वाल्मीकि रामायणम् · युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

सर्गः ५ · २३ श्लोकाःSarga 5 · 23 ślokas

श्रीरामका सीताके लिये शोक और विलाप

॥ ६ · ५ · १ ॥
सा तु नीलेन विधिवत्स्वारक्षा सुसमाहिता। सागरस्योत्तरे तीरे साधु सा विनिवेशिता॥

sā tu nīlena vidhivatsvārakṣā susamāhitā।
sāgarasyottare tīre sādhu sā viniveśitā॥

नील ने, जिसकी विधिवत् रक्षा की व्यवस्था की गयी थी, उस परम सावधान वानर-सेना को समुद्र के उत्तर तट पर अच्छे ढंग से ठहराया

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॥ ६ · ५ · २ ॥
मैन्दश्च द्विविदश्चोभौ तत्र वानरपुङ्गवौ। विचेरतुश्च तां सेनां रक्षार्थं सर्वतोदिशम्॥

maindaśca dvividaścobhau tatra vānarapuṅgavau।
viceratuśca tāṁ senāṁ rakṣārthaṁ sarvatodiśam॥

मैन्द और द्विविद—ये दो प्रमुख वानरवीर उस सेना की रक्षा के लिये सब ओर विचरते रहते थे

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॥ ६ · ५ · ३ ॥
निविष्टायां तु सेनायां तीरे नदनदीपतेः। पार्श्वस्थं लक्ष्मणं दृष्ट्वा रामो वचनमब्रवीत्॥

niviṣṭāyāṁ tu senāyāṁ tīre nadanadīpateḥ।
pārśvasthaṁ lakṣmaṇaṁ dṛṣṭvā rāmo vacanamabravīt॥

समुद्र के किनारे सेना का पड़ाव पड़ जाने पर श्रीरामचन्द्रजी ने अपने पास बैठे हुए लक्ष्मण की ओर देखकर कहा—

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॥ ६ · ५ · ४ ॥
शोकश्च किल कालेन गच्छता ह्यपगच्छति। मम चापश्यतः कान्तामहन्यहनि वर्धते॥

śokaśca kila kālena gacchatā hyapagacchati।
mama cāpaśyataḥ kāntāmahanyahani vardhate॥

‘सुमित्रानन्दन! कहा जाता है कि शोक बीतते हुए समय के साथ स्वयं भी दूर हो जाता है; परंतु मेरा शोक तो अपनी प्राणवल्लभा को न देखने के कारण दिनोंदिन बढ़ रहा है

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॥ ६ · ५ · ५ ॥
मे दुःखं प्रिया दूरे मे दुःखं हृतेति च। एतदेवानुशोचामि वयोऽस्या ह्यतिवर्तते॥

na me duḥkhaṁ priyā dūre na me duḥkhaṁ hṛteti ca।
etadevānuśocāmi vayo'syā hyativartate॥

‘मुझे इस बात का दुःख नहीं है कि मेरी प्रिया मुझसे दूर है। उसका अपहरण हुआ—इसका भी दुःख नहीं है। मैं तो बारंबार इसीलिये शोक में डूबा रहता हूँ कि उसके जीवित रहने के लिये जो अवधि नियत कर दी गयी है, वह शीघ्रतापूर्वक बीती जा रही है

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॥ ६ · ५ · ६ ॥
वाहि वात यतः कान्ता तां स्पृष्ट्वा मामपि स्पृश। त्वयि मे गात्रसंस्पर्शश्चन्द्रे दृष्टिसमागमः॥

vāhi vāta yataḥ kāntā tāṁ spṛṣṭvā māmapi spṛśa।
tvayi me gātrasaṁsparśaścandre dṛṣṭisamāgamaḥ॥

‘हवा! तुम वहाँ बह, जहाँ मेरी प्राणवल्लभा है। उसका स्पर्श करके मेरा भी स्पर्श कर। उस दशा में तुझसे जो मेरे अङ्गों का स्पर्श होगा, वह चन्द्रमा से होनेवाले दृष्टिसंयोग की भाँति मेरे सारे संताप को दूर करनेवाला और आह्लादजनक होगा

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॥ ६ · ५ · ७ ॥
तन्मे दहति गात्राणि विषं पीतमिवाशये। हा नाथेति प्रिया सा मां ह्रियमाणा यदब्रवीत्॥

tanme dahati gātrāṇi viṣaṁ pītamivāśaye।
hā nātheti priyā sā māṁ hriyamāṇā yadabravīt॥

‘अपहरण होते समय मेरी प्यारी सीता ने जो मुझे ‘हा नाथ!’ कहकर पुकारा था, वह पीये हुए उदरस्थित विष की भाँति मेरे सारे अङ्गों को दग्ध किये देता है

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॥ ६ · ५ · ८ ॥
तद्वियोगेन्धनवता तच्चिन्ताविमलार्चिषा। रात्रिंदिवं शरीरं मे दह्यते मदनाग्निना॥

tadviyogendhanavatā taccintāvimalārciṣā।
rātriṁdivaṁ śarīraṁ me dahyate madanāgninā॥

‘प्रियतमा का वियोग ही जिसका ईंधन है, उसकी चिन्ता ही जिसकी दीप्तिमती लपटें हैं, वह प्रेमाग्नि मेरे शरीर को रात-दिन जलाती रहती है

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॥ ६ · ५ · ९ ॥
अवगाह्यार्णवं स्वप्स्ये सौमित्रे भवता विना। एवं प्रज्वलन् कामो मां सुप्तं जले दहेत्॥

avagāhyārṇavaṁ svapsye saumitre bhavatā vinā।
evaṁ ca prajvalan kāmo na māṁ suptaṁ jale dahet॥

‘सुमित्रानन्दन! तुम यहीं रहो। मैं तुम्हारे बिना अकेला ही समुद्र के भीतर घुसकर सोऊँगा। इस तरह जल में शयन करने पर यह प्रज्वलित प्रेमाग्नि मुझे दग्ध नहीं कर सकेगी

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॥ ६ · ५ · १० ॥
बह्वेतत् कामयानस्य शक्यमेतेन जीवितुम्। यदहं सा वामोरुरेकां धरणिमाश्रितौ॥

bahvetat kāmayānasya śakyametena jīvitum।
yadahaṁ sā ca vāmorurekāṁ dharaṇimāśritau॥

‘मैं और वह वामोरु सीता एक ही भूतल पर सोते हैं। प्रियतमा के संयोग की इच्छा रखनेवाले मुझ विरही के लिये इतना ही बहुत है। इतने से भी मैं जीवित रह सकता हूँ

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॥ ६ · ५ · ११ ॥
केदारस्येवाकेदारः सोदकस्य निरूदकः। उपस्नेहेन जीवामि जीवन्तीं यच्छृणोमि ताम्॥

kedārasyevākedāraḥ sodakasya nirūdakaḥ।
upasnehena jīvāmi jīvantīṁ yacchṛṇomi tām॥

‘जैसे जल से भरी हुई क्यारी के सम्पर्क से बिना जल की क्यारी का धान भी जीवित रहता है—सूखता नहीं है, उसी प्रकार मैं जो यह सुनता हूँ कि सीता अभी जीवित है, इसीसे जी रहा हूँ

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॥ ६ · ५ · १२ ॥
कदा नु खलु सुश्रोणीं शतपत्रायतेक्षणाम्। विजित्य शत्रून् द्रक्ष्यामि सीतां स्फीतामिव श्रियम्॥

kadā nu khalu suśroṇīṁ śatapatrāyatekṣaṇām।
vijitya śatrūn drakṣyāmi sītāṁ sphītāmiva śriyam॥

‘कब वह समय आयेगा, जब शत्रुओं को परास्त करके मैं समृद्धिशालिनी राजलक्ष्मी के समान कमलनयनी सुमध्यमा सीता को देखूँगा

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॥ ६ · ५ · १३ ॥
कदा सुचारुदन्तोष्ठं तस्याः पद्ममिवाननम्। ईषदुन्नाम्य पास्यामि रसायनमिवातुरः॥

kadā sucārudantoṣṭhaṁ tasyāḥ padmamivānanam।
īṣadunnāmya pāsyāmi rasāyanamivāturaḥ॥

‘जैसे रोगी रसायन का पान करता है, उसी प्रकार मैं कब सुन्दर दाँतों और बिम्बसदृश मनोहर ओठों से युक्त सीता के प्रफुल्लकमल-जैसे मुख को कुछ ऊपर उठाकर चूमूँगा

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॥ ६ · ५ · १४ ॥
तौ तस्याः सहितौ पीनौ स्तनौ तालफलोपमौ। कदा खलु सोत्कम्पौ श्लिष्यन्त्या मां भजिष्यतः॥

tau tasyāḥ sahitau pīnau stanau tālaphalopamau।
kadā na khalu sotkampau śliṣyantyā māṁ bhajiṣyataḥ॥

‘मेरा आलिङ्गन करती हुई प्रिया सीता के वे परस्पर सटे हुए, तालफल के समान गोल और मोटे दोनों स्तन कब किंचित् कम्पन के साथ मेरा स्पर्श करेंगे

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॥ ६ · ५ · १५ ॥
सा नूनमसितापाङ्गी रक्षोमध्यगता सती। मन्नाथा नाथहीनेव त्रातारं नाधिगच्छति॥

sā nūnamasitāpāṅgī rakṣomadhyagatā satī।
mannāthā nāthahīneva trātāraṁ nādhigacchati॥

‘कजरारे नेत्रप्रान्तवाली वह सती-साध्वी सीता, जिसका मैं ही नाथ हूँ, आज अनाथ की भाँति राक्षसों के बीच में पड़कर निश्चय ही कोई रक्षक नहीं पा रही होगी

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॥ ६ · ५ · १६ ॥
कथं जनकराजस्य दुहिता मम प्रिया। राक्षसीमध्यगा शेते स्नुषा दशरथस्य च॥

kathaṁ janakarājasya duhitā mama ca priyā।
rākṣasīmadhyagā śete snuṣā daśarathasya ca॥

‘राजा जनक की पुत्री, महाराज दशरथ की पुत्रवधू और मेरी प्रियतमा सीता राक्षसियों के बीच में कैसे सोती होगी

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॥ ६ · ५ · १७ ॥
अविक्षोभ्याणि रक्षांसि सा विधूयोत्पतिष्यति। विधूय जलदान् नीलान् शशिलेखा शरत्स्विव॥

avikṣobhyāṇi rakṣāṁsi sā vidhūyotpatiṣyati।
vidhūya jaladān nīlān śaśilekhā śaratsviva॥

‘वह समय कब आयेगा, जब कि सीता मेरे द्वारा उन दुर्धर्ष राक्षसों का विनाश करके उसी प्रकार अपना उद्धार करेगी, जैसे शरत्काल में चन्द्रलेखा काले बादलों का निवारण करके उनके आवरण से मुक्त हो जाती है

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॥ ६ · ५ · १८ ॥
स्वभावतनुका नूनं शोकेनानशनेन च। भूयस्तनुतरा सीता देशकालविपर्ययात्॥

svabhāvatanukā nūnaṁ śokenānaśanena ca।
bhūyastanutarā sītā deśakālaviparyayāt॥

‘स्वभाव से ही दुबले-पतले शरीरवाली सीता विपरीत देशकाल में पड़ जाने के कारण निश्चय ही शोक और उपवास करके और भी दुर्बल हो गयी होगी

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॥ ६ · ५ · १९ ॥
कदा नु राक्षसेन्द्रस्य निधायोरसि सायकान्। शोकं प्रत्याहरिष्यामि शोकमुत्सृज्य मानसम्॥

kadā nu rākṣasendrasya nidhāyorasi sāyakān।
śokaṁ pratyāhariṣyāmi śokamutsṛjya mānasam॥

‘मैं राक्षसराज रावण की छाती में अपने सायकों को धँसाकर अपने मानसिक शोक का निराकरण करके कब सीता का शोक दूर करूँगा

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॥ ६ · ५ · २० ॥
कदा नु खलु मे साध्वी सीतामरसुतोपमा। सोत्कण्ठा कण्ठमालम्ब्य मोक्ष्यत्यानन्दजं जलम्॥

kadā nu khalu me sādhvī sītāmarasutopamā।
sotkaṇṭhā kaṇṭhamālambya mokṣyatyānandajaṁ jalam॥

‘देवकन्या के समान सुन्दरी मेरी सती-साध्वी सीता कब उत्कण्ठापूर्वक मेरे गले से लगकर अपने नेत्रों से आनन्द के आँसू बहायेगी

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॥ ६ · ५ · २१ ॥
कदा शोकमिमं घोरं मैथिलीविप्रयोगजम्। सहसा विप्रमोक्ष्यामि वासः शुक्लेतरं यथा॥

kadā śokamimaṁ ghoraṁ maithilīviprayogajam।
sahasā vipramokṣyāmi vāsaḥ śukletaraṁ yathā॥

‘ऐसा समय कब आयेगा, जब मैं मिथिलेशकुमारी के वियोग से होनेवाले इस भयंकर शोक को मलिन वस्त्र की भाँति सहसा त्याग दूँगा?’

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॥ ६ · ५ · २२ ॥
एवं विलपतस्तस्य तत्र रामस्य धीमतः। दिनक्षयान्मन्दवपुर्भास्करोऽस्तमुपागमत्॥

evaṁ vilapatastasya tatra rāmasya dhīmataḥ।
dinakṣayānmandavapurbhāskaro'stamupāgamat॥

बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजी वहाँ इस प्रकार विलाप कर ही रहे थे कि दिन का अन्त होने के कारण मन्द किरणोंवाले सूर्यदेव अस्ताचल को जा पहुँचे

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॥ ६ · ५ · २३ ॥
आश्वासितो लक्ष्मणेन रामः संध्यामुपासत। स्मरन् कमलपत्राक्षीं सीतां शोकाकुलीकृतः॥

āśvāsito lakṣmaṇena rāmaḥ saṁdhyāmupāsata।
smaran kamalapatrākṣīṁ sītāṁ śokākulīkṛtaḥ॥

उस समय लक्ष्मण के धैर्य बँधाने पर शोक से व्याकुल हुए श्रीराम ने कमलनयनी सीता का चिन्तन करते हुए संध्योपासना की

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चमः सर्गः॥ ५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५ ॥