाः। तेन शब्देन वित्रस्ता जग्मुर्भीता दिशो दश॥

ṛkṣāḥ siṁhāśca mahiṣā vāraṇāśca mṛgāḥ khagāḥ।
tena śabdena vitrastā jagmurbhītā diśo daśa॥

वानरों के उस सिंहनाद से त्रस्त एवं भयभीत हुए रीछ, सिंह, भैंसे, हाथी, मृग और पक्षी दसों दिशाओं की ओर भाग गये

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॥ ६ · ३९ · १७ ॥
शिखरं तु त्रिकूटस्य प्रांशु चैकं दिविस्पृशम्। समन्तात् पुष्पसंछन्नं महारजतसंनिभम्॥

śikharaṁ tu trikūṭasya prāṁśu caikaṁ divispṛśam।
samantāt puṣpasaṁchannaṁ mahārajatasaṁnibham॥

त्रिकूट पर्वत का एक शिखर बहुत ऊँचा था। ऐसा जान पड़ता था, मानो स्वर्गलोक को छू रहा हो। उसपर सब ओर पीले रंग के फूल खिले हुए थे, जिनसे वह सोने का-सा जान पड़ता था

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॥ ६ · ३९ · १८ ॥
शतयोजनविस्तीर्णं विमलं चारुदर्शनम्। श्लक्ष्णं श्रीमन्महच्चैव दुष्प्रापं शकुनैरपि॥

śatayojanavistīrṇaṁ vimalaṁ cārudarśanam।
ślakṣṇaṁ śrīmanmahaccaiva duṣprāpaṁ śakunairapi॥

उस शिखर का विस्तार सौ योजन था। वह देखने में बड़ा ही सुन्दर, स्वच्छ, स्निग्ध, कान्तिमान् और विशाल था। पक्षियों के लिये भी उसकी चोटीतक पहुँचना कठिन होता था

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॥ ६ · ३९ · १९ ॥
मनसापि दुरारोहं किं पुनः कर्मणा जनैः। निविष्टा तस्य शिखरे लङ्का रावणपालिता॥

manasāpi durārohaṁ kiṁ punaḥ karmaṇā janaiḥ।
niviṣṭā tasya śikhare laṅkā rāvaṇapālitā॥

लोग त्रिकूट के उस शिखर पर मन के द्वारा चढ़ने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। फिर क्रियाद्वारा उसपर आरूढ़ होने की तो बात ही क्या है? रावणद्वारा पालित लङ्का त्रिकूट के उसी शिखर पर बसी हुई थी

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॥ ६ · ३९ · २० ॥
दशयोजनविस्तीर्णा विंशद्योजनमायता। सा पुरी गोपुरैरुच्चैः पाण्डुराम्बुदसंनिभैः। काञ्चनेन शालेन राजतेन शोभते॥

daśayojanavistīrṇā viṁśadyojanamāyatā।
sā purī gopurairuccaiḥ pāṇḍurāmbudasaṁnibhaiḥ।
kāñcanena ca śālena rājatena ca śobhate॥

वह पुरी दस योजन चौड़ी और बीस योजन लंबी थी। सफेद बादलों के समान ऊँचे-ऊँचे गोपुर तथा सोने और चाँदी के परकोटे उसकी शोभा बढ़ाते थे

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॥ ६ · ३९ · २१ ॥
प्रासादैश्च विमानैश्च लङ्का परमभूषिता। घनैरिवातपापाये मध्यमं वैष्णवं पदम्॥

prāsādaiśca vimānaiśca laṅkā paramabhūṣitā।
ghanairivātapāpāye madhyamaṁ vaiṣṇavaṁ padam॥

जैसे ग्रीष्म के अन्तकाल—वर्षा ऋतु में घनीभूत बादल आकाश की शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार प्रासादों और विमानों से लङ्कापुरी अत्यन्त सुशोभित हो रही थी

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॥ ६ · ३९ · २२ ॥
यस्यां स्तम्भसहस्रेण प्रासादः समलंकृतः। कैलासशिखराकारो दृश्यते खमिवोल्लिखन्॥

yasyāṁ stambhasahasreṇa prāsādaḥ samalaṁkṛtaḥ।
kailāsaśikharākāro dṛśyate khamivollikhan॥

उस पुरी में सहस्र खम्भों से अलंकृत एक चैत्यप्रासाद था, जो कैलास-शिखर के समान दिखायी देता था। वह आकाश को मापता हुआ-सा जान पड़ता था

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॥ ६ · ३९ · २३ ॥
चैत्यः राक्षसेन्द्रस्य बभूव पुरभूषणम्। शतेन रक्षसां नित्यं यः समग्रेण रक्ष्यते॥

caityaḥ sa rākṣasendrasya babhūva purabhūṣaṇam।
śatena rakṣasāṁ nityaṁ yaḥ samagreṇa rakṣyate॥

राक्षसराज रावण का वह चैत्यप्रासाद लङ्कापुरी का आभूषण था। कई सौ राक्षस रक्षा के सभी साधनों से सम्पन्न होकर प्रतिदिन उसकी रक्षा करते थे

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॥ ६ · ३९ · २४ ॥
मनोज्ञां काञ्चनवतीं पर्वतैरुपशोभिताम्। नानाधातुविचित्रैश्च उद्यानैरुपशोभिताम्॥

manojñāṁ kāñcanavatīṁ parvatairupaśobhitām।
nānādhātuvicitraiśca udyānairupaśobhitām॥

इस प्रकार वह पुरी बड़ी ही मनोहर, सुवर्णमयी, अनेकानेक पर्वतों से अलंकृत, नाना प्रकार की विचित्र धातुओं से चित्रित और अनेक उद्यानों से सुशोभित थी

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॥ ६ · ३९ · २५ ॥
नानाविहगसंघुष्टां नानामृगनिषेविताम्। नानाकुसुमसम्पन्नां नानाराक्षससेविताम्॥

nānāvihagasaṁghuṣṭāṁ nānāmṛganiṣevitām।
nānākusumasampannāṁ nānārākṣasasevitām॥

भाँति-भाँति के विहङ्गम वहाँ अपनी मधुर बोली बोल रहे थे। नाना प्रकार के मृग आदि पशु उसका सेवन करते थे। अनेक प्रकार के फूलों की सम्पत्ति से वह सम्पन्न थी और विविध प्रकार के आकारवाले राक्षस वहाँ निवास करते थे

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॥ ६ · ३९ · २६ ॥
तां समृद्धां समृद्धार्थो लक्ष्मीवाँल्लक्ष्मणाग्रजः। रावणस्य पुरीं रामो ददर्श सह वानरैः॥

tāṁ samṛddhāṁ samṛddhārtho lakṣmīvām̐llakṣmaṇāgrajaḥ।
rāvaṇasya purīṁ rāmo dadarśa saha vānaraiḥ॥

धन-धान्य से सम्पन्न तथा सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओं से भरी-पूरी उस रावण-पुरी को लक्ष्मण के बड़े भाई लक्ष्मीवान् श्रीराम ने वानरों के साथ देखा

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॥ ६ · ३९ · २७ ॥
तां महागृहसम्बाधां दृष्ट्वा लक्ष्मणपूर्वजः। नगरीं त्रिदिवप्रख्यां विस्मयं प्राप वीर्यवान्॥

tāṁ mahāgṛhasambādhāṁ dṛṣṭvā lakṣmaṇapūrvajaḥ।
nagarīṁ tridivaprakhyāṁ vismayaṁ prāpa vīryavān॥

बड़े-बड़े महलों से सघन बसी हुई उस स्वर्गतुल्य नगरी को देखकर पराक्रमी श्रीराम बड़े विस्मित हुए

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॥ ६ · ३९ · २८ ॥
तां रत्नपूर्णां बहुसंविधानां प्रासादमालाभिरलंकृतां च। पुरीं महायन्त्रकवाटमुख्यां ददर्श रामो महता बलेन॥

tāṁ ratnapūrṇāṁ bahusaṁvidhānāṁ
prāsādamālābhiralaṁkṛtāṁ ca।
purīṁ mahāyantrakavāṭamukhyāṁ
dadarśa rāmo mahatā balena॥

इस प्रकार अपनी विशाल सेना के साथ श्रीरघुनाथजी ने अनेक प्रकार के रत्नों से पूर्ण, तरह-तरह की रचनाओं से सुसज्जित, ऊँचे-ऊँचे महलों की पंक्ति से अलंकृत और बड़े-बड़े यन्त्रों से युक्त मजबूत किवाड़ोंवाली वह अद्भुत पुरी देखी

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः॥ ३९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें उन्तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३९ ॥