वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ८२ · ३२ श्लोकाःSarga 82 · 32 ślokas

वसिष्ठजीका भरतको राज्यपर अभिषिक्त होनेके लिये आदेश देना तथा भरतका उसे अनुचित बताकर अस्वीकार करना और श्रीरामको लौटा लानेके लिये वनमें चलनेकी तैयारीके निमित्त सबको आदेश देना

राज्यं रामस्य

“राज्यं रामस्य”
॥ २ · ८२ · १०–१२ ॥

दीप्तस्तम्भायां राजसभायां वृद्धो ब्रह्मर्षिर्वसिष्ठः करे कमण्डलुं धृत्वा भरतमभिषेकाय नियुङ्क्ते; अश्रुमुखो बद्धाञ्जलिः श्वेतशोकवस्त्रधरस्तु भरतः 'राज्यमहं च रामस्यैव' इति निषेधन् सभामध्ये तिष्ठति।

दीपों की सुनहरी आभा में जगमगाती स्तम्भमयी राजसभा में श्वेतवस्त्रधारी वृद्ध ब्रह्मर्षि वसिष्ठ हाथ में कमण्डलु लिये खड़े हैं और भरत को राज्याभिषेक स्वीकार करने का आदेश दे रहे हैं; किन्तु सादे श्वेत शोक-वस्त्र में, समस्त आभूषण त्यागे, अश्रुपूरित नेत्रों और जुड़े हाथों से युवक भरत भरी सभा के बीच खड़े होकर अस्वीकार करते हुए मानो कह रहे हैं कि यह राज्य और वे स्वयं—दोनों ही श्रीराम के हैं; चारों ओर बैठे मुकुटधारी मन्त्री और सभासद यह धर्ममय वचन सुनकर द्रवित हो उठे हैं।

In the pillared royal assembly, aglow with warm lamplight, the aged white-robed sage Vasishth stands holding his brass water-pot and bids the young prince to accept consecration; but Bharat, in plain undyed mourner's white with every ornament laid aside, tears on his face and hands folded, refuses before the whole court — declaring that the kingdom and he himself both belong to Ram alone, while the crowned ministers seated all around are moved to tears by his righteous words.

॥ २ · ८२ · १ ॥
तामार्यगणसम्पूर्णां भरतः प्रग्रहां सभाम्। ददर्श बुद्धिसम्पन्नः पूर्णचन्द्रां निशामिव

tāmāryagaṇasampūrṇāṁ bharataḥ pragrahāṁ sabhām।
dadarśa buddhisampannaḥ pūrṇacandrāṁ niśāmiva ॥

बुद्धिमान् भरत ने उत्तम ग्रह-नक्षत्रों से सुशोभित और पूर्ण चन्द्रमण्डल से प्रकाशित रात्रि की भाँति उस सभा को देखा। वह श्रेष्ठ पुरुषों की मण्डली से भरी-पूरी तथा वसिष्ठ आदि श्रेष्ठ मुनियों की उपस्थिति से शोभायमान थी

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॥ २ · ८२ · २ ॥
आसनानि यथान्यायमार्याणां विशतां तदा। वस्त्राङ्गरागप्रभया द्योतिता सा सभोत्तमा

āsanāni yathānyāyamāryāṇāṁ viśatāṁ tadā।
vastrāṅgarāgaprabhayā dyotitā sā sabhottamā ॥

उस समय यथायोग्य आसनों पर बैठे हुए आर्य पुरुषों के वस्त्रों तथा अङ्गरागों की प्रभा से वह उत्तम सभा अधिक दीपिमती हो उठी थी

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॥ २ · ८२ · ३ ॥
सा विद्वज्जनसम्पूर्णा सभा सुरुचिरा तथा। अदृश्यत घनापाये पूर्णचन्द्रेव शर्वरी

sā vidvajjanasampūrṇā sabhā surucirā tathā।
adṛśyata ghanāpāye pūrṇacandreva śarvarī ॥

जैसे वर्षाकाल व्यतीत होने पर शरद्-ऋतु की पूर्णिमा को पूर्ण चन्द्रमण्डल से अलंकृत रजनी बड़ी मनोहर दिखायी देती है, उसी प्रकार विद्वानों के समुदाय से भरी हुई वह सभा बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी

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॥ २ · ८२ · ४ ॥
राज्ञस्तु प्रकृतीः सर्वाः सम्प्रेक्ष्य धर्मवित्। इदं पुरोहितो वाक्यं भरतं मृदु चाब्रवीत्

rājñastu prakṛtīḥ sarvāḥ sa samprekṣya ca dharmavit।
idaṁ purohito vākyaṁ bharataṁ mṛdu cābravīt ॥

उस समय धर्म के ज्ञाता पुरोहित वसिष्ठजी ने राजा की सम्पूर्ण प्रकृतियों को उपस्थित देख भरत से यह मधुर वचन कहा—

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॥ २ · ८२ · ५ ॥
तात राजा दशरथः स्वर्गतो धर्ममाचरन्। धनधान्यवतीं स्फीतां प्रदाय पृथिवीं तव

tāta rājā daśarathaḥ svargato dharmamācaran।
dhanadhānyavatīṁ sphītāṁ pradāya pṛthivīṁ tava ॥

‘तात! राजा दशरथ यह धन-धान्य से परिपूर्ण समृद्धिशालिनी पृथिवी तुम्हें देकर स्वयं धर्म का आचरण करते हुए स्वर्गवासी हुए हैं

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॥ २ · ८२ · ६ ॥
रामस्तथा सत्यवृत्तिः सतां धर्ममनुस्मरन्। नाजहात् पितुरादेशं शशी ज्योत्स्नामिवोदितः

rāmastathā satyavṛttiḥ satāṁ dharmamanusmaran।
nājahāt piturādeśaṁ śaśī jyotsnāmivoditaḥ ॥

‘सत्यपूर्ण बर्ताव करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी ने सत्पुरुषों के धर्म का विचार करके पिता की आज्ञा का उसी प्रकार उल्लङ्घन नहीं किया, जैसे उदित चन्द्रमा अपनी चाँदनी को नहीं छोड़ता है

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॥ २ · ८२ · ७ ॥
पित्रा भ्रात्रा ते दत्तं राज्यं निहतकण्टकम्। तद् भुङ्क्ष्व मुदितामात्यः क्षिप्रमेवाभिषेचय

pitrā bhrātrā ca te dattaṁ rājyaṁ nihatakaṇṭakam।
tad bhuṅkṣva muditāmātyaḥ kṣipramevābhiṣecaya ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ८२ · ८ ॥
उदीच्याश्च प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्याश्च केवलाः। कोट्यापरान्ताः सामुद्रा रत्नान्युपहरन्तु ते

udīcyāśca pratīcyāśca dākṣiṇātyāśca kevalāḥ।
koṭyāparāntāḥ sāmudrā ratnānyupaharantu te ॥

॥ ७–८ ॥

‘इस प्रकार पिता और ज्येष्ठ भ्राता—दोनों ने ही तुम्हें यह अकण्टक राज्य प्रदान किया है। अतः तुम मन्त्रियों को प्रसन्न रखते हुए इसका पालन करो और शीघ्र ही अपना अभिषेक करा लो। जिससे उत्तर, पश्चिम, दक्षिण, पूर्व और अपरान्त देश के निवासी राजा तथा समुद्र में जहाजोंद्वारा व्यापार करनेवाले व्यवसायी तुम्हें असंख्य रत्न प्रदान करें

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॥ २ · ८२ · ९ ॥
तच्छ्रुत्वा भरतो वाक्यं शोकेनाभिपरिप्लुतः। जगाम मनसा रामं धर्मज्ञो धर्मकांक्षया

tacchrutvā bharato vākyaṁ śokenābhipariplutaḥ।
jagāma manasā rāmaṁ dharmajño dharmakāṁkṣayā ॥

यह बात सुनकर धर्मज्ञ भरत शोक में डूब गये और धर्मपालन की इच्छा से उन्होंने मन-ही-मन श्रीराम को शरण ली

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॥ २ · ८२ · १० ॥
सबाष्पकलया वाचा कलहंसस्वरो युवा। विललाप सभामध्ये जगर्ह पुरोहितम्

sabāṣpakalayā vācā kalahaṁsasvaro yuvā।
vilalāpa sabhāmadhye jagarha ca purohitam ॥

नवयुवक भरत उस भरी सभा में आँसू बहाते हुए गद्गद वाणीद्वारा कलहंस के समान मधुर स्वर से विलाप करने और पुरोहितजी को उपालम्भ देने लगे—

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॥ २ · ८२ · ११ ॥
चरितब्रह्मचर्यस्य विद्यास्नातस्य धीमतः। धर्मे प्रयतमानस्य को राज्यं मद्विधो हरेत्

caritabrahmacaryasya vidyāsnātasya dhīmataḥ।
dharme prayatamānasya ko rājyaṁ madvidho haret ॥

‘गुरुदेव! जिन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन किया, जो सम्पूर्ण विद्याओं में निष्णात हुए तथा जो सदा ही धर्म के लिये प्रयत्नशील रहते हैं, उन बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजी के राज्य का मेरे-जैसा कौन मनुष्य अपहरण कर सकता है?

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॥ २ · ८२ · १२ ॥
कथं दशरथाज्जातो भवेद् राज्यापहारकः। राज्यं चाहं रामस्य धर्मं वक्तुमिहार्हसि

kathaṁ daśarathājjāto bhaved rājyāpahārakaḥ।
rājyaṁ cāhaṁ ca rāmasya dharmaṁ vaktumihārhasi ॥

‘महाराज दशरथ का कोई भी पुत्र बड़े भाई के राज्य का अपहरण कैसे कर सकता है? यह राज्य और मैं दोनों ही श्रीराम के हैं; यह समझकर आपको इस सभा में धर्मसंगत बात कहनी चाहिये (अन्याययुक्त नहीं)

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॥ २ · ८२ · १३ ॥
ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च धर्मात्मा दिलीपनहुषोपमः। लब्धुमर्हति काकुत्स्थो राज्यं दशरथो यथा

jyeṣṭhaḥ śreṣṭhaśca dharmātmā dilīpanahuṣopamaḥ।
labdhumarhati kākutstho rājyaṁ daśaratho yathā ॥

‘धर्मात्मा श्रीराम मुझसे अवस्था में बड़े और गुणों में भी श्रेष्ठ हैं। वे दिलीप और नहुष के समान तेजस्वी हैं; अतः महाराज दशरथ की भाँति वे ही इस राज्य को पाने के अधिकारी हैं

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॥ २ · ८२ · १४ ॥
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यं कुर्यां पापमहं यदि। इक्ष्वाकूणामहं लोके भवेयं कुलपांसनः

anāryajuṣṭamasvargyaṁ kuryāṁ pāpamahaṁ yadi।
ikṣvākūṇāmahaṁ loke bhaveyaṁ kulapāṁsanaḥ ॥

‘पाप का आचरण तो नीच पुरुष करते हैं। वह मनुष्य को निश्चय ही नरक में डालनेवाला है। यदि श्रीरामचन्द्रजी का राज्य लेकर मैं भी पापाचरण करूँ तो संसार में इक्ष्वाकुकुल का कलंक समझा जाऊँगा

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॥ २ · ८२ · १५ ॥
यद्धि मात्रा कृतं पापं नाहं तदपि रोचये। इहस्थो वनदुर्गस्थं नमस्यामि कृताञ्जलिः

yaddhi mātrā kṛtaṁ pāpaṁ nāhaṁ tadapi rocaye।
ihastho vanadurgasthaṁ namasyāmi kṛtāñjaliḥ ॥

‘मेरी माता ने जो पाप किया है, उसे मैं कभी पसंद नहीं करता; इसीलिये यहाँ रहकर भी मैं दुर्गम वन में निवास करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी को हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ

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॥ २ · ८२ · १६ ॥
राममेवानुगच्छामि राजा द्विपदां वरः। त्रयाणामपि लोकानां राघवो राज्यमर्हति

rāmamevānugacchāmi sa rājā dvipadāṁ varaḥ।
trayāṇāmapi lokānāṁ rāghavo rājyamarhati ॥

‘मैं श्रीराम का ही अनुसरण करूँगा। मनुष्यों में श्रेष्ठ श्रीरघुनाथजी ही इस राज्य के राजा हैं। वे तीनों ही लोकों के राजा होनेयोग्य हैं’

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॥ २ · ८२ · १७ ॥
तद्वाक्यं धर्मसंयुक्तं श्रुत्वा सर्वे सभासदः। हर्षान्मुमुचुरश्रूणि रामे निहितचेतसः

tadvākyaṁ dharmasaṁyuktaṁ śrutvā sarve sabhāsadaḥ।
harṣānmumucuraśrūṇi rāme nihitacetasaḥ ॥

भरत का वह धर्मयुक्त वचन सुनकर सभी सभासद् श्रीराम में चित्त लगाकर हर्ष के आँसू बहाने लगे

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॥ २ · ८२ · १८ ॥
यदि त्वार्यं शक्ष्यामि विनिवर्तयितुं वनात्। वने तत्रैव वत्स्यामि यथार्यो लक्ष्मणस्तथा

yadi tvāryaṁ na śakṣyāmi vinivartayituṁ vanāt।
vane tatraiva vatsyāmi yathāryo lakṣmaṇastathā ॥

भरत ने फिर कहा—‘यदि मैं आर्य श्रीराम को वन से न लौटा सकूँगा तो स्वयं भी नरश्रेष्ठ लक्ष्मण की भाँति वहीं निवास करूँगा

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॥ २ · ८२ · १९ ॥
सर्वोपायं तु वर्तिष्ये विनिवर्तयितुं बलात्। समक्षमार्यमिश्राणां साधूनां गुणवर्तिनाम्

sarvopāyaṁ tu vartiṣye vinivartayituṁ balāt।
samakṣamāryamiśrāṇāṁ sādhūnāṁ guṇavartinām ॥

‘मैं आप सभी सद्गुणयुक्त बर्ताव करनेवाले पूजनीय श्रेष्ठ सभासदों के समक्ष श्रीरामचन्द्रजी को बलपूर्वक लौटा लाने के लिये सारे उपायों से चेष्टा करूँगा

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॥ २ · ८२ · २० ॥
विष्टिकर्मान्तिकाः सर्वे मार्गशोधकदक्षकाः। प्रस्थापिता मया पूर्वं यात्रा मम रोचते

viṣṭikarmāntikāḥ sarve mārgaśodhakadakṣakāḥ।
prasthāpitā mayā pūrvaṁ yātrā ca mama rocate ॥

‘मैंने मार्गशोधन में कुशल सभी अवैतनिक वेतनभोगी कार्यकर्ताओं को पहले ही यहाँ से भेज दिया है। अतः मुझे श्रीरामचन्द्रजी के पास चलना ही अच्छा जान पड़ता है’

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॥ २ · ८२ · २१ ॥
एवमुक्त्वा तु धर्मात्मा भरतो भ्रातृवत्सलः। समीपस्थमुवाचेदं सुमन्त्रं मन्त्रकोविदम्

evamuktvā tu dharmātmā bharato bhrātṛvatsalaḥ।
samīpasthamuvācedaṁ sumantraṁ mantrakovidam ॥

सभासदों से ऐसा कहकर भ्रातृवत्सल धर्मात्मा भरत पास बैठे हुए मन्त्रवेत्ता सुमन्त्र से इस प्रकार बोले—

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॥ २ · ८२ · २२ ॥
तूर्णमुत्थाय गच्छ त्वं सुमन्त्र मम शासनात्। यात्रामाज्ञापय क्षिप्रं बलं चैव समानय

tūrṇamutthāya gaccha tvaṁ sumantra mama śāsanāt।
yātrāmājñāpaya kṣipraṁ balaṁ caiva samānaya ॥

‘सुमन्त्रजी! आप जल्दी उठकर जाइये और मेरी आज्ञा से सबको वन में चलने का आदेश सूचित कर दीजिये और सेना को भी शीघ्र ही बुला भेजिये’

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॥ २ · ८२ · २३ ॥
एवमुक्तः सुमन्त्रस्तु भरतेन महात्मना। प्रहृष्टः सोऽदिशत् सर्वं यथासंदिष्टमिष्टवत्

evamuktaḥ sumantrastu bharatena mahātmanā।
prahṛṣṭaḥ so'diśat sarvaṁ yathāsaṁdiṣṭamiṣṭavat ॥

महात्मा भरत के ऐसा कहने पर सुमन्त्र ने बड़े हर्ष के साथ सबको उनके कथनानुसार वह प्रिय संदेश सुना दिया

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॥ २ · ८२ · २४ ॥
ताः प्रहृष्टाः प्रकृतयो बलाध्यक्षा बलस्य च। श्रुत्वा यात्रां समाज्ञां राघवस्य निवर्तने

tāḥ prahṛṣṭāḥ prakṛtayo balādhyakṣā balasya ca।
śrutvā yātrāṁ samājñāṁ rāghavasya nivartane ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी को लौटा लाने के लिये भरत जायेंगे और उनके साथ जाने के लिये सेना को भी आदेश प्राप्त हुआ है’—यह समाचार सुनकर वे सभी प्रजाजन तथा सेनापतिगण बहुत प्रसन्न हुए

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॥ २ · ८२ · २५ ॥
ततो योधाङ्गनाः सर्वा भर्तॄन् सर्वान् गृहे गृहे। यात्रागमनमाज्ञाय त्वरयन्ति स्म हर्षिताः

tato yodhāṅganāḥ sarvā bhartṝn sarvān gṛhe gṛhe।
yātrāgamanamājñāya tvarayanti sma harṣitāḥ ॥

तदनन्तर उस यात्रा का समाचार पाकर सैनिकों की सभी स्त्रियाँ घर-घर में हर्ष से खिल उठीं और अपने पतियों को जल्दी तैयार होने के लिये प्रेरित करने लगीं

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॥ २ · ८२ · २६ ॥
ते हयैर्गोरथैः शीघ्रं स्यन्दनैश्च मनोजवैः। सह योषिद्बलाध्यक्षा बलं सर्वमचोदयन्

te hayairgorathaiḥ śīghraṁ syandanaiśca manojavaiḥ।
saha yoṣidbalādhyakṣā balaṁ sarvamacodayan ॥

सेनापतियों ने घोड़ों, बैलगाड़ियों तथा मन के समान वेगशाली रथोंसहित सम्पूर्ण सेना को स्त्रियोंसहित यात्रा के लिये शीघ्र तैयार होने की आज्ञा दी

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॥ २ · ८२ · २७ ॥
सज्जं तु तद् बलं दृष्ट्वा भरतो गुरुसंनिधौ। रथं मे त्वरयस्वेति सुमन्त्रं पार्श्वतोऽब्रवीत्

sajjaṁ tu tad balaṁ dṛṣṭvā bharato gurusaṁnidhau।
rathaṁ me tvarayasveti sumantraṁ pārśvato'bravīt ॥

सेना को कूँच के लिये उद्यत देख भरत ने गुरु के समीप ही बगल में खड़े हुए सुमन्त्र से कहा—‘आप मेरे रथ को शीघ्र तैयार करके लाइये’

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॥ २ · ८२ · २८ ॥
भरतस्य तु तस्याज्ञां परिगृह्य प्रहर्षितः। रथं गृहीत्वोपययौ युक्तं परमवाजिभिः

bharatasya tu tasyājñāṁ parigṛhya praharṣitaḥ।
rathaṁ gṛhītvopayayau yuktaṁ paramavājibhiḥ ॥

भरत की उस आज्ञा को शिरोधार्य करके सुमन्त्र बड़े हर्ष के साथ गये और उत्तम घोड़ों से जुता हुआ रथ लेकर लौट आये

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॥ २ · ८२ · २९ ॥
राघवः सत्यधृतिः प्रतापवान् ब्रुवन् सुयुक्तं दृढसत्यविक्रमः। गुरुं महारण्यगतं यशस्विनं प्रसादयिष्यन् भरतोऽब्रवीत्तदा

sa rāghavaḥ satyadhṛtiḥ pratāpavān bruvan suyuktaṁ dṛḍhasatyavikramaḥ।
guruṁ mahāraṇyagataṁ yaśasvinaṁ prasādayiṣyan bharato'bravīttadā ॥

तब सुदृढ़ एवं सत्य पराक्रमवाले सत्यपरायण प्रतापी भरत विशाल वन में गये हुए अपने बड़े भाई यशस्वी श्रीराम को लौटा लाने के निमित्त राजी करने के लिये यात्रा के उद्देश्य से उस समय इस प्रकार बोले—

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॥ २ · ८२ · ३० ॥
तूर्णं त्वमुत्थाय सुमन्त्र गच्छ बलस्य योगाय बलप्रधानान्। आनेतुमिच्छामि हि तं वनस्थं प्रसाद्य रामं जगतो हिताय

tūrṇaṁ tvamutthāya sumantra gaccha balasya yogāya balapradhānān।
ānetumicchāmi hi taṁ vanasthaṁ prasādya rāmaṁ jagato hitāya ॥

‘सुमन्त्रजी! आप शीघ्र उठकर सेनापतियों के पास जाइये और उनसे कहकर सेना को कल कूँच करने के लिये तैयार होने का प्रबन्ध कीजिये; क्योंकि मैं सारे जगत् का कल्याण करने के लिये उन वनवासी श्रीराम को प्रसन्न करके यहाँ ले आना चाहता हूँ’

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॥ २ · ८२ · ३१ ॥
सूतपुत्रो भरतेन सम्यगाज्ञापितः सम्परिपूर्णकामः। शशास सर्वान् प्रकृतिप्रधानान् बलस्य मुख्यांश्च सुहृज्जनं

sa sūtaputro bharatena samyagājñāpitaḥ samparipūrṇakāmaḥ।
śaśāsa sarvān prakṛtipradhānān balasya mukhyāṁśca suhṛjjanaṁ ca ॥

भरत की यह उत्तम आज्ञा पाकर सूतपुत्र सुमन्त्र ने अपना मनोरथ सफल हुआ समझा और उन्होंने प्रजावर्ग के सभी प्रधान व्यक्तियों, सेनापतियों तथा सुहृदों को भरत का आदेश सुना दिया

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॥ २ · ८२ · ३२ ॥
ततः समुत्थाय कुले कुले ते राजन्यवैश्या वृषलाश्च विप्राः। अयूयुजन्नुष्ट्ररथान् खरांश्च नागान् हयांश्चैव कुलप्रसूतान्

tataḥ samutthāya kule kule te rājanyavaiśyā vṛṣalāśca viprāḥ।
ayūyujannuṣṭrarathān kharāṁśca nāgān hayāṁścaiva kulaprasūtān ॥

तब प्रत्येक घर के लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र उठ-उठकर अच्छी जाति के घोड़े, हाथी, ऊँट, गधे तथा रथों को जोतने लगे

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्व्यशीतितमः सर्गः ॥ ८२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बयासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८२ ॥