वाल्मीकि रामायणम् · किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

सर्गः ६५ · ३५ श्लोकाःSarga 65 · 35 ślokas

बारी-बारीसे वानर-वीरोंके द्वारा अपनी-अपनी गमनशक्तिका वर्णन, जाम्बवान् और अङ्गदकी बातचीत तथा जाम्बवान्का हनुमान्जीको प्रेरित करनेके लिये उनके पास जाना

॥ ४ · ६५ · १ ॥
अथाङ्गदवचः श्रुत्वा ते सर्वे वानरर्षभाः। स्वं स्वं गतौ समुत्साहमूचुस्तत्र यथाक्रमम्॥

athāṅgadavacaḥ śrutvā te sarve vānararṣabhāḥ।
svaṁ svaṁ gatau samutsāhamūcustatra yathākramam॥

अङ्गद की यह बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ वानर लम्बी छलाँग मारने के सम्बन्ध में अपने-अपने उत्साह का—शक्ति का क्रमशः परिचय देने लगे

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॥ ४ · ६५ · २ ॥
गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः। मैन्दश्च द्विविदश्चैव सुषेणो जाम्बवांस्तथा॥

gajo gavākṣo gavayaḥ śarabho gandhamādanaḥ।
maindaśca dvividaścaiva suṣeṇo jāmbavāṁstathā॥

गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, सुषेण और जाम्बवान्—इन सबने अपनी-अपनी शक्ति का वर्णन किया

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॥ ४ · ६५ · ३ ॥
आबभाषे गजस्तत्र प्लवेयं दशयोजनम्। गवाक्षो योजनान्याह गमिष्यामीति विंशतिम्॥

ābabhāṣe gajastatra plaveyaṁ daśayojanam।
gavākṣo yojanānyāha gamiṣyāmīti viṁśatim॥

इनमें से गज ने कहा—‘मैं दस योजन की छलाँग मार सकता हूँ।’ गवाक्ष बोले—‘मैं बीस योजनतक चला जाऊँगा’

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॥ ४ · ६५ · ४ ॥
शरभो वानरस्तत्र वानरांस्तानुवाच ह। त्रिंशतं तु गमिष्यामि योजनानां प्लवङ्गमाः॥

śarabho vānarastatra vānarāṁstānuvāca ha।
triṁśataṁ tu gamiṣyāmi yojanānāṁ plavaṅgamāḥ॥

इसके बाद वहाँ शरभ नामक वानर ने उन कपिवरों से कहा—‘वानरो! मैं तीस योजनतक एक छलाँग में चला जाऊँगा’

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॥ ४ · ६५ · ५ ॥
ऋषभो वानरस्तत्र वानरांस्तानुवाच ह। चत्वारिंशद् गमिष्यामि योजनानां संशयः॥

ṛṣabho vānarastatra vānarāṁstānuvāca ha।
catvāriṁśad gamiṣyāmi yojanānāṁ na saṁśayaḥ॥

तदनन्तर कपिवर ऋषभ ने उन वानरों से कहा—‘मैं चालीस योजनतक चला जाऊँगा, इसमें संशय नहीं है’

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॥ ४ · ६५ · ६ ॥
वानरांस्तु महातेजा अब्रवीद् गन्धमादनः। योजनानां गमिष्यामि पञ्चाशत्तु संशयः॥

vānarāṁstu mahātejā abravīd gandhamādanaḥ।
yojanānāṁ gamiṣyāmi pañcāśattu na saṁśayaḥ॥

तत्पश्चात् महातेजस्वी गन्धमादन ने उन वानरों से कहा—‘इसमें संदेह नहीं कि मैं पचास योजनतक एक छलाँग में चला जाऊँगा’

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॥ ४ · ६५ · ७ ॥
मैन्दस्तु वानरस्तत्र वानरांस्तानुवाच ह। योजनानां परं षष्टिमहं प्लवितुमुत्सहे॥

maindastu vānarastatra vānarāṁstānuvāca ha।
yojanānāṁ paraṁ ṣaṣṭimahaṁ plavitumutsahe॥

इसके बाद वहाँ वानर-वीर मैन्द उन वानरों से बोले—‘मैं साठ योजनतक एक छलाँग में कूद जाने का उत्साह रखता हूँ’

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॥ ४ · ६५ · ८ ॥
ततस्तत्र महातेजा द्विविदः प्रत्यभाषत। गमिष्यामि संदेहः सप्ततिं योजनान्यहम्॥

tatastatra mahātejā dvividaḥ pratyabhāṣata।
gamiṣyāmi na saṁdehaḥ saptatiṁ yojanānyaham॥

तदनन्तर महातेजस्वी द्विविद बोले—‘मैं सत्तर योजनतक चला जाऊँगा, इसमें संदेह नहीं है’

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॥ ४ · ६५ · ९ ॥
सुषेणस्तु महातेजाः सत्त्ववान् कपिसत्तमः। अशीतिं प्रतिजानेऽहं योजनानां पराक्रमे॥

suṣeṇastu mahātejāḥ sattvavān kapisattamaḥ।
aśītiṁ pratijāne'haṁ yojanānāṁ parākrame॥

इसके बाद धैर्यशाली कपिश्रेष्ठ महातेजस्वी सुषेण बोले—‘मैं एक छलाँग में असी योजनतक जाने की प्रतिज्ञा करता हूँ’

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॥ ४ · ६५ · १० ॥
तेषां कथयतां तत्र सर्वांस्ताननुमान्य च। ततो वृद्धतमस्तेषां जाम्बवान् प्रत्यभाषत॥

teṣāṁ kathayatāṁ tatra sarvāṁstānanumānya ca।
tato vṛddhatamasteṣāṁ jāmbavān pratyabhāṣata॥

इस प्रकार कहनेवाले सब वानरों का सम्मान करके ऋक्षराज जाम्बवान्, जो सबसे बूढ़े थे, बोले—

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॥ ४ · ६५ · ११ ॥
पूर्वमस्माकमप्यासीत् कश्चिद् गतिपराक्रमः। ते वयं वयसः पारमनुप्राप्ताः स्म साम्प्रतम्॥

pūrvamasmākamapyāsīt kaścid gatiparākramaḥ।
te vayaṁ vayasaḥ pāramanuprāptāḥ sma sāmpratam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ६५ · १२ ॥
किं तु नैवं गते शक्यमिदं कार्यमुपेक्षितुम्। यदर्थं कपिराजश्च रामश्च कृतनिश्चयौ॥

kiṁ tu naivaṁ gate śakyamidaṁ kāryamupekṣitum।
yadarthaṁ kapirājaśca rāmaśca kṛtaniścayau॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ६५ · १३ ॥
साम्प्रतं कालमस्माकं या गतिस्तां निबोधत। नवतिं योजनानां तु गमिष्यामि संशयः॥

sāmprataṁ kālamasmākaṁ yā gatistāṁ nibodhata।
navatiṁ yojanānāṁ tu gamiṣyāmi na saṁśayaḥ॥

॥ ११–१३ ॥

‘पहले युवावस्था में मेरे अंदर भी दूरतक छलाँग मारने की कुछ शक्ति थी। यद्यपि अब मैं उस अवस्था को पार कर चुका हूँ तो भी जिस कार्य के लिये वानरराज सुग्रीव तथा भगवान् श्रीराम दृढ निश्चय कर चुके हैं, उसकी मेरे द्वारा उपेक्षा नहीं की जा सकती। इस समय मेरी जो गति है, उसे आपलोग सुनें। मैं एक छलाँग में नब्बे योजनतक चला जाऊँगा, इसमें संशय नहीं है’

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॥ ४ · ६५ · १४ ॥
तांश्च सर्वान् हरिश्रेष्ठाञ्जाम्बवानिदमब्रवीत्। खल्वेतावदेवासीद् गमने मे पराक्रमः॥

tāṁśca sarvān hariśreṣṭhāñjāmbavānidamabravīt।
na khalvetāvadevāsīd gamane me parākramaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ६५ · १५ ॥
मया वैरोचने यज्ञे प्रभविष्णुः सनातनः। प्रदक्षिणीकृतः पूर्वं क्रममाणस्त्रिविक्रमम्॥

mayā vairocane yajñe prabhaviṣṇuḥ sanātanaḥ।
pradakṣiṇīkṛtaḥ pūrvaṁ kramamāṇastrivikramam॥

॥ १४–१५ ॥

ऐसा कहकर जाम्बवान् उन समस्त श्रेष्ठ वानरों से पुनः इस प्रकार बोले—‘पूर्वकाल में मेरे अंदर इतनी ही दूरतक चलने की शक्ति नहीं थी। पहले राजा बलि के यज्ञ में सर्वव्यापी एवं सबके कारणभूत सनातन भगवान् विष्णु जब तीन पग भूमि नापने के लिये अपने पैर बढ़ा रहे थे, उस समय मैंने उनके उस विराट् स्वरूप की थोड़े ही समय में परिक्रमा कर ली थी

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॥ ४ · ६५ · १६ ॥
इदानीमहं वृद्धः प्लवने मन्दविक्रमः। यौवने तदासीन्मे बलमप्रतिमं परम्॥

sa idānīmahaṁ vṛddhaḥ plavane mandavikramaḥ।
yauvane ca tadāsīnme balamapratimaṁ param॥

‘इस समय तो मैं बूढ़ा हो गया, अतः छलाँग मारने की मेरी शक्ति बहुत कम हो गयी है; किंतु युवावस्था में मेरे भीतर वह महान् बल था, जिसकी कहीं तुलना नहीं है

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॥ ४ · ६५ · १७ ॥
सम्प्रत्येतावदेवाद्य शक्यं मे गमने स्वतः। नैतावता संसिद्धिः कार्यस्यास्य भविष्यति॥

sampratyetāvadevādya śakyaṁ me gamane svataḥ।
naitāvatā ca saṁsiddhiḥ kāryasyāsya bhaviṣyati॥

‘आजकल तो मुझमें स्वतः चलने की इतनी ही शक्ति है, परंतु इतनी ही गति से समुद्रलङ्घनरूप इस वर्तमान कार्य की सिद्धि नहीं हो सकती’

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॥ ४ · ६५ · १८ ॥
अथोत्तरमुदारार्थमब्रवीदङ्गदस्तदा। अनुमान्य तदा प्राज्ञो जाम्बवन्तं महाकपिः॥

athottaramudārārthamabravīdaṅgadastadā।
anumānya tadā prājño jāmbavantaṁ mahākapiḥ॥

तदनन्तर बुद्धिमान् महाकपि अङ्गद ने उस समय जाम्बवान् का विशेष आदर करके यह उदारतापूर्ण बात कही—

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॥ ४ · ६५ · १९ ॥
अहमेतद् गमिष्यामि योजनानां शतं महत्। निवर्तने तु मे शक्तिः स्यान्न वेति निश्चितम्॥

ahametad gamiṣyāmi yojanānāṁ śataṁ mahat।
nivartane tu me śaktiḥ syānna veti na niścitam॥

‘मैं इस महासागर के सौ योजन की विशाल दूरी को लाँघ जाऊँगा, किंतु उधर से लौटने में मेरी ऐसी ही शक्ति रहेगी या नहीं, यह निश्चितरूप से नहीं कहा जा सकता’

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॥ ४ · ६५ · २० ॥
तमुवाच हरिश्रेष्ठं जाम्बवान् वाक्यकोविदः। ज्ञायते गमने शक्तिस्तव हर्यृक्षसत्तम॥

tamuvāca hariśreṣṭhaṁ jāmbavān vākyakovidaḥ।
jñāyate gamane śaktistava haryṛkṣasattama॥

तब बातचीत की कला में चतुर जाम्बवान् ने कपिश्रेष्ठ अङ्गद से कहा—‘रीछों और वानरों में श्रेष्ठ युवराज! तुम्हारी गमनशक्ति से हमलोग भलीभाँति परिचित हैं

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॥ ४ · ६५ · २१ ॥
कामं शतसहस्रं वा नह्येष विधिरुच्यते। योजनानां भवान् शक्तो गन्तुं प्रतिनिवर्तितुम्॥

kāmaṁ śatasahasraṁ vā nahyeṣa vidhirucyate।
yojanānāṁ bhavān śakto gantuṁ pratinivartitum॥

‘भले ही, तुम एक लाख योजनतक चले जाओ, तथापि तुम सबके स्वामी हो, अतः तुम्हें भेजना हमारे लिये उचित नहीं है। तुम लाखों योजन जाने और वहाँ से लौटने में समर्थ हो

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॥ ४ · ६५ · २२ ॥
नहि प्रेषयिता तात स्वामी प्रेष्यः कथंचन। भवतायं जनः सर्वः प्रेष्यः प्लवगसत्तम॥

nahi preṣayitā tāta svāmī preṣyaḥ kathaṁcana।
bhavatāyaṁ janaḥ sarvaḥ preṣyaḥ plavagasattama॥

‘किंतु तात! वानरशिरोमणे! जो सबको भेजनेवाला स्वामी है, वह किसी तरह प्रेष्य (आज्ञापालक) नहीं हो सकता। ये सब लोग तुम्हारे सेवक हैं, तुम इन्हींमें से किसीको भेजो

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॥ ४ · ६५ · २३ ॥
भवान् कलत्रमस्माकं स्वामिभावे व्यवस्थितः। स्वामी कलत्रं सैन्यस्य गतिरेषा परंतप॥

bhavān kalatramasmākaṁ svāmibhāve vyavasthitaḥ।
svāmī kalatraṁ sainyasya gatireṣā paraṁtapa॥

‘तुम कलत्र (स्त्री की भाँति रक्षणीय) हो, (जैसे नारी पति के हृदय की स्वामिनी होती है, उसी प्रकार) तुम हमारे स्वामी के पद पर प्रतिष्ठित हो। परंतप! स्वामी सेना के लिये कलत्र (स्त्री) के समान संरक्षणीय होता है। यही लोक की मान्यता है

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॥ ४ · ६५ · २४ ॥
अपि वै तस्य कार्यस्य भवान् मूलमरिंदम। तस्मात् कलत्रवत् तात प्रतिपाल्यः सदा भवान्॥

api vai tasya kāryasya bhavān mūlamariṁdama।
tasmāt kalatravat tāta pratipālyaḥ sadā bhavān॥

‘शत्रुदमन! तात! तुम्हीं उस कार्य के मूल हो, अतः सदा कलत्र की भाँति तुम्हारा पालन करना उचित है

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॥ ४ · ६५ · २५ ॥
मूलमर्थस्य संरक्ष्यमेष कार्यविदां नयः। मूले हि सति सिध्यन्ति गुणाः सर्वे फलोदयाः॥

mūlamarthasya saṁrakṣyameṣa kāryavidāṁ nayaḥ।
mūle hi sati sidhyanti guṇāḥ sarve phalodayāḥ॥

‘कार्य के मूल की रक्षा करनी चाहिये। यही कार्य के तत्त्व को जाननेवाले विद्वानों की नीति है; क्योंकि मूल के रहने पर ही सभी गुण सफल सिद्ध होते हैं

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॥ ४ · ६५ · २६ ॥
तद् भवानस्य कार्यस्य साधनं सत्यविक्रम। बुद्धिविक्रमसम्पन्नो हेतुरत्र परंतप॥

tad bhavānasya kāryasya sādhanaṁ satyavikrama।
buddhivikramasampanno heturatra paraṁtapa॥

‘अतः सत्यपराक्रमी शत्रुदमन वीर! तुम्हीं इस कार्य के साधन तथा बुद्धि और पराक्रम से सम्पन्न हेतु हो

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॥ ४ · ६५ · २७ ॥
गुरुश्च गुरुपुत्रश्च त्वं हि नः कपिसत्तम। भवन्तमाश्रित्य वयं समर्था ह्यर्थसाधने॥

guruśca guruputraśca tvaṁ hi naḥ kapisattama।
bhavantamāśritya vayaṁ samarthā hyarthasādhane॥

‘कपिश्रेष्ठ! तुम्हीं हमारे गुरु और गुरुपुत्र हो। तुम्हारा आश्रय लेकर ही हम सब लोग कार्यसाधन में समर्थ हो सकते हैं’

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॥ ४ · ६५ · २८ ॥
उक्तवाक्यं महाप्राज्ञं जाम्बवन्तं महाकपिः। प्रत्युवाचोत्तरं वाक्यं वालिसूनुरथाङ्गदः॥

uktavākyaṁ mahāprājñaṁ jāmbavantaṁ mahākapiḥ।
pratyuvācottaraṁ vākyaṁ vālisūnurathāṅgadaḥ॥

जब परम बुद्धिमान् जाम्बवान् पूर्वोक्त बात कह चुके, तब महाकपि वालिकुमार अङ्गद ने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—

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॥ ४ · ६५ · २९ ॥
यदि नाहं गमिष्यामि नान्यो वानरपुङ्गवः। पुनः खल्विदमस्माभिः कार्यं प्रायोपवेशनम्॥

yadi nāhaṁ gamiṣyāmi nānyo vānarapuṅgavaḥ।
punaḥ khalvidamasmābhiḥ kāryaṁ prāyopaveśanam॥

‘यदि मैं नहीं जाऊँगा और दूसरा कोई भी श्रेष्ठ वानर जाने को तैयार न होगा, तब फिर हमलोगों को निश्चितरूप से मरणान्त उपवास ही करना चाहिये

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॥ ४ · ६५ · ३० ॥
नह्यकृत्वा हरिपतेः संदेशं तस्य धीमतः। तत्रापि गत्वा प्राणानां पश्ये परिरक्षणम्॥

nahyakṛtvā haripateḥ saṁdeśaṁ tasya dhīmataḥ।
tatrāpi gatvā prāṇānāṁ na paśye parirakṣaṇam॥

‘बुद्धिमान् वानरराज सुग्रीव के आदेश का पालन किये बिना यदि हमलोग किष्किन्धा को लौट चलें तो वहाँ जाकर भी हमें अपने प्राणों की रक्षा का कोई उपाय नहीं दिखायी देता

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॥ ४ · ६५ · ३१ ॥
हि प्रसादे चात्यर्थकोपे हरिरीश्वरः। अतीत्य तस्य संदेशं विनाशो गमने भवेत्॥

sa hi prasāde cātyarthakope ca harirīśvaraḥ।
atītya tasya saṁdeśaṁ vināśo gamane bhavet॥

‘वे हमपर कृपा करने और अत्यन्त कुपित होकर हमें दण्ड देने में भी समर्थ हैं। उनकी आज्ञा का उल्लङ्घन करके जाने पर हमारा विनाश अवश्यम्भावी है

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॥ ४ · ६५ · ३२ ॥
तत्तथा ह्यस्य कार्यस्य भवत्यन्यथा गतिः। तद् भवानेव दृष्टार्थः संचिन्तयितुमर्हति॥

tattathā hyasya kāryasya na bhavatyanyathā gatiḥ।
tad bhavāneva dṛṣṭārthaḥ saṁcintayitumarhati॥

‘अतः जिस उपाय से इस सीता दर्शनरूपी कार्य की सिद्धि में कोई रुकावट न पड़े, उसका आप ही विचार करें; क्योंकि आपको सब बातों का अनुभव है’

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॥ ४ · ६५ · ३३ ॥
सोऽङ्गदेन तदा वीरः प्रत्युक्तः प्लवगर्षभः। जाम्बवानुत्तमं वाक्यं प्रोवाचेदं ततोऽङ्गदम्॥

so'ṅgadena tadā vīraḥ pratyuktaḥ plavagarṣabhaḥ।
jāmbavānuttamaṁ vākyaṁ provācedaṁ tato'ṅgadam॥

उस समय अङ्गद के ऐसा कहने पर वीर वानर-शिरोमणि जाम्बवान् ने उनसे यह उत्तम बात कही—

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॥ ४ · ६५ · ३४ ॥
तस्य ते वीर कार्यस्य किंचित् परिहास्यते। एष संचोदयाम्येनं यः कार्यं साधयिष्यति॥

tasya te vīra kāryasya na kiṁcit parihāsyate।
eṣa saṁcodayāmyenaṁ yaḥ kāryaṁ sādhayiṣyati॥

‘वीर! तुम्हारे इस कार्य में कोई किंचित् भी त्रुटि नहीं आने पायेगी। अब मैं ऐसे वीर को प्रेरित कर रहा हूँ, जो इस कार्य को सिद्ध कर सकेगा’

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॥ ४ · ६५ · ३५ ॥
ततः प्रतीतं प्लवतां वरिष्ठमेकान्तमाश्रित्य सुखोपविष्टम्। संचोदयामास हरिप्रवीरो हरिप्रवीरं हनुमन्तमेव॥

tataḥ pratītaṁ plavatāṁ variṣṭhamekāntamāśritya sukhopaviṣṭam।
saṁcodayāmāsa haripravīro haripravīraṁ hanumantameva॥

ऐसा कहकर वानरों और भालुओं के वीर यूथपति जाम्बवान् ने वानरसेना के श्रेष्ठ वीर हनुमान्जी को ही प्रेरित किया, जो एकान्त में जाकर मौज से बैठे हुए थे। उन्हें किसी बात की चिन्ता नहीं थी और वे दूरतक की छलाँग मारनेवालों में सबसे श्रेष्ठ थे

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः॥ ६५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६५ ॥