वाल्मीकि रामायणम् · किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

सर्गः ६३ · १५ श्लोकाःSarga 63 · 15 ślokas

सम्पातिका पंखयुक्त होकर वानरोंको उत्साहित करके उड़ जाना और वानरोंका वहाँसे दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान करना

॥ ४ · ६३ · १ ॥
एतैरन्यैश्च बहुभिर्वाक्यैर्वाक्यविशारदः। मां प्रशस्याभ्यनुज्ञाप्य प्रविष्टः स्वमालयम्॥

etairanyaiśca bahubhirvākyairvākyaviśāradaḥ।
māṁ praśasyābhyanujñāpya praviṣṭaḥ sa svamālayam॥

‘बातचीत की कला में चतुर महर्षि निशाकर ने ये तथा और भी बहुत-सी बातें कहकर मुझे समझाया और श्रीरामकार्य में सहायक बनने के कारण मेरे सौभाग्य की सराहना की। तत्पश्चात् मेरी अनुमति लेकर वे अपने आश्रम के भीतर चले गये

English translation coming soon.

॥ ४ · ६३ · २ ॥
कन्दरात् तु विसर्पित्वा पर्वतस्य शनैः शनैः। अहं विन्ध्यं समारुह्य भवतः प्रतिपालये॥

kandarāt tu visarpitvā parvatasya śanaiḥ śanaiḥ।
ahaṁ vindhyaṁ samāruhya bhavataḥ pratipālaye॥

‘तदनन्तर कन्दरा से धीरे-धीरे निकलकर मैं विन्ध्य पर्वत के शिखर पर चढ़ आया और तब से तुम लोगों के आने की बाट देख रहा हूँ

English translation coming soon.

॥ ४ · ६३ · ३ ॥
अद्य त्वेतस्य कालस्य वर्षं साग्रशतं गतम्। देशकालप्रतीक्षोऽस्मि हृदि कृत्वा मुनेर्वचः॥

adya tvetasya kālasya varṣaṁ sāgraśataṁ gatam।
deśakālapratīkṣo'smi hṛdi kṛtvā munervacaḥ॥

‘मुनि से बातचीत के बाद आजतक जो समय बीता है, इसमें आठ हजार से अधिक वर्ष निकल गये। मुनि के कथन को हृदय में धारण करके मैं देश-काल की प्रतीक्षा कर रहा हूँ

English translation coming soon.

॥ ४ · ६३ · ४ ॥
महाप्रस्थानमासाद्य स्वर्गते तु निशाकरे। मां निर्दहति संतापो वितर्कैर्बहुभिर्वृतम्॥

mahāprasthānamāsādya svargate tu niśākare।
māṁ nirdahati saṁtāpo vitarkairbahubhirvṛtam॥

‘निशाकर मुनि महाप्रस्थान करके जब स्वर्गलोक को चले गये, तभी से मैं अनेक प्रकार के तर्क-वितर्कों से घिर गया। संताप की आग मुझे रात-दिन जलाती रहती है

English translation coming soon.

॥ ४ · ६३ · ५ ॥
उदितां मरणे बुद्धिं मुनिवाक्यैर्निवर्तये। बुद्धिर्या तेन मे दत्ता प्राणानां रक्षणे मम॥ सा मेऽपनयते दुःखं दीप्तेवाग्निशिखा तमः।

uditāṁ maraṇe buddhiṁ munivākyairnivartaye।
buddhiryā tena me dattā prāṇānāṁ rakṣaṇe mama॥
sā me'panayate duḥkhaṁ dīptevāgniśikhā tamaḥ।

‘मेरे मन में कई बार प्राण त्यागने की इच्छा हुई, किंतु मुनि के वचनों को याद करके मैं उस संकल्प को टालता आया हूँ। उन्होंने मुझे प्राणों को रखने के लिये जो बुद्धि (सम्मति) दी थी, वह मेरे दुःख को उसी प्रकार दूर कर देती है, जैसे जलती हुई अग्निशिखा अन्धकार को

English translation coming soon.

॥ ४ · ६३ · ६ ॥
बुध्यता मया वीर्यं रावणस्य दुरात्मनः॥ पुत्रः संतर्जितो वाग्भिर्न त्राता मैथिली कथम्।

budhyatā ca mayā vīryaṁ rāvaṇasya durātmanaḥ॥
putraḥ saṁtarjito vāgbhirna trātā maithilī katham।

‘दुरात्मा रावण में कितना बल है, इसे मैं जानता हूँ। इसलिये मैंने कठोर वचनोंद्वारा अपने पुत्र को डाँटा था कि तूने मिथिलेशकुमारी सीता की रक्षा क्यों नहीं की

English translation coming soon.

॥ ४ · ६३ · ७ ॥
तस्या विलपितं श्रुत्वा तौ सीतावियोजितौ॥ मे दशरथस्नेहात् पुत्रेणोत्पादितं प्रियम्।

tasyā vilapitaṁ śrutvā tau ca sītāviyojitau॥
na me daśarathasnehāt putreṇotpāditaṁ priyam।

‘सीता का विलाप सुनकर और उनसे बिछुड़े हुए श्रीराम तथा लक्ष्मण का परिचय पाकर तथा राजा दशरथ के प्रति मेरे स्नेह का स्मरण करके भी मेरे पुत्र ने जो सीता की रक्षा नहीं की, अपने इस बर्ताव से उसने मुझे प्रसन्न नहीं किया—मेरा प्रिय कार्य नहीं होने दिया’

English translation coming soon.

॥ ४ · ६३ · ८ ॥
तस्य त्वेवं ब्रुवाणस्य संहतैर्वानरैः सह॥ उत्पेततुस्तदा पक्षौ समक्षं वनचारिणाम्।

tasya tvevaṁ bruvāṇasya saṁhatairvānaraiḥ saha॥
utpetatustadā pakṣau samakṣaṁ vanacāriṇām।

वहाँ एकत्र होकर बैठे हुए वानरों के साथ सम्पाति इस प्रकार बातें कर ही रहे थे कि उन वनचारी वानरों के समक्ष उसी समय उनके दो नये पंख निकल आये

English translation coming soon.

॥ ४ · ६३ · ९ ॥
दृष्ट्वा स्वां तनुं पक्षैरुद्गतैररुणच्छदैः॥ प्रहर्षमतुलं लेभे वानरांश्चेदमब्रवीत्।

sa dṛṣṭvā svāṁ tanuṁ pakṣairudgatairaruṇacchadaiḥ॥
praharṣamatulaṁ lebhe vānarāṁścedamabravīt।

अपने शरीर को नये निकले हुए लाल रंग के पंखों से संयुक्त हुआ देख सम्पाति को अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ। वे वानरों से इस प्रकार बोले—

English translation coming soon.

॥ ४ · ६३ · १० ॥
निशाकरस्य राजर्षेः प्रसादादमितौजसः॥ आदित्यरश्मिनिर्दग्धौ पक्षौ पुनरुपस्थितौ।

niśākarasya rājarṣeḥ prasādādamitaujasaḥ॥
ādityaraśminirdagdhau pakṣau punarupasthitau।

‘कपिवरो! अमिततेजस्वी राजर्षि निशाकर के प्रसाद से सूर्य-किरणोंद्वारा दग्ध हुए मेरे दोनों पंख फिर उत्पन्न हो गये

English translation coming soon.

॥ ४ · ६३ · ११ ॥
यौवने वर्तमानस्य ममासीद् यः पराक्रमः॥ तमेवाद्यावगच्छामि बलं पौरुषमेव च।

yauvane vartamānasya mamāsīd yaḥ parākramaḥ॥
tamevādyāvagacchāmi balaṁ pauruṣameva ca।

‘युवावस्था में मेरा जैसा पराक्रम और बल था, वैसे ही बल और पुरुषार्थ का इस समय मैं अनुभव कर रहा हूँ

English translation coming soon.

॥ ४ · ६३ · १२ ॥
सर्वथा क्रियतां यत्नः सीतामधिगमिष्यथ॥ पक्षलाभो ममायं वः सिद्धिप्रत्ययकारकः।

sarvathā kriyatāṁ yatnaḥ sītāmadhigamiṣyatha॥
pakṣalābho mamāyaṁ vaḥ siddhipratyayakārakaḥ।

‘वानरो! तुम सब प्रकार से यत्न करो। निश्चय ही तुम्हें सीता का दर्शन प्राप्त होगा। मुझे पंखों का प्राप्त होना तुमलोगों की कार्य-सिद्धि का विश्वास दिलानेवाला है’

English translation coming soon.

॥ ४ · ६३ · १३ ॥
इत्युक्त्वा तान् हरीन् सर्वान् सम्पातिः पतगोत्तमः॥ उत्पपात गिरेः शृङ्गाज्जिज्ञासुः खगमो गतिम्।

ityuktvā tān harīn sarvān sampātiḥ patagottamaḥ॥
utpapāta gireḥ śṛṅgājjijñāsuḥ khagamo gatim।

उन समस्त वानरों से ऐसा कहकर पक्षियों में श्रेष्ठ सम्पाति अपने आकाश-गमन की शक्ति का परिचय पाने के लिये उस पर्वतशिखर से उड़ गये

English translation coming soon.

॥ ४ · ६३ · १४ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा प्रतिसंहृष्टमानसाः। बभूवुर्हरिशार्दूला विक्रमाभ्युदयोन्मुखाः॥

tasya tad vacanaṁ śrutvā pratisaṁhṛṣṭamānasāḥ।
babhūvurhariśārdūlā vikramābhyudayonmukhāḥ॥

उनकी वह बात सुनकर उन श्रेष्ठ वानरों का हृदय प्रसन्नता से खिल उठा। वे पराक्रमसाध्य अभ्युदय के लिये उद्यत हो गये

English translation coming soon.

॥ ४ · ६३ · १५ ॥
अथ पवनसमानविक्रमाः प्लवगवराः प्रतिलब्धपौरुषाः। अभिजिदभिमुखां दिशं ययुरजनकसुतापरिमार्गणोन्मुखाः॥

atha pavanasamānavikramāḥ plavagavarāḥ pratilabdhapauruṣāḥ।
abhijidabhimukhāṁ diśaṁ yayurajanakasutāparimārgaṇonmukhāḥ॥

तदनन्तर वायु के समान पराक्रमी वे श्रेष्ठ वानर अपने भूले हुए पुरुषार्थ को फिर से पा गये और जनकनन्दिनी सीता की खोज के लिये उत्सुक हो अभिजित् नक्षत्र से युक्त दक्षिण दिशा की ओर चल दिये

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः॥ ६३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६३ ॥