वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ८१ · १६ श्लोकाःSarga 81 · 16 ślokas

प्रातःकालके मङ्गलवाद्य-घोषको सुनकर भरतका दुःखी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजीका सभामें आकर मन्त्री आदिको बुलानेके लिये दूत भेजना

मङ्गलवाद्य-निषेध

“मङ्गलवाद्य-निषेध”
॥ २ · ८१ · ४ ॥

प्रभाते सूतमागधैः शङ्खदुन्दुभिभिश्च मङ्गलवाद्येषु घोषत्सु, शोकसंतप्तः श्वेतवस्त्रो भरतः करमुद्यम्य 'नाहं राजा' इति तूर्यघोषं निवारयति, पार्श्वस्थं शत्रुघ्नं प्रति विलपन्; वादकाः शङ्खान् मुष्टींश्च व्रीडिता अवनमयन्ति।

प्रातःकालकी पहली किरणके साथ सूत और मागध शङ्ख फूँककर तथा सोनेके डंडेवाली विशाल दुन्दुभि बजाकर भरतको राजा मानते हुए मङ्गल-वाद्य छेड़ बैठे हैं; पर श्वेत शोक-वस्त्र धारण किये शोकसंतप्त भरत चौंककर एक हाथ उठाये 'मैं राजा नहीं हूँ' पुकारते हुए वाद्योंको रोक रहे हैं — शङ्ख और ढोलकी चोब लिये बजानेवाले सहमकर थम गये हैं; व्यथित भरत अपने गोरे भाई शत्रुघ्नकी ओर मुड़कर विलाप कर रहे हैं। पृष्ठभूमिमें उषा-प्रकाशसे भरा स्वर्णस्तम्भोंवाला राजभवन, चरणोंके पास बिखरे पुष्प।

At first light the court bards and musicians strike up the auspicious morning music — a conch raised to the lips, a great gold-rodded kettle-drum, a press of turbaned attendants — to hail Bharat as king; but the grief-stricken prince, in a plain white mourner's cloth, has started up and thrust out one hand to silence them, crying that he is not the king. Beside him his fair brother Shatrughn turns toward his anguished face, while the conch-blower and the drummer falter, abashed, in the dawn-lit, gold-pillared hall strewn with fallen petals.

॥ २ · ८१ · १ ॥
ततो नान्दीमुखीं रात्रिं भरतं सूतमागधाः। तुष्टुवुः सविशेषज्ञाः स्तवैर्मङ्गलसंस्तवैः

tato nāndīmukhīṁ rātriṁ bharataṁ sūtamāgadhāḥ।
tuṣṭuvuḥ saviśeṣajñāḥ stavairmaṅgalasaṁstavaiḥ ॥

इधर अयोध्या में उस अभ्युदयसूचक रात्रि का थोड़ा-सा ही भाग अवशिष्ट देख स्तुति-कला के विशेषज्ञ सूत और मागधों ने मङ्गलमयी स्तुतियोंद्वारा भरत का स्तवन आरम्भ किया

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॥ २ · ८१ · २ ॥
सुवर्णकोणाभिहतः प्राणदद्यामदुन्दुभिः। दध्मुः शङ्खांश्च शतशो वाद्यांश्चोच्चावचस्वरान्

suvarṇakoṇābhihataḥ prāṇadadyāmadundubhiḥ।
dadhmuḥ śaṅkhāṁśca śataśo vādyāṁścoccāvacasvarān ॥

प्रहर की समाप्ति को सूचित करनेवाली दुन्दुभि सोने के डंडे से आहत होकर बज उठी। बाजे बजानेवालों ने शङ्ख तथा दूसरे-दूसरे नाना प्रकार के सैकड़ों बाजे बजाये

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॥ २ · ८१ · ३ ॥
तूर्यघोषः सुमहान् दिवमापूरयन्निव। भरतं शोकसंतप्तं भूयः शोकैररन्धयत्

sa tūryaghoṣaḥ sumahān divamāpūrayanniva।
bharataṁ śokasaṁtaptaṁ bhūyaḥ śokairarandhayat ॥

वाद्यों का वह महान् तुमुल घोष समस्त आकाश को व्याप्त करता हुआ-सा गूँज उठा और शोकसंतप्त भरत को पुनः शोकाग्नि की आँच से राँधने लगा

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॥ २ · ८१ · ४ ॥
ततः प्रबुद्धो भरतस्तं घोषं संनिवर्त्य च। नाहं राजेति चोक्त्वा तं शत्रुघ्नमिदमब्रवीत्

tataḥ prabuddho bharatastaṁ ghoṣaṁ saṁnivartya ca।
nāhaṁ rājeti coktvā taṁ śatrughnamidamabravīt ॥

वाद्यों की उस ध्वनि से भरत की नींद खुल गयी; वे जाग उठे और ‘मैं राजा नहीं हूँ’ ऐसा कहकर उन्होंने उन बाजों का बजना बंद करा दिया। तत्पश्चात् वे शत्रुघ्न से बोले—

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॥ २ · ८१ · ५ ॥
पश्य शत्रुघ्न कैकेय्या लोकस्यापकृतं महत्। विसृज्य मयि दुःखानि राजा दशरथो गतः

paśya śatrughna kaikeyyā lokasyāpakṛtaṁ mahat।
visṛjya mayi duḥkhāni rājā daśaratho gataḥ ॥

‘शत्रुघ्न! देखो तो सही, कैकेयी ने जगत् का कितना महान् अपकार किया है। महाराज दशरथ मुझपर बहुत-से दुःखों का बोझ डालकर स्वर्गलोक को चले गये

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॥ २ · ८१ · ६ ॥
तस्यैषा धर्मराजस्य धर्ममूला महात्मनः। परिभ्रमति राजश्रीर्नौरिवाकर्णिका जले

tasyaiṣā dharmarājasya dharmamūlā mahātmanaḥ।
paribhramati rājaśrīrnaurivākarṇikā jale ॥

‘आज उन धर्मराज महामना नरेश की यह धर्ममूला राजलक्ष्मी जल में पड़ी हुई बिना नाविक की नौका के समान इधर-उधर डगमगा रही है

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॥ २ · ८१ · ७ ॥
यो हि नः सुमहान् नाथः सोऽपि प्रव्राजितो वने। अनया धर्ममुत्सृज्य मात्रा मे राघवः स्वयम्

yo hi naḥ sumahān nāthaḥ so'pi pravrājito vane।
anayā dharmamutsṛjya mātrā me rāghavaḥ svayam ॥

‘जो हमलोगों के सबसे बड़े स्वामी और संरक्षक हैं, उन श्रीरघुनाथजी को भी स्वयं मेरी इस माता ने धर्म को तिलाञ्जलि देकर वन में भेज दिया’

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॥ २ · ८१ · ८ ॥
इत्येवं भरतं वीक्ष्य विलपन्तमचेतनम्। कृपणा रुरुदुः सर्वाः सुस्वरं योषितस्तदा

ityevaṁ bharataṁ vīkṣya vilapantamacetanam।
kṛpaṇā ruruduḥ sarvāḥ susvaraṁ yoṣitastadā ॥

उस समय भरत को इस प्रकार अचेत हो-होकर विलाप करते देख रनिवास की सारी स्त्रियाँ दीनभाव से फूट-फूटकर रोने लगीं

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॥ २ · ८१ · ९ ॥
तथा तस्मिन् विलपति वसिष्ठो राजधर्मवित्। सभामिक्ष्वाकुनाथस्य प्रविवेश महायशाः

tathā tasmin vilapati vasiṣṭho rājadharmavit।
sabhāmikṣvākunāthasya praviveśa mahāyaśāḥ ॥

जब भरत इस प्रकार विलाप कर रहे थे, उसी समय राजधर्म के ज्ञाता महायशस्वी महर्षि वसिष्ठ ने इक्ष्वाकुनाथ राजा दशरथ के सभाभवन में प्रवेश किया

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॥ २ · ८१ · १० ॥
शातकुम्भमयीं रम्यां मणिहेमसमाकुलाम्। सुधर्मामिव धर्मात्मा सगणः प्रत्यपद्यत

śātakumbhamayīṁ ramyāṁ maṇihemasamākulām।
sudharmāmiva dharmātmā sagaṇaḥ pratyapadyata ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ८१ · ११ ॥
काञ्चनमयं पीठं स्वस्त्यास्तरणसंवृतम्। अध्यास्त सर्ववेदज्ञो दूताननुशशास

sa kāñcanamayaṁ pīṭhaṁ svastyāstaraṇasaṁvṛtam।
adhyāsta sarvavedajño dūtānanuśaśāsa ca ॥

॥ १०–११ ॥

वह सभाभवन अधिकांश सुवर्ण का बना हुआ था। उसमें सोने के खम्भे लगे थे। वह रमणीय सभा देवताओं की सुधर्मा सभा के समान शोभा पाती थी। सम्पूर्ण वेदों के ज्ञाता धर्मात्मा वसिष्ठ ने अपने शिष्यगण के साथ उस सभा में पदार्पण किया और सुवर्णमय पीठ पर जो स्वस्तिकाकार बिछौने से ढका हुआ था, वे विराजमान हुए। आसन ग्रहण करने के पश्चात् उन्होंने दूतों को आज्ञा दी—

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॥ २ · ८१ · १२ ॥
ब्राह्मणान् क्षत्रियान् योधानमात्यान् गणवल्लभान्। क्षिप्रमानयताव्यग्राः कृत्यमात्ययिकं हि नः

brāhmaṇān kṣatriyān yodhānamātyān gaṇavallabhān।
kṣipramānayatāvyagrāḥ kṛtyamātyayikaṁ hi naḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ८१ · १३ ॥
सराजपुत्रं शत्रुघ्नं भरतं यशस्विनम्। युधाजितं सुमन्त्रं ये तत्र हिता जनाः

sarājaputraṁ śatrughnaṁ bharataṁ ca yaśasvinam।
yudhājitaṁ sumantraṁ ca ye ca tatra hitā janāḥ ॥

॥ १२–१३ ॥

‘तुमलोग शान्तभाव से जाकर ब्राह्मणों, क्षत्रियों, योद्धाओं, अमात्यों और सेनापतियों को शीघ्र बुला लाओ। अन्य राजकुमारों के साथ यशस्वी भरत और शत्रुघ्न को, मन्त्री युधाजित् और सुमन्त्र को तथा और भी जो हितैषी पुरुष वहाँ हों उन सबको शीघ्र बुलाओ। हमें उनसे बहुत ही आवश्यक कार्य है’

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॥ २ · ८१ · १४ ॥
ततो हलहलाशब्दो महान् समुदपद्यत। रथैरश्वैर्गजैश्चापि जनानामुपगच्छताम्

tato halahalāśabdo mahān samudapadyata।
rathairaśvairgajaiścāpi janānāmupagacchatām ॥

तदनन्तर घोड़े, हाथी और रथों से आनेवाले लोगों का महान् कोलाहल आरम्भ हुआ

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॥ २ · ८१ · १५ ॥
ततो भरतमायान्तं शतक्रतुमिवामराः। प्रत्यनन्दन् प्रकृतयो यथा दशरथं तथा

tato bharatamāyāntaṁ śatakratumivāmarāḥ।
pratyanandan prakṛtayo yathā daśarathaṁ tathā ॥

तत्पश्चात् जैसे देवता इन्द्र का अभिनन्दन करते हैं, उसी प्रकार समस्त प्रकृतियों (मन्त्री-प्रजा आदि) ने आते हुए भरत का राजा दशरथ की ही भाँति अभिनन्दन किया

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॥ २ · ८१ · १६ ॥
हृद इव तिमिनागसंवृतः स्तिमितजलो मणिशङ्खशर्करः। दशरथसुतशोभिता सभा सदशरथेव बभूव सा पुरा

hṛda iva timināgasaṁvṛtaḥ
stimitajalo maṇiśaṅkhaśarkaraḥ।
daśarathasutaśobhitā sabhā
sadaśaratheva babhūva sā purā ॥

तिमि नामक महान् मत्स्य और जलहस्ती से युक्त, स्थिर जलवाले तथा मुक्ता आदि मणियों से युक्त शङ्ख और बालुकावाले समुद्र के जलाशय की भाँति वह सभा दशरथपुत्र भरत से सुशोभित होकर वैसी ही शोभा पाने लगी, जैसे पूर्वकाल में राजा दशरथ की उपस्थिति से शोभा पाती थी*

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकाशीतितमः सर्गः ॥ ८१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें इक्यासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८१ ॥