हनुमान्जीका लङ्काके दुर्ग, फाटक, सेना-विभाग और संक्रम आदिका वर्णन करके भगवान् श्रीरामसे सेनाको कूच करनेकी आज्ञा देनेके लिये प्रार्थना करना
sugrīvasya vacaḥ śrutvā hetumat paramārthavat।
pratijagrāha kākutstho hanūmantamathābravīt॥
सुग्रीव के ये युक्तियुक्त और उत्तम अभिप्राय से पूर्ण वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें स्वीकार किया और फिर हनुमान्जी से कहा—
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tapasā setubandhena sāgarocchoṣaṇena ca।
sarvathāpi samartho'smi sāgarasyāsya laṅghane॥
‘मैं तपस्या से पुल बाँधकर और समुद्र को सुखाकर सब प्रकार से महासागर को लाँघ जाने में समर्थ हूँ
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kati durgāṇi durgāyā laṅkāyāstad bravīṣva me।
jñātumicchāmi tat sarvaṁ darśanādiva vānara॥
‘वानरवीर! तुम मुझे यह तो बताओ कि उस दुर्गम लङ्कापुरी के कितने दुर्ग हैं। मैं देखे हुए के समान उसका सारा विवरण स्पष्टरूप से जानना चाहता हूँ
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balasya parimāṇaṁ ca dvāradurgakriyāmapi।
guptikarma ca laṅkāyā rakṣasāṁ sadanāni ca॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
yathāsukhaṁ yathāvacca laṅkāyāmasi dṛṣṭavān।
sarvamācakṣva tattvena sarvathā kuśalo hyasi॥
‘तुमने रावण की सेना का परिमाण, पुरी के दरवाजों को दुर्गम बनाने के साधन, लङ्का की रक्षा के उपाय तथा राक्षसों के भवन—इन सबको सुखपूर्वक यथावत्-रूप से वहाँ देखा है। अतः इन सबका ठीक-ठीक वर्णन करो; क्योंकि तुम सब प्रकार से कुशल हो’
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śrutvā rāmasya vacanaṁ hanumān mārutātmajaḥ।
vākyaṁ vākyavidāṁ śreṣṭho rāmaṁ punarathābravīt॥
श्रीरघुनाथजी का यह वचन सुनकर वाणी के मर्म को समझनेवाले विद्वानों में श्रेष्ठ पवनकुमार हनुमान् ने श्रीराम से फिर कहा—
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śrūyatāṁ sarvamākhyāsye durgakarma vidhānataḥ।
guptā purī yathā laṅkā rakṣitā ca yathā balaiḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
rākṣasāśca yathā snigdhā rāvaṇasya ca tejasā।
parāṁ samṛddhiṁ laṅkāyāḥ sāgarasya ca bhīmatām॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
vibhāgaṁ ca balaughasya nirdeśaṁ vāhanasya ca।
evamuktvā kapiśreṣṭhaḥ kathayāmāsa tattvataḥ॥
‘भगवन्! सुनिये। मैं सब बातें बता रहा हूँ। लङ्का के दुर्ग किस विधि से बने हैं, किस प्रकार लङ्कापुरी की रक्षा की व्यवस्था की गयी है, किस तरह वह सेनाओं से सुरक्षित है, रावण के तेज से प्रभावित हो राक्षस उसके प्रति कैसा स्नेह रखते हैं, लङ्का की समृद्धि कितनी उत्तम है, समुद्र कितना भयंकर है, पैदल सैनिकों का विभाग करके कहाँ कितने सैनिक रखे गये हैं और वहाँ के वाहनों की कितनी संख्या है—इन सब बातों का मैं वर्णन करूँगा। ऐसा कहकर कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने वहाँ की बातों को ठीक-ठीक बताना आरम्भ किया
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hṛṣṭapramuditā laṅkā mattadvipasamākulā।
mahatī rathasampūrṇā rakṣogaṇaniṣevitā॥
‘प्रभो! लङ्कापुरी हर्ष और आमोद-प्रमोद से पूर्ण है। वह विशाल पुरी मतवाले हाथियों से व्याप्त तथा असंख्य रथों से भरी हुई है। राक्षसों के समुदाय सदा उसमें निवास करते हैं
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dṛḍhabaddhakapāṭāni mahāparighavanti ca।
catvāri vipulānyasyā dvārāṇi sumahānti ca॥
‘उस पुरी के चार बड़े-बड़े दरवाजे हैं, जो बहुत लंबे-चौड़े हैं। उनमें बहुत मजबूत किवाड़ लगे हैं और मोटी-मोटी अर्गलाएँ हैं
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tatreṣūpalayantrāṇi balavanti mahānti ca।
āgataṁ pratisainyaṁ taistatra pratinivāryate॥
‘उन दरवाजों पर बड़े विशाल और प्रबल यन्त्र लगे हैं। जो तीर और पत्थरों के गोले बरसाते हैं। उनके द्वारा आक्रमण करनेवाली शत्रुसेना को आगे बढ़ने से रोका जाता है
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dvāreṣu saṁskṛtā bhīmāḥ kālāyasamayāḥ śitāḥ।
śataśo racitā vīraiḥ śataghnyo rakṣasāṁ gaṇaiḥ॥
‘जिन्हें वीर राक्षसगणों ने बनाया है, जो काले लोहे की बनी हुई, भयंकर और तीखी हैं तथा जिनका अच्छी तरह संस्कार किया गया है, ऐसी सैकड़ों शतघ्नियाँ (लोहे के काँटों से भरी हुई चार हाथ लंबी गदाएँ) उन दरवाजों पर सजाकर रखी गयी हैं
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sauvarṇastu mahāṁstasyāḥ prākāro duṣpradharṣaṇaḥ।
maṇividrumavaidūryamuktāviracitāntaraḥ॥
‘उस पुरी के चारों ओर सोने का बना हुआ बहुत ऊँचा परकोटा है, जिसको तोड़ना बहुत ही कठिन है। उसमें मणि, मूँगे, नीलम और मोतियों का काम किया गया है
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sarvataśca mahābhīmāḥ śītatoyā mahāśubhāḥ।
agādhā grāhavatyaśca parikhā mīnasevitāḥ॥
‘परकोटों के चारों ओर महाभयंकर, शत्रुओं का महान् अमङ्गल करनेवाली, ठंडे जल से भरी हुई और अगाध गहराई से युक्त कई खाइयाँ बनी हुई हैं, जिनमें ग्राह और बड़े-बड़े मत्स्य निवास करते हैं
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dvāreṣu tāsāṁ catvāraḥ saṁkramāḥ paramāyatāḥ।
yantrairupetā bahubhirmahadbhirgṛhapaṅktibhiḥ॥
‘उक्त चारों दरवाजों के सामने उन खाइयों पर मचानों के रूप में चार संक्रम (लकड़ी के पुल) हैं, जो बहुत ही विस्तृत हैं। उनमें बहुत-से बड़े-बड़े यन्त्र लगे हुए हैं और उनके आस-पास परकोटे पर बने हुए मकानों की पंक्तियाँ हैं
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trāyante saṁkramāstatra parasainyāgate sati।
yantraistairavakīryante parikhāsu samantataḥ॥
‘जब शत्रु की सेना आती है, तब यन्त्रों के द्वारा उन संक्रमों की रक्षा की जाती है तथा उन यन्त्रों के द्वारा ही उन्हें सब ओर खाइयों में गिरा दिया जाता है और वहाँ पहुँची हुई शत्रु-सेनाओं को भी सब ओर फेंक दिया जाता है
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ekastvakampyo balavān saṁkramaḥ sumahādṛḍhaḥ।
kāñcanairbahubhiḥ stambhairvedikābhiśca śobhitaḥ॥
‘उनमें से एक संक्रम तो बड़ा ही सुदृढ़ और अभेद्य है। वहाँ बहुत बड़ी सेना रहती है और वह सोने के अनेक खंभों तथा चबूतरों से सुशोभित है
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svayaṁ prakṛtimāpanno yuyutsū rāma rāvaṇaḥ।
utthitaścāpramattaśca balānāmanudarśane॥
‘रघुनाथजी! रावण युद्ध के लिये उत्सुक होता हुआ स्वयं कभी क्षुब्ध नहीं होता—स्वस्थ एवं धीर बना रहता है। वह सेनाओं के बारंबार निरीक्षण के लिये सदा सावधान एवं उद्यत रहता है
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laṅkā punarnirālambā devadurgā bhayāvahā।
nādeyaṁ pārvataṁ vānyaṁ kṛtrimaṁ ca caturvidham॥
‘लङ्का पर चढ़ाई करने के लिये कोई अवलम्ब नहीं है। वह पुरी देवताओं के लिये भी दुर्गम और बड़ी भयावनी है। उसके चारों ओर नदी, पर्वत, वन और कृत्रिम (खाई, परकोटा आदि)—ये चार प्रकार के दुर्ग हैं
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sthitā pāre samudrasya dūrapārasya rāghava।
naupathaścāpi nāstyatra niruddeśaśca sarvataḥ॥
‘रघुनन्दन! वह बहुत दूरतक फैले हुए समुद्र के दक्षिण किनारे पर बसी हुई है। वहाँ जाने के लिये नाव का भी मार्ग नहीं है; क्योंकि उसमें लक्ष्य का भी किसी प्रकार पता रहना सम्भव नहीं है
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śailāgre racitā durgā sā pūrdevapuropamā।
vājivāraṇasampūrṇā laṅkā paramadurjayā॥
‘वह दुर्गम पुरी पर्वत के शिखर पर बसायी गयी है और देवपुरी के समान सुन्दर दिखायी देती है, हाथी, घोड़ों से भरी हुई वह लङ्का अत्यन्त दुर्जय है
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parikhāśca śataghnyaśca yantrāṇi vividhāni ca।
śobhayanti purīṁ laṅkāṁ rāvaṇasya durātmanaḥ॥
‘खाइयाँ, शतघ्नियाँ और तरह-तरह के यन्त्र दुरात्मा रावण की उस लङ्कानगरी की शोभा बढ़ाते हैं
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ayutaṁ rakṣasāmatra pūrvadvāraṁ samāśritam।
śūlahastā durādharṣāḥ sarve khaḍgāgrayodhinaḥ॥
‘लङ्का के पूर्वद्वार पर दस हजार राक्षस रहते हैं, जो सब-के-सब हाथों में शूल धारण करते हैं। वे अत्यन्त दुर्जय और युद्ध के मुहाने पर तलवारों से जूझनेवाले हैं
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niyutaṁ rakṣasāmatra dakṣiṇadvāramāśritam।
caturaṅgeṇa sainyena yodhāstatrāpyanuttamāḥ॥
‘लङ्का के दक्षिण द्वार पर चतुरंगिणी सेना के साथ एक लाख राक्षस योद्धा डटे रहते हैं। वहाँ के सैनिक भी बड़े बहादुर हैं
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prayutaṁ rakṣasāmatra paścimadvāramāśritam।
carmakhaḍgadharāḥ sarve tathā sarvāstrakovidāḥ॥
‘पुरी के पश्चिम द्वार पर दस लाख राक्षस निवास करते हैं। वे सब-के-सब ढाल और तलवार धारण करते हैं तथा सम्पूर्ण अस्त्रों के ज्ञान में निपुण हैं
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nyarbudaṁ rakṣasāmatra uttaradvāramāśritam।
rathinaścāśvavāhāśca kulaputrāḥ supūjitāḥ॥
‘उस पुरी के उत्तर द्वार पर एक अर्बुद (दस करोड़) राक्षस रहते हैं। जिनमें से कुछ तो रथी हैं और कुछ घुड़सवार। वे सभी उत्तम कुल में उत्पन्न और अपनी वीरता के लिये प्रशंसित हैं
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śataśo'tha sahasrāṇi madhyamaṁ skandhamāśritāḥ।
yātudhānā durādharṣāḥ sāgrakoṭiśca rakṣasām॥
‘लङ्का के मध्यभाग की छावनी में सैकड़ों सहस्र दुर्जय राक्षस रहते हैं, जिनकी संख्या एक करोड़ से अधिक है
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te mayā saṁkramā bhagnāḥ parikhāścāvapūritāḥ।
dagdhā ca nagarī laṅkā prākārāścāvasāditāḥ।
balaikadeśaḥ kṣapito rākṣasānāṁ mahātmanām॥
‘किंतु मैंने उन सब संक्रमों को तोड़ डाला है, खाइयाँ पाट दी हैं, लङ्कापुरी को जला दिया है और उसके परकोटों को भी धराशायी कर दिया है। इतना ही नहीं, वहाँ के विशालकाय राक्षसों की सेना का एक चौथाई भाग नष्ट कर डाला है
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yena kena tu mārgeṇa tarāma varuṇālayam।
hateti nagarī laṅkā vānarairupadhāryatām॥
‘हमलोग किसी-न-किसी मार्ग या उपाय से एक बार समुद्र को पार कर लें; फिर तो लङ्का को वानरों के द्वारा नष्ट हुई ही समझिये
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aṅgado dvivido maindo jāmbavān panaso nalaḥ।
nīlaḥ senāpatiścaiva balaśeṣeṇa kiṁ tava॥
‘अङ्गद, द्विविद, मैन्द, जाम्बवान्, पनस, नल और सेनापति नील—इतने ही वानर लङ्काविजय करने के लिये पर्याप्त हैं। बाकी सेना लेकर आपको क्या करना है?
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plavamānā hi gatvā tvāṁ rāvaṇasya mahāpurīm।
saparvatavanāṁ bhittvā sakhātāṁ ca satoraṇām।
saprākārāṁ sabhavanāmānayiṣyanti rāghava॥
‘रघुनन्दन! ये अङ्गद आदि वीर आकाश में उछलते-कूदते हुए रावण की महापुरी लङ्का में पहुँचकर उसे पर्वत, वन, खाई, दरवाजे, परकोटे और मकानोंसहित नष्ट करके सीताजी को यहाँ ले आयेंगे
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evamājñāpaya kṣipraṁ balānāṁ sarvasaṁgraham।
muhūrtena tu yuktena prasthānamabhirocaya॥
‘ऐसा समझकर आप शीघ्र ही समस्त सैनिकों को सम्पूर्ण आवश्यक वस्तुओं का संग्रह करके कूच करने की आज्ञा दीजिये और उचित मुहूर्त से प्रस्थान की इच्छा कीजिये’
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे तृतीयः सर्गः॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तीसरा सर्ग पूरा हुआ॥ ३ ॥