विभीषणका रावणके महलमें जाना, उसे अपशकुनोंका भय दिखाकर सीताको लौटा देनेके लिये प्रार्थना करना और रावणका उनकी बात न मानकर उन्हें वहाँसे विदा कर देना
tataḥ pratyuṣasi prāpte prāptadharmārthaniścayaḥ।
rākṣasādhipaterveśma bhīmakarmā vibhīṣaṇaḥ॥
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śailāgracayasaṁkāśaṁ śailaśṛṅgamivonnatam।
suvibhaktamahākakṣaṁ mahājanaparigraham॥
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matimadbhirmahāmātrairanuraktairadhiṣṭhitam।
rākṣasairāptaparyāptaiḥ sarvataḥ parirakṣitam॥
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mattamātaṅganiḥśvāsairvyākulīkṛtamārutam।
śaṅkhaghoṣamahāghoṣaṁ tūryasambādhanāditam॥
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pramadājanasambādhaṁ prajalpitamahāpatham।
taptakāñcananiryūhaṁ bhūṣaṇottamabhūṣitam॥
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gandharvāṇāmivāvāsamālayaṁ marutāmiva।
ratnasaṁcayasambādhaṁ bhavanaṁ bhogināmiva॥
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taṁ mahābhramivādityastejovistṛtaraśmimān।
agrajasyālayaṁ vīraḥ praviveśa mahādyutiḥ॥
दूसरे दिन सबेरा होते ही धर्म और अर्थ के तत्त्व को जाननेवाले भीमकर्मा महातेजस्वी वीर विभीषण अपने बड़े भाई राक्षसराज रावण के घर गये। वह घर अनेक प्रासादों के कारण पर्वतशिखरों के समूह की भाँति शोभा पाता था। उसकी ऊँचाई भी पहाड़ की चोटी को लज्जित करती थी। उसमें अलग-अलग बड़ी-बड़ी कक्षाएँ (ड्योढ़ियाँ) सुन्दर ढंग से बनी हुई थीं। बहुतेरे श्रेष्ठ पुरुषों का वहाँ आना-जाना लगा रहता था। अनेकानेक बुद्धिमान् महामन्त्री, जो राजा के प्रति अनुराग रखनेवाले थे, उसमें बैठे थे। विश्वसनीय, हितैषी तथा कार्यसाधन में कुशल बहुसंख्यक राक्षस सब ओर से उस भवन की रक्षा करते थे। वहाँ की वायु मतवाले हाथियों के निःश्वास से मिश्रित हो बवंडर-सी जान पड़ती थी। शङ्ख-ध्वनि के समान राक्षसों का गम्भीर घोष वहाँ गूँजता रहता था। नाना प्रकार के वाद्यों के मनोरम शब्द उस भवन को निनादित करते थे। रूप और यौवन के मद से मतवाली युवतियों की वहाँ भीड़-सी लगती रहती थी। वहाँ के बड़े-बड़े मार्ग लोगों के वार्तालाप से मुखरित जान पड़ते थे। उसके फाटक तपाये हुए सुवर्ण के बने हुए थे। उत्तम सजावट की वस्तुओं से वह महल अच्छी तरह सजा हुआ था, अतएव वह गन्धर्वों के आवास और देवताओं के निवासस्थान-सा मनोरम प्रतीत होता था। रत्नराशि से परिपूर्ण होने के कारण वह नागभवन के समान उद्भासित होता था। जैसे तेज से विस्तृत किरणोंवाले सूर्य महान् मेघों की घटा में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार तेजस्वी विभीषण ने रावण के उस भवन में पदार्पण किया
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puṇyān puṇyāhaghoṣāṁśca vedavidbhirudāhṛtān।
śuśrāva sumahātejā bhrāturvijayasaṁśritān॥
वहाँ पहुँचकर उन महातेजस्वी विभीषण ने अपने भाई की विजय के उद्देश्य से वेदवेत्ता ब्राह्मणोंद्वारा किये गये पुण्याहवाचन के पवित्र घोष सुने
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pūjitān dadhipātraiśca sarpirbhiḥ sumanokṣataiḥ।
mantravedavido viprān dadarśa sa mahābalaḥ॥
तत्पश्चात् उन महाबली विभीषण ने वेदमन्त्रों के ज्ञाता ब्राह्मणों का दर्शन किया, जिनके हाथों में दही और घी के पात्र थे। फूलों और अक्षतों से उन सबकी पूजा की गयी थी
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sa pūjyamāno rakṣobhirdīpyamānaṁ svatejasā।
āsanasthaṁ mahābāhurvavande dhanadānujam॥
वहाँ जाने पर राक्षसों ने उनका स्वागत-सत्कार किया। फिर उन महाबाहु विभीषण ने अपने तेज से देदीप्यमान और सिंहासन पर विराजमान कुबेर के छोटे भाई रावण को प्रणाम किया
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sa rājadṛṣṭisampannamāsanaṁ hemabhūṣitam।
jagāma samudācāraṁ prayujyācārakovidaḥ॥
तदनन्तर शिष्टाचार के ज्ञाता विभीषण ‘विजयतां महाराजः’ (महाराज की जय हो) इत्यादि रूप से राजा के प्रति परम्पराप्राप्त शुभाशंसासूचक वचन का प्रयोग करके राजा के द्वारा दृष्टि के संकेत से बताये गये सुवर्णभूषित सिंहासन पर बैठ गये
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sa rāvaṇaṁ mahātmānaṁ vijane mantrisaṁnidhau।
uvāca hitamatyarthaṁ vacanaṁ hetuniścitam॥
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prasādya bhrātaraṁ jyeṣṭhaṁ sāntvenopasthitakramaḥ।
deśakālārthasaṁvādi dṛṣṭalokaparāvaraḥ॥
विभीषण जगत् की भली-बुरी बातों को अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने प्रणाम आदि व्यवहार का यथार्थरूप से निर्वाह करके सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा अपने बड़े भाई महामना रावण को प्रसन्न किया और उससे एकान्त में मन्त्रियों के निकट देश, काल और प्रयोजन के अनुरूप, युक्तियोंद्वारा निश्चित तथा अत्यन्त हितकारक बात कही—
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yadāprabhṛti vaidehī samprāpteha paraṁtapa।
tadāprabhṛti dṛśyante nimittānyaśubhāni naḥ॥
‘शत्रुओं को संताप देनेवाले महाराज! जब से विदेहकुमारी सीता यहाँ आयी हैं, तभी से हमलोगों को अनेक प्रकार के अमङ्गलसूचक अपशकुन दिखायी दे रहे हैं
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sasphuliṅgaḥ sadhūmārciḥ sadhūmakaluṣodayaḥ।
mantrasaṁdhukṣito'pyagnirna samyagabhivardhate॥
‘मन्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक धधकाने पर भी आग अच्छी तरह प्रज्वलित नहीं हो रही है। उससे चिनगारियाँ निकलने लगती हैं। उसकी लपट के साथ धुआँ उठने लगता है और मन्थनकाल में जब अग्नि प्रकट होती है, उस समय भी वह धूएँ से मलिन ही रहती है
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agniṣṭheṣvagniśālāsu tathā brahmasthalīṣu ca।
sarīsṛpāṇi dṛśyante havyeṣu ca pipīlikāḥ॥
‘रसोई-घरों में, अग्निशालाओं में तथा वेदाध्ययन के स्थानों में भी साँप देखे जाते हैं और हवन-सामग्रियों में चींटियाँ पड़ी दिखायी देती हैं
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gavāṁ payāṁsi skannāni vimadā varakuñjarāḥ।
dīnamaśvāḥ praheṣante navagrāsābhinandinaḥ॥
‘गायों का दूध सूख गया है, बड़े-बड़े गजराज मदरहित हो गये हैं, घोड़े नये ग्रास से आनन्दित (भोजन से संतुष्ट) होने पर भी दीनतापूर्ण स्वर में हिनहिनाते हैं
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kharoṣṭrāśvatarā rājan bhinnaromāḥ sravanti ca।
na svabhāve'vatiṣṭhante vidhānairapi cintitāḥ॥
‘राजन्! गधों, ऊँटों और खच्चरों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उनके नेत्रों से आँसू गिरने लगते हैं। विधिपूर्वक चिकित्सा की जाने पर भी वे पूर्णतः स्वस्थ हो नहीं पाते हैं
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vāyasāḥ saṁghaśaḥ krūrā vyāharanti samantataḥ।
samavetāśca dṛśyante vimānāgreṣu saṁghaśaḥ॥
‘क्रूर कौए झुंड-के-झुंड एकत्र होकर कर्कश स्वर में काँव-काँव करने लगते हैं तथा वे सतमहले मकानों पर समूह-के-समूह इकट्ठे हुए देखे जाते हैं
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gṛdhrāśca parilīyante purīmupari piṇḍitāḥ।
upapannāśca saṁdhye dve vyāharantyaśivaṁ śivāḥ॥
‘लङ्कापुरी के ऊपर झुंड-के-झुंड गीध उसका स्पर्श करते हुए-से मड़राते रहते हैं। दोनों संध्याओं के समय सियारिनें नगर के समीप आकर अमङ्गलसूचक शब्द करती हैं
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kravyādānāṁ mṛgāṇāṁ ca purīdvāreṣu saṁghaśaḥ।
śrūyante vipulā ghoṣāḥ savisphūrjitaniḥsvanāḥ॥
‘नगर के सभी फाटकों पर समूह-के-समूह एकत्र हुए मांसभक्षी पशुओं के जोर-जोर से किये जानेवाले चीत्कार बिजली की गड़गड़ाहट के समान सुनायी पड़ते हैं
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tadevaṁ prastute kārye prāyaścittamidaṁ kṣamam।
rocaye vīra vaidehī rāghavāya pradīyatām॥
‘वीरवर! ऐसी परिस्थिति में मुझे तो यही प्रायश्चित्त अच्छा जान पड़ता है कि विदेहकुमारी सीता श्रीरामचन्द्रजी को लौटा दी जायँ
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idaṁ ca yadi vā mohāllobhād vā vyāhṛtaṁ mayā।
tatrāpi ca mahārāja na doṣaṁ kartumarhasi॥
‘महाराज! यदि यह बात मैंने मोह या लोभ से कही हो तो भी आपको मुझमें दोषदृष्टि नहीं करनी चाहिये
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ayaṁ hi doṣaḥ sarvasya janasyāsyopalakṣyate।
rakṣasāṁ rākṣasīnāṁ ca purasyāntaḥpurasya ca॥
‘सीता का अपहरण तथा इससे होनेवाला अपशकुनरूपी दोष यहाँ की सारी जनता, राक्षस-राक्षसी तथा नगर और अन्तःपुर—सभी के लिये उपलक्षित होता है
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prāpaṇe cāsya mantrasya nivṛttāḥ sarvamantriṇaḥ।
avaśyaṁ ca mayā vācyaṁ yad dṛṣṭamathavā śrutam।
sampradhārya yathānyāyaṁ tad bhavān kartumarhati॥
‘यह बात आपके कानोंतक पहुँचाने में प्रायः सभी मन्त्री संकोच करते हैं; परंतु जो बात मैंने देखी या सुनी है वह मुझे तो आपके आगे अवश्य निवेदन कर देनी चाहिये; अतः उसपर यथोचित विचार करके आप जैसा उचित समझें, वैसा करें’
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iti svamantriṇāṁ madhye bhrātā bhrātaramūcivān।
rāvaṇaṁ rakṣasāṁ śreṣṭhaṁ pathyametad vibhīṣaṇaḥ॥
इस प्रकार भाई विभीषण ने अपने मन्त्रियों के बीच में बड़े भाई राक्षसराज रावण से ये हितकारी वचन कहे
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hitaṁ mahārthaṁ mṛdu hetusaṁhitaṁ
vyatītakālāyatisampratikṣamam।
niśamya tadvākyamupasthitajvaraḥ
prasaṅgavānuttarametadabravīt॥
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bhayaṁ na paśyāmi kutaścidapyahaṁ
na rāghavaḥ prāpsyati jātu maithilīm।
suraiḥ sahendrairapi saṁgare kathaṁ
mamāgrataḥ sthāsyati lakṣmaṇāgrajaḥ॥
विभीषण की ये हितकर, महान् अर्थ की साधक, कोमल, युक्तिसंगत तथा भूत, भविष्य और वर्तमानकाल में भी कार्यसाधन में समर्थ बातें सुनकर रावण को बुखार चढ़ आया। श्रीराम के साथ वैर बढ़ाने में उसकी आसक्ति हो गयी थी। इसलिये उसने इस प्रकार उत्तर दिया—‘विभीषण! मैं तो कहीं से भी कोई भय नहीं देखता। राम मिथिलेशकुमारी सीता को कभी नहीं पा सकते। इन्द्रसहित देवताओं की सहायता प्राप्त कर लेने पर भी लक्ष्मण के बड़े भाई राम मेरे सामने संग्राम में कैसे टिक सकेंगे?’
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ityevamuktvā surasainyanāśano
mahābalaḥ saṁyati caṇḍavikramaḥ।
daśānano bhrātaramāptavādinaṁ
visarjayāmāsa tadā vibhīṣaṇam॥
ऐसा कहकर देवसेना के नाशक और समराङ्गण में प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करनेवाले महाबली दशानन ने अपने यथार्थवादी भाई विभीषण को तत्काल विदा कर दिया
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे दशमः सर्गः॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १० ॥