वाल्मीकि रामायणम् · युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

सर्गः ८ · २४ श्लोकाःSarga 8 · 24 ślokas

प्रहस्त, दुर्मुख, वज्रदंष्ट्र, निकुम्भ और वज्रहनुका रावणके सामने शत्रु-सेनाको मार गिरानेका उत्साह दिखाना

॥ ६ · ८ · १ ॥
ततो नीलाम्बुदप्रख्यः प्रहस्तो नाम राक्षसः। अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं शूरः सेनापतिस्तदा॥

tato nīlāmbudaprakhyaḥ prahasto nāma rākṣasaḥ।
abravīt prāñjalirvākyaṁ śūraḥ senāpatistadā॥

इसके बाद नील मेघ के समान श्यामवर्णवाले शूर सेनापति प्रहस्त नामक राक्षस ने हाथ जोड़कर कहा—

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॥ ६ · ८ · २ ॥
देवदानवगन्धर्वाः पिशाचपतगोरगाः। सर्वे धर्षयितुं शक्याः किं पुनर्मानवौ रणे॥

devadānavagandharvāḥ piśācapatagoragāḥ।
sarve dharṣayituṁ śakyāḥ kiṁ punarmānavau raṇe॥

‘महाराज! हमलोग देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और सर्प सभी को पराजित कर सकते हैं; फिर उन दो मनुष्यों को रणभूमि में हराना कौन बड़ी बात है

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॥ ६ · ८ · ३ ॥
सर्वे प्रमत्ता विश्वस्ता वञ्चिताः स्म हनूमता। नहि मे जीवतो गच्छेज्जीवन् वनगोचरः॥

sarve pramattā viśvastā vañcitāḥ sma hanūmatā।
nahi me jīvato gacchejjīvan sa vanagocaraḥ॥

‘पहले हमलोग असावधान थे। हमारे मन में शत्रुओं की ओर से कोई खटका नहीं था। इसीलिये हम निश्चिन्त बैठे थे। यही कारण है कि हनुमान् हमें धोखा दे गया। नहीं तो मेरे जीते-जी वह वानर यहाँ से जीता-जागता नहीं जा सकता था

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॥ ६ · ८ · ४ ॥
सर्वां सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम्। करोम्यवानरां भूमिमाज्ञापयतु मां भवान्॥

sarvāṁ sāgaraparyantāṁ saśailavanakānanām।
karomyavānarāṁ bhūmimājñāpayatu māṁ bhavān॥

‘यदि आपकी आज्ञा हो तो पर्वत, वन और काननोंसहित समुद्रतक की सारी भूमि को मैं वानरों से सूनी कर दूँ

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॥ ६ · ८ · ५ ॥
रक्षां चैव विधास्यामि वानराद् रजनीचर। नागमिष्यति ते दुःखं किंचिदात्मापराधजम्॥

rakṣāṁ caiva vidhāsyāmi vānarād rajanīcara।
nāgamiṣyati te duḥkhaṁ kiṁcidātmāparādhajam॥

‘राक्षसराज! मैं वानरमात्र से आपकी रक्षा करूँगा, अतः अपने द्वारा किये गये सीता-हरणरूपी अपराध के कारण कोई दुःख आपपर नहीं आने पायेगा’

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॥ ६ · ८ · ६ ॥
अब्रवीत् तु सुसंक्रुद्धो दुर्मुखो नाम राक्षसः। इदं क्षमणीयं हि सर्वेषां नः प्रधर्षणम्॥

abravīt tu susaṁkruddho durmukho nāma rākṣasaḥ।
idaṁ na kṣamaṇīyaṁ hi sarveṣāṁ naḥ pradharṣaṇam॥

तत्पश्चात् दुर्मुख नामक राक्षस ने अत्यन्त कुपित होकर कहा—‘यह क्षमा करनेयोग्य अपराध नहीं है, क्योंकि इसके द्वारा हम सब लोगों का तिरस्कार हुआ है

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॥ ६ · ८ · ७ ॥
अयं परिभवो भूयः पुरस्यान्तःपुरस्य च। श्रीमतो राक्षसेन्द्रस्य वानरेण प्रधर्षणम्॥

ayaṁ paribhavo bhūyaḥ purasyāntaḥpurasya ca।
śrīmato rākṣasendrasya vānareṇa pradharṣaṇam॥

‘वानर के द्वारा हमलोगों पर जो आक्रमण हुआ है, यह समस्त लङ्कापुरी का, महाराज के अन्तःपुर का और श्रीमान् राक्षसराज रावण का भी भारी पराभव है

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॥ ६ · ८ · ८ ॥
अस्मिन् मुहूर्ते गत्वैको निवर्तिष्यामि वानरान्। प्रविष्टान् सागरं भीममम्बरं वा रसातलम्॥

asmin muhūrte gatvaiko nivartiṣyāmi vānarān।
praviṣṭān sāgaraṁ bhīmamambaraṁ vā rasātalam॥

‘मैं अभी इसी मुहूर्त में अकेला ही जाकर सारे वानरों को मार भगाऊँगा। भले ही वे भयंकर समुद्र में, आकाश में अथवा रसातल में ही क्यों न घुस गये हों’

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॥ ६ · ८ · ९ ॥
ततोऽब्रवीत् सुसंक्रुद्धो वज्रदंष्ट्रो महाबलः। प्रगृह्य परिघं घोरं मांसशोणितरूषितम्॥

tato'bravīt susaṁkruddho vajradaṁṣṭro mahābalaḥ।
pragṛhya parighaṁ ghoraṁ māṁsaśoṇitarūṣitam॥

इतने ही में महाबली वज्रदंष्ट्र अत्यन्त क्रोध से भरकर रक्त, मांस से सने हुए भयानक परिघ को हाथ में लिये हुए बोला—

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॥ ६ · ८ · १० ॥
किं नो हनूमता कार्यं कृपणेन तपस्विना। रामे तिष्ठति दुर्धर्षे सुग्रीवेऽपि सलक्ष्मणे॥

kiṁ no hanūmatā kāryaṁ kṛpaṇena tapasvinā।
rāme tiṣṭhati durdharṣe sugrīve'pi salakṣmaṇe॥

‘दुर्जय वीर राम, सुग्रीव और लक्ष्मण के रहते हुए हमें उस बेचारे तपस्वी हनुमान् से क्या काम है?

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॥ ६ · ८ · ११ ॥
अद्य रामं ससुग्रीवं परिघेण सलक्ष्मणम्। आगमिष्यामि हत्वैको विक्षोभ्य हरिवाहिनीम्॥

adya rāmaṁ sasugrīvaṁ parigheṇa salakṣmaṇam।
āgamiṣyāmi hatvaiko vikṣobhya harivāhinīm॥

‘आज मैं अकेला ही वानर-सेना में तहलका मचा दूँगा और इस परिघ से सुग्रीव तथा लक्ष्मणसहित राम का भी काम तमाम करके लौट आऊँगा

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॥ ६ · ८ · १२ ॥
इदं ममापरं वाक्यं शृणु राजन् यदिच्छसि। उपायकुशलो ह्येव जयेच्छत्रूनतन्द्रितः॥

idaṁ mamāparaṁ vākyaṁ śṛṇu rājan yadicchasi।
upāyakuśalo hyeva jayecchatrūnatandritaḥ॥

‘राजन्! यदि आपकी इच्छा हो तो आप यह मेरी दूसरी बात सुनें। उपायकुशल पुरुष ही यदि आलस्य छोड़कर प्रयत्न करे तो वह शत्रुओं पर विजय पा सकता है

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॥ ६ · ८ · १३ ॥
कामरूपधराः शूराः सुभीमा भीमदर्शनाः। राक्षसा वा सहस्राणि राक्षसाधिप निश्चिताः॥

kāmarūpadharāḥ śūrāḥ subhīmā bhīmadarśanāḥ।
rākṣasā vā sahasrāṇi rākṣasādhipa niścitāḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ६ · ८ · १४ ॥
काकुत्स्थमुपसंगम्य बिभ्रतो मानुषं वपुः। सर्वे ह्यसम्भ्रमा भूत्वा ब्रुवन्तु रघुसत्तमम्॥

kākutsthamupasaṁgamya bibhrato mānuṣaṁ vapuḥ।
sarve hyasambhramā bhūtvā bruvantu raghusattamam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ६ · ८ · १५ ॥
प्रेषिता भरतेनैव भ्रात्रा तव यवीयसा। हि सेनां समुत्थाप्य क्षिप्रमेवोपयास्यति॥

preṣitā bharatenaiva bhrātrā tava yavīyasā।
sa hi senāṁ samutthāpya kṣipramevopayāsyati॥

॥ १३–१५ ॥

‘अतः राक्षसराज! मेरी दूसरी राय यह है कि इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, अत्यन्त भयानक तथा भयंकर दृष्टिवाले सहस्रों शूरवीर राक्षस एक निश्चित विचार करके मनुष्य का रूप धारण कर श्रीराम के पास जायँ और सब लोग बिना किसी घबराहट के उन रघुवंशशिरोमणि से कहें कि हम आपके सैनिक हैं। हमें आपके छोटे भाई भरत ने भेजा है। इतना सुनते ही वे वानर-सेना को उठाकर तुरंत लङ्का पर आक्रमण करने के लिये वहाँ से चल देंगे

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॥ ६ · ८ · १६ ॥
ततो वयमितस्तूर्णं शूलशक्तिगदाधराः। चापबाणासिहस्ताश्च त्वरितास्तत्र यामहे॥

tato vayamitastūrṇaṁ śūlaśaktigadādharāḥ।
cāpabāṇāsihastāśca tvaritāstatra yāmahe॥

‘तत्पश्चात् हमलोग यहाँ से शूल, शक्ति, गदा, धनुष, बाण और खड्ग धारण किये शीघ्र ही मार्ग में उनके पास जा पहुँचें

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॥ ६ · ८ · १७ ॥
आकाशे गणशः स्थित्वा हत्वा तां हरिवाहिनीम्। अश्मशस्त्रमहावृष्ट्या प्रापयाम यमक्षयम्॥

ākāśe gaṇaśaḥ sthitvā hatvā tāṁ harivāhinīm।
aśmaśastramahāvṛṣṭyā prāpayāma yamakṣayam॥

‘फिर आकाश में अनेक यूथ बनाकर खड़े हो जायँ और पत्थरों तथा शस्त्र-समूहों की बड़ी भारी वर्षा करके उस वानर-सेना को यमलोक पहुँचा दें

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॥ ६ · ८ · १८ ॥
एवं चेदुपसर्पेतामनयं रामलक्ष्मणौ। अवश्यमपनीतेन जहतामेव जीवितम्॥

evaṁ cedupasarpetāmanayaṁ rāmalakṣmaṇau।
avaśyamapanītena jahatāmeva jīvitam॥

‘यदि इस प्रकार हमारी बातें सुनकर वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण सेना को कूच करने की आज्ञा दे देंगे और वहाँ से चल देंगे तो उन्हें हमारी अनीति का शिकार होना पड़ेगा; उन्हें हमारे छलपूर्ण प्रहार से पीड़ित होकर अपने प्राणों का परित्याग करना पड़ेगा

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॥ ६ · ८ · १९ ॥
कौम्भकर्णिस्ततो वीरो निकुम्भो नाम वीर्यवान्। अब्रवीत् परमक्रुद्धो रावणं लोकरावणम्॥

kaumbhakarṇistato vīro nikumbho nāma vīryavān।
abravīt paramakruddho rāvaṇaṁ lokarāvaṇam॥

तदनन्तर पराक्रमी वीर कुम्भकर्णकुमार निकुम्भ ने अत्यन्त कुपित होकर समस्त लोकों को रुलानेवाले रावण से कहा—

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॥ ६ · ८ · २० ॥
सर्वे भवन्तस्तिष्ठन्तु महाराजेन संगताः। अहमेको हनिष्यामि राघवं सहलक्ष्मणम्॥ सुग्रीवं सहनूमन्तं सर्वांश्चैवात्र वानरान्।

sarve bhavantastiṣṭhantu mahārājena saṁgatāḥ।
ahameko haniṣyāmi rāghavaṁ sahalakṣmaṇam॥
sugrīvaṁ sahanūmantaṁ sarvāṁścaivātra vānarān।

‘आप सब लोग यहाँ महाराज के साथ चुपचाप बैठे रहें। मैं अकेला ही राम, लक्ष्मण, सुग्रीव, हनुमान् तथा अन्य सब वानरों को भी यहाँ मौत के घाट उतार दूँगा’

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॥ ६ · ८ · २१ ॥
ततो वज्रहनुर्नाम राक्षसः पर्वतोपमः॥ क्रुद्धः परिलिहन् सृक्कां जिह्वया वाक्यमब्रवीत्।

tato vajrahanurnāma rākṣasaḥ parvatopamaḥ॥
kruddhaḥ parilihan sṛkkāṁ jihvayā vākyamabravīt।

तब पर्वत के समान विशालकाय वज्रहनु नामक राक्षस कुपित हो जीभ से अपने जबड़े को चाटता हुआ बोला—

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॥ ६ · ८ · २२ ॥
स्वैरं कुर्वन्तु कार्याणि भवन्तो विगतज्वराः॥ एकोऽहं भक्षयिष्यामि तां सर्वां हरिवाहिनीम्।

svairaṁ kurvantu kāryāṇi bhavanto vigatajvarāḥ॥
eko'haṁ bhakṣayiṣyāmi tāṁ sarvāṁ harivāhinīm।

‘आप सब लोग निश्चिन्त होकर इच्छानुसार अपना-अपना काम करें। मैं अकेला ही सारी वानर-सेना को खा जाऊँगा

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॥ ६ · ८ · २३ ॥
स्वस्थाः क्रीडन्तु निश्चिन्ताः पिबन्तु मधु वारुणीम्॥

svasthāḥ krīḍantu niścintāḥ pibantu madhu vāruṇīm॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ६ · ८ · २४ ॥
अहमेको वधिष्यामि सुग्रीवं सहलक्ष्मणम्। साङ्गदं हनूमन्तं सर्वांश्चैवात्र वानरान्॥

ahameko vadhiṣyāmi sugrīvaṁ sahalakṣmaṇam।
sāṅgadaṁ ca hanūmantaṁ sarvāṁścaivātra vānarān॥

॥ २३–२४ ॥

‘आपलोग स्वस्थ रहकर क्रीड़ा करें और निश्चिन्त हो वारुणी मदिरा को पियें। मैं अकेला ही सुग्रीव, लक्ष्मण, अंगद, हनुमान् और अन्य सब वानरों को भी यहाँ वध कर डालूँगा’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डेऽष्टमः सर्गः॥ ८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८ ॥