वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ७८ · २६ श्लोकाःSarga 78 · 26 ślokas

शत्रुघ्नका रोष, उनका कुब्जाको घसीटना और भरतजीके कहनेसे उसे मूर्च्छित अवस्थामें छोड़ देना

शत्रुघ्न-कोप · कुब्जा-कर्षण

“शत्रुघ्न-कोप · कुब्जा-कर्षण”
॥ २ · ७८ · १६–२१ ॥

क्रोधसंवीतः शत्रुघ्नः कुब्जां मन्थरां भूतले बलाद् विकर्षति, तस्याः चन्दनलिप्ताङ्गे राजभूषणानि भग्नानि सर्वतो विकीर्यन्ते; पार्श्वस्थो भरतः 'अवध्याः प्रमदाः क्षम्यताम्' इति करं प्रसार्य निवारयति।

राजभवनके संगमरमरी आँगनमें गौरवर्ण शत्रुघ्न रोषसे भरकर कुब्जा मन्थराको एक बाँहसे पकड़कर भूमिपर घसीट रहे हैं; वह भय और पीड़ासे चीख उठी है, उसका दूसरा हाथ बचावके लिये फैला हुआ है, और उसके चन्दन-चर्चित अंगोंपर सजे राजसी आभूषण टूट-टूटकर फर्शपर बिखर गये हैं। पासमें खड़े श्यामवर्ण भरत हाथ उठाकर उन्हें रोकते हुए कहते प्रतीत होते हैं—'स्त्रियाँ अवध्य हैं, इसे क्षमा कर दो।'

On the marble floor of the palace hall, the fair prince Shatrughna, blazing with wrath, has seized the hunchbacked maid Manthara by one arm and drags her across the ground; she shrieks in terror, her free hand flung out in appeal, as the royal ornaments heaped on her sandal-anointed limbs snap loose and scatter in a glinting trail of gold. Beside them the dusky Bharat thrusts out a restraining hand—women must not be slain; let her be spared.

॥ २ · ७८ · १ ॥
अथ यात्रां समीहन्तं शत्रुघ्नो लक्ष्मणानुजः। भरतं शोकसंतप्तमिदं वचनमब्रवीत्

atha yātrāṁ samīhantaṁ śatrughno lakṣmaṇānujaḥ।
bharataṁ śokasaṁtaptamidaṁ vacanamabravīt ॥

तेरहवें दिन का कार्य पूर्ण करके श्रीरामचन्द्रजी के पास जाने का विचार करते हुए शोकसंतप्त भरत से लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्ने इस प्रकार कहा—

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॥ २ · ७८ · २ ॥
गतिर्यः सर्वभूतानां दुःखे किं पुनरात्मनः। रामः सत्त्वसम्पन्नः स्त्रिया प्रव्राजितो वनम्

gatiryaḥ sarvabhūtānāṁ duḥkhe kiṁ punarātmanaḥ।
sa rāmaḥ sattvasampannaḥ striyā pravrājito vanam ॥

‘भैया! जो दुःख के समय अपने तथा आत्मीयजनों के लिये तो बात ही क्या है, समस्त प्राणियों को भी सहारा देनेवाले हैं, वे सत्त्वगुणसम्पन्न श्रीराम एक स्त्री के द्वारा वन में भेज दिये गये (यह कितने खेद की बात है)!

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॥ २ · ७८ · ३ ॥
बलवान् वीर्यसम्पन्नो लक्ष्मणो नाम योऽप्यसौ। किं मोचयते रामं कृत्वापि पितृनिग्रहम्

balavān vīryasampanno lakṣmaṇo nāma yo'pyasau।
kiṁ na mocayate rāmaṁ kṛtvāpi pitṛnigraham ॥

‘तथा वे जो बल और पराक्रम से सम्पन्न लक्ष्मण नामधारी शूरवीर हैं, उन्होंने भी कुछ नहीं किया। मैं पूछता हूँ कि उन्होंने पिता को कैद करके भी श्रीराम को इस संकट से क्यों नहीं छुड़ाया?

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॥ २ · ७८ · ४ ॥
पूर्वमेव तु विग्राह्यः समवेक्ष्य नयानयौ। उत्पथं यः समारूढो नार्या राजा वशं गतः

pūrvameva tu vigrāhyaḥ samavekṣya nayānayau।
utpathaṁ yaḥ samārūḍho nāryā rājā vaśaṁ gataḥ ॥

‘जब राजा एक नारी के वश में होकर बुरे मार्ग पर आरूढ़ हो चुके थे, तब न्याय और अन्याय का विचार करके उन्हें पहले ही कैद कर लेना चाहिये था’

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॥ २ · ७८ · ५ ॥
इति सम्भाषमाणे तु शत्रुघ्ने लक्ष्मणानुजे। प्राग्द्वारेऽभूत् तदा कुब्जा सर्वाभरणभूषिता

iti sambhāṣamāṇe tu śatrughne lakṣmaṇānuje।
prāgdvāre'bhūt tadā kubjā sarvābharaṇabhūṣitā ॥

लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्न जब इस प्रकार रोष में भरकर बोल रहे थे, उसी समय कुब्जा समस्त आभूषणों से विभूषित हो उस राजभवन के पूर्वद्वार पर आकर खड़ी हो गयी

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॥ २ · ७८ · ६ ॥
लिप्ता चन्दनसारेण राजवस्त्राणि बिभ्रती। विविधं विविधैस्तैस्तैर्भूषणैश्च विभूषिता

liptā candanasāreṇa rājavastrāṇi bibhratī।
vividhaṁ vividhaistaistairbhūṣaṇaiśca vibhūṣitā ॥

उसके अङ्गों में उत्तमोत्तम चन्दन का लेप लगा हुआ था तथा वह राजरानियों के पहनने योग्य विविध वस्त्र धारण करके भाँति-भाँति के आभूषणों से सज-धजकर वहाँ आयी थी

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॥ २ · ७८ · ७ ॥
मेखलादामभिश्चित्रैरन्यैश्च वरभूषणैः। बभासे बहुभिर्बद्धा रज्जुबद्धेव वानरी

mekhalādāmabhiścitrairanyaiśca varabhūṣaṇaiḥ।
babhāse bahubhirbaddhā rajjubaddheva vānarī ॥

करधनी की विचित्र लड़ियों तथा अन्य बहुसंख्यक सुन्दर अलंकारों से अलंकृत हो वह बहुत-सी रस्सियों में बँधी हुई वानरी के समान जान पड़ती थी

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॥ २ · ७८ · ८ ॥
तां समीक्ष्य तदा द्वाःस्थो भृशं पापस्य कारिणीम्। गृहीत्वाकरुणं कुब्जां शत्रुघ्नाय न्यवेदयत्

tāṁ samīkṣya tadā dvāḥstho bhṛśaṁ pāpasya kāriṇīm।
gṛhītvākaruṇaṁ kubjāṁ śatrughnāya nyavedayat ॥

वही सारी बुराइयों की जड़ थी। वही श्रीराम के वनवासरूपी पाप का मूल कारण थी। उसपर दृष्टि पड़ते ही द्वारपाल ने उसे पकड़ लिया और बड़ी निर्दयता के साथ घसीट लाकर शत्रुघ्न के हाथ में देते हुए कहा—

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॥ २ · ७८ · ९ ॥
यस्याः कृते वने रामो न्यस्तदेहश्च वः पिता। सेयं पापा नृशंसा तस्याः कुरु यथामति

yasyāḥ kṛte vane rāmo nyastadehaśca vaḥ pitā।
seyaṁ pāpā nṛśaṁsā ca tasyāḥ kuru yathāmati ॥

‘राजकुमार! जिसके कारण श्रीराम को वन में निवास करना पड़ा है और आपलोगों के पिता ने शरीर का परित्याग किया है, वह क्रूर कर्म करनेवाली पापिनी यही है। आप इसके साथ जैसा बर्ताव उचित समझें करें’

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॥ २ · ७८ · १० ॥
शत्रुघ्नश्च तदाज्ञाय वचनं भृशदुःखितः। अन्तःपुरचरान् सर्वानित्युवाच धृतव्रतः

śatrughnaśca tadājñāya vacanaṁ bhṛśaduḥkhitaḥ।
antaḥpuracarān sarvānityuvāca dhṛtavrataḥ ॥

द्वारपाल की बात पर विचार करके शत्रुघ्न का दुःख और बढ़ गया। उन्होंने अपने कर्तव्य का निश्चय किया और अन्तःपुर में रहनेवाले सब लोगों को सुनाकर इस प्रकार कहा—

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॥ २ · ७८ · ११ ॥
तीव्रमुत्पादितं दुःखं भ्रातृणां मे तथा पितुः। यथा सेयं नृशंसस्य कर्मणः फलमश्नुताम्

tīvramutpāditaṁ duḥkhaṁ bhrātṛṇāṁ me tathā pituḥ।
yathā seyaṁ nṛśaṁsasya karmaṇaḥ phalamaśnutām ॥

‘इस पापिनी ने मेरे भाइयों तथा पिता को जैसा दुःसह दुःख पहुँचाया है, अपने उस क्रूर कर्म का वैसा ही फल यह भी भोगे’

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॥ २ · ७८ · १२ ॥
एवमुक्त्वा तेनाशु सखीजनसमावृता। गृहीता बलवत् कुब्जा सा तद् गृहमनादयत्

evamuktvā ca tenāśu sakhījanasamāvṛtā।
gṛhītā balavat kubjā sā tad gṛhamanādayat ॥

ऐसा कहकर शत्रुघ्न ने सखियों से घिरी हुई कुब्जा को तुरंत ही बलपूर्वक पकड़ लिया। वह डर के मारे ऐसा चीखने-चिल्लाने लगी कि वह सारा महल गूँज उठा

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॥ २ · ७८ · १३ ॥
ततः सुभृशसंतप्तस्तस्याः सर्वः सखीजनः। क्रुद्धमाज्ञाय शत्रुघ्नं व्यपलायत सर्वशः

tataḥ subhṛśasaṁtaptastasyāḥ sarvaḥ sakhījanaḥ।
kruddhamājñāya śatrughnaṁ vyapalāyata sarvaśaḥ ॥

फिर तो उसकी सारी सखियाँ अत्यन्त संतप्त हो उठीं और शत्रुघ्न को कुपित जानकर सब ओर भाग चलीं

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॥ २ · ७८ · १४ ॥
अमन्त्रयत कृत्स्नश्च तस्याः सर्वः सखीजनः। यथायं समुपक्रान्तो निःशेषं नः करिष्यति

amantrayata kṛtsnaśca tasyāḥ sarvaḥ sakhījanaḥ।
yathāyaṁ samupakrānto niḥśeṣaṁ naḥ kariṣyati ॥

उसकी सम्पूर्ण सखियों ने एक जगह एकत्र होकर आपस में सलाह की कि ‘जिस प्रकार इन्होंने बलपूर्वक कुब्जा को पकड़ा है, उससे जान पड़ता है, ये हमलोगों में से किसीको जीवित नहीं छोड़ेंगे

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॥ २ · ७८ · १५ ॥
सानुक्रोशां वदान्यां धर्मज्ञां यशस्विनीम्। कौसल्यां शरणं यामः सा हि नोऽस्ति ध्रुवा गतिः

sānukrośāṁ vadānyāṁ ca dharmajñāṁ ca yaśasvinīm।
kausalyāṁ śaraṇaṁ yāmaḥ sā hi no'sti dhruvā gatiḥ ॥

‘अतः हमलोग परम दयालु, उदार, धर्मज्ञ और यशस्विनी महारानी कौसल्या की शरण में चलें। इस समय वे ही हमारी निश्चल गति हैं’

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॥ २ · ७८ · १६ ॥
रोषेण संवीतः शत्रुघ्नः शत्रुशासनः। विचकर्ष तदा कुब्जां क्रोशन्तीं पृथिवीतले

sa ca roṣeṇa saṁvītaḥ śatrughnaḥ śatruśāsanaḥ।
vicakarṣa tadā kubjāṁ krośantīṁ pṛthivītale ॥

शत्रुओं का दमन करनेवाले शत्रुघ्न रोष में भरकर कुब्जा को जमीन पर घसीटने लगे। उस समय वह जोर-जोर से चीत्कार कर रही थी

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॥ २ · ७८ · १७ ॥
तस्यां व्याकृष्यमाणायां मन्थरायां ततस्ततः। चित्रं बहुविधं भाण्डं पृथिव्यां तद्व्यशीर्यत

tasyāṁ vyākṛṣyamāṇāyāṁ mantharāyāṁ tatastataḥ।
citraṁ bahuvidhaṁ bhāṇḍaṁ pṛthivyāṁ tadvyaśīryata ॥

जब मन्थरा घसीटी जा रही थी, उस समय उसके नाना प्रकार के विचित्र आभूषण टूट-टूटकर पृथ्वी पर इधर-उधर विखरे जाते थे

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॥ २ · ७८ · १८ ॥
तेन भाण्डेन विस्तीर्णं श्रीमद् राजनिवेशनम्। अशोभत तदा भूयः शारदं गगनं यथा

tena bhāṇḍena vistīrṇaṁ śrīmad rājaniveśanam।
aśobhata tadā bhūyaḥ śāradaṁ gaganaṁ yathā ॥

आभूषणों के उन टुकड़ों से वह शोभाशाली विशाल राजभवन नक्षत्रमालाओँ से अलंकृत शरत्काल के आकाश की भाँति अधिक सुशोभित हो रहा था

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॥ २ · ७८ · १९ ॥
बली बलवत् क्रोधाद् गृहीत्वा पुरुषर्षभः। कैकेयीमभिनिर्भर्त्स्य बभाषे परुषं वचः

sa balī balavat krodhād gṛhītvā puruṣarṣabhaḥ।
kaikeyīmabhinirbhartsya babhāṣe paruṣaṁ vacaḥ ॥

बलवान् नरश्रेष्ठ शत्रुघ्न जिस समय रोषपूर्वक मन्थरा को जोर से पकड़कर घसीट रहे थे, उस समय उसे छुड़ाने के लिये कैकेयी उनके पास आयी। तब उन्होंने उसे धिक्कारते हुए उसके प्रति बड़ी कठोर बातें कहीं—उसे रोषपूर्वक फटकारा

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॥ २ · ७८ · २० ॥
तैर्वाक्यैः परुषैर्दुःखैः कैकेयी भृशदुःखिता। शत्रुघ्नभयसंत्रस्ता पुत्रं शरणमागता

tairvākyaiḥ paruṣairduḥkhaiḥ kaikeyī bhṛśaduḥkhitā।
śatrughnabhayasaṁtrastā putraṁ śaraṇamāgatā ॥

शत्रुघ्न के वे कठोर वचन बड़े ही दुःखदायी थे। उन्हें सुनकर कैकेयी को बहुत दुःख हुआ। वह शत्रुघ्न के भय से थर्रा उठी और अपने पुत्र की शरण में आयी

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॥ २ · ७८ · २१ ॥
तं प्रेक्ष्य भरतः क्रुद्धं शत्रुघ्नमिदमब्रवीत्। अवध्याः सर्वभूतानां प्रमदाः क्षम्यतामिति

taṁ prekṣya bharataḥ kruddhaṁ śatrughnamidamabravīt।
avadhyāḥ sarvabhūtānāṁ pramadāḥ kṣamyatāmiti ॥

शत्रुघ्न को क्रोध में भरा हुआ देख भरत ने उनसे कहा—सुमित्राकुमार! क्षमा करो। स्त्रियाँ सभी प्राणियों के लिये अवध्य होती हैं

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॥ २ · ७८ · २२ ॥
हन्यामहमिमां पापां कैकेयीं दुष्टचारिणीम्। यदि मां धार्मिको रामो नासूयेन्मातृघातकम्

hanyāmahamimāṁ pāpāṁ kaikeyīṁ duṣṭacāriṇīm।
yadi māṁ dhārmiko rāmo nāsūyenmātṛghātakam ॥

‘यदि मुझे यह भय न होता कि धर्मात्मा श्रीराम मातृघाती समझकर मुझसे घृणा करने लगेंगे तो मैं भी इस दुष्ट आचरण करनेवाली पापिनी कैकेयी को मार डालता

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॥ २ · ७८ · २३ ॥
इमामपि हतां कुब्जां यदि जानाति राघवः। त्वां मां चैव धर्मात्मा नाभिभाषिष्यते ध्रुवम्

imāmapi hatāṁ kubjāṁ yadi jānāti rāghavaḥ।
tvāṁ ca māṁ caiva dharmātmā nābhibhāṣiṣyate dhruvam ॥

‘धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी तो इस कुब्जा के भी मारे जाने का समाचार यदि जान लें तो वे निश्चय ही तुमसे और मुझसे बोलना भी छोड़ देंगे’

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॥ २ · ७८ · २४ ॥
भरतस्य वचः श्रुत्वा शत्रुघ्नो लक्ष्मणानुजः। न्यवर्तत ततो दोषात् तां मुमोच मूर्च्छिताम्

bharatasya vacaḥ śrutvā śatrughno lakṣmaṇānujaḥ।
nyavartata tato doṣāt tāṁ mumoca ca mūrcchitām ॥

भरतजी को यह बात सुनकर लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्न मन्थरा के वधरूपी दोष से निवृत्त हो गये और उसे मूर्च्छित अवस्था में ही छोड़ दिया

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॥ २ · ७८ · २५ ॥
सा पादमूले कैकेय्या मन्थरा निपपात ह। निःश्वसन्ती सुदुःखार्ता कृपणं विललाप

sā pādamūle kaikeyyā mantharā nipapāta ha।
niḥśvasantī suduḥkhārtā kṛpaṇaṁ vilalāpa ha ॥

मन्थरा कैकेयी के चरणों में गिर पड़ी और लंबी साँस खींचती हुई अत्यन्त दुःख से आर्त हो करुण विलाप करने लगी

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॥ २ · ७८ · २६ ॥
शत्रुघ्नविक्षेपविमूढसंज्ञां समीक्ष्य कुब्जां भरतस्य माता। शनैः समाश्वासयदार्तरूपां क्रौञ्चीं विलग्नामिव वीक्षमाणाम्

śatrughnavikṣepavimūḍhasaṁjñāṁ samīkṣya kubjāṁ bharatasya mātā।
śanaiḥ samāśvāsayadārtarūpāṁ krauñcīṁ vilagnāmiva vīkṣamāṇām ॥

शत्रुघ्न के पटकने और घसीटने से आर्त एवं अचेत हुई कुब्जा को देखकर भरत की माता कैकेयी धीरे-धीरे उसे आश्वासन देने—होश में लाने की चेष्टा करने लगी। उस समय कुब्जा पिंजड़े में बंधी हुई क्रौञ्ची की भाँति कातर दृष्टि से उसकी ओर देख रही थी

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टसप्ततितमः सर्गः ॥ ७८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अठहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७८ ॥