वाल्मीकि रामायणम् · युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

सर्गः ६ · १८ श्लोकाःSarga 6 · 18 ślokas

रावणका कर्तव्य-निर्णयके लिये अपने मन्त्रियोंसे समुचित सलाह देनेका अनुरोध करना

॥ ६ · ६ · १ ॥
लङ्कायां तु कृतं कर्म घोरं दृष्ट्वा भयावहम्। राक्षसेन्द्रो हनुमता शक्रेणेव महात्मना। अब्रवीद् राक्षसान् सर्वान् ह्रिया किंचिदवाङ्मुखः॥

laṅkāyāṁ tu kṛtaṁ karma ghoraṁ dṛṣṭvā bhayāvaham।
rākṣasendro hanumatā śakreṇeva mahātmanā।
abravīd rākṣasān sarvān hriyā kiṁcidavāṅmukhaḥ॥

इधर इन्द्रतुल्य पराक्रमी महात्मा हनुमान्जी ने लङ्का में जो अत्यन्त भयावह घोर कर्म किया था, उसे देखकर राक्षसराज रावण का मुख लज्जा से कुछ नीचे को झुक गया और उसने समस्त राक्षसों से इस प्रकार कहा—

English translation coming soon.

॥ ६ · ६ · २ ॥
धर्षिता प्रविष्टा लङ्का दुष्प्रसहा पुरी। तेन वानरमात्रेण दृष्टा सीता जानकी॥

dharṣitā ca praviṣṭā ca laṅkā duṣprasahā purī।
tena vānaramātreṇa dṛṣṭā sītā ca jānakī॥

‘निशाचरो! वह हनुमान्, जो एक वानरमात्र है, अकेला इस दुर्धर्ष पुरी में घुस आया। उसने इसे तहस-नहस कर डाला और जनककुमारी सीता से भेंट भी कर लिया

English translation coming soon.

॥ ६ · ६ · ३ ॥
प्रासादो धर्षितश्चैत्यः प्रवरा राक्षसा हताः। आविला पुरी लङ्का सर्वा हनुमता कृता॥

prāsādo dharṣitaścaityaḥ pravarā rākṣasā hatāḥ।
āvilā ca purī laṅkā sarvā hanumatā kṛtā॥

‘इतना ही नहीं, हनुमान् ने चैत्यप्रासाद को धराशायी कर दिया, मुख्य-मुख्य राक्षसों को मार गिराया और सारी लङ्कापुरी में खलबली मचा दी

English translation coming soon.

॥ ६ · ६ · ४ ॥
किं करिष्यामि भद्रं वः किं वो युक्तमनन्तरम्। उच्यतां नः समर्थं यत् कृतं सुकृतं भवेत्॥

kiṁ kariṣyāmi bhadraṁ vaḥ kiṁ vo yuktamanantaram।
ucyatāṁ naḥ samarthaṁ yat kṛtaṁ ca sukṛtaṁ bhavet॥

‘तुमलोगों का भला हो। अब मैं क्या करूँ? तुम्हें जो कार्य उचित और समर्थ जान पड़े तथा जिसे करने पर कोई अच्छा परिणाम निकले, उसे बताओ

English translation coming soon.

॥ ६ · ६ · ५ ॥
मन्त्रमूलं विजयं प्रवदन्ति मनस्विनः। तस्माद् वै रोचये मन्त्रं रामं प्रति महाबलाः॥

mantramūlaṁ ca vijayaṁ pravadanti manasvinaḥ।
tasmād vai rocaye mantraṁ rāmaṁ prati mahābalāḥ॥

‘महाबली वीरो! मनस्वी पुरुषों का कहना है कि विजय का मूल कारण मन्त्रियों की दी हुई अच्छी सलाह ही है। इसलिये मैं श्रीराम के विषय में आपलोगों से सलाह लेना अच्छा समझता हूँ

English translation coming soon.

॥ ६ · ६ · ६ ॥
त्रिविधाः पुरुषा लोके उत्तमाधममध्यमाः। तेषां तु समवेतानां गुणदोषौ वदाम्यहम्॥

trividhāḥ puruṣā loke uttamādhamamadhyamāḥ।
teṣāṁ tu samavetānāṁ guṇadoṣau vadāmyaham॥

‘संसार में उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकार के पुरुष होते हैं। मैं उन सब के गुण-दोषों का वर्णन करता हूँ

English translation coming soon.

॥ ६ · ६ · ७ ॥
मन्त्रस्त्रिभिर्हि संयुक्तः समर्थैर्मन्त्रनिर्णये। मित्रैर्वापि समानार्थैर्बान्धवैरपि वाधिकैः॥

mantrastribhirhi saṁyuktaḥ samarthairmantranirṇaye।
mitrairvāpi samānārthairbāndhavairapi vādhikaiḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ६ · ६ · ८ ॥
सहितो मन्त्रयित्वा यः कर्मारम्भान् प्रवर्तयेत्। दैवे कुरुते यत्नं तमाहुः पुरुषोत्तमम्॥

sahito mantrayitvā yaḥ karmārambhān pravartayet।
daive ca kurute yatnaṁ tamāhuḥ puruṣottamam॥

॥ ७–८ ॥

‘जिसका मन्त्र आगे बताये जानेवाले तीन लक्षणों से युक्त होता है तथा जो पुरुष मन्त्रनिर्णय में समर्थ मित्रों, समान दुःख-सुखवाले बान्धवों और उनसे भी बढ़कर अपने हितकारियों के साथ सलाह करके कार्य का आरम्भ करता है तथा दैव के सहारे प्रयत्न करता है, उसे उत्तम पुरुष कहते हैं

English translation coming soon.

॥ ६ · ६ · ९ ॥
एकोऽर्थं विमृशेदेको धर्मे प्रकुरुते मनः। एकः कार्याणि कुरुते तमाहुर्मध्यमं नरम्॥

eko'rthaṁ vimṛśedeko dharme prakurute manaḥ।
ekaḥ kāryāṇi kurute tamāhurmadhyamaṁ naram॥

‘जो अकेला ही अपने कर्तव्य का विचार करता है, अकेला ही धर्म में मन लगाता है और अकेला ही सब काम करता है, उसे मध्यम श्रेणी का पुरुष कहा जाता है

English translation coming soon.

॥ ६ · ६ · १० ॥
गुणदोषौ निश्चित्य त्यक्त्वा दैवव्यपाश्रयम्। करिष्यामीति यः कार्यमुपेक्षेत् नराधमः॥

guṇadoṣau na niścitya tyaktvā daivavyapāśrayam।
kariṣyāmīti yaḥ kāryamupekṣet sa narādhamaḥ॥

‘जो गुण-दोष का विचार न करके दैव का भी आश्रय छोड़कर केवल ‘करूँगा’ इसी बुद्धि से कार्य आरम्भ करता है और फिर उसकी उपेक्षा कर देता है, वह पुरुषों में अधम है

English translation coming soon.

॥ ६ · ६ · ११ ॥
यथेमे पुरुषा नित्यमुत्तमाधममध्यमाः। एवं मन्त्रोऽपि विज्ञेय उत्तमाधममध्यमः॥

yatheme puruṣā nityamuttamādhamamadhyamāḥ।
evaṁ mantro'pi vijñeya uttamādhamamadhyamaḥ॥

‘जैसे ये पुरुष सदा उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकार के होते हैं, वैसे ही मन्त्र (निश्चित किया हुआ विचार) भी उत्तम, मध्यम और अधम-भेद से तीन प्रकार का समझना चाहिये

English translation coming soon.

॥ ६ · ६ · १२ ॥
ऐकमत्यमुपागम्य शास्त्रदृष्टेन चक्षुषा। मन्त्रिणो यत्र निरतास्तमाहुर्मन्त्रमुत्तमम्॥

aikamatyamupāgamya śāstradṛṣṭena cakṣuṣā।
mantriṇo yatra niratāstamāhurmantramuttamam॥

‘जिसमें शास्त्रोक्त दृष्टि से सब मन्त्री एकमत होकर प्रवृत्त होते हैं, उसे उत्तम मन्त्र कहते हैं

English translation coming soon.

॥ ६ · ६ · १३ ॥
बह्वीरपि मतीर्गत्वा मन्त्रिणामर्थनिर्णयः। पुनर्यत्रैकतां प्राप्तः मन्त्रो मध्यमः स्मृतः॥

bahvīrapi matīrgatvā mantriṇāmarthanirṇayaḥ।
punaryatraikatāṁ prāptaḥ sa mantro madhyamaḥ smṛtaḥ॥

‘जहाँ प्रारम्भ में कई प्रकार का मतभेद होने पर भी अन्त में सब मन्त्रियों का कर्तव्यविषयक निर्णय एक हो जाता है, वह मन्त्र मध्यम माना गया है

English translation coming soon.

॥ ६ · ६ · १४ ॥
अन्योन्यमतिमास्थाय यत्र सम्प्रतिभाष्यते। चैकमत्ये श्रेयोऽस्ति मन्त्रः सोऽधम उच्यते॥

anyonyamatimāsthāya yatra sampratibhāṣyate।
na caikamatye śreyo'sti mantraḥ so'dhama ucyate॥

‘जहाँ भिन्न-भिन्न बुद्धि का आश्रय ले सब ओर से स्पर्धापूर्वक भाषण किया जाय और एकमत होने पर भी जिससे कल्याण की सम्भावना न हो, वह मन्त्र या निश्चय अधम कहलाता है

English translation coming soon.

॥ ६ · ६ · १५ ॥
तस्मात् सुमन्त्रितं साधु भवन्तो मतिसत्तमाः। कार्यं सम्प्रतिपद्यन्तामेतत् कृत्यं मतं मम॥

tasmāt sumantritaṁ sādhu bhavanto matisattamāḥ।
kāryaṁ sampratipadyantāmetat kṛtyaṁ mataṁ mama॥

‘आप सब लोग परम बुद्धिमान् हैं; इसलिये अच्छी तरह सलाह करके कोई एक कार्य निश्चित करें। उसीको मैं अपना कर्तव्य समझूँगा

English translation coming soon.

॥ ६ · ६ · १६ ॥
वानराणां हि धीराणां सहस्रैः परिवारितः। रामोऽभ्येति पुरीं लङ्कामस्माकमुपरोधकः॥

vānarāṇāṁ hi dhīrāṇāṁ sahasraiḥ parivāritaḥ।
rāmo'bhyeti purīṁ laṅkāmasmākamuparodhakaḥ॥

‘(ऐसे निश्चय की आवश्यकता इसलिये पड़ी है कि) राम सहस्रों धीरवीर वानरों के साथ हमारी लङ्कापुरी पर चढ़ाई करने के लिये आ रहे हैं

English translation coming soon.

॥ ६ · ६ · १७ ॥
तरिष्यति सुव्यक्तं राघवः सागरं सुखम्। तरसा युक्तरूपेण सानुजः सबलानुगः॥

tariṣyati ca suvyaktaṁ rāghavaḥ sāgaraṁ sukham।
tarasā yuktarūpeṇa sānujaḥ sabalānugaḥ॥

‘यह बात भी भलीभाँति स्पष्ट हो चुकी है कि वे रघुवंशी राम अपने समुचित बल के द्वारा भाई, सेना और सेवकोंसहित सुखपूर्वक समुद्र को पार कर लेंगे

English translation coming soon.

॥ ६ · ६ · १८ ॥
समुद्रमुच्छोषयति वीर्येणान्यत्करोति वा। तस्मिन्नेवंविधे कार्ये विरुद्धे वानरैः सह। हितं पुरे सैन्ये सर्वं सम्मन्त्र्यतां मम॥

samudramucchoṣayati vīryeṇānyatkaroti vā।
tasminnevaṁvidhe kārye viruddhe vānaraiḥ saha।
hitaṁ pure ca sainye ca sarvaṁ sammantryatāṁ mama॥

‘वे या तो समुद्र को ही सुखा डालेंगे या अपने पराक्रम से कोई दूसरा ही उपाय करेंगे। ऐसी स्थिति में वानरों से विरोध आ पड़ने पर नगर और सेना के लिये जो भी हितकर हो, वैसी सलाह आपलोग दीजिये’

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षष्ठः सर्गः॥ ६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छठा सर्ग पूरा हुआ॥ ६ ॥