वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ८० · २२ श्लोकाःSarga 80 · 22 ślokas

अयोध्यासे गङ्गातटतक सुरम्य शिविर और कूप आदिसे युक्त सुखद राजमार्गका निर्माण

गङ्गापथ-निर्माण

“गङ्गापथ-निर्माण”
॥ २ · ८० · ४–१२ ॥

अयोध्यातो गङ्गातटपर्यन्तं विशालं राजमार्गं निर्मान्ति शिल्पिनः — केचित् सूत्रैः भूमिं मिमते, केचित् वेदिकामण्डितान् कूपान् खनन्ति, अन्ये कुद्दालैः पथं समीकुर्वन्ति; दूरे गङ्गा रजतरेखेव विभाति, पार्श्वे पताकाध्वजमण्डिताः निवेशाः शक्रपुरमिव शोभन्ते।

स्वर्णिम दिवसालोक में अयोध्या से गङ्गातट तक जाता विशाल राजमार्ग बन रहा है; अग्रभाग में शिल्पी सूत्र तानकर भूमि नापते हैं, कुछ कारीगर घड़ेसे जल खींचते हुए वेदिका-मण्डित कूप खोदते हैं, तो अन्य श्रमिक कुदाल-फावड़ोंसे मार्ग को समतल कर पक्का कर रहे हैं; दूर क्षितिज पर गङ्गा रजत-रेखा-सी झलमला रही है, और मार्ग के किनारे पताका-मण्डित देवालय एवं विश्राम-शिविर इन्द्रपुरी की भाँति शोभा पा रहे हैं।

Under warm golden daylight the vast royal road from Ayodhya to the Ganga takes shape: in the foreground surveyors stretch measuring cords across the earth while labourers draw water from a fresh stone well ringed by its platform, and gangs of workmen level and pave the broad highway with mattocks and spades; far off on the horizon the Ganga glimmers like a thread of silver, and along the verges banner-crowned shrines and rest-camps rise splendid as the city of Indra.

॥ २ · ८० · १ ॥
अथ भूमिप्रदेशज्ञाः सूत्रकर्मविशारदाः। स्वकर्माभिरताः शूराः खनका यन्त्रकास्तथा

atha bhūmipradeśajñāḥ sūtrakarmaviśāradāḥ।
svakarmābhiratāḥ śūrāḥ khanakā yantrakāstathā ॥

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॥ २ · ८० · २ ॥
कर्मान्तिकाः स्थपतयः पुरुषा यन्त्रकोविदाः। तथा वर्धकयश्चैव मार्गिणो वृक्षतक्षकाः

karmāntikāḥ sthapatayaḥ puruṣā yantrakovidāḥ।
tathā vardhakayaścaiva mārgiṇo vṛkṣatakṣakāḥ ॥

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॥ २ · ८० · ३ ॥
सूपकाराः सुधाकारा वंशचर्मकृतस्तथा। समर्था ये द्रष्टारः पुरतश्च प्रतस्थिरे

sūpakārāḥ sudhākārā vaṁśacarmakṛtastathā।
samarthā ye ca draṣṭāraḥ purataśca pratasthire ॥

॥ १–३ ॥

तत्पश्चात् ऊँची-नीची एवं सजल-निर्जल भूमि का ज्ञान रखनेवाले, सूत्रकर्म (छावनी आदि बनाने के लिये सूत धारण करने) में कुशल, मार्ग की रक्षा आदि अपने कर्म में सदा सावधान रहनेवाले शूर-वीर, भूमि खोदने या सुरङ्ग आदि बनानेवाले, नदी आदि पार करने के लिये तुरंत साधन उपस्थित करनेवाले अथवा जल के प्रवाह को रोकनेवाले वेतनभोगी कारीगर, थवई, रथ और यन्त्र आदि बनानेवाले पुरुष, बढ़ई, मार्गरक्षक, पेड़ काटनेवाले, रसोइये, चूने से पोतने आदि का काम करनेवाले, बाँस की चटाई और सूप आदि बनानेवाले, चमड़े का चारजामा आदि बनानेवाले तथा रास्ते की विशेष जानकारी रखनेवाले सामर्थ्यशाली पुरुषों ने पहले प्रस्थान किया

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॥ २ · ८० · ४ ॥
तु हर्षात् तमुद्देशं जनौघो विपुलः प्रयान्। अशोभत महावेगः सागरस्येव पर्वणि

sa tu harṣāt tamuddeśaṁ janaugho vipulaḥ prayān।
aśobhata mahāvegaḥ sāgarasyeva parvaṇi ॥

उस समय मार्ग ठीक करने के लिये एक विशाल जनसमुदाय बड़े हर्ष के साथ वनप्रदेश की ओर अग्रसर हुआ, जो पूर्णिमा के दिन उमड़े हुए समुद्र के महान् वेग की भाँति शोभा पा रहा था

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॥ २ · ८० · ५ ॥
ते स्ववारं समास्थाय वर्त्मकर्मणि कोविदाः। करणैर्विविधोपेतैः पुरस्तात् सम्प्रतस्थिरे

te svavāraṁ samāsthāya vartmakarmaṇi kovidāḥ।
karaṇairvividhopetaiḥ purastāt sampratasthire ॥

वे मार्ग-निर्माण में निपुण कारीगर अपना-अपना दल साथ लेकर अनेक प्रकार के औजारों के साथ आगे चल दिये

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॥ २ · ८० · ६ ॥
लता वल्लीश्च गुल्मांश्च स्थाणूनश्मन एव च। जनास्ते चक्रिरे मार्गं छिन्दन्तो विविधान् द्रुमान्

latā vallīśca gulmāṁśca sthāṇūnaśmana eva ca।
janāste cakrire mārgaṁ chindanto vividhān drumān ॥

वे लोग लताएँ, बेलें, झाड़ियाँ, ठूँठे वृक्ष तथा पत्थरों को हटाते और नाना प्रकार के वृक्षों को काटते हुए मार्ग तैयार करने लगे

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॥ २ · ८० · ७ ॥
अवृक्षेषु देशेषु केचिद् वृक्षानरोपयन्। केचित् कुठारैष्टङ्कैश्च दात्रैश्छिन्दन् क्वचित् क्वचित्

avṛkṣeṣu ca deśeṣu kecid vṛkṣānaropayan।
kecit kuṭhāraiṣṭaṅkaiśca dātraiśchindan kvacit kvacit ॥

जिन स्थानों में वृक्ष नहीं थे, वहाँ कुछ लोगों ने वृक्ष भी लगाये। कुछ कारीगरों ने कुल्हाड़ों, टंकों (पत्थर तोड़ने के औजारों) तथा हँसियों से कहीं-कहीं वृक्षों और घासों को काट-काटकर रास्ता साफ किया

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॥ २ · ८० · ८ ॥
अपरे वीरणस्तम्बान् बलिनो बलवत्तराः। विधमन्ति स्म दुर्गाणि स्थलानि ततस्ततः

apare vīraṇastambān balino balavattarāḥ।
vidhamanti sma durgāṇi sthalāni ca tatastataḥ ॥

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॥ २ · ८० · ९ ॥
अपरेऽपूरयन् कूपान् पांसुभिः श्वभ्रमायतम्। निम्नभागांस्तथैवाशु समांश्चक्रुः समन्ततः

apare'pūrayan kūpān pāṁsubhiḥ śvabhramāyatam।
nimnabhāgāṁstathaivāśu samāṁścakruḥ samantataḥ ॥

॥ ८–९ ॥

अन्य प्रबल मनुष्यों ने जिनकी जड़ें नीचेतक जमी हुई थीं, उन कुश, कास आदि के झुरमुटों को हाथों से ही उखाड़ फेंका। वे जहाँ-तहाँ ऊँचे-नीचे दुर्गम स्थानों को खोद-खोदकर बराबर कर देते थे। दूसरे लोग कुओं और लंबे-चौड़े गड्ढों को धूलों से ही पाट देते थे। जो स्थान नीचे होते, वहाँ सब ओर से मिट्टी डालकर वे उन्हें शीघ्र ही बराबर कर देते थे

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॥ २ · ८० · १० ॥
बबन्धुर्बन्धनीयांश्च क्षोद्यान् संचुक्षुदुस्तथा। बिभिदुर्भेदनीयांश्च तांस्तान् देशान् नरास्तदा

babandhurbandhanīyāṁśca kṣodyān saṁcukṣudustathā।
bibhidurbhedanīyāṁśca tāṁstān deśān narāstadā ॥

उन्होंने जहाँ पुल बाँधने के योग्य पानी देखा, वहाँ पुल बाँध दिये। जहाँ कँकरीली जमीन दिखायी दी, वहाँ उसे ठोक-पीटकर मुलायम कर दिया और जहाँ पानी बहने के लिये मार्ग बनाना आवश्यक समझा, वहाँ बाँध काट दिया। इस प्रकार विभिन्न देशों में वहाँ की आवश्यकता के अनुसार कार्य किया

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॥ २ · ८० · ११ ॥
अचिरेण तु कालेन परिवाहान् बहूदकान्। चक्रुर्बहुविधाकारान् सागरप्रतिमान् बहून्

acireṇa tu kālena parivāhān bahūdakān।
cakrurbahuvidhākārān sāgarapratimān bahūn ॥

छोटे-छोटे सोतों को, जिनका पानी सब ओर बह जाया करता था, चारों ओर से बाँधकर शीघ्र ही अधिक जलवाला बना दिया। इस तरह थोड़े ही समय में उन्होंने भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार के बहुत-से सरोवर तैयार कर दिये, जो अगाध जल से भरे होने के कारण समुद्र के समान जान पड़ते थे

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॥ २ · ८० · १२ ॥
निर्जलेषु देशेषु खानयामासुरुत्तमान्। उदपानान् बहुविधान् वेदिकापरिमण्डितान्

nirjaleṣu ca deśeṣu khānayāmāsuruttamān।
udapānān bahuvidhān vedikāparimaṇḍitān ॥

निर्जल स्थानों में नाना प्रकार के अच्छे-अच्छे कुएँ और बावड़ी आदि बनवा दिये, जो आस-पास बनी हुई वेदिकाओं से अलंकृत थे

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॥ २ · ८० · १३ ॥
ससुधाकुट्टिमतलः प्रपुष्पिततमहीरुहः। मत्तोद्घुष्टद्विजगणः पताकाभिरलंकृतः

sasudhākuṭṭimatalaḥ prapuṣpitatamahīruhaḥ।
mattodghuṣṭadvijagaṇaḥ patākābhiralaṁkṛtaḥ ॥

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॥ २ · ८० · १४ ॥
चन्दनोदकसंसिक्तो नानाकुसुमभूषितः। बह्वशोभत सेनायाः पन्थाः सुरपथोपमः

candanodakasaṁsikto nānākusumabhūṣitaḥ।
bahvaśobhata senāyāḥ panthāḥ surapathopamaḥ ॥

॥ १३–१४ ॥

इस प्रकार सेना का वह मार्ग देवताओं के मार्ग की भाँति अधिक शोभा पाने लगा। उसकी भूमि पर चूना-सुर्खी और कंकरीट बिछाकर उसे कूट-पीटकर पक्का कर दिया गया था। उसके किनारे-किनारे फूलों से सुशोभित वृक्ष लगाये गये थे। वहाँ के वृक्षों पर मतवाले पक्षी चहक रहे थे। सारे मार्ग को पताकाओं से सजा दिया गया था, उसपर चन्दनमिश्रित जल का छिड़काव किया गया था तथा अनेक प्रकार के फूलों से वह सड़क सजायी गयी थी

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॥ २ · ८० · १५ ॥
आज्ञाप्याथ यथाज्ञप्ति युक्तास्तेऽधिकृता नराः। रमणीयेषु देशेषु बहुस्वादुफलेषु

ājñāpyātha yathājñapti yuktāste'dhikṛtā narāḥ।
ramaṇīyeṣu deśeṣu bahusvāduphaleṣu ca ॥

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॥ २ · ८० · १६ ॥
यो निवेशस्त्वभिप्रेतो भरतस्य महात्मनः। भूयस्तं शोभयामासुर्भूषाभिर्भूषणोपमम्

yo niveśastvabhipreto bharatasya mahātmanaḥ।
bhūyastaṁ śobhayāmāsurbhūṣābhirbhūṣaṇopamam ॥

॥ १५–१६ ॥

मार्ग बन जाने पर जहाँ-तहाँ छावनी आदि बनाने के लिये जिन्हें अधिकार दिया गया था, कार्य में दत्त-चित्त रहनेवाले उन लोगों ने भरत की आज्ञा के अनुसार सेवकों को काम करने का आदेश देकर जहाँ स्वादिष्ट फलों की अधिकता थी उन सुन्दर प्रदेशों में छावनियाँ बनवायीं और जो भरत को अभीष्ट था, मार्ग के भूषणरूप उस शिविर को नाना प्रकार के अलंकारों से और भी सजा दिया

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॥ २ · ८० · १७ ॥
नक्षत्रेषु प्रशस्तेषु मुहूर्तेषु तद्विदः। निवेशान् स्थापयामासुर्भरतस्य महात्मनः

nakṣatreṣu praśasteṣu muhūrteṣu ca tadvidaḥ।
niveśān sthāpayāmāsurbharatasya mahātmanaḥ ॥

वास्तु-कर्म के ज्ञाता विद्वानों ने उत्तम नक्षत्रों और मुहूर्तों में महात्मा भरत के ठहरने के लिये जो-जो स्थान बने थे, उनकी प्रतिष्ठा करवायी

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॥ २ · ८० · १८ ॥
बहुपांसुचयाश्चापि परिखाः परिवारिताः। तत्रेन्द्रनीलप्रतिमाः प्रतोलीवरशोभिताः

bahupāṁsucayāścāpi parikhāḥ parivāritāḥ।
tatrendranīlapratimāḥ pratolīvaraśobhitāḥ ॥

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॥ २ · ८० · १९ ॥
प्रासादमालासंयुक्ताः सौधप्राकारसंवृताः। पताकाशोभिताः सर्वे सुनिर्मितमहापथाः

prāsādamālāsaṁyuktāḥ saudhaprākārasaṁvṛtāḥ।
patākāśobhitāḥ sarve sunirmitamahāpathāḥ ॥

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॥ २ · ८० · २० ॥
विसर्पद्भिरिवाकाशे विटङ्काग्रविमानकैः। समुच्छ्रितैर्निवेशास्ते बभुः शक्रपुरोपमाः

visarpadbhirivākāśe viṭaṅkāgravimānakaiḥ।
samucchritairniveśāste babhuḥ śakrapuropamāḥ ॥

॥ १८–२० ॥

मार्ग में बने हुए वे निवेश (विश्राम-स्थान) इन्द्रपुरी के समान शोभा पाते थे। उनके चारों ओर खाइयाँ खोदी गयी थीं, धूल-मिट्टी के ऊँचे ढेर लगाये गये थे। खेमों के भीतर इन्द्रनीलमणि की बनी हुई प्रतिमाएँ सजायी गयी थीं। गलियों और सड़कों से उनकी विशेष शोभा होती थी। राजकीय गृहों और देवस्थानों से युक्त वे शिविर चूने पुते हुए प्राकारों (चहारदीवारियों) से घिरे थे। सभी विश्रामस्थान पताकाओं से सुशोभित थे। सर्वत्र बड़ी-बड़ी सड़कों का सुन्दर ढंग से निर्माण किया गया था। विटङ्कों (कबूतरों के रहने के स्थानों—कावकों) और ऊँचे-ऊँचे श्रेष्ठ विमानों के कारण उन सभी शिविरों की बड़ी शोभा हो रही थी

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॥ २ · ८० · २१ ॥
जाह्नवीं तु समासाद्य विविधद्रुमकाननाम्। शीतलामलपानीयां महामीनसमाकुलाम्

jāhnavīṁ tu samāsādya vividhadrumakānanām।
śītalāmalapānīyāṁ mahāmīnasamākulām ॥

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॥ २ · ८० · २२ ॥
सचन्द्रतारागणमण्डितं यथा नभः क्षपायाममलं विराजते। नरेन्द्रमार्गः तदा व्यराजत क्रमेण रम्यः शुभशिल्पिनिर्मितः

sacandratārāgaṇamaṇḍitaṁ yathā
nabhaḥ kṣapāyāmamalaṁ virājate।
narendramārgaḥ sa tadā vyarājata
krameṇa ramyaḥ śubhaśilpinirmitaḥ ॥

॥ २१–२२ ॥

नाना प्रकार के वृक्षों और वनों से सुशोभित, शीतल निर्मल जल से भरी हुई और बड़े-बड़े मत्स्यों से व्याप्त गङ्गा के किनारेतक बना हुआ वह रमणीय राजमार्ग उस समय बड़ी शोभा पा रहा था। अच्छे कारीगरों ने उसका निर्माण किया था। रात्रि के समय वह चन्द्रमा और तारागणों से मण्डित निर्मल आकाश के समान सुशोभित होता था

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽशीतितमः सर्गः ॥ ८० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अस्सीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८० ॥