वाल्मीकि रामायणम् · युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

सर्गः २४ · ४४ श्लोकाःSarga 24 · 44 ślokas

श्रीरामका लक्ष्मणसे लङ्काकी शोभाका वर्णन करके सेनाको व्यूहबद्ध खड़ी होनेके लिये आदेश देना, श्रीरामकी आज्ञासे बन्धनमुक्त हुए शुकका रावणके पास जाकर उनकी सैन्यशक्तिकी प्रबलता बताना तथा रावणका अपने बलकी डींग हाँकना

॥ ६ · २४ · १ ॥
सा वीरसमिती राज्ञा विरराज व्यवस्थिता। शशिना शुभनक्षत्रा पौर्णमासीव शारदी॥

sā vīrasamitī rājñā virarāja vyavasthitā।
śaśinā śubhanakṣatrā paurṇamāsīva śāradī॥

सुग्रीव ने उस वीर वानरसेना की यथोचित व्यवस्था की थी। उनके कारण वह वैसी ही शोभा पाती थी, जैसे चन्द्रमा और शुभ नक्षत्रों से युक्त शरत्काल की पूर्णिमा सुशोभित हो रही हो

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॥ ६ · २४ · २ ॥
प्रचचाल वेगेन त्रस्ता चैव वसुंधरा। पीड्यमाना बलौघेन तेन सागरवर्चसा॥

pracacāla ca vegena trastā caiva vasuṁdharā।
pīḍyamānā balaughena tena sāgaravarcasā॥

वह विशाल सैन्य-समूह समुद्र के समान जान पड़ता था। उसके भार से दबी हुई वसुधा भयभीत हो उठी और उसके वेग से डोलने लगी

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॥ ६ · २४ · ३ ॥
ततः शुश्रुवुराक्रुष्टं लङ्कायां काननौकसः। भेरीमृदङ्गसंघुष्टं तुमुलं लोमहर्षणम्॥

tataḥ śuśruvurākruṣṭaṁ laṅkāyāṁ kānanaukasaḥ।
bherīmṛdaṅgasaṁghuṣṭaṁ tumulaṁ lomaharṣaṇam॥

तदनन्तर वानरों ने लङ्का में महान् कोलाहल सुना, जो भेरी और मृदङ्ग के गम्भीर घोष से मिलकर बड़ा ही भयंकर और रोमाञ्चकारी जान पड़ता था

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॥ ६ · २४ · ४ ॥
बभूवुस्तेन घोषेण संहृष्टा हरियूथपाः। अमृष्यमाणास्तद् घोषं विनेदुर्घोषवत्तरम्॥

babhūvustena ghoṣeṇa saṁhṛṣṭā hariyūthapāḥ।
amṛṣyamāṇāstad ghoṣaṁ vinedurghoṣavattaram॥

उस तुमुलनाद को सुनकर वानरयूथपति हर्ष और उत्साह में भर गये और उसे न सह सकने के कारण उससे भी बढ़कर जोर-जोर से गर्जना करने लगे

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॥ ६ · २४ · ५ ॥
राक्षसास्तत् प्लवंगानां शुश्रुवुस्तेऽपि गर्जितम्। नर्दतामिव दृप्तानां मेघानामम्बरे स्वनम्॥

rākṣasāstat plavaṁgānāṁ śuśruvuste'pi garjitam।
nardatāmiva dṛptānāṁ meghānāmambare svanam॥

राक्षसों ने वानरों की वह गर्जना सुनी, जो दर्प में भरकर सिंहनाद कर रहे थे। उनकी आवाज आकाश में मेघों की गर्जना के समान जान पड़ती थी

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॥ ६ · २४ · ६ ॥
दृष्ट्वा दाशरथिर्लङ्कां चित्रध्वजपताकिनीम्। जगाम मनसा सीतां दूयमानेन चेतसा॥

dṛṣṭvā dāśarathirlaṅkāṁ citradhvajapatākinīm।
jagāma manasā sītāṁ dūyamānena cetasā॥

दशरथनन्दन श्रीराम ने विचित्र ध्वजा-पताकाओं से सुशोभित लङ्कापुरी को देखकर व्यथितचित्त से मन-ही-मन सीता का स्मरण किया

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॥ ६ · २४ · ७ ॥
अत्र सा मृगशावाक्षी रावणेनोपरुध्यते। अभिभूता ग्रहेणेव लोहिताङ्गेन रोहिणी॥

atra sā mṛgaśāvākṣī rāvaṇenoparudhyate।
abhibhūtā graheṇeva lohitāṅgena rohiṇī॥

वे भीतर-ही-भीतर कहने लगे—‘हाय! यहीं वह मृगलोचना सीता रावण की कैद में पड़ी है। उसकी दशा मंगलग्रह से आक्रान्त हुई रोहिणी के समान हो रही है’

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॥ ६ · २४ · ८ ॥
दीर्घमुष्णं निःश्वस्य समुद्वीक्ष्य लक्ष्मणम्। उवाच वचनं वीरस्तत्कालहितमात्मनः॥

dīrghamuṣṇaṁ ca niḥśvasya samudvīkṣya ca lakṣmaṇam।
uvāca vacanaṁ vīrastatkālahitamātmanaḥ॥

मन-ही-मन ऐसा कहकर वीर श्रीराम गरम-गरम लंबी साँस खींचकर लक्ष्मण की ओर देखते हुए अपने लिये समयानुकूल हितकर वचन बोले—

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॥ ६ · २४ · ९ ॥
आलिखन्तीमिवाकाशमुत्थितां पश्य लक्ष्मण। मनसेव कृतां लङ्कां नगाग्रे विश्वकर्मणा॥

ālikhantīmivākāśamutthitāṁ paśya lakṣmaṇa।
manaseva kṛtāṁ laṅkāṁ nagāgre viśvakarmaṇā॥

‘लक्ष्मण! इस लङ्का की ओर तो देखो। यह अपनी ऊँचाई से आकाश में रेखा खींचती हुई-सी जान पड़ती है। जान पड़ता है पूर्वकाल में विश्वकर्मा ने अपने मन से ही इस पर्वत-शिखर पर लङ्कापुरी का निर्माण किया है

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॥ ६ · २४ · १० ॥
विमानैर्बहुभिर्लङ्का संकीर्णा रचिता पुरा। विष्णोः पदमिवाकाशं छादितं पाण्डुभिर्घनैः॥

vimānairbahubhirlaṅkā saṁkīrṇā racitā purā।
viṣṇoḥ padamivākāśaṁ chāditaṁ pāṇḍubhirghanaiḥ॥

‘पूर्वकाल में यह पुरी अनेक सतमंजले मकानों से भरी-पूरी बनायी गयी थी। इसके श्वेत एवं सघन विमानाकार भवनों से भगवान् विष्णु के चरणस्थापन का स्थानभूत आकाश आच्छादित-सा हो गया

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॥ ६ · २४ · ११ ॥
पुष्पितैः शोभिता लङ्का वनैश्चित्ररथोपमैः। नानापतगसंघुष्टफलपुष्पोपगैः शुभैः॥

puṣpitaiḥ śobhitā laṅkā vanaiścitrarathopamaiḥ।
nānāpatagasaṁghuṣṭaphalapuṣpopagaiḥ śubhaiḥ॥

‘फूलों से भरे हुए चैत्ररथ वन के सदृश सुन्दर काननों से लङ्कापुरी सुशोभित हो रही है। उन काननों में नाना प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे हैं तथा फलों और फूलों की प्राप्ति कराने के कारण वे बड़े सुन्दर जान पड़ते हैं

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॥ ६ · २४ · १२ ॥
पश्य मत्तविहंगानि प्रलीनभ्रमराणि च। कोकिलाकुलखण्डानि दोधवीति शिवोऽनिलः॥

paśya mattavihaṁgāni pralīnabhramarāṇi ca।
kokilākulakhaṇḍāni dodhavīti śivo'nilaḥ॥

‘देखो, यह शीतल सुखद वायु इन वनों को, जिनमें मतवाले पक्षी चहचहा रहे हैं, भौंरे पत्तों और फूलों में लीन हो रहे हैं तथा जिनके प्रत्येक खण्ड कोकिलों के समूह एवं संगीत से व्याप्त हैं, बारंबार कम्पित कर रहा है’

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॥ ६ · २४ · १३ ॥
इति दाशरथी रामो लक्ष्मणं समभाषत। बलं तत्र विभजञ्छास्त्रदृष्टेन कर्मणा॥

iti dāśarathī rāmo lakṣmaṇaṁ samabhāṣata।
balaṁ ca tatra vibhajañchāstradṛṣṭena karmaṇā॥

दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम ने लक्ष्मण से ऐसा कहा और युद्ध के शास्त्रीय नियमानुसार सेना का विभाग किया

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॥ ६ · २४ · १४ ॥
शशास कपिसेनां तां बलादादाय वीर्यवान्। अङ्गदः सह नीलेन तिष्ठेदुरसि दुर्जयः॥

śaśāsa kapisenāṁ tāṁ balādādāya vīryavān।
aṅgadaḥ saha nīlena tiṣṭhedurasi durjayaḥ॥

उस समय श्रीराम ने वानरसैनिकों को यह आदेश दिया—‘इस विशाल सेना में से अपनी सेना को साथ लेकर दुर्जय एवं पराक्रमी वीर अङ्गद नील के साथ वानरसेना के पुरुषव्यूह में हृदय के स्थान में स्थित हों

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॥ ६ · २४ · १५ ॥
तिष्ठेद् वानरवाहिन्या वानरौघसमावृतः। आश्रितो दक्षिणं पार्श्वमृषभो नाम वानरः॥

tiṣṭhed vānaravāhinyā vānaraughasamāvṛtaḥ।
āśrito dakṣiṇaṁ pārśvamṛṣabho nāma vānaraḥ॥

‘इसी तरह ऋषभ नामक वानर कपियों के समुदाय से घिरे रहकर इस वानरवाहिनी के दाहिने पार्श्व में खड़े रहें

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॥ ६ · २४ · १६ ॥
गन्धहस्तीव दुर्धर्षस्तरस्वी गन्धमादनः। तिष्ठेद् वानरवाहिन्याः सव्यं पार्श्वमधिष्ठितः॥

gandhahastīva durdharṣastarasvī gandhamādanaḥ।
tiṣṭhed vānaravāhinyāḥ savyaṁ pārśvamadhiṣṭhitaḥ॥

‘जो गन्धहस्ती के समान दुर्जय एवं वेगशाली हैं, वे कपिश्रेष्ठ गन्धमादन वानरवाहिनी के वाम पार्श्व में खड़े हों

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॥ ६ · २४ · १७ ॥
मूर्ध्नि स्थास्याम्यहं यत्तो लक्ष्मणेन समन्वितः। जाम्बवांश्च सुषेणश्च वेगदर्शी वानरः॥ ऋक्षमुख्या महात्मानः कुक्षिं रक्षन्तु ते त्रयः।

mūrdhni sthāsyāmyahaṁ yatto lakṣmaṇena samanvitaḥ।
jāmbavāṁśca suṣeṇaśca vegadarśī ca vānaraḥ॥
ṛkṣamukhyā mahātmānaḥ kukṣiṁ rakṣantu te trayaḥ।

‘मैं लक्ष्मण के साथ सावधान रहकर इस व्यूह के मस्तक के स्थान में खड़ा होऊँगा। जाम्बवान्, सुषेण और वानर वेगदर्शी—ये तीन महामनस्वी वीर जो रीछों की सेना के प्रधान हैं, वे सैन्यव्यूह के कुक्षिभाग की रक्षा करें

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॥ ६ · २४ · १८ ॥
जघनं कपिसेनायाः कपिराजोऽभिरक्षतु। पश्चार्धमिव लोकस्य प्रचेतास्तेजसा वृतः॥

jaghanaṁ kapisenāyāḥ kapirājo'bhirakṣatu।
paścārdhamiva lokasya pracetāstejasā vṛtaḥ॥

‘वानरराज सुग्रीव वानरवाहिनी के पिछले भाग की रक्षा में उसी प्रकार लगे रहें, जैसे तेजस्वी वरुण इस जगत् की पश्चिम दिशा का संरक्षण करते हैं’

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॥ ६ · २४ · १९ ॥
सुविभक्तमहाव्यूहा महावानररक्षिता। अनीकिनी सा विबभौ यथा द्यौः साभ्रसम्प्लवा॥

suvibhaktamahāvyūhā mahāvānararakṣitā।
anīkinī sā vibabhau yathā dyauḥ sābhrasamplavā॥

इस प्रकार सुन्दरता से विभक्त हो विशाल व्यूह में बद्ध हुई वह सेना, जिसकी बड़े-बड़े वानर रक्षा करते थे, मेघों से घिरे हुए आकाश के समान जान पड़ती थी

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॥ ६ · २४ · २० ॥
प्रगृह्य गिरिशृङ्गाणि महतश्च महीरुहान्। आसेदुर्वानरा लङ्कां मिमर्दयिषवो रणे॥

pragṛhya giriśṛṅgāṇi mahataśca mahīruhān।
āsedurvānarā laṅkāṁ mimardayiṣavo raṇe॥

वानरलोग पर्वतों के शिखर और बड़े-बड़े वृक्ष लेकर युद्ध के लिये लङ्का पर चढ़ आये। वे उस पुरी को पददलित करके धूल में मिला देना चाहते थे

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॥ ६ · २४ · २१ ॥
शिखरैर्विकिरामैनां लङ्कां मुष्टिभिरेव वा। इति स्म दधिरे सर्वे मनांसि हरिपुङ्गवाः॥

śikharairvikirāmaināṁ laṅkāṁ muṣṭibhireva vā।
iti sma dadhire sarve manāṁsi haripuṅgavāḥ॥

सभी वानरयूथपति ये ही मनसूबे बाँधते थे कि हम लङ्का पर पर्वत-शिखरों की वर्षा करें और लङ्कावासियों को मुक्कों से मार-मारकर यमलोक पहुँचा दें

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॥ ६ · २४ · २२ ॥
ततो रामो महातेजाः सुग्रीवमिदमब्रवीत्। सुविभक्तानि सैन्यानि शुक एष विमुच्यताम्॥

tato rāmo mahātejāḥ sugrīvamidamabravīt।
suvibhaktāni sainyāni śuka eṣa vimucyatām॥

तदनन्तर महातेजस्वी राम ने सुग्रीव से कहा—‘हमलोगों ने अपनी सेनाओं को सुन्दर ढंग से विभक्त करके उन्हें व्यूहबद्ध कर लिया है, अतः अब इस शुक को छोड़ दिया जाय’

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॥ ६ · २४ · २३ ॥
रामस्य तु वचः श्रुत्वा वानरेन्द्रो महाबलः। मोचयामास तं दूतं शुकं रामस्य शासनात्॥

rāmasya tu vacaḥ śrutvā vānarendro mahābalaḥ।
mocayāmāsa taṁ dūtaṁ śukaṁ rāmasya śāsanāt॥

श्रीरामचन्द्रजी का यह वचन सुनकर महाबली वानरराज ने उनके आदेश से रावणदूत शुक को बन्धनमुक्त करा दिया

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॥ ६ · २४ · २४ ॥
मोचितो रामवाक्येन वानरैश्च निपीडितः। शुकः परमसंत्रस्तो रक्षोऽधिपमुपागमत्॥

mocito rāmavākyena vānaraiśca nipīḍitaḥ।
śukaḥ paramasaṁtrasto rakṣo'dhipamupāgamat॥

श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा से छुटकारा पाकर वानरों से पीड़ित होने के कारण अत्यन्त भयभीत हुआ शुक राक्षसराज के पास गया

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॥ ६ · २४ · २५ ॥
रावणः प्रहसन्नेव शुकं वाक्यमुवाच ह। किमिमौ ते सितौ पक्षौ लूनपक्षश्च दृश्यसे॥ कच्चिन्नानेकचित्तानां तेषां त्वं वशमागतः।

rāvaṇaḥ prahasanneva śukaṁ vākyamuvāca ha।
kimimau te sitau pakṣau lūnapakṣaśca dṛśyase॥
kaccinnānekacittānāṁ teṣāṁ tvaṁ vaśamāgataḥ।

उस समय रावण ने हँसते हुए-से ही शुक से कहा—‘ये तुम्हारी दोनों पाँखें बाँध क्यों दी गयी हैं। इससे तुम इस तरह दिखायी देते हो मानो तुम्हारे पंख नोच लिये गये हों। कहीं तुम उन चञ्चलचित्तवाले वानरों के चंगुल में तो नहीं फँस गये थे?’

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॥ ६ · २४ · २६ ॥
ततः भयसंविग्नस्तेन राज्ञाभिचोदितः। वचनं प्रत्युवाचेदं राक्षसाधिपमुत्तमम्॥

tataḥ sa bhayasaṁvignastena rājñābhicoditaḥ।
vacanaṁ pratyuvācedaṁ rākṣasādhipamuttamam॥

राजा रावण के इस प्रकार पूछने पर भय से घबराये हुए शुक ने उस समय उस श्रेष्ठ राक्षसराज को इस प्रकार उत्तर दिया—

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॥ ६ · २४ · २७ ॥
सागरस्योत्तरे तीरेऽब्रुवं ते वचनं तथा। यथासंदेशमक्लिष्टं सान्त्वयन् श्लक्ष्णया गिरा॥

sāgarasyottare tīre'bruvaṁ te vacanaṁ tathā।
yathāsaṁdeśamakliṣṭaṁ sāntvayan ślakṣṇayā girā॥

‘महाराज! मैंने समुद्र के उत्तर तट पर पहुँचकर आपका संदेश बहुत स्पष्ट शब्दों में मधुर वाणीद्वारा सान्त्वना देते हुए सुनाया

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॥ ६ · २४ · २८ ॥
क्रुद्धैस्तैरहमुत्प्लुत्य दृष्टमात्रः प्लवंगमैः। गृहीतोऽस्म्यपि चारब्धो हन्तुं लोप्तुं मुष्टिभिः॥

kruddhaistairahamutplutya dṛṣṭamātraḥ plavaṁgamaiḥ।
gṛhīto'smyapi cārabdho hantuṁ loptuṁ ca muṣṭibhiḥ॥

‘किंतु मुझ पर दृष्टि पड़ते ही कुपित हुए वानरों ने उछलकर मुझे पकड़ लिया और घूसों से मारना एवं पाँखें नोचना आरम्भ किया

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॥ ६ · २४ · २९ ॥
ते संभाषितुं शक्याः सम्प्रश्नोऽत्र विद्यते। प्रकृत्या कोपनास्तीक्ष्णा वानरा राक्षसाधिप॥

na te saṁbhāṣituṁ śakyāḥ sampraśno'tra na vidyate।
prakṛtyā kopanāstīkṣṇā vānarā rākṣasādhipa॥

‘राक्षसराज! वे वानर स्वभाव से ही क्रोधी और तीखे हैं। उनसे बात भी नहीं की जा सकती थी। फिर यह पूछने का अवसर कहाँ था कि तुम मुझे क्यों मार रहे हो?

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॥ ६ · २४ · ३० ॥
हन्ता विराधस्य कबन्धस्य खरस्य च। सुग्रीवसहितो रामः सीतायाः पदमागतः॥

sa ca hantā virādhasya kabandhasya kharasya ca।
sugrīvasahito rāmaḥ sītāyāḥ padamāgataḥ॥

‘जो विराध, कबन्ध और खर का वध कर चुके हैं, वे श्रीराम सुग्रीव के साथ सीता के स्थान का पता पाकर उनका उद्धार करने के लिये आये हैं

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॥ ६ · २४ · ३१ ॥
कृत्वा सागरे सेतुं तीर्त्वा लवणोदधिम्। एष रक्षांसि निर्धूय धन्वी तिष्ठति राघवः॥

sa kṛtvā sāgare setuṁ tīrtvā ca lavaṇodadhim।
eṣa rakṣāṁsi nirdhūya dhanvī tiṣṭhati rāghavaḥ॥

‘वे रघुनाथजी समुद्र पर पुल बाँध लवणसागर को पार करके राक्षसों को तिनकों के समान समझकर धनुष हाथ में लिये यहाँ पास ही खड़े हैं

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॥ ६ · २४ · ३२ ॥
ऋक्षवानरसङ्घानामनीकानि सहस्रशः। गिरिमेघनिकाशानां छादयन्ति वसुंधराम्॥

ṛkṣavānarasaṅghānāmanīkāni sahasraśaḥ।
girimeghanikāśānāṁ chādayanti vasuṁdharām॥

‘पर्वत और मेघों के समान विशालकाय रीछों और वानर-समूहों की सहस्रों सेनाएँ इस पृथ्वी पर छा गयी हैं

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॥ ६ · २४ · ३३ ॥
राक्षसानां बलौघस्य वानरेन्द्रबलस्य च। नैतयोर्विद्यते संधिर्देवदानवयोरिव॥

rākṣasānāṁ balaughasya vānarendrabalasya ca।
naitayorvidyate saṁdhirdevadānavayoriva॥

‘देवता और दानवों में जैसे मेल होना असम्भव है, उसी प्रकार राक्षसों और वानरराज सुग्रीव के सैनिकों में संधि नहीं हो सकती

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॥ ६ · २४ · ३४ ॥
पुरा प्राकारमायान्ति क्षिप्रमेकतरं कुरु। सीतां चास्मै प्रयच्छाशु युद्धं वापि प्रदीयताम्॥

purā prākāramāyānti kṣipramekataraṁ kuru।
sītāṁ cāsmai prayacchāśu yuddhaṁ vāpi pradīyatām॥

‘अतः जबतक वे लङ्कापुरी की चहारदिवारी पर नहीं चढ़ आते, उसके पहले ही आप शीघ्रतापूर्वक दो में से एक काम कर डालिये—या तो तुरंत ही उन्हें सीता को लौटा दीजिये या फिर सामने खड़े होकर युद्ध कीजिये’

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॥ ६ · २४ · ३५ ॥
शुकस्य वचनं श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत्। रोषसंरक्तनयनो निर्दहन्निव चक्षुषा॥

śukasya vacanaṁ śrutvā rāvaṇo vākyamabravīt।
roṣasaṁraktanayano nirdahanniva cakṣuṣā॥

शुक की यह बात सुनकर रावण की आँखें रोष से लाल हो गयीं। वह इस तरह घूर-घूरकर देखने लगा, मानो अपनी दृष्टि से उसको दग्ध कर देगा। वह बोला—

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॥ ६ · २४ · ३६ ॥
यदि मां प्रति युद्ध्येरन् देवगन्धर्वदानवाः। नैव सीतां प्रदास्यामि सर्वलोकभयादपि॥

yadi māṁ prati yuddhyeran devagandharvadānavāḥ।
naiva sītāṁ pradāsyāmi sarvalokabhayādapi॥

‘यदि देवता, गन्धर्व और दानव भी मुझसे युद्ध करने को तैयार हो जायँ तथा सारे संसार के लोग मुझे भय दिखाने लगें तो भी मैं सीता को नहीं लौटाऊँगा

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॥ ६ · २४ · ३७ ॥
कदा समभिधावन्ति मामका राघवं शराः। वसन्ते पुष्पितं मत्ता भ्रमरा इव पादपम्॥

kadā samabhidhāvanti māmakā rāghavaṁ śarāḥ।
vasante puṣpitaṁ mattā bhramarā iva pādapam॥

‘जैसे मतवाले भ्रमर वसन्त-ऋतु में फूलों से भरे हुए वृक्ष पर टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार मेरे बाण कब उस रघुवंशी पर धावा करेंगे?

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॥ ६ · २४ · ३८ ॥
कदा शोणितदिग्धाङ्गं दीप्तैः कार्मुकविच्युतैः। शरैरादीपयिष्यामि उल्काभिरिव कुञ्जरम्॥

kadā śoṇitadigdhāṅgaṁ dīptaiḥ kārmukavicyutaiḥ।
śarairādīpayiṣyāmi ulkābhiriva kuñjaram॥

‘वह अवसर कब आयेगा जब मेरे धनुष से छूटे हुए तेजस्वी बाणोंद्वारा घायल होकर राम का शरीर लहूलुहान हो जायगा और जैसे जलती हुई लुकारी से लोग हाथी को जलाते हैं, उसी तरह मैं उन बाणों से राम को दग्ध कर डालूँगा

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॥ ६ · २४ · ३९ ॥
तच्चास्य बलमादास्ये बलेन महता वृतः। ज्योतिषामिव सर्वेषां प्रभामुद्यन् दिवाकरः॥

taccāsya balamādāsye balena mahatā vṛtaḥ।
jyotiṣāmiva sarveṣāṁ prabhāmudyan divākaraḥ॥

‘जैसे सूर्य अपने उदय के साथ ही समस्त नक्षत्रों की प्रभा हर लेते हैं, उसी प्रकार मैं विशाल सेना के साथ रणभूमि में खड़ा हो राम की समस्त वानर-सेना को आत्मसात् कर लूँगा

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॥ ६ · २४ · ४० ॥
सागरस्येव मे वेगो मारुतस्येव मे बलम्। दाशरथिर्वेद तेन मां योद्धुमिच्छति॥

sāgarasyeva me vego mārutasyeva me balam।
na ca dāśarathirveda tena māṁ yoddhumicchati॥

दशरथकुमार राम ने अभी समरभूमि में समुद्र के समान मेरे वेग और वायु के समान मेरे बल का अनुभव नहीं किया है, इसलिये वह मेरे साथ युद्ध करना चाहता है

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॥ ६ · २४ · ४१ ॥
मे तूणीशयान् बाणान् सविषानिव पन्नगान्। रामः पश्यति संग्रामे तेन मां योद्धुमिच्छति॥

na me tūṇīśayān bāṇān saviṣāniva pannagān।
rāmaḥ paśyati saṁgrāme tena māṁ yoddhumicchati॥

‘मेरे तरकस में सोये हुए बाण विषधर सर्पों के समान भयंकर हैं। राम ने संग्राम में उन बाणों को देखा ही नहीं है; इसलिये वह मुझसे जूझना चाहता है

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॥ ६ · २४ · ४२ ॥
जानाति पुरा वीर्यं मम युद्धे राघवः। मम चापमयीं वीणां शरकोणैः प्रवादिताम्॥

na jānāti purā vīryaṁ mama yuddhe sa rāghavaḥ।
mama cāpamayīṁ vīṇāṁ śarakoṇaiḥ pravāditām॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ६ · २४ · ४३ ॥
ज्याशब्दतुमुलां घोरामार्तगीतमहास्वनाम्। नाराचतलसंनादां नदीमहितवाहिनीम्। अवगाह्य महारङ्गं वादयिष्याम्यहं रणे॥

jyāśabdatumulāṁ ghorāmārtagītamahāsvanām।
nārācatalasaṁnādāṁ nadīmahitavāhinīm।
avagāhya mahāraṅgaṁ vādayiṣyāmyahaṁ raṇe॥

॥ ४२–४३ ॥

‘पहले कभी युद्ध में राम का मेरे बल-पराक्रम से पाला नहीं पड़ा है, इसीलिये वह मेरे साथ लड़ने का हौसला रखता है। मेरा धनुष एक सुन्दर वीणा है, जो बाणों के कोनों से बजायी जाती है। उसकी प्रत्यञ्चा से जो टङ्कार-ध्वनि उठती है, वही उसकी भयंकर स्वरलहरी है। आर्तों की चीत्कार और पुकार ही उसपर उच्च स्वर से गाया जानेवाला गीत है। नाराचों को छोड़ते समय जो चट-चट शब्द होता है, वही मानो हथेली पर दिया जानेवाला ताल है। बहती हुई नदी के समान जो शत्रुओं की वाहिनी है, वही मानो उस संगीतोत्सव के लिये विशाल रंगभूमि है। मैं समराङ्गण में उस रंगभूमि के भीतर प्रवेश करके अपनी वह भयंकर वीणा बजाऊँगा

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॥ ६ · २४ · ४४ ॥
वासवेनापि सहस्रचक्षुषा युद्धेऽस्मि शक्यो वरुणेन वा स्वयम्। यमेन वा धर्षयितुं शराग्निना महाहवे वैश्रवणेन वा पुनः॥

na vāsavenāpi sahasracakṣuṣā
yuddhe'smi śakyo varuṇena vā svayam।
yamena vā dharṣayituṁ śarāgninā
mahāhave vaiśravaṇena vā punaḥ॥

‘यदि महासमर में सहस्रनेत्रधारी इन्द्र अथवा साक्षात् वरुण या स्वयं यमराज अथवा मेरे बड़े भाई कुबेर ही आ जायँ तो वे भी अपनी बाणाग्नि से मुझे पराजित नहीं कर सकते’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २४ ॥