मन्त्री आदिका भरतसे राज्य ग्रहण करनेके लिये प्रस्ताव तथा भरतका अभिषेक-सामग्रीकी परिक्रमा करके श्रीरामको ही राज्यका अधिकारी बताकर उन्हें लौटा लानेके लिये चलनेके निमित्त व्यवस्था करनेकी सबको आज्ञा देना
“भरत-राज्यत्याग”
॥ २ · ७९ · ६–८ ॥
श्वेतशोकवस्त्रधरो भरतः, कलश-श्वेतच्छत्र-चामर-मुकुटादिकम् अभिषेकसम्भारं प्रदक्षिणीकृत्य, उत्थितकरेण तस्मात् परावृत्तः, दृढव्रतः 'ज्येष्ठो रामः एव राजा भविष्यति' इति प्रवदति; परितः प्रसारितहस्ता वृद्धामात्याः राज्यग्रहणाय याचन्ते।
श्वेत शोक-वस्त्रधारी युवा भरत अभिषेककी सुनहरी सामग्री — कलशोंकी पंक्ति, श्वेत राजछत्र, चँवर और रत्नजटित मुकुट — की परिक्रमा करके उससे मुख मोड़ लेते हैं; एक हाथ उठाकर राज्य अस्वीकार करते हुए, शोकके बीच भी दृढ़ मुखसे वे घोषित करते हैं कि सिंहासन तो केवल ज्येष्ठ श्रीरामका है और वे स्वयं वनमें जाकर उन्हें लौटा लाएँगे; पास खड़े श्वेतकेश वृद्ध मन्त्री हाथ फैलाकर उन्हें राज्य ग्रहण करनेकी प्रार्थना कर रहे हैं।
Clad in the plain white of mourning, the young prince Bharat turns away from the gleaming coronation regalia he has just circumambulated — the row of golden water-jars, the white royal parasol, the fly-whisks and the jewelled crown upon its crimson cushion — one palm raised in refusal; resolute through his grief, he declares before the assembled ministers that the throne belongs to his elder brother Ram alone, vowing to go to the forest and bring him home, while the grey-haired elder councillors around him stretch out their hands, entreating him to take the kingdom.
tataḥ prabhātasamaye divase'tha caturdaśe।
sametya rājakartāro bharataṁ vākyamabruvan ॥
तदनन्तर चौदहवें दिन प्रातःकाल समस्त राजकर्मचारी मिलकर भरत से इस प्रकार बोले—
English translation coming soon.
gato daśarathaḥ svargaṁ yo no gurutaro guruḥ।
rāmaṁ pravrājya vai jyeṣṭhaṁ lakṣmaṇaṁ ca mahābalam ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
tvamadya bhava no rājā rājaputro mahāyaśaḥ।
saṁgatyā nāparādhnoti rājyametadanāyakam ॥
‘महायशस्वी राजकुमार! जो हमारे सर्वश्रेष्ठ गुरु थे, वे महाराज दशरथ तो अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण को वन में भेजकर स्वयं स्वर्गलोक को चले गये, अब इस राज्य का कोई स्वामी नहीं है; इसलिये अब आप ही हमारे राजा हों। आपके बड़े भाई को स्वयं महाराज ने वनवास की आज्ञा दी और आपको यह राज्य प्रदान किया! अतः आपका राजा होना न्यायसङ्गत है। इस सङ्गति के कारण ही आप राज्य को अपने अधिकार में लेकर किसीके प्रति कोई अपराध नहीं कर रहे हैं
English translation coming soon.
ābhiṣecanikaṁ sarvamidamādāya rāghava।
pratīkṣate tvāṁ svajanaḥ śreṇayaśca nṛpātmaja ॥
‘राजकुमार रघुनन्दन! ये मन्त्री आदि स्वजन, पुरवासी तथा सेठलोग अभिषेक की सब सामग्री लेकर आपकी राह देखते हैं
English translation coming soon.
rājyaṁ gṛhāṇa bharata pitṛpaitāmahaṁ dhruvam।
abhiṣecaya cātmānaṁ pāhi cāsmān nararṣabha ॥
‘भरतजी! आप अपने माता-पितामहों के इस राज्य को अवश्य ग्रहण कीजिये। नरश्रेष्ठ! राजा के पद पर अपना अभिषेक कराइये और हमलोगों की रक्षा कीजिये’
English translation coming soon.
ābhiṣecanikaṁ bhāṇḍaṁ kṛtvā sarvaṁ pradakṣiṇam।
bharatastaṁ janaṁ sarvaṁ pratyuvāca dhṛtavrataḥ ॥
यह सुनकर उत्तम व्रत को धारण करनेवाले भरत ने अभिषेक के लिये रखी हुई कलश आदि सब सामग्री को प्रदक्षिणा की और वहाँ उपस्थित हुए सब लोगों को इस प्रकार उत्तर दिया—
English translation coming soon.
jyeṣṭhasya rājatā nityamucitā hi kulasya naḥ।
naivaṁ bhavanto māṁ vaktumarhanti kuśalā janāḥ ॥
‘सज्जनो! आपलोग बुद्धिमान् हैं, आपको मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। हमारे कुल में सदा ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का अधिकारी होता आया है और यही उचित भी है
English translation coming soon.
rāmaḥ pūrvo hi no bhrātā bhaviṣyati mahīpatiḥ।
ahaṁ tvaraṇye vatsyāmi varṣāṇi nava pañca ca ॥
‘श्रीरामचन्द्रजी हमलोगों के बड़े भाई हैं, अतः वे ही राजा होंगे। उनके बदले मैं ही चौदह वर्षोंतक वन में निवास करूँगा
English translation coming soon.
yujyatāṁ mahatī senā caturaṅgamahābalā।
ānayiṣyāmyahaṁ jyeṣṭhaṁ bhrātaraṁ rāghavaṁ vanāt ॥
‘आपलोग विशाल चतुरङ्गिणी सेना, जो सब प्रकार से सबल हो, तैयार कीजिये। मैं अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रजी को वन से लौटा लाऊँगा
English translation coming soon.
ābhiṣecanikaṁ caiva sarvametadupaskṛtam।
puraskṛtya gamiṣyāmi rāmahetorvanaṁ prati ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
tatraiva taṁ naravyāghramabhiṣicya puraskṛtam।
ānayiṣyāmi vai rāmaṁ havyavāhamivādhvarāt ॥
‘अभिषेक के लिये संचित हुई इस सारी सामग्री को आगे करके मैं श्रीराम से मिलने के लिये वन में चलूँगा और उन नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी का वहीं अभिषेक करके यज्ञ से लायी जानेवाली अग्नि के समान उन्हें आगे करके अयोध्या में ले आऊँगा
English translation coming soon.
na sakāmāṁ kariṣyāmi svāmimāṁ mātṛgandhinīm।
vane vatsyāmyahaṁ durge rāmo rājā bhaviṣyati ॥
‘परंतु जिसमें लेशमात्र मातृभाव शेष है, अपनी माता कहलानेवाली इस कैकेयी को मैं कदापि सफलमनोरथ नहीं होने दूँगा। श्रीराम यहाँ के राजा होंगे और मैं दुर्गम वन में निवास करूँगा
English translation coming soon.
kriyatāṁ śilpibhiḥ panthāḥ samāni viṣamāṇi ca।
rakṣiṇaścānusaṁyāntu pathi durgavicārakāḥ ॥
‘कारीगर आगे जाकर रास्ता बनायें, ऊँची-नीची भूमि को बराबर करें तथा मार्ग में दुर्गम स्थानों की जानकारी रखनेवाले रक्षक भी साथ-साथ चलें’
English translation coming soon.
evaṁ sambhāṣamāṇaṁ taṁ rāmahetornṛpātmajam।
pratyuvāca janaḥ sarvaḥ śrīmad vākyamanuttamam ॥
श्रीरामचन्द्रजी के लिये ऐसी बातें कहते हुए राजकुमार भरत से वहाँ आये हुए सब लोगों ने इस प्रकार सुन्दर एवं परम उत्तम बात कही—
English translation coming soon.
evaṁ te bhāṣamāṇasya padmā śrīrupatiṣṭhatām।
yastvaṁ jyeṣṭhe nṛpasute pṛthivīṁ dātumicchasi ॥
‘भरतजी! ऐसे उत्तम वचन कहनेवाले आपके पास कमलवन में निवास करनेवाली लक्ष्मी अवस्थित हों; क्योंकि आप राजा के ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को स्वयं ही इस पृथिवी का राज्य लौटा देना चाहते हैं’
English translation coming soon.
anuttamaṁ tadvacanaṁ nṛpātmajaḥ
prabhāṣitaṁ saṁśravaṇe niśamya ca।
praharṣajāstaṁ prati bāṣpabindavo
nipeturāryānananetrasambhavāḥ ॥
उन लोगों का कहा हुआ वह परम उत्तम आशीर्वचन जब कान में पड़ा, तब उसे सुनकर राजकुमार भरत को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन सबकी ओर देखकर भरत के मुखमण्डल में सुशोभित होनेवाले नेत्रों से हर्षजनित आँसुओं की बूँदें गिरने लगीं
English translation coming soon.
ūcuste vacanamidaṁ niśamya hṛṣṭāḥ
sāmātyāḥ sapariṣado viyātaśokāḥ।
panthānaṁ naravarabhaktimān janaśca
vyādiṣṭastava vacanācca śilpivargaḥ ॥
भरत के मुख से श्रीराम को ले आने की बात सुनकर उस सभा के सभी सदस्यों और मन्त्रियोंसहित समस्त राजकर्मचारी हर्ष से खिल उठे। उनका सारा शोक दूर हो गया और वे भरत से बोले— ‘नरश्रेष्ठ! आपकी आज्ञा के अनुसार राजपरिवार के प्रति भक्तिभाव रखनेवाले कारीगरों और रक्षकों को मार्ग ठीक करने के लिये भेज दिया गया है’
English translation coming soon.
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनाशीतितमः सर्गः ॥ ७९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उन्नासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७९ ॥