वाल्मीकि रामायणम् · युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

सर्गः ३६ · २२ श्लोकाःSarga 36 · 22 ślokas

माल्यवान्पर आक्षेप और नगरकी रक्षाका प्रबन्ध करके रावणका अपने अन्तःपुरमें जाना

॥ ६ · ३६ · १ ॥
तत् तु माल्यवतो वाक्यं हितमुक्तं दशाननः। मर्षयति दुष्टात्मा कालस्य वशमागतः॥

tat tu mālyavato vākyaṁ hitamuktaṁ daśānanaḥ।
na marṣayati duṣṭātmā kālasya vaśamāgataḥ॥

दुष्टात्मा दशमुख रावण काल के अधीन हो रहा था, इसलिये माल्यवान् की कही हुई हितकर बात को भी वह सहन नहीं कर सका

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · २ ॥
बद्ध्वा भ्रुकुटिं वक्त्रे क्रोधस्य वशमागतः। अमर्षात् परिवृत्ताक्षो माल्यवन्तमथाब्रवीत्॥

sa baddhvā bhrukuṭiṁ vaktre krodhasya vaśamāgataḥ।
amarṣāt parivṛttākṣo mālyavantamathābravīt॥

वह क्रोध के वशीभूत हो गया। अमर्ष से उसके नेत्र घूमने लगे। उसने भौंहें टेढ़ी करके माल्यवान् से कहा—

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · ३ ॥
हितबुद्ध्या यदहितं वचः परुषमुच्यते। परपक्षं प्रविश्यैव नैतच्छ्रोत्रगतं मम॥

hitabuddhyā yadahitaṁ vacaḥ paruṣamucyate।
parapakṣaṁ praviśyaiva naitacchrotragataṁ mama॥

‘तुमने शत्रु का पक्ष लेकर हित-बुद्धि से जो मेरे अहित की कठोर बात कही है, वह पूरी तौर से मेरे कानोंतक नहीं पहुँची

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · ४ ॥
मानुषं कृपणं राममेकं शाखामृगाश्रयम्। समर्थं मन्यसे केन त्यक्तं पित्रा वनाश्रयम्॥

mānuṣaṁ kṛpaṇaṁ rāmamekaṁ śākhāmṛgāśrayam।
samarthaṁ manyase kena tyaktaṁ pitrā vanāśrayam॥

‘बेचारा राम एक मनुष्य ही तो है, जिसने सहारा लिया है कुछ बंदरों का। पिता के त्याग देने से उसने वन की शरण ली है। उसमें कौन-सी ऐसी विशेषता है, जिससे तुम उसे बड़ा सामर्थ्यशाली मान रहे हो

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · ५ ॥
रक्षसामीश्वरं मां देवानां भयंकरम्। हीनं मां मन्यसे केन अहीनं सर्वविक्रमैः॥

rakṣasāmīśvaraṁ māṁ ca devānāṁ ca bhayaṁkaram।
hīnaṁ māṁ manyase kena ahīnaṁ sarvavikramaiḥ॥

‘मैं राक्षसों का स्वामी तथा सभी प्रकार के पराक्रमों से सम्पन्न हूँ, देवताओं के मन में भी भय उत्पन्न करता हूँ; फिर किस कारण से तुम मुझे राम की अपेक्षा हीन समझते हो?

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · ६ ॥
वीरद्वेषेण वा शङ्के पक्षपातेन वा रिपोः। त्वयाहं परुषाण्युक्तो परप्रोत्साहनेन वा॥

vīradveṣeṇa vā śaṅke pakṣapātena vā ripoḥ।
tvayāhaṁ paruṣāṇyukto paraprotsāhanena vā॥

‘तुमने जो मुझे कठोर बातें सुनायी हैं, उनके विषय में मुझे शङ्का है कि तुम या तो मुझ-जैसे वीर से द्वेष रखते हो या शत्रु से मिले हुए हो अथवा शत्रुओं ने ऐसा कहने या करने के लिये तुम्हें प्रोत्साहन दिया है

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · ७ ॥
प्रभवन्तं पदस्थं हि परुषं कोऽभिभाषते। पण्डितः शास्त्रतत्त्वज्ञो विना प्रोत्साहनेन वा॥

prabhavantaṁ padasthaṁ hi paruṣaṁ ko'bhibhāṣate।
paṇḍitaḥ śāstratattvajño vinā protsāhanena vā॥

‘जो प्रभावशाली होने के साथ ही अपने राज्य पर प्रतिष्ठित है, ऐसे पुरुष को कौन शास्त्रतत्त्वज्ञ विद्वान् शत्रु का प्रोत्साहन पाये बिना कटुवचन सुना सकता है?

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · ८ ॥
आनीय वनात् सीतां पद्महीनामिव श्रियम्। किमर्थं प्रतिदास्यामि राघवस्य भयादहम्॥

ānīya ca vanāt sītāṁ padmahīnāmiva śriyam।
kimarthaṁ pratidāsyāmi rāghavasya bhayādaham॥

‘कमलहीन कमला की भाँति सुन्दरी सीता को वन से ले आकर अब केवल राम के भय से मैं कैसे लौटा दूँ?

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · ९ ॥
वृतं वानरकोटीभिः ससुग्रीवं सलक्ष्मणम्। पश्य कैश्चिदहोभिश्च राघवं निहतं मया॥

vṛtaṁ vānarakoṭībhiḥ sasugrīvaṁ salakṣmaṇam।
paśya kaiścidahobhiśca rāghavaṁ nihataṁ mayā॥

‘करोड़ों वानरों से घिरे हुए सुग्रीव और लक्ष्मण-सहित राम को मैं कुछ ही दिनों में मार डालूँगा, यह तुम अपनी आँखों देख लेना

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · १० ॥
द्वन्द्वे यस्य तिष्ठन्ति दैवतान्यपि संयुगे। कस्माद् रावणो युद्धे भयमाहारयिष्यति॥

dvandve yasya na tiṣṭhanti daivatānyapi saṁyuge।
sa kasmād rāvaṇo yuddhe bhayamāhārayiṣyati॥

‘जिसके सामने द्वन्द्वयुद्ध में देवता भी नहीं ठहर पाते हैं, वही रावण युद्ध में किससे भयभीत होगा?

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · ११ ॥
द्विधा भज्येयमप्येवं नमेयं तु कस्यचित्। एष मे सहजो दोषः स्वभावो दुरतिक्रमः॥

dvidhā bhajyeyamapyevaṁ na nameyaṁ tu kasyacit।
eṣa me sahajo doṣaḥ svabhāvo duratikramaḥ॥

‘मैं बीच से दो टूक हो जाऊँगा, पर किसीके सामने झुक नहीं सकूँगा, यह मेरा सहज दोष है और स्वभाव किसीके लिये भी दुर्लङ्घ्य होता है

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · १२ ॥
यदि तावत् समुद्रे तु सेतुर्बद्धो यदृच्छया। रामेण विस्मयः कोऽत्र येन ते भयमागतम्॥

yadi tāvat samudre tu seturbaddho yadṛcchayā।
rāmeṇa vismayaḥ ko'tra yena te bhayamāgatam॥

‘यदि राम ने दैववश समुद्र पर सेतु बाँध लिया तो इसमें विस्मय की कौन बात है, जिससे तुम्हें इतना भय हो गया है?

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · १३ ॥
तु तीर्त्वार्णवं रामः सह वानरसेनया। प्रतिजानामि ते सत्यं जीवन् प्रतियास्यति॥

sa tu tīrtvārṇavaṁ rāmaḥ saha vānarasenayā।
pratijānāmi te satyaṁ na jīvan pratiyāsyati॥

‘मैं तुम्हारे आगे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि समुद्र पार करके वानरसेनासहित आये हुए राम यहाँ से जीवित नहीं लौट सकेंगे’

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · १४ ॥
एवं ब्रुवाणं संरब्धं रुष्टं विज्ञाय रावणम्। व्रीडितो माल्यवान् वाक्यं नोत्तरं प्रत्यपद्यत॥

evaṁ bruvāṇaṁ saṁrabdhaṁ ruṣṭaṁ vijñāya rāvaṇam।
vrīḍito mālyavān vākyaṁ nottaraṁ pratyapadyata॥

ऐसी बातें कहते हुए रावण को क्रोध से भरा हुआ एवं रुष्ट जानकर माल्यवान् बहुत लज्जित हुआ और उसने कोई उत्तर नहीं दिया

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · १५ ॥
जयाशिषा तु राजानं वर्धयित्वा यथोचितम्। माल्यवानभ्यनुज्ञातो जगाम स्वं निवेशनम्॥

jayāśiṣā tu rājānaṁ vardhayitvā yathocitam।
mālyavānabhyanujñāto jagāma svaṁ niveśanam॥

माल्यवान् ने ‘महाराज की जय हो’ इस विजयसूचक आशीर्वाद से राजा को यथोचित बढ़ावा दिया और उससे आज्ञा लेकर वह अपने घर चला गया

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · १६ ॥
रावणस्तु सहामात्यो मन्त्रयित्वा विमृश्य च। लङ्कायास्तु तदा गुप्तिं कारयामास राक्षसः॥

rāvaṇastu sahāmātyo mantrayitvā vimṛśya ca।
laṅkāyāstu tadā guptiṁ kārayāmāsa rākṣasaḥ॥

तदनन्तर मन्त्रियोंसहित राक्षस रावण ने परस्पर विचार-विमर्श करके तत्काल लङ्का की रक्षा का प्रबन्ध किया

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · १७ ॥
व्यादिदेश पूर्वस्यां प्रहस्तं द्वारि राक्षसम्। दक्षिणस्यां महावीर्यौ महापार्श्वमहोदरौ॥

vyādideśa ca pūrvasyāṁ prahastaṁ dvāri rākṣasam।
dakṣiṇasyāṁ mahāvīryau mahāpārśvamahodarau॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ६ · ३६ · १८ ॥
पश्चिमायामथ द्वारि पुत्रमिन्द्रजितं तदा। व्यादिदेश महामायं राक्षसैर्बहुभिर्वृतम्॥

paścimāyāmatha dvāri putramindrajitaṁ tadā।
vyādideśa mahāmāyaṁ rākṣasairbahubhirvṛtam॥

॥ १७–१८ ॥

उसने पूर्व द्वार पर उसकी रक्षा के लिये राक्षस प्रहस्त को तैनात किया, दक्षिण द्वार पर महापराक्रमी महापार्श्व और महोदर को नियुक्त किया तथा पश्चिम द्वार पर अपने पुत्र इन्द्रजित् को रखा, जो महान् मायावी था। वह बहुत-से राक्षसोंद्वारा घिरा हुआ था

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · १९ ॥
उत्तरस्यां पुरद्वारि व्यादिश्य शुकसारणौ। स्वयं चात्र गमिष्यामि मन्त्रिणस्तानुवाच ह॥

uttarasyāṁ puradvāri vyādiśya śukasāraṇau।
svayaṁ cātra gamiṣyāmi mantriṇastānuvāca ha॥

तदनन्तर नगर के उत्तर द्वार पर शुक और सारण को रक्षा के लिये जाने की आज्ञा दे मन्त्रियों से रावण ने कहा—‘मैं स्वयं भी उत्तर द्वार पर जाऊँगा’

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · २० ॥
राक्षसं तु विरूपाक्षं महावीर्यपराक्रमम्। मध्यमेऽस्थापयद् गुल्मे बहुभिः सह राक्षसैः॥

rākṣasaṁ tu virūpākṣaṁ mahāvīryaparākramam।
madhyame'sthāpayad gulme bahubhiḥ saha rākṣasaiḥ॥

नगर के बीच की छावनी पर उसने बहुसंख्यक राक्षसों के साथ महान् बल-पराक्रम से सम्पन्न राक्षस विरूपाक्ष को स्थापित किया

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · २१ ॥
एवं विधानं लङ्कायां कृत्वा राक्षसपुंगवः। कृतकृत्यमिवात्मानं मन्यते कालचोदितः॥

evaṁ vidhānaṁ laṅkāyāṁ kṛtvā rākṣasapuṁgavaḥ।
kṛtakṛtyamivātmānaṁ manyate kālacoditaḥ॥

इस प्रकार लङ्का में पुरी की रक्षा का प्रबन्ध करके कालप्रेरित राक्षसशिरोमणि रावण अपने-आपको कृतकृत्य मानने लगा

English translation coming soon.

॥ ६ · ३६ · २२ ॥
विसर्जयामास ततः मन्त्रिणो विधानमाज्ञाप्य पुरस्य पुष्कलम्। जयाशिषा मन्त्रिगणेन पूजितो विवेश सोऽन्तःपुरमृद्धिमन्महत्॥

visarjayāmāsa tataḥ sa mantriṇo
vidhānamājñāpya purasya puṣkalam।
jayāśiṣā mantrigaṇena pūjito
viveśa so'ntaḥpuramṛddhimanmahat॥

इस तरह नगर के संरक्षण की प्रचुर व्यवस्था के लिये आज्ञा देकर रावण ने सब मन्त्रियों को विदा कर दिया और स्वयं भी उनके विजयसूचक आशीर्वाद से सम्मानित हो अपने समृद्धिशाली एवं विशाल अन्तःपुर में चला गया

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३६ ॥