वाल्मीकि रामायणम् · युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

सर्गः ३५ · ३७ श्लोकाःSarga 35 · 37 ślokas

माल्यवान्का रावणको श्रीरामसे संधि करनेके लिये समझाना

॥ ६ · ३५ · १ ॥
तेन शङ्खविमिश्रेण भेरीशब्देन नादिना। उपयाति महाबाहू रामः परपुरंजयः॥

tena śaṅkhavimiśreṇa bherīśabdena nādinā।
upayāti mahābāhū rāmaḥ parapuraṁjayaḥ॥

शत्रुनगरी पर विजय पानेवाले महाबाहु श्रीराम ने शङ्खध्वनि से मिश्रित हो तुमुल नाद करनेवाली भेरी की आवाज के साथ लङ्का पर आक्रमण किया

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॥ ६ · ३५ · २ ॥
तं निनादं निशम्याथ रावणो राक्षसेश्वरः। मुहूर्तं ध्यानमास्थाय सचिवानभ्युदैक्षत॥

taṁ ninādaṁ niśamyātha rāvaṇo rākṣaseśvaraḥ।
muhūrtaṁ dhyānamāsthāya sacivānabhyudaikṣata॥

उस भेरीनाद को सुनकर राक्षसराज रावण ने दो घड़ीतक कुछ सोच-विचार करने के पश्चात् अपने मन्त्रियों की ओर देखा

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॥ ६ · ३५ · ३ ॥
अथ तान् सचिवांस्तत्र सर्वानाभाष्य रावणः। सभां संनादयन् सर्वानित्युवाच महाबलः॥ जगत्संतापनः क्रूरोऽगर्हयन् राक्षसेश्वरः।

atha tān sacivāṁstatra sarvānābhāṣya rāvaṇaḥ।
sabhāṁ saṁnādayan sarvānityuvāca mahābalaḥ॥
jagatsaṁtāpanaḥ krūro'garhayan rākṣaseśvaraḥ।

उन सब मन्त्रियों को सम्बोधित करके जगत् को संताप देनेवाले, महाबली, क्रूर राक्षसराज रावण ने सारी सभा को प्रतिध्वनित करके किसी पर आक्षेप न करते हुए कहा—

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॥ ६ · ३५ · ४ ॥
तरणं सागरस्यास्य विक्रमं बलपौरुषम्॥

taraṇaṁ sāgarasyāsya vikramaṁ balapauruṣam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ६ · ३५ · ५ ॥
यदुक्तवन्तो रामस्य भवन्तस्तन्मया श्रुतम्। भवतश्चाप्यहं वेद्मि युद्धे सत्यपराक्रमान्। तूष्णीकानीक्षतोऽन्योन्यं विदित्वा रामविक्रमम्॥

yaduktavanto rāmasya bhavantastanmayā śrutam।
bhavataścāpyahaṁ vedmi yuddhe satyaparākramān।
tūṣṇīkānīkṣato'nyonyaṁ viditvā rāmavikramam॥

॥ ४–५ ॥

‘आपलोगों ने राम के पराक्रम, बल-पौरुष तथा समुद्र-लङ्घन की जो बात बतायी है, वह सब मैंने सुन ली; परंतु मैं तो आपलोगों को भी, जो इस समय राम के पराक्रम की बातें जानकर चुपचाप एक-दूसरे का मुँह देख रहे हैं, संग्रामभूमि में सत्यपराक्रमी वीर समझता हूँ’

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॥ ६ · ३५ · ६ ॥
ततस्तु सुमहाप्राज्ञो माल्यवान् नाम राक्षसः। रावणस्य वचः श्रुत्वा इति मातामहोऽब्रवीत्॥

tatastu sumahāprājño mālyavān nāma rākṣasaḥ।
rāvaṇasya vacaḥ śrutvā iti mātāmaho'bravīt॥

रावण के इस आक्षेपपूर्ण वचन को सुनने के पश्चात् महाबुद्धिमान् माल्यवान् नामक राक्षस ने, जो रावण का नाना था, इस प्रकार कहा—

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॥ ६ · ३५ · ७ ॥
विद्यास्वभिविनीतो यो राजा राजन् नयानुगः। शास्ति चिरमैश्वर्यमरींश्च कुरुते वशे॥

vidyāsvabhivinīto yo rājā rājan nayānugaḥ।
sa śāsti ciramaiśvaryamarīṁśca kurute vaśe॥

‘राजन्! जो राजा चौदहों विद्याओं में सुशिक्षित और नीति का अनुसरण करनेवाला होता है, वह दीर्घकालतक राज्य का शासन करता है। वह शत्रुओं को भी वश में कर लेता है

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॥ ६ · ३५ · ८ ॥
संदधानो हि कालेन विगृह्णंश्चारिभिः सह। स्वपक्षे वर्धनं कुर्वन्महदैश्वर्यमश्नुते॥

saṁdadhāno hi kālena vigṛhṇaṁścāribhiḥ saha।
svapakṣe vardhanaṁ kurvanmahadaiśvaryamaśnute॥

‘जो समय के अनुसार आवश्यक होने पर शत्रुओं के साथ संधि और विग्रह करता है तथा अपने पक्ष की वृद्धि में लगा रहता है, वह महान् ऐश्वर्य का भागी होता है

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॥ ६ · ३५ · ९ ॥
हीयमानेन कर्तव्यो राज्ञा संधिः समेन च। शत्रुमवमन्येत ज्यायान् कुर्वीत विग्रहम्॥

hīyamānena kartavyo rājñā saṁdhiḥ samena ca।
na śatrumavamanyeta jyāyān kurvīta vigraham॥

‘जिस राजा की शक्ति क्षीण हो रही हो अथवा जो शत्रु के समान ही शक्ति रखता हो, उससे संधि कर लेनी चाहिये। अपने से अधिक या समान शक्तिवाले शत्रु का कभी अपमान न करे। यदि स्वयं ही शक्ति में बढ़ा-चढ़ा हो, तभी शत्रु के साथ वह युद्ध ठाने

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॥ ६ · ३५ · १० ॥
तन्मह्यं रोचते संधिः सह रामेण रावण। यदर्थमभियुक्तोऽसि सीता तस्मै प्रदीयताम्॥

tanmahyaṁ rocate saṁdhiḥ saha rāmeṇa rāvaṇa।
yadarthamabhiyukto'si sītā tasmai pradīyatām॥

‘इसलिये रावण! मुझे तो श्रीराम के साथ संधि करना ही अच्छा लगता है। जिसके लिये तुम्हारे ऊपर आक्रमण हो रहा है, वह सीता तुम श्रीराम को लौटा दो

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॥ ६ · ३५ · ११ ॥
तस्य देवर्षयः सर्वे गन्धर्वाश्च जयैषिणः। विरोधं मा गमस्तेन संधिस्ते तेन रोचताम्॥

tasya devarṣayaḥ sarve gandharvāśca jayaiṣiṇaḥ।
virodhaṁ mā gamastena saṁdhiste tena rocatām॥

‘देखो देवता, ऋषि और गन्धर्व सभी श्रीराम की विजय चाहते हैं, अतः तुम उनसे विरोध न करो। उनके साथ संधि कर लेने की ही इच्छा करो

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॥ ६ · ३५ · १२ ॥
असृजद् भगवान् पक्षौ द्वावेव हि पितामहः। सुराणामसुराणां धर्माधर्मौ तदाश्रयौ॥

asṛjad bhagavān pakṣau dvāveva hi pitāmahaḥ।
surāṇāmasurāṇāṁ ca dharmādharmau tadāśrayau॥

‘भगवान् ब्रह्मा ने सुर और असुर दो ही पक्षों की सृष्टि की है। धर्म और अधर्म ही इनके आश्रय हैं

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॥ ६ · ३५ · १३ ॥
धर्मो हि श्रूयते पक्ष अमराणां महात्मनाम्। अधर्मो रक्षसां पक्षो ह्यसुराणां राक्षस॥

dharmo hi śrūyate pakṣa amarāṇāṁ mahātmanām।
adharmo rakṣasāṁ pakṣo hyasurāṇāṁ ca rākṣasa॥

‘सुना जाता है महात्मा देवताओं का पक्ष धर्म है। राक्षसराज! राक्षसों और असुरों का पक्ष अधर्म है

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॥ ६ · ३५ · १४ ॥
धर्मो वै ग्रसतेऽधर्मं यदा कृतमभूद् युगम्। अधर्मो ग्रसते धर्मं यदा तिष्यः प्रवर्तते॥

dharmo vai grasate'dharmaṁ yadā kṛtamabhūd yugam।
adharmo grasate dharmaṁ yadā tiṣyaḥ pravartate॥

‘जब सत्ययुग होता है, तब धर्म बलवान् होकर अधर्म को ग्रस लेता है और जब कलियुग आता है, तब अधर्म ही धर्म को दबा देता है

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॥ ६ · ३५ · १५ ॥
तत् त्वया चरता लोकान् धर्मोऽपि निहतो महान्। अधर्मः प्रगृहीतश्च तेनास्मद् बलिनः परे॥

tat tvayā caratā lokān dharmo'pi nihato mahān।
adharmaḥ pragṛhītaśca tenāsmad balinaḥ pare॥

‘तुमने दिग्विजय के लिये सब लोकों में भ्रमण करते हुए महान् धर्म का नाश किया है और अधर्म को गले लगाया है, इसलिये हमारे शत्रु हमसे प्रबल हैं

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॥ ६ · ३५ · १६ ॥
प्रमादात् प्रवृद्धस्तेऽधर्मोऽहिर्ग्रसते हि नः। विवर्धयति पक्षं सुराणां सुरभावनः॥

sa pramādāt pravṛddhaste'dharmo'hirgrasate hi naḥ।
vivardhayati pakṣaṁ ca surāṇāṁ surabhāvanaḥ॥

‘तुम्हारे प्रमाद से बढ़ा हुआ अधर्मरूपी अजगर अब हमें निगल जाना चाहता है और देवताओंद्वारा पालित धर्म उनके पक्ष की वृद्धि कर रहा है

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॥ ६ · ३५ · १७ ॥
विषयेषु प्रसक्तेन यत्किंचित्कारिणा त्वया। ऋषीणामग्निकल्पानामुद्वेगो जनितो महान्॥

viṣayeṣu prasaktena yatkiṁcitkāriṇā tvayā।
ṛṣīṇāmagnikalpānāmudvego janito mahān॥

‘विषयों में आसक्त होकर जो कुछ भी कर डालनेवाले तुमने जो मनमाना आचरण किया है, इससे अग्नि के समान तेजस्वी ऋषियों को बड़ा ही उद्वेग प्राप्त हुआ है

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॥ ६ · ३५ · १८ ॥
तेषां प्रभावो दुर्धर्षः प्रदीप्त इव पावकः। तपसा भावितात्मानो धर्मस्यानुग्रहे रताः॥

teṣāṁ prabhāvo durdharṣaḥ pradīpta iva pāvakaḥ।
tapasā bhāvitātmāno dharmasyānugrahe ratāḥ॥

‘उनका प्रभाव प्रज्वलित अग्नि के समान दुर्धर्ष है। वे ऋषि-मुनि तपस्या के द्वारा अपने अन्तःकरण को शुद्ध करके धर्म के ही संग्रह में तत्पर रहते हैं

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॥ ६ · ३५ · १९ ॥
मुख्यैर्यज्ञैर्यजन्त्येते तैस्तैर्यत्ते द्विजातयः। जुह्वत्यग्नींश्च विधिवद् वेदांश्चोच्चैरधीयते॥

mukhyairyajñairyajantyete taistairyatte dvijātayaḥ।
juhvatyagnīṁśca vidhivad vedāṁścoccairadhīyate॥

‘ये द्विजगण मुख्य-मुख्य यज्ञोंद्वारा यजन करते, विधिवत् अग्नि में आहुति देते और उच्च स्वर से वेदों का पाठ करते हैं

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॥ ६ · ३५ · २० ॥
अभिभूय रक्षांसि ब्रह्मघोषानुदीरयन्। दिशो विप्रद्रुताः सर्वाः स्तनयित्नुरिवोष्णगे॥

abhibhūya ca rakṣāṁsi brahmaghoṣānudīrayan।
diśo vipradrutāḥ sarvāḥ stanayitnurivoṣṇage॥

‘उन्होंने राक्षसों को अभिभूत करके वेदमन्त्रों की ध्वनि का विस्तार किया है, इसलिये ग्रीष्म ऋतु में मेघ की भाँति राक्षस सम्पूर्ण दिशाओं में भाग खड़े हुए हैं

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॥ ६ · ३५ · २१ ॥
ऋषीणामग्निकल्पानामग्निहोत्रसमुत्थितः। आदत्ते रक्षसां तेजो धूमो व्याप्य दिशो दश॥

ṛṣīṇāmagnikalpānāmagnihotrasamutthitaḥ।
ādatte rakṣasāṁ tejo dhūmo vyāpya diśo daśa॥

‘अग्नितुल्य तेजस्वी ऋषियों के अग्निहोत्र से प्रकट हुआ धूम दसों दिशाओं में व्याप्त होकर राक्षसों के तेज को हर लेता है

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॥ ६ · ३५ · २२ ॥
तेषु तेषु देशेषु पुण्येष्वेव दृढव्रतैः। चर्यमाणं तपस्तीव्रं संतापयति राक्षसान्॥

teṣu teṣu ca deśeṣu puṇyeṣveva dṛḍhavrataiḥ।
caryamāṇaṁ tapastīvraṁ saṁtāpayati rākṣasān॥

‘भिन्न-भिन्न देशों में पुण्य कर्मों में ही लगे रहकर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करनेवाले ऋषिलोग जो तीव्र तपस्या करते हैं, वही राक्षसों को संताप दे रही है

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॥ ६ · ३५ · २३ ॥
देवदानवयक्षेभ्यो गृहीतश्च वरस्त्वया। मनुष्या वानरा ऋक्षा गोलाङ्गूला महाबलाः। बलवन्त इहागम्य गर्जन्ति दृढविक्रमाः॥

devadānavayakṣebhyo gṛhītaśca varastvayā।
manuṣyā vānarā ṛkṣā golāṅgūlā mahābalāḥ।
balavanta ihāgamya garjanti dṛḍhavikramāḥ॥

‘तुमने देवताओं, दानवों और यक्षों से ही अवध्य होने का वर प्राप्त किया है, मनुष्य आदि से नहीं। परंतु यहाँ तो मनुष्य, वानर, रीछ और लंगूर आकर गरज रहे हैं। वे सब-के-सब हैं भी बड़े बलवान्, सैनिकशक्ति से सम्पन्न तथा सुदृढ़ पराक्रमी

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॥ ६ · ३५ · २४ ॥
उत्पातान् विविधान् दृष्ट्वा घोरान् बहुविधान् बहून्। विनाशमनुपश्यामि सर्वेषां रक्षसामहम्॥

utpātān vividhān dṛṣṭvā ghorān bahuvidhān bahūn।
vināśamanupaśyāmi sarveṣāṁ rakṣasāmaham॥

‘नाना प्रकार के बहुत-से भयंकर उत्पातों को लक्ष्य करके मैं तो इन समस्त राक्षसों के विनाश का ही अवसर उपस्थित देख रहा हूँ

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॥ ६ · ३५ · २५ ॥
खराभिस्तनिता घोरा मेघाः प्रतिभयंकराः। शोणितेनाभिवर्षन्ति लङ्कामुष्णेन सर्वतः॥

kharābhistanitā ghorā meghāḥ pratibhayaṁkarāḥ।
śoṇitenābhivarṣanti laṅkāmuṣṇena sarvataḥ॥

‘घोर एवं भयंकर मेघ प्रचण्ड गर्जन-तर्जन के साथ लङ्का पर सब ओर से गर्म खून की वर्षा कर रहे हैं

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॥ ६ · ३५ · २६ ॥
रुदतां वाहनानां प्रपतन्त्यश्रुबिन्दवः। रजोध्वस्ता विवर्णाश्च प्रभान्ति यथापुरम्॥

rudatāṁ vāhanānāṁ ca prapatantyaśrubindavaḥ।
rajodhvastā vivarṇāśca na prabhānti yathāpuram॥

‘घोड़े-हाथी आदि वाहन रो रहे हैं और उनके नेत्रों से अश्रुविन्दु झर रहे हैं। दिशाएँ धूल भर जानेसे मलिन हो अब पहले की भाँति प्रकाशित नहीं हो रही हैं

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॥ ६ · ३५ · २७ ॥
व्याला गोमायवो गृध्रा वाश्यन्ति सुभैरवम्। प्रविश्य लङ्कामारामे समवायांश्च कुर्वते॥

vyālā gomāyavo gṛdhrā vāśyanti ca subhairavam।
praviśya laṅkāmārāme samavāyāṁśca kurvate॥

‘मांसभक्षी हिंसक पशु, गीदड़ और गीध भयंकर बोली बोलते हैं तथा लङ्का के उपवन में घुसकर झुंड बनाकर बैठते हैं

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॥ ६ · ३५ · २८ ॥
कालिकाः पाण्डुरैर्दन्तैः प्रहसन्त्यग्रतः स्थिताः। स्त्रियः स्वप्नेषु मुष्णन्त्यो गृहाणि प्रतिभाष्य च॥

kālikāḥ pāṇḍurairdantaiḥ prahasantyagrataḥ sthitāḥ।
striyaḥ svapneṣu muṣṇantyo gṛhāṇi pratibhāṣya ca॥

‘सपने में काले रंग की स्त्रियाँ अपने पीले दाँत दिखाती हुई सामने आकर खड़ी हो जाती और प्रतिकूल बातें कहकर घर के सामान चुराती हुई जोर-जोर से हँसती हैं

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॥ ६ · ३५ · २९ ॥
गृहाणां बलिकर्माणि श्वानः पर्युपभुञ्जते। खरा गोषु प्रजायन्ते मूषका नकुलेषु च॥

gṛhāṇāṁ balikarmāṇi śvānaḥ paryupabhuñjate।
kharā goṣu prajāyante mūṣakā nakuleṣu ca॥

‘घरों में जो बलिकर्म किये जाते हैं, उस बलि-सामग्री को कुत्ते खा जाते हैं। गौओं से गधे और नेवलों से चूहे पैदा होते हैं

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॥ ६ · ३५ · ३० ॥
मार्जारा द्वीपिभिः सार्धं सूकराः शुनकैः सह। किंनरा राक्षसैश्चापि समेयुर्मानुषैः सह॥

mārjārā dvīpibhiḥ sārdhaṁ sūkarāḥ śunakaiḥ saha।
kiṁnarā rākṣasaiścāpi sameyurmānuṣaiḥ saha॥

‘बाघों के साथ बिलाव, कुत्तों के साथ सूअर तथा राक्षसों और मनुष्यों के साथ किन्नर समागम करते हैं

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॥ ६ · ३५ · ३१ ॥
पाण्डुरा रक्तपादाश्च विहगाः कालचोदिताः। राक्षसानां विनाशाय कपोता विचरन्ति च॥

pāṇḍurā raktapādāśca vihagāḥ kālacoditāḥ।
rākṣasānāṁ vināśāya kapotā vicaranti ca॥

‘जिनकी पाँखें सफेद और पंजे लाल हैं, वे कबूतर पक्षी दैव से प्रेरित हो राक्षसों का भावी विनाश सूचित करने के लिये यहाँ सब ओर विचरते हैं

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॥ ६ · ३५ · ३२ ॥
चीचीकूचीति वाशन्त्यः शारिका वेश्मसु स्थिताः। पतन्ति ग्रथिताश्चापि निर्जिताः कलहैषिभिः॥

cīcīkūcīti vāśantyaḥ śārikā veśmasu sthitāḥ।
patanti grathitāścāpi nirjitāḥ kalahaiṣibhiḥ॥

‘घरों में रहनेवाली सारिकाएँ कलह की इच्छावाले दूसरे पक्षियों से चें-चें करती हुई गुँथ जाती हैं और उनसे पराजित हो पृथ्वी पर गिर पड़ती हैं

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॥ ६ · ३५ · ३३ ॥
पक्षिणश्च मृगाः सर्वे प्रत्यादित्यं रुदन्ति ते। करालो विकटो मुण्डः पुरुषः कृष्णपिङ्गलः॥ कालो गृहाणि सर्वेषां काले कालेऽन्ववेक्षते।

pakṣiṇaśca mṛgāḥ sarve pratyādityaṁ rudanti te।
karālo vikaṭo muṇḍaḥ puruṣaḥ kṛṣṇapiṅgalaḥ॥
kālo gṛhāṇi sarveṣāṁ kāle kāle'nvavekṣate।

‘पक्षी और मृग सभी सूर्य की ओर मुँह करके रोते हैं। विकराल, विकट, काले और भूरे रंग के मूँड़ मुड़ाये हुए पुरुष का रूप धारण करके काल समय-समय पर हम सबके घरों की ओर देखता है

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॥ ६ · ३५ · ३४ ॥
एतान्यन्यानि दुष्टानि निमित्तान्युत्पतन्ति च॥

etānyanyāni duṣṭāni nimittānyutpatanti ca॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ६ · ३५ · ३५ ॥
विष्णुं मन्यामहे रामं मानुषं रूपमास्थितम्। नहि मानुषमात्रोऽसौ राघवो दृढविक्रमः॥

viṣṇuṁ manyāmahe rāmaṁ mānuṣaṁ rūpamāsthitam।
nahi mānuṣamātro'sau rāghavo dṛḍhavikramaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ६ · ३५ · ३६ ॥
येन बद्धः समुद्रे सेतुः परमाद्भुतः। कुरुष्व नरराजेन संधिं रामेण रावण। ज्ञात्वावधार्य कर्माणि क्रियतामायतिक्षमम्॥

yena baddhaḥ samudre ca setuḥ sa paramādbhutaḥ।
kuruṣva nararājena saṁdhiṁ rāmeṇa rāvaṇa।
jñātvāvadhārya karmāṇi kriyatāmāyatikṣamam॥

॥ ३४–३६ ॥

‘ये तथा और भी बहुत-से अपशकुन हो रहे हैं। मैं ऐसा समझता हूँ कि साक्षात् भगवान् विष्णु ही मानवरूप धारण करके राम होकर आये हैं। जिन्होंने समुद्र में अत्यन्त अद्भुत सेतु बाँधा है, वे दृढपराक्रमी रघुवीर साधारण मनुष्यमात्र नहीं हैं। रावण! तुम नरराज श्रीराम के साथ संधि कर लो। श्रीराम के अलौकिक कर्मों और लङ्का में होनेवाले उत्पातों को जानकर जो कार्य भविष्य में सुख देनेवाला हो, उसका निश्चय करके वही करो’

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॥ ६ · ३५ · ३७ ॥
इदं वचस्तस्य निगद्य माल्यवान् परीक्ष्य रक्षोधिपतेर्मनः पुनः। अनुत्तमेषूत्तमपौरुषो बली बभूव तूष्णीं समवेक्ष्य रावणम्॥

idaṁ vacastasya nigadya mālyavān parīkṣya rakṣodhipatermanaḥ punaḥ।
anuttameṣūttamapauruṣo balī babhūva tūṣṇīṁ samavekṣya rāvaṇam॥

यह बात कहकर तथा राक्षसराज रावण के मनोभाव की परीक्षा करके उत्तम मन्त्रियों में श्रेष्ठ पौरुषशाली महाबली माल्यवान् रावण की ओर देखता हुआ चुप हो गया

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः॥ ३५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३५ ॥