वाल्मीकि रामायणम् · युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

सर्गः १५ · १४ श्लोकाःSarga 15 · 14 ślokas

इन्द्रजित्द्वारा विभीषणका उपहास तथा विभीषणका उसे फटकारकर सभामें अपनी उचित सम्मति देना

॥ ६ · १५ · १ ॥
बृहस्पतेस्तुल्यमतेर्वचस्त- न्निशम्य यत्नेन विभीषणस्य। ततो महात्मा वचनं बभाषे तत्रेन्द्रजिन्नैर्ऋतयूथमुख्यः॥

bṛhaspatestulyamatervacasta-
nniśamya yatnena vibhīṣaṇasya।
tato mahātmā vacanaṁ babhāṣe
tatrendrajinnairṛtayūthamukhyaḥ॥

विभीषण बृहस्पति के समान बुद्धिमान् थे। उनके वचनों को जैसे-तैसे बड़े कष्ट से सुनकर राक्षस-यूथपतियों में प्रधान महाकाय इन्द्रजित् ने वहाँ यह बात कही—

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॥ ६ · १५ · २ ॥
किं नाम ते तात कनिष्ठ वाक्य- मनर्थकं वै बहुभीतवच्च। अस्मिन् कुले योऽपि भवेन्न जातः सोऽपीदृशं नैव वदेन्न कुर्यात्॥

kiṁ nāma te tāta kaniṣṭha vākya-
manarthakaṁ vai bahubhītavacca।
asmin kule yo'pi bhavenna jātaḥ
so'pīdṛśaṁ naiva vadenna kuryāt॥

‘मेरे छोटे चाचा! आप बहुत डरे हुए की भाँति यह कैसी निरर्थक बात कह रहे हैं? जिसने इस कुल में जन्म न लिया होगा, वह पुरुष भी न तो ऐसी बात कहेगा और न ऐसा काम ही करेगा

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॥ ६ · १५ · ३ ॥
सत्त्वेन वीर्येण पराक्रमेण धैर्येण शौर्येण तेजसा च। एकः कुलेऽस्मिन् पुरुषो विमुक्तो विभीषणस्तात कनिष्ठ एषः॥

sattvena vīryeṇa parākrameṇa
dhairyeṇa śauryeṇa ca tejasā ca।
ekaḥ kule'smin puruṣo vimukto
vibhīṣaṇastāta kaniṣṭha eṣaḥ॥

‘पिताजी! हमारे इस राक्षसकुल में एकमात्र ये छोटे चाचा विभीषण ही बल, वीर्य, पराक्रम, धैर्य, शौर्य और तेज से रहित हैं

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॥ ६ · १५ · ४ ॥
किं नाम तौ मानुषराजपुत्रा- वस्माकमेकेन हि राक्षसेन। सुप्राकृतेनापि निहन्तुमेतौ शक्यौ कुतो भीषयसे स्म भीरो॥

kiṁ nāma tau mānuṣarājaputrā-
vasmākamekena hi rākṣasena।
suprākṛtenāpi nihantumetau
śakyau kuto bhīṣayase sma bhīro॥

‘वे दोनों मानव राजकुमार क्या हैं? उन्हें तो हमारा एक साधारण-सा राक्षस भी मार सकता है; फिर मेरे डरपोक चाचा! आप हमें क्यों डरा रहे हैं?

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॥ ६ · १५ · ५ ॥
त्रिलोकनाथो ननु देवराजः शक्रो मया भूमितले निविष्टः। भयार्पिताश्चापि दिशः प्रपन्नाः सर्वे तदा देवगणाः समग्राः॥

trilokanātho nanu devarājaḥ
śakro mayā bhūmitale niviṣṭaḥ।
bhayārpitāścāpi diśaḥ prapannāḥ
sarve tadā devagaṇāḥ samagrāḥ॥

‘मैंने तीनों लोकों के स्वामी देवराज इन्द्र को भी स्वर्ग से हटाकर इस भूतल पर ला बिठाया था। उस समय सारे देवताओं ने भयभीत हो भागकर सम्पूर्ण दिशाओं की शरण ली थी

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॥ ६ · १५ · ६ ॥
ऐरावतो निःस्वनमुन्नदन् निपातितो भूमितले मया तु। विकृष्य दन्तौ तु मया प्रसह्य वित्रासिता देवगणाः समग्राः॥

airāvato niḥsvanamunnadan sa
nipātito bhūmitale mayā tu।
vikṛṣya dantau tu mayā prasahya
vitrāsitā devagaṇāḥ samagrāḥ॥

‘मैंने हठपूर्वक ऐरावत हाथी के दोनों दाँत उखाड़कर उसे स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरा दिया था। उस समय वह जोर-जोर से चिग्घाड़ रहा था। अपने इस पराक्रमद्वारा मैंने सम्पूर्ण देवताओं को आतङ्क में डाल दिया था

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॥ ६ · १५ · ७ ॥
सोऽहं सुराणामपि दर्पहन्ता दैत्योत्तमानामपि शोककर्ता। कथं नरेन्द्रात्मजयोर्न शक्तो मनुष्ययोः प्राकृतयोः सुवीर्यः॥

so'haṁ surāṇāmapi darpahantā
daityottamānāmapi śokakartā।
kathaṁ narendrātmajayorna śakto
manuṣyayoḥ prākṛtayoḥ suvīryaḥ॥

‘जो देवताओं के भी दर्प का दलन कर सकता है, बड़े-बड़े दैत्यों को भी शोकमग्न कर देनेवाला है तथा जो उत्तम बल-पराक्रम से सम्पन्न है, वही मुझ-जैसा वीर मनुष्य-जाति के दो साधारण राजकुमारों का सामना कैसे नहीं कर सकता है?’

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॥ ६ · १५ · ८ ॥
अथेन्द्रकल्पस्य दुरासदस्य महौजसस्तद् वचनं निशम्य। ततो महार्थं वचनं बभाषे विभीषणः शस्त्रभृतां वरिष्ठः॥

athendrakalpasya durāsadasya
mahaujasastad vacanaṁ niśamya।
tato mahārthaṁ vacanaṁ babhāṣe
vibhīṣaṇaḥ śastrabhṛtāṁ variṣṭhaḥ॥

इन्द्रतुल्य तेजस्वी महापराक्रमी दुर्जय वीर इन्द्रजित् की यह बात सुनकर शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ विभीषण ने ये महान् अर्थ से युक्त वचन कहे—

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॥ ६ · १५ · ९ ॥
तात मन्त्रे तव निश्चयोऽस्ति बालस्त्वमद्याप्यविपक्वबुद्धिः। तस्मात् त्वयाप्यात्मविनाशनाय वचोऽर्थहीनं बहु विप्रलप्तम्॥

na tāta mantre tava niścayo'sti
bālastvamadyāpyavipakvabuddhiḥ।
tasmāt tvayāpyātmavināśanāya
vaco'rthahīnaṁ bahu vipralaptam॥

‘तात! अभी तुम बालक हो। तुम्हारी बुद्धि कच्ची है। तुम्हारे मन में कर्तव्य और अकर्तव्य का यथार्थ निश्चय नहीं हुआ है। इसीलिये तुम भी अपने ही विनाश के लिये बहुत-सी निरर्थक बातें बक गये हो

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॥ ६ · १५ · १० ॥
पुत्रप्रवादेन तु रावणस्य त्वमिन्द्रजिन्मित्रमुखोऽसि शत्रुः। यस्येदृशं राघवतो विनाशं निशम्य मोहादनुमन्यसे त्वम्॥

putrapravādena tu rāvaṇasya
tvamindrajinmitramukho'si śatruḥ।
yasyedṛśaṁ rāghavato vināśaṁ
niśamya mohādanumanyase tvam॥

‘इन्द्रजित्! तुम रावण के पुत्र कहलाकर भी ऊपर से ही उसके मित्र हो। भीतर से तो तुम पिता के शत्रु ही जान पड़ते हो। यही कारण है कि तुम श्रीरघुनाथजी के द्वारा राक्षसराज के विनाश की बातें सुनकर भी मोहवश उन्हींकी हाँ-में-हाँ मिला रहे हो

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॥ ६ · १५ · ११ ॥
त्वमेव वध्यश्च सुदुर्मतिश्च चापि वध्यो इहानयत् त्वाम्। बालं दृढं साहसिकं योऽद्य प्रावेशयन्मन्त्रकृतां समीपम्॥

tvameva vadhyaśca sudurmatiśca
sa cāpi vadhyo ya ihānayat tvām।
bālaṁ dṛḍhaṁ sāhasikaṁ ca yo'dya
prāveśayanmantrakṛtāṁ samīpam॥

‘तुम्हारी बुद्धि बहुत ही खोटी है। तुम स्वयं तो मार डालने के योग्य हो ही, जो तुम्हें यहाँ बुला लाया है, वह भी वध के ही योग्य है। जिसने आज तुम-जैसे अत्यन्त दुःसाहसी बालक को इन सलाहकारों के समीप आने दिया है, वह प्राणदण्ड का ही अपराधी है

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॥ ६ · १५ · १२ ॥
मूढोऽप्रगल्भोऽविनयोपपन्न- स्तीक्ष्णस्वभावोऽल्पमतिर्दुरात्मा। मूर्खस्त्वमत्यन्तसुदुर्मतिश्च त्वमिन्द्रजिद् बालतया ब्रवीषि॥

mūḍho'pragalbho'vinayopapanna-
stīkṣṇasvabhāvo'lpamatirdurātmā।
mūrkhastvamatyantasudurmatiśca
tvamindrajid bālatayā bravīṣi॥

‘इन्द्रजित्! तुम अविवेकी हो। तुम्हारी बुद्धि परिपक्व नहीं है। विनय तो तुम्हें छूकर नहीं गयी है। तुम्हारा स्वभाव बड़ा तीखा और बुद्धि बहुत थोड़ी है। तुम अत्यन्त दुर्बुद्धि, दुरात्मा और मूर्ख हो। इसीलिये बालकों की-सी बे-सिर-पैर की बातें करते हो

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॥ ६ · १५ · १३ ॥
को ब्रह्मदण्डप्रतिमप्रकाशा- नर्चिष्मतः कालनिकाशरूपान्। सहेत बाणान् यमदण्डकल्पान् समक्षमुक्तान् युधि राघवेण॥

ko brahmadaṇḍapratimaprakāśā-
narciṣmataḥ kālanikāśarūpān।
saheta bāṇān yamadaṇḍakalpān
samakṣamuktān yudhi rāghaveṇa॥

‘भगवान् श्रीराम के द्वारा युद्ध के मुहाने पर शत्रुओं के समक्ष छोड़े गये तेजस्वी बाण साक्षात् ब्रह्मदण्ड के समान प्रकाशित होते हैं, काल के समान जान पड़ते हैं और यमदण्ड के समान भयंकर होते हैं। भला, उन्हें कौन सह सकता है?

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॥ ६ · १५ · १४ ॥
धनानि रत्नानि सुभूषणानि वासांसि दिव्यानि मणींश्च चित्रान्। सीतां रामाय निवेद्य देवीं वसेम राजन्निह वीतशोकाः॥

dhanāni ratnāni subhūṣaṇāni
vāsāṁsi divyāni maṇīṁśca citrān।
sītāṁ ca rāmāya nivedya devīṁ
vasema rājanniha vītaśokāḥ॥

‘अतः राजन्! हमलोग धन, रत्न, सुन्दर आभूषण, दिव्य वस्त्र, विचित्र मणि और देवी सीता को श्रीराम की सेवा में समर्पित करके ही शोकरहित होकर इस नगर में निवास कर सकते हैं’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चदशः सर्गः॥ १५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १५ ॥