रावणके द्वारा विभीषणका तिरस्कार और विभीषणका भी उसे फटकारकर चल देना
suniviṣṭaṁ hitaṁ vākyamuktavantaṁ vibhīṣaṇam।
abravīt paruṣaṁ vākyaṁ rāvaṇaḥ kālacoditaḥ॥
रावण के सिर पर काल मँडरा रहा था, इसलिये उसने सुन्दर अर्थ से युक्त और हितकर बात कहने पर भी विभीषण से कठोर वाणी में कहा—
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vaset saha sapatnena kruddhenāśīviṣeṇa ca।
na tu mitrapravādena saṁvasecchatrusevinā॥
‘भाई! शत्रु और कुपित विषधर सर्प के साथ रहना पड़े तो रह ले; परंतु जो मित्र कहलाकर भी शत्रु की सेवा कर रहा हो, उसके साथ कदापि न रहे
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jānāmi śīlaṁ jñātīnāṁ sarvalokeṣu rākṣasa।
hṛṣyanti vyasaneṣvete jñātīnāṁ jñātayaḥ sadā॥
‘राक्षस! सम्पूर्ण लोकों में सजातीय बन्धुओं का जो स्वभाव होता है, उसे मैं अच्छी तरह जानता हूँ। जातिवाले सर्वदा अपने अन्य सजातीयों की आपत्तियों में ही हर्ष मानते हैं
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pradhānaṁ sādhakaṁ vaidyaṁ dharmaśīlaṁ ca rākṣasa।
jñātayo'pyavamanyante śūraṁ paribhavanti ca॥
‘निशाचर! जो ज्येष्ठ होने के कारण राज्य पाकर सबमें प्रधान हो गया हो, राज्यकार्य को अच्छी तरह चला रहा हो और विद्वान्, धर्मशील तथा शूरवीर हो, उसे भी कुटुम्बीजन अपमानित करते हैं और अवसर पाकर उसे नीचा दिखाने की भी चेष्टा करते हैं
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nityamanyonyasaṁhṛṣṭā vyasaneṣvātatāyinaḥ।
pracchannahṛdayā ghorā jñātayastu bhayāvahāḥ॥
‘जातिवाले सदा एक-दूसरे पर संकट आने पर हर्ष का अनुभव करते हैं। वे बड़े आततायी होते हैं— मौका पड़ने पर आग लगाने, जहर देने, शस्त्र चलाने, धन हड़पने और क्षेत्र तथा स्त्री का अपहरण करने में भी नहीं हिचकते हैं। अपना मनोभाव छिपाये रहते हैं; अतएव क्रूर और भयंकर होते हैं
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śrūyante hastibhirgītāḥ ślokāḥ padmavane purā।
pāśahastān narān dṛṣṭvā śṛṇuṣva gadato mama॥
‘पूर्वकाल की बात है, पद्मवन में हाथियों ने अपने हृदय के उद्गार प्रकट किये थे, जो अब भी श्लोकों के रूप में गाये और सुने जाते हैं। एक बार कुछ लोगों को हाथ में फंदा लिये आते देख हाथियों ने जो बातें कही थीं, उन्हें बता रहा हूँ, मुझसे सुनो
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nāgnirnānyāni śastrāṇi na naḥ pāśā bhayāvahāḥ।
ghorāḥ svārthaprayuktāstu jñātayo no bhayāvahāḥ॥
‘हमें अग्नि, दूसरे-दूसरे शस्त्र तथा पाश भय नहीं दे सकते। हमारे लिये तो अपने स्वार्थी जाति-भाई ही भयानक और खतरे की वस्तु हैं
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upāyamete vakṣyanti grahaṇe nātra saṁśayaḥ।
kṛtsnād bhayājjñātibhayaṁ kukaṣṭaṁ vihitaṁ ca naḥ॥
‘ये ही हमारे पकड़े जाने का उपाय बता देंगे, इसमें संशय नहीं; अतः सम्पूर्ण भयों की अपेक्षा हमें अपने जाति-भाइयों से प्राप्त होनेवाला भय ही अधिक कष्टदायक जान पड़ता है
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vidyate goṣu sampannaṁ vidyate jñātito bhayam।
vidyate strīṣu cāpalyaṁ vidyate brāhmaṇe tapaḥ॥
‘जैसे गौओं में हव्य-कव्य की सम्पत्ति दूध होता है, स्त्रियों में चपलता होती है और ब्राह्मण में तपस्या रहा करती है, उसी प्रकार जाति-भाइयों से भय अवश्य प्राप्त होता है
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tato neṣṭamidaṁ saumya yadahaṁ lokasatkṛtaḥ।
aiśvaryamabhijātaśca ripūṇāṁ mūrdhni ca sthitaḥ॥
‘अतः सौम्य! आज जो सारा संसार मेरा सम्मान करता है और मैं जो ऐश्वर्यवान्, कुलीन और शत्रुओं के सिर पर स्थित हूँ, यह सब तुम्हें अभीष्ट नहीं है
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yathā puṣkarapatreṣu patitāstoyabindavaḥ।
na śleṣamabhigacchanti tathānāryeṣu sauhṛdam॥
‘जैसे कमल के पत्ते पर गिरी हुई पानी की बूँदें उसमें सटती नहीं हैं, उसी प्रकार अनार्यों के हृदय में सौहार्द नहीं टिकता है
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yathā śaradi meghānāṁ siñcatāmapi garjatām।
na bhavatyambusaṁkledastathānāryeṣu sauhṛdam॥
‘जैसे शरद्-ऋतु में गर्जते और बरसते हुए मेघों के जल से धरती गीली नहीं होती है, उसी प्रकार अनार्यों के हृदय में स्नेहजनित आर्द्रता नहीं होती है
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yathā madhukarastarṣād rasaṁ vindanna tiṣṭhati।
tathā tvamapi tatraiva tathānāryeṣu sauhṛdam॥
‘जैसे भौंरा बड़ी चाह से फूलों का रस पीता हुआ भी वहाँ ठहरता नहीं है, उसी प्रकार अनार्यों में सुहृज्जनोचित स्नेह नहीं टिक पाता है। तुम भी ऐसे ही अनार्य हो
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yathā madhukarastarṣāt kāśapuṣpaṁ pibannapi।
rasamatra na vindeta tathānāryeṣu sauhṛdam॥
‘जैसे भ्रमर रस की इच्छा से काश के फूल का पान करे तो उसमें रस नहीं पा सकता, उसी प्रकार अनार्यों में जो स्नेह होता है, वह किसीके लिये लाभदायक नहीं होता
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yathā pūrvaṁ gajaḥ snātvā gṛhya hastena vai rajaḥ।
dūṣayatyātmano dehaṁ tathānāryeṣu sauhṛdam॥
‘जैसे हाथी पहले स्नान करके फिर सूँड़ से धूल उछालकर अपने शरीर को गँदला कर लेता है, उसी प्रकार दुर्जनों की मैत्री दूषित होती है
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yo'nyastvevaṁvidhaṁ brūyād vākyametanniśācara।
asmin muhūrte na bhavet tvāṁ tu dhik kulapāṁsana॥
‘कुलकलङ्क निशाचर! तुझे धिक्कार है। यदि तेरे सिवा दूसरा कोई ऐसी बातें कहता तो उसे इसी मुहूर्त में अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ता’
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ityuktaḥ paruṣaṁ vākyaṁ nyāyavādī vibhīṣaṇaḥ।
utpapāta gadāpāṇiścaturbhiḥ saha rākṣasaiḥ॥
विभीषण न्यायानुकूल बातें कह रहे थे तो भी रावण ने जब उनसे ऐसे कठोर वचन कहे, तब वे हाथ में गदा लेकर अन्य चार राक्षसों के साथ उसी समय उछलकर आकाश में चले गये
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abravīcca tadā vākyaṁ jātakrodho vibhīṣaṇaḥ।
antarikṣagataḥ śrīmān bhrātā vai rākṣasādhipam॥
उस समय अन्तरिक्ष में खड़े हुए तेजस्वी भ्राता विभीषण ने कुपित होकर राक्षसराज रावण से कहा—
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sa tvaṁ bhrātāsi me rājan brūhi māṁ yad yadicchasi।
jyeṣṭho mānyaḥ pitṛsamo na ca dharmapathe sthitaḥ।
idaṁ hi paruṣaṁ vākyaṁ na kṣamāmyagrajasya te॥
‘राजन्! तुम्हारी बुद्धि भ्रम में पड़ी हुई है। तुम धर्म के मार्ग पर नहीं हो। यों तो मेरे बड़े भाई होने के कारण तुम पिता के समान आदरणीय हो। इसलिये मुझे जो-जो चाहो, कह लो; परंतु अग्रज होने पर भी तुम्हारे इस कठोर वचन को कदापि नहीं सह सकता
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sunītaṁ hitakāmena vākyamuktaṁ daśānana।
na gṛhṇantyakṛtātmānaḥ kālasya vaśamāgatāḥ॥
‘दशानन! जो अजितेन्द्रिय पुरुष काल के वशीभूत हो जाते हैं, वे हित की कामना से कहे हुए सुन्दर नीतियुक्त वचनों को भी नहीं ग्रहण करते हैं
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sulabhāḥ puruṣā rājan satataṁ priyavādinaḥ।
apriyasya ca pathyasya vaktā śrotā ca durlabhaḥ॥
‘राजन्! सदा प्रिय लगनेवाली मीठी-मीठी बातें कहनेवाले लोग तो सुगमता से मिल सकते हैं; परंतु जो सुनने में अप्रिय किंतु परिणाम में हितकर हो, ऐसी बात कहने और सुननेवाले दुर्लभ होते हैं
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baddhaṁ kālasya pāśena sarvabhūtāpahāriṇaḥ।
na naśyantamupekṣe tvāṁ pradīptaṁ śaraṇaṁ yathā॥
‘तुम समस्त प्राणियों का संहार करनेवाले काल के पाश में बँध चुके हो। जिसमें आग लग गयी हो, उस घर की भाँति नष्ट हो रहे हो। ऐसी दशा में मैं तुम्हारी उपेक्षा नहीं कर सकता था, इसीलिये तुम्हें हित की बात सुझा दी थी
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dīptapāvakasaṁkāśaiḥ śitaiḥ kāñcanabhūṣaṇaiḥ।
na tvāmicchāmyahaṁ draṣṭuṁ rāmeṇa nihataṁ śaraiḥ॥
‘श्रीराम के सुवर्णभूषित बाण प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी और तीखे हैं। मैं श्रीराम के द्वारा उन बाणों से तुम्हारी मृत्यु नहीं देखना चाहता था, इसीलिये तुम्हें समझाने की चेष्टा की थी
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śūrāśca balavantaśca kṛtāstrāśca narā raṇe।
kālābhipannāḥ sīdanti yathā vālukasetavaḥ॥
‘काल के वशीभूत होने पर बड़े-बड़े शूरवीर, बलवान् और अस्त्रवेत्ता भी बालू की भीति या बाँध के समान नष्ट हो जाते हैं
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tanmarṣayatu yaccoktaṁ gurutvāddhitamicchatā।
ātmānaṁ sarvathā rakṣa purīṁ cemāṁ sarākṣasām।
svasti te'stu gamiṣyāmi sukhī bhava mayā vinā॥
‘राक्षसराज! मैं तुम्हारा हित चाहता हूँ। इसीलिये जो कुछ भी कहा है, वह यदि तुम्हें अच्छा नहीं लगा तो उसके लिये मुझे क्षमा कर दो; क्योंकि तुम मेरे बड़े भाई हो। अब तुम अपनी तथा राक्षसोंसहित इस समस्त लङ्कापुरी की सब प्रकार से रक्षा करो। तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं यहाँ से चला जाऊँगा। तुम मेरे बिना सुखी हो जाओ
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nivāryamāṇasya mayā hitaiṣiṇā
na rocate te vacanaṁ niśācara।
parāntakāle hi gatāyuṣo narā
hitaṁ na gṛhṇanti suhṛdbhirīritam॥
‘निशाचरराज! मैं तुम्हारा हितैषी हूँ। इसीलिये मैंने तुम्हें बार-बार अनुचित मार्ग पर चलने से रोका है, किंतु तुम्हें मेरी बात अच्छी नहीं लगती है। वास्तव में जिन लोगों की आयु समाप्त हो जाती है, वे जीवन के अन्तकाल में अपने सुहृदों की कही हुई हितकर बात भी नहीं मानते हैं’
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षोडशः सर्गः॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १६ ॥