वाल्मीकि रामायणम् · युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

युद्धकाण्डम्Yuddha Kāṇḍa

सर्गः १ · १९ श्लोकाःSarga 1 · 19 ślokas

हनुमान्जीकी प्रशंसा करके श्रीरामका उन्हें हृदयसे लगाना और समुद्रको पार करनेके लिये चिन्तित होना

॥ ६ · १ · १ ॥
श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं यथावदभिभाषितम्। रामः प्रीतिसमायुक्तो वाक्यमुत्तरमब्रवीत्॥

śrutvā hanūmato vākyaṁ yathāvadabhibhāṣitam।
rāmaḥ prītisamāyukto vākyamuttaramabravīt॥

हनुमान्जी के द्वारा यथावत् रूप से कहे हुए इन वचनों को सुनकर भगवान् श्रीराम बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार उत्तम वचन बोले—

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॥ ६ · १ · २ ॥
कृतं हनुमता कार्यं सुमहद् भुवि दुर्लभम्। मनसापि यदन्येन शक्यं धरणीतले॥

kṛtaṁ hanumatā kāryaṁ sumahad bhuvi durlabham।
manasāpi yadanyena na śakyaṁ dharaṇītale॥

‘हनुमान् ने बड़ा भारी कार्य किया है। भूतल पर ऐसा कार्य होना कठिन है। इस भूमण्डल में दूसरा कोई तो ऐसा कार्य करने की बात मन के द्वारा सोच भी नहीं सकता

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॥ ६ · १ · ३ ॥
नहि तं परिपश्यामि यस्तरेत महोदधिम्। अन्यत्र गरुडाद् वायोरन्यत्र हनूमतः॥

nahi taṁ paripaśyāmi yastareta mahodadhim।
anyatra garuḍād vāyoranyatra ca hanūmataḥ॥

‘गरुड़, वायु और हनुमान् को छोड़कर दूसरे किसीको मैं ऐसा नहीं देखता, जो महासागर को लाँघ सके

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॥ ६ · १ · ४ ॥
देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम्। अप्रधृष्यां पुरीं लङ्कां रावणेन सुरक्षिताम्॥ प्रविष्टः सत्त्वमाश्रित्य जीवन् को नाम निष्क्रमेत्।

devadānavayakṣāṇāṁ gandharvoragarakṣasām।
apradhṛṣyāṁ purīṁ laṅkāṁ rāvaṇena surakṣitām॥
praviṣṭaḥ sattvamāśritya jīvan ko nāma niṣkramet।

‘देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस— इनमें से किसीके लिये भी जिसपर आक्रमण करना असम्भव है तथा जो रावण के द्वारा भलीभाँति सुरक्षित है, उस लङ्कापुरी में अपने बल के भरोसे प्रवेश करके कौन वहाँ से जीवित निकल सकता है?

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॥ ६ · १ · ५ ॥
को विशेत्सुदुराधर्षां राक्षसैश्च सुरक्षिताम्॥ यो वीर्यबलसम्पन्नो समः स्याद्धनूमतः।

ko viśetsudurādharṣāṁ rākṣasaiśca surakṣitām॥
yo vīryabalasampanno na samaḥ syāddhanūmataḥ।

‘जो हनुमान् के समान बल-पराक्रम से सम्पन्न न हो, ऐसा कौन पुरुष राक्षसोंद्वारा सुरक्षित अत्यन्त दुर्जय लङ्का में प्रवेश कर सकता है

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॥ ६ · १ · ६ ॥
भृत्यकार्यं हनुमता सुग्रीवस्य कृतं महत्। एवं विधाय स्वबलं सदृशं विक्रमस्य च॥

bhṛtyakāryaṁ hanumatā sugrīvasya kṛtaṁ mahat।
evaṁ vidhāya svabalaṁ sadṛśaṁ vikramasya ca॥

‘हनुमान् ने समुद्र-लङ्घन आदि कार्यों के द्वारा अपने पराक्रम के अनुरूप बल प्रकट करके एक सच्चे सेवक के योग्य सुग्रीव का बहुत बड़ा कार्य सम्पन्न किया है

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॥ ६ · १ · ७ ॥
यो हि भृत्यो नियुक्तः सन् भर्त्रा कर्मणि दुष्करे। कुर्यात् तदनुरागेण तमाहुः पुरुषोत्तमम्॥

yo hi bhṛtyo niyuktaḥ san bhartrā karmaṇi duṣkare।
kuryāt tadanurāgeṇa tamāhuḥ puruṣottamam॥

‘जो सेवक स्वामी के द्वारा किसी दुष्कर कार्य में नियुक्त होने पर उसे पूरा करके तदनुरूप दूसरे कार्य को भी (यदि वह मुख्य कार्य का विरोधी न हो) सम्पन्न करता है, वह सेवकों में उत्तम कहा गया है

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॥ ६ · १ · ८ ॥
यो नियुक्तः परं कार्यं कुर्यान्नृपतेः प्रियम्। भृत्यो युक्तः समर्थश्च तमाहुर्मध्यमं नरम्॥

yo niyuktaḥ paraṁ kāryaṁ na kuryānnṛpateḥ priyam।
bhṛtyo yuktaḥ samarthaśca tamāhurmadhyamaṁ naram॥

‘जो एक कार्य में नियुक्त होकर योग्यता और सामर्थ्य होने पर भी स्वामी के दूसरे प्रिय कार्य को नहीं करता (स्वामी ने जितना कहा है, उतना ही करके लौट आता है) वह मध्यम श्रेणी का सेवक बताया गया है

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॥ ६ · १ · ९ ॥
नियुक्तो नृपतेः कार्यं कुर्याद् यः समाहितः। भृत्यो युक्तः समर्थश्च तमाहुः पुरुषाधमम्॥

niyukto nṛpateḥ kāryaṁ na kuryād yaḥ samāhitaḥ।
bhṛtyo yuktaḥ samarthaśca tamāhuḥ puruṣādhamam॥

‘जो सेवक मालिक के किसी कार्य में नियुक्त होकर अपने में योग्यता और सामर्थ्य के होते हुए भी उसे सावधानी से पूरा नहीं करता, वह अधम कोटि का कहा गया है

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॥ ६ · १ · १० ॥
तन्नियोगे नियुक्तेन कृतं कृत्यं हनूमता। चात्मा लघुतां नीतः सुग्रीवश्चापि तोषितः॥

tanniyoge niyuktena kṛtaṁ kṛtyaṁ hanūmatā।
na cātmā laghutāṁ nītaḥ sugrīvaścāpi toṣitaḥ॥

‘हनुमान् ने स्वामी के एक कार्य में नियुक्त होकर उसके साथ ही दूसरे महत्त्वपूर्ण कार्यों को भी पूरा किया, अपने गौरव में भी कमी नहीं आने दी—अपने-आपको दूसरों की दृष्टि में छोटा नहीं बनने दिया और सुग्रीव को भी पूर्णतः संतुष्ट कर दिया

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॥ ६ · १ · ११ ॥
अहं रघुवंशश्च लक्ष्मणश्च महाबलः। वैदेह्या दर्शनेनाद्य धर्मतः परिरक्षिताः॥

ahaṁ ca raghuvaṁśaśca lakṣmaṇaśca mahābalaḥ।
vaidehyā darśanenādya dharmataḥ parirakṣitāḥ॥

‘आज हनुमान् ने विदेहनन्दिनी सीता का पता लगाकर—उन्हें अपनी आँखों देखकर धर्म के अनुसार मेरी, समस्त रघुवंश की और महाबली लक्ष्मण की भी रक्षा की है

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॥ ६ · १ · १२ ॥
इदं तु मम दीनस्य मनो भूयः प्रकर्षति। यदिहास्य प्रियाख्यातुर्न कुर्मि सदृशं प्रियम्॥

idaṁ tu mama dīnasya mano bhūyaḥ prakarṣati।
yadihāsya priyākhyāturna kurmi sadṛśaṁ priyam॥

‘आज मेरे पास पुरस्कार देने योग्य वस्तु का अभाव है, यह बात मेरे मन में बड़ी कसक पैदा कर रही है कि यहाँ जिसने मुझे ऐसा प्रिय संवाद सुनाया, उसका मैं कोई वैसा ही प्रिय कार्य नहीं कर पा रहा हूँ

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॥ ६ · १ · १३ ॥
एष सर्वस्वभूतस्तु परिष्वङ्गो हनूमतः। मया कालमिमं प्राप्य दत्तस्तस्य महात्मनः॥

eṣa sarvasvabhūtastu pariṣvaṅgo hanūmataḥ।
mayā kālamimaṁ prāpya dattastasya mahātmanaḥ॥

‘इस समय इन महात्मा हनुमान् को मैं केवल अपना प्रगाढ़ आलिङ्गन प्रदान करता हूँ, क्योंकि यही मेरा सर्वस्व है’

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॥ ६ · १ · १४ ॥
इत्युक्त्वा प्रीतिहृष्टाङ्गो रामस्तं परिष्वजे। हनूमन्तं कृतात्मानं कृतकार्यमुपागतम्॥

ityuktvā prītihṛṣṭāṅgo rāmastaṁ pariṣvaje।
hanūmantaṁ kṛtātmānaṁ kṛtakāryamupāgatam॥

ऐसा कहते-कहते रघुनाथजी के अङ्ग-प्रत्यङ्ग प्रेम से पुलकित हो गये और उन्होंने अपनी आज्ञा के पालन में सफलता पाकर लौटे हुए पवित्रात्मा हनुमान्जी को हृदय से लगा लिया

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॥ ६ · १ · १५ ॥
ध्यात्वा पुनरुवाचेदं वचनं रघुसत्तमः। हरीणामीश्वरस्यापि सुग्रीवस्योपशृण्वतः॥

dhyātvā punaruvācedaṁ vacanaṁ raghusattamaḥ।
harīṇāmīśvarasyāpi sugrīvasyopaśṛṇvataḥ॥

फिर थोड़ी देरतक विचार करके रघुवंश-शिरोमणि श्रीराम ने वानरराज सुग्रीव को सुनाकर यह बात कही—

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॥ ६ · १ · १६ ॥
सर्वथा सुकृतं तावत् सीतायाः परिमार्गणम्। सागरं तु समासाद्य पुनर्नष्टं मनो मम॥

sarvathā sukṛtaṁ tāvat sītāyāḥ parimārgaṇam।
sāgaraṁ tu samāsādya punarnaṣṭaṁ mano mama॥

‘बन्धुओ! सीता की खोज का काम तो सुचारु रूप से सम्पन्न हो गया; किंतु समुद्रतक की दुस्तरता का विचार करके मेरे मन का उत्साह फिर नष्ट हो गया

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॥ ६ · १ · १७ ॥
कथं नाम समुद्रस्य दुष्पारस्य महाम्भसः। हरयो दक्षिणं पारं गमिष्यन्ति समागताः॥

kathaṁ nāma samudrasya duṣpārasya mahāmbhasaḥ।
harayo dakṣiṇaṁ pāraṁ gamiṣyanti samāgatāḥ॥

‘महान् जलराशि से परिपूर्ण समुद्र को पार करना तो बड़ा ही कठिन काम है। यहाँ एकत्र हुए ये वानर समुद्र के दक्षिण तट पर कैसे पहुँचेंगे

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॥ ६ · १ · १८ ॥
यद्यप्येष तु वृत्तान्तो वैदेह्या गदितो मम। समुद्रपारगमने हरीणां किमिवोत्तरम्॥

yadyapyeṣa tu vṛttānto vaidehyā gadito mama।
samudrapāragamane harīṇāṁ kimivottaram॥

‘मेरी सीता ने भी यही संदेह उठाया था, जिसका वृत्तान्त अभी-अभी मुझसे कहा गया है। इन वानरों के समुद्र के पार जाने के विषय में जो प्रश्न खड़ा हुआ है, उसका वास्तविक उत्तर क्या है?’

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॥ ६ · १ · १९ ॥
इत्युक्त्वा शोकसम्भ्रान्तो रामः शत्रुनिबर्हणः। हनूमन्तं महाबाहुस्ततो ध्यानमुपागमत्॥

ityuktvā śokasambhrānto rāmaḥ śatrunibarhaṇaḥ।
hanūmantaṁ mahābāhustato dhyānamupāgamat॥

हनुमान्जी से ऐसा कहकर शत्रुसूदन महाबाहु श्रीराम शोकाकुल होकर बड़ी चिन्ता में पड़ गये

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे प्रथमः सर्गः॥ १ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पहला सर्ग पूरा हुआ॥ १ ॥