वाल्मीकि रामायणम् · किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

सर्गः ६६ · ३८ श्लोकाःSarga 66 · 38 ślokas

जाम्बवान्का हनुमान्जीको उनकी उत्पत्तिकथा सुनाकर समुद्रलङ्घनके लिये उत्साहित करना

॥ ४ · ६६ · १ ॥
अनेकशतसाहस्रीं विषण्णां हरिवाहिनीम्। जाम्बवान् समुदीक्ष्यैवं हनूमन्तमथाब्रवीत्॥

anekaśatasāhasrīṁ viṣaṇṇāṁ harivāhinīm।
jāmbavān samudīkṣyaivaṁ hanūmantamathābravīt॥

लाखों वानरों की सेना को इस तरह विषाद में पड़ी देख जाम्बवान् ने हनुमान्जी से कहा—

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॥ ४ · ६६ · २ ॥
वीर वानरलोकस्य सर्वशास्त्रविदां वर। तूष्णीमेकान्तमाश्रित्य हनूमन् किं जल्पसि॥

vīra vānaralokasya sarvaśāstravidāṁ vara।
tūṣṇīmekāntamāśritya hanūman kiṁ na jalpasi॥

‘वानरजगत् के वीर तथा सम्पूर्ण शास्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ हनुमान्! तुम एकान्त में आकर चुपचाप क्यों बैठे हो? कुछ बोलते क्यों नहीं?

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॥ ४ · ६६ · ३ ॥
हनूमन्हरिराजस्य सुग्रीवस्य समो ह्यसि। रामलक्ष्मणयोश्चापि तेजसा बलेन च॥

hanūmanharirājasya sugrīvasya samo hyasi।
rāmalakṣmaṇayoścāpi tejasā ca balena ca॥

‘हनूमन्! तुम तो वानरराज सुग्रीव के समान पराक्रमी हो तथा तेज और बल में श्रीराम और लक्ष्मण के तुल्य हो

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॥ ४ · ६६ · ४ ॥
अरिष्टनेमिनः पुत्रो वैनतेयो महाबलः। गरुत्मानिव विख्यात उत्तमः सर्वपक्षिणाम्॥

ariṣṭaneminaḥ putro vainateyo mahābalaḥ।
garutmāniva vikhyāta uttamaḥ sarvapakṣiṇām॥

‘कश्यपजी के महाबली पुत्र और समस्त पक्षियों में श्रेष्ठ जो विनतानन्दन गरुड़ हैं, उन्हींके समान तुम भी विख्यात शक्तिशाली एवं तीव्रगामी हो

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॥ ४ · ६६ · ५ ॥
बहुशो हि मया दृष्टः सागरे महाबलः। भुजङ्गानुद्धरन् पक्षी महाबाहुर्महाबलः॥

bahuśo hi mayā dṛṣṭaḥ sāgare sa mahābalaḥ।
bhujaṅgānuddharan pakṣī mahābāhurmahābalaḥ॥

‘महाबली महाबाहु पक्षिराज गरुड़ को मैंने समुद्र में कई बार देखा है, जो बड़े-बड़े सर्पों को वहाँ से निकाल लाते हैं

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॥ ४ · ६६ · ६ ॥
पक्षयोर्यद् बलं तस्य भुजवीर्यबलं तव। विक्रमश्चापि वेगश्च ते तेनापहीयते॥

pakṣayoryad balaṁ tasya bhujavīryabalaṁ tava।
vikramaścāpi vegaśca na te tenāpahīyate॥

‘उनके दोनों पंखों में जो बल है, वही बल, वही पराक्रम तुम्हारी इन दोनों भुजाओं में भी है। इसीलिये तुम्हारा वेग और विक्रम भी उनसे कम नहीं है

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॥ ४ · ६६ · ७ ॥
बलं बुद्धिश्च तेजश्च सत्त्वं हरिपुङ्गव। विशिष्टं सर्वभूतेषु किमात्मानं सज्जसे॥

balaṁ buddhiśca tejaśca sattvaṁ ca haripuṅgava।
viśiṣṭaṁ sarvabhūteṣu kimātmānaṁ na sajjase॥

‘वानरशिरोमणे! तुम्हारा बल, बुद्धि, तेज और धैर्य भी समस्तं प्राणियों में सबसे बढ़कर है। फिर तुम अपने-आपको ही समुद्र लाँघने के लिये क्यों नहीं तैयार करते?

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॥ ४ · ६६ · ८ ॥
अप्सराऽप्सरसां श्रेष्ठा विख्याता पुञ्जिकस्थला। अञ्जनेति परिख्याता पत्नी केसरिणो हरेः॥

apsarā'psarasāṁ śreṣṭhā vikhyātā puñjikasthalā।
añjaneti parikhyātā patnī kesariṇo hareḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ६६ · ९ ॥
विख्याता त्रिषु लोकेषु रूपेणाप्रतिमा भुवि। अभिशापादभूत् तात कपित्वे कामरूपिणी॥ दुहिता वानरेन्द्रस्य कुञ्जरस्य महात्मनः।

vikhyātā triṣu lokeṣu rūpeṇāpratimā bhuvi।
abhiśāpādabhūt tāta kapitve kāmarūpiṇī॥
duhitā vānarendrasya kuñjarasya mahātmanaḥ।

॥ ८–९ ॥

‘(वीरवर! तुम्हारे प्रादुर्भाव की कथा इस प्रकार है—) पुञ्जिकस्थला नाम से विख्यात जो अप्सरा है, वह समस्त अप्सराओं में अग्रगण्य है। तात! एक समय शापवश वह कपियोनि में अवतीर्ण हुई। उस समय वह वानरराज महामनस्वी कुञ्जर की पुत्री इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली थी। इस भूतल पर उसके रूप की समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी। वह तीनों लोकों में विख्यात थी। उसका नाम अञ्जना था। वह वानरराज केसरी की पत्नी हुई

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॥ ४ · ६६ · १० ॥
मानुषं विग्रहं कृत्वा रूपयौवनशालिनी॥

mānuṣaṁ vigrahaṁ kṛtvā rūpayauvanaśālinī॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ६६ · ११ ॥
विचित्रमाल्याभरणा कदाचित् क्षौमधारिणी। अचरत् पर्वतस्याग्रे प्रावृडम्बुदसंनिभे॥

vicitramālyābharaṇā kadācit kṣaumadhāriṇī।
acarat parvatasyāgre prāvṛḍambudasaṁnibhe॥

॥ १०–११ ॥

‘एक दिन की बात है, रूप और यौवन से सुशोभित होनेवाली अञ्जना मानवी स्त्री का शरीर धारण करके वर्षाकाल के मेघ की भाँति श्याम कान्तिवाले एक पर्वतशिखर पर विचर रही थी। उसके अङ्गों पर रेशमी साड़ी शोभा पाती थी। वह फूलों के विचित्र आभूषणों से विभूषित थी

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॥ ४ · ६६ · १२ ॥
तस्या वस्त्रं विशालाक्ष्याः पीतं रक्तदशं शुभम्। स्थितायाः पर्वतस्याग्रे मारुतोऽपाहरच्छनैः॥

tasyā vastraṁ viśālākṣyāḥ pītaṁ raktadaśaṁ śubham।
sthitāyāḥ parvatasyāgre māruto'pāharacchanaiḥ॥

‘उस विशाललोचना बाला का सुन्दर वस्त्र तो पीले रंग का था, किंतु उसके किनारे का रंग लाल था। वह पर्वत के शिखर पर खड़ी थी। उसी समय वायुदेवता ने उसके उस वस्त्र को धीरे से हर लिया

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॥ ४ · ६६ · १३ ॥
ददर्श ततस्तस्या वृत्तावूरू सुसंहतौ। स्तनौ पीनौ सहितौ सुजातं चारु चाननम्॥

sa dadarśa tatastasyā vṛttāvūrū susaṁhatau।
stanau ca pīnau sahitau sujātaṁ cāru cānanam॥

‘तत्पश्चात् उन्होंने उसकी परस्पर सटी हुई गोल-गोल जाँघों, एक-दूसरे से लगे हुए पीन उरोजों तथा मनोहर मुख को भी देखा

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॥ ४ · ६६ · १४ ॥
तां बलादायतश्रोणीं तनुमध्यां यशस्विनीम्। दृष्ट्वैव शुभसर्वाङ्गीं पवनः काममोहितः॥

tāṁ balādāyataśroṇīṁ tanumadhyāṁ yaśasvinīm।
dṛṣṭvaiva śubhasarvāṅgīṁ pavanaḥ kāmamohitaḥ॥

‘उसके नितम्ब ऊँचे और विस्तृत थे। कटिभाग बहुत ही पतला था। उसके सारे अङ्ग परम सुन्दर थे। इस प्रकार बलपूर्वक यशस्विनी अञ्जना के अङ्गों का अवलोकन करके पवन देवता काम से मोहित हो गये

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॥ ४ · ६६ · १५ ॥
तां भुजाभ्यां दीर्घाभ्यां पर्यष्वजत मारुतः। मन्मथाविष्टसर्वाङ्गो गतात्मा तामनिन्दिताम्॥

sa tāṁ bhujābhyāṁ dīrghābhyāṁ paryaṣvajata mārutaḥ।
manmathāviṣṭasarvāṅgo gatātmā tāmaninditām॥

‘उनके सम्पूर्ण अङ्गों में कामभाव का आवेश हो गया। मन अञ्जना में ही लग गया। उन्होंने उस अनिन्द्य सुन्दरी को अपनी दोनों विशाल भुजाओं में भरकर हृदय से लगा लिया

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॥ ४ · ६६ · १६ ॥
सा तु तत्रैव सम्भ्रान्ता सुव्रता वाक्यमब्रवीत्। एकपत्नीव्रतमिदं को नाशयितुमिच्छति॥

sā tu tatraiva sambhrāntā suvratā vākyamabravīt।
ekapatnīvratamidaṁ ko nāśayitumicchati॥

‘अञ्जना उत्तम व्रत का पालन करनेवाली सती नारी थी। अतः उस अवस्था में पड़कर वह वहीं घबरा उठी और बोली—‘कौन मेरे इस पातिव्रत्य का नाश करना चाहता है’?

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॥ ४ · ६६ · १७ ॥
अञ्जनाया वचः श्रुत्वा मारुतः प्रत्यभाषत। त्वां हिंसामि सुश्रोणि मा भूत् ते मनसो भयम्॥

añjanāyā vacaḥ śrutvā mārutaḥ pratyabhāṣata।
na tvāṁ hiṁsāmi suśroṇi mā bhūt te manaso bhayam॥

अञ्जना की बात सुनकर पवनदेव ने उत्तर दिया—‘सुश्रोणि! मैं तुम्हारे एकपत्नी-व्रत का नाश नहीं कर रहा हूँ। अतः तुम्हारे मन से यह भय दूर हो जाना चाहिये

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॥ ४ · ६६ · १८ ॥
मनसास्मि गतो यत् त्वां परिष्वज्य यशस्विनि। वीर्यवान् बुद्धिसम्पन्नस्तव पुत्रो भविष्यति॥

manasāsmi gato yat tvāṁ pariṣvajya yaśasvini।
vīryavān buddhisampannastava putro bhaviṣyati॥

‘यशस्विनि! मैंने अव्यक्तरूप से तुम्हारा आलिङ्गन करके मानसिक संकल्प के द्वारा तुम्हारे साथ समागम किया है। इससे तुम्हें बल-पराक्रम से सम्पन्न एवं बुद्धिमान् पुत्र प्राप्त होगा

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॥ ४ · ६६ · १९ ॥
महासत्त्वो महातेजा महाबलपराक्रमः। लङ्घने प्लवने चैव भविष्यति मया समः॥

mahāsattvo mahātejā mahābalaparākramaḥ।
laṅghane plavane caiva bhaviṣyati mayā samaḥ॥

‘वह महान् धैर्यवान्, महातेजस्वी, महाबली, महापराक्रमी तथा लाँघने और छलाँग मारने में मेरे समान होगा’

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॥ ४ · ६६ · २० ॥
एवमुक्ता ततस्तुष्टा जननी ते महाकपे। गुहायां त्वां महाबाहो प्रजज्ञे प्लवगर्षभ॥

evamuktā tatastuṣṭā jananī te mahākape।
guhāyāṁ tvāṁ mahābāho prajajñe plavagarṣabha॥

‘महाकपे! वायुदेव के ऐसा कहने पर तुम्हारी माता प्रसन्न हो गयीं। महाबाहो! वानरश्रेष्ठ! फिर उन्होंने तुम्हें एक गुफा में जन्म दिया

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॥ ४ · ६६ · २१ ॥
अभ्युत्थितं ततः सूर्यं बालो दृष्ट्वा महावने। फलं चेति जिघृक्षुस्त्वमुत्प्लुत्याभ्युत्पतो दिवम्॥

abhyutthitaṁ tataḥ sūryaṁ bālo dṛṣṭvā mahāvane।
phalaṁ ceti jighṛkṣustvamutplutyābhyutpato divam॥

‘बाल्यावस्था में एक विशाल वन के भीतर एक दिन उदित हुए सूर्य को देखकर तुमने समझा कि यह भी कोई फल है; अतः उसे लेने के लिये तुम सहसा आकाश में उछल पड़े

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॥ ४ · ६६ · २२ ॥
शतानि त्रीणि गत्वाथ योजनानां महाकपे। तेजसा तस्य निर्धूतो विषादं गतस्ततः॥

śatāni trīṇi gatvātha yojanānāṁ mahākape।
tejasā tasya nirdhūto na viṣādaṁ gatastataḥ॥

‘महाकपे! तीन सौ योजन ऊँचे जाने के बाद सूर्य के तेज से आक्रान्त होने पर भी तुम्हारे मन में खेद या चिन्ता नहीं हुई

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॥ ४ · ६६ · २३ ॥
त्वामप्युपगतं तूर्णमन्तरिक्षं महाकपे। क्षिप्तमिन्द्रेण ते वज्रं कोपाविष्टेन तेजसा॥

tvāmapyupagataṁ tūrṇamantarikṣaṁ mahākape।
kṣiptamindreṇa te vajraṁ kopāviṣṭena tejasā॥

‘कपिप्रवर! अन्तरिक्ष में जाकर जब तुरंत ही तुम सूर्य के पास पहुँच गये, तब इन्द्र ने कुपित होकर तुम्हारे ऊपर तेज से प्रकाशित वज्र का प्रहार किया

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॥ ४ · ६६ · २४ ॥
तदा शैलाग्रशिखरे वामो हनुरभज्यत। ततो हि नामधेयं ते हनुमानिति कीर्तितम्॥

tadā śailāgraśikhare vāmo hanurabhajyata।
tato hi nāmadheyaṁ te hanumāniti kīrtitam॥

‘उस समय उदयगिरि के शिखर पर तुम्हारे हनु (ठोड़ी) का बायाँ भाग वज्र की चोट से खण्डित हो गया। तभी से तुम्हारा नाम हनुमान् पड़ गया

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॥ ४ · ६६ · २५ ॥
ततस्त्वां निहतं दृष्ट्वा वायुर्गन्धवहः स्वयम्। त्रैलोक्यं भृशसंक्रुद्धो ववौ वै प्रभञ्जनः॥

tatastvāṁ nihataṁ dṛṣṭvā vāyurgandhavahaḥ svayam।
trailokyaṁ bhṛśasaṁkruddho na vavau vai prabhañjanaḥ॥

‘तुम पर प्रहार किया गया है, यह देखकर गन्धवाहक वायुदेवता को बड़ा क्रोध हुआ। उन प्रभञ्जनदेव ने तीनों लोकों में प्रवाहित होना छोड़ दिया

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॥ ४ · ६६ · २६ ॥
सम्भ्रान्ताश्च सुराः सर्वे त्रैलोक्ये क्षुभिते सति। प्रसादयन्ति संक्रुद्धं मारुतं भुवनेश्वराः॥

sambhrāntāśca surāḥ sarve trailokye kṣubhite sati।
prasādayanti saṁkruddhaṁ mārutaṁ bhuvaneśvarāḥ॥

‘इससे सम्पूर्ण देवता घबरा गये; क्योंकि वायु के अवरुद्ध हो जाने से तीनों लोकों में खलबली मच गयी थी। उस समय समस्त लोकपाल कुपित हुए वायुदेव को मनाने लगे

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॥ ४ · ६६ · २७ ॥
प्रसादिते पवने ब्रह्मा तुभ्यं वरं ददौ। अशस्त्रवध्यतां तात समरे सत्यविक्रम॥

prasādite ca pavane brahmā tubhyaṁ varaṁ dadau।
aśastravadhyatāṁ tāta samare satyavikrama॥

‘सत्यपराक्रमी तात! पवनदेव के प्रसन्न होने पर ब्रह्माजी ने तुम्हारे लिये यह वर दिया कि तुम समराङ्गण में किसी भी अस्त्र-शस्त्र के द्वारा मारे नहीं जा सकोगे

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॥ ४ · ६६ · २८ ॥
वज्रस्य निपातेन विरुजं त्वां समीक्ष्य च। सहस्रनेत्रः प्रीतात्मा ददौ ते वरमुत्तमम्॥ स्वच्छन्दतश्च मरणं तव स्यादिति वै प्रभो।

vajrasya ca nipātena virujaṁ tvāṁ samīkṣya ca।
sahasranetraḥ prītātmā dadau te varamuttamam॥
svacchandataśca maraṇaṁ tava syāditi vai prabho।

‘प्रभो! वज्र के प्रहार से भी तुम्हें पीड़ित न देखकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र के मन में बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने तुम्हारे लिये यह उत्तम वर दिया—‘मृत्यु तुम्हारी इच्छा के अधीन होगी—तुम जब चाहोगे, तभी मर सकोगे, अन्यथा नहीं’

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॥ ४ · ६६ · २९ ॥
त्वं केसरिणः पुत्रः क्षेत्रजो भीमविक्रमः॥ मारुतस्यौरसः पुत्रस्तेजसा चापि तत्समः।

sa tvaṁ kesariṇaḥ putraḥ kṣetrajo bhīmavikramaḥ॥
mārutasyaurasaḥ putrastejasā cāpi tatsamaḥ।

‘इस प्रकार तुम केसरी के क्षेत्रज पुत्र हो। तुम्हारा पराक्रम शत्रुओं के लिये भयंकर है। तुम वायुदेव के औरस पुत्र हो, इसलिये तेज की दृष्टि से भी उन्हींके समान हो

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॥ ४ · ६६ · ३० ॥
त्वं हि वायुसुतो वत्स प्लवने चापि तत्समः॥

tvaṁ hi vāyusuto vatsa plavane cāpi tatsamaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ६६ · ३१ ॥
वयमद्य गतप्राणा भवानस्मासु साम्प्रतम्। दाक्ष्यविक्रमसम्पन्नः कपिराज इवापरः॥

vayamadya gataprāṇā bhavānasmāsu sāmpratam।
dākṣyavikramasampannaḥ kapirāja ivāparaḥ॥

॥ ३०–३१ ॥

‘वत्स! तुम पवन के पुत्र हो, अतः छलाँग मारने में भी उन्हींके तुल्य हो। हमारी प्राणशक्ति अब चली गयी। इस समय तुम्हीं हमलोगों में दूसरे वानरराज की भाँति चातुर्य एवं पौरुष से सम्पन्न हो

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॥ ४ · ६६ · ३२ ॥
त्रिविक्रमे मया तात सशैलवनकानना। त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी परिक्रान्ता प्रदक्षिणम्॥

trivikrame mayā tāta saśailavanakānanā।
triḥsaptakṛtvaḥ pṛthivī parikrāntā pradakṣiṇam॥

‘तात! भगवान् वामन ने त्रिलोकी को नापने के लिये जब पैर बढ़ाया था, उस समय मैंने पर्वत, वन और काननोंसहित समूची पृथ्वी की इक्कीस बार प्रदक्षिणा की थी

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॥ ४ · ६६ · ३३ ॥
तथा चौषधयोऽस्माभिः संचिता देवशासनात्। निर्मथ्यममृतं याभिस्तदानीं नो महद्बलम्॥

tathā cauṣadhayo'smābhiḥ saṁcitā devaśāsanāt।
nirmathyamamṛtaṁ yābhistadānīṁ no mahadbalam॥

‘समुद्र-मन्थन के समय देवताओं की आज्ञा से हमने उन ओषधियों का संचय किया था, जिनके द्वारा अमृत को मथकर निकालना था। उन दिनों हममें महान् बल था

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॥ ४ · ६६ · ३४ ॥
इदानीमहं वृद्धः परिहीनपराक्रमः। साम्प्रतं कालमस्माकं भवान् सर्वगुणान्वितः॥

sa idānīmahaṁ vṛddhaḥ parihīnaparākramaḥ।
sāmprataṁ kālamasmākaṁ bhavān sarvaguṇānvitaḥ॥

‘अब तो मैं बूढ़ा हो गया हूँ। मेरा पराक्रम घट गया है। इस समय हमलोगों में तुम्हीं सब प्रकार के गुणों से सम्पन्न हो

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॥ ४ · ६६ · ३५ ॥
तद् विजृम्भस्व विक्रान्त प्लवतामुत्तमो ह्यसि। त्वद्वीर्यं द्रष्टुकामा हि सर्वा वानरवाहिनी॥

tad vijṛmbhasva vikrānta plavatāmuttamo hyasi।
tvadvīryaṁ draṣṭukāmā hi sarvā vānaravāhinī॥

‘अतः पराक्रमी वीर! तुम अपने असीम बल का विस्तार करो। छलाँग मारनेवालों में तुम सबसे श्रेष्ठ हो। यह सारी वानरसेना तुम्हारे बल-पराक्रम को देखना चाहती है

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॥ ४ · ६६ · ३६ ॥
उत्तिष्ठ हरिशार्दूल लङ्घयस्व महार्णवम्। परा हि सर्वभूतानां हनुमन् या गतिस्तव॥

uttiṣṭha hariśārdūla laṅghayasva mahārṇavam।
parā hi sarvabhūtānāṁ hanuman yā gatistava॥

‘वानरश्रेष्ठ हनुमान्! उठो और इस महासागर को लाँघ जाओ; क्योंकि तुम्हारी गति सभी प्राणियों से बढ़कर है

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॥ ४ · ६६ · ३७ ॥
विषण्णा हरयः सर्वे हनुमन् किमुपेक्षसे। विक्रमस्व महावेग विष्णुस्त्रीन् विक्रमानिव॥

viṣaṇṇā harayaḥ sarve hanuman kimupekṣase।
vikramasva mahāvega viṣṇustrīn vikramāniva॥

‘हनुमन्! समस्त वानर चिन्ता में पड़े हैं। तुम क्यों इनकी उपेक्षा करते हो? महान् वेगशाली वीर! जैसे भगवान् विष्णु ने त्रिलोकी को नापने के लिये तीन पग बढ़ाये थे, उसी प्रकार तुम भी अपने पैर बढ़ाओ’

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॥ ४ · ६६ · ३८ ॥
ततः कपीनामृषभेण चोदितः प्रतीतवेगः पवनात्मजः कपिः। प्रहर्षयंस्तां हरिवीरवाहिनीं चकार रूपं महदात्मनस्तदा॥

tataḥ kapīnāmṛṣabheṇa coditaḥ pratītavegaḥ pavanātmajaḥ kapiḥ।
praharṣayaṁstāṁ harivīravāhinīṁ cakāra rūpaṁ mahadātmanastadā॥

इस प्रकार वानरों और भालुओं में श्रेष्ठ जाम्बवान् की प्रेरणा पाकर कपिवर पवनकुमार हनुमान् को अपने महान् वेग पर विश्वास हो आया। उन्होंने वानर वीरों की उस सेना का हर्ष बढ़ाते हुए उस समय अपना विराट्रूप प्रकट किया

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः॥ ६६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६६ ॥