वाल्मीकि रामायणम् · किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

सर्गः ६१ · १७ श्लोकाःSarga 61 · 17 ślokas

सम्पातिका निशाकर मुनिको अपने पंखके जलनेका कारण बताना

॥ ४ · ६१ · १ ॥
ततस्तद् दारुणं कर्म दुष्करं सहसा कृतम्। आचचक्षे मुनेः सर्वं सूर्यानुगमनं तथा॥

tatastad dāruṇaṁ karma duṣkaraṁ sahasā kṛtam।
ācacakṣe muneḥ sarvaṁ sūryānugamanaṁ tathā॥

‘उनके इस प्रकार पूछने पर मैंने बिना सोचे-समझे सूर्य का अनुगमनरूप जो दुष्कर एवं दारुण कार्य किया था, वह सब उन्हें बताया

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॥ ४ · ६१ · २ ॥
भगवन् व्रणयुक्तत्वाल्लज्जया चाकुलेन्द्रियः। परिश्रान्तो शक्रोमि वचनं परिभाषितुम्॥

bhagavan vraṇayuktatvāllajjayā cākulendriyaḥ।
pariśrānto na śakromi vacanaṁ paribhāṣitum॥

‘मैंने कहा—‘भगवन्! मेरे शरीर में घाव हो गया है तथा मेरी इन्द्रियाँ लज्जा से व्याकुल हैं, इसलिये अधिक कष्ट पाने के कारण मैं अच्छी तरह बात भी नहीं कर सकता

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॥ ४ · ६१ · ३ ॥
अहं चैव जटायुश्च संघर्षाद् गर्वमोहितौ। आकाशं पतितौ दूराज्जिज्ञासन्तौ पराक्रमम्॥

ahaṁ caiva jaṭāyuśca saṁgharṣād garvamohitau।
ākāśaṁ patitau dūrājjijñāsantau parākramam॥

‘मैं और जटायु दोनों ही गर्व से मोहित हो रहे थे; अतः अपने पराक्रम की थाह लगाने के लिये हम दोनों दूरतक पहुँचने के उद्देश्य से उड़ने लगे

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॥ ४ · ६१ · ४ ॥
कैलासशिखरे बद्ध्वा मुनीनामग्रतः पणम्। रविः स्यादनुयातव्यो यावदस्तं महागिरिम्॥

kailāsaśikhare baddhvā munīnāmagrataḥ paṇam।
raviḥ syādanuyātavyo yāvadastaṁ mahāgirim॥

‘कैलास पर्वत के शिखर पर मुनियों के सामने हम दोनों ने यह शर्त बदी थी कि सूर्य जबतक अस्ताचल पर जायँ, उसके पहले ही हम दोनों को उनके पास पहुँच जाना चाहिये

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॥ ४ · ६१ · ५ ॥
अप्यावां युगपत् प्राप्तावपश्याव महीतले। रथचक्रप्रमाणानि नगराणि पृथक् पृथक्॥

apyāvāṁ yugapat prāptāvapaśyāva mahītale।
rathacakrapramāṇāni nagarāṇi pṛthak pṛthak॥

‘यह निश्चय करके हम साथ ही आकाश में जा पहुँचे। वहाँ से पृथ्वी के भिन्न-भिन्न नगर में हम रथ के पहिये के बराबर दिखायी देते थे

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॥ ४ · ६१ · ६ ॥
क्वचिद् वादित्रघोषश्च क्वचिद् भूषणनिःस्वनः। गायन्तीः स्माङ्गना बह्वीः पश्यावो रक्तवाससः॥

kvacid vāditraghoṣaśca kvacid bhūṣaṇaniḥsvanaḥ।
gāyantīḥ smāṅganā bahvīḥ paśyāvo raktavāsasaḥ॥

‘ऊपर के लोकों में कहीं वाद्यों का मधुर घोष हो रहा था, कहीं आभूषणों की झनकारें सुनायी पड़ती थीं और कहीं लाल रंग की साड़ी पहने बहुत-सी सुन्दरियाँ गीत गा रही थीं, जिन्हें हम दोनों ने अपनी आँखों देखा था

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॥ ४ · ६१ · ७ ॥
तूर्णमुत्पत्य चाकाशमादित्यपदमास्थितौ। आवामालोकयावस्तद् वनं शाद्वलसंस्थितम्॥

tūrṇamutpatya cākāśamādityapadamāsthitau।
āvāmālokayāvastad vanaṁ śādvalasaṁsthitam॥

‘उससे भी ऊँचे उड़कर हम तुरंत सूर्य के मार्ग पर जा पहुँचे। वहाँ से नीचे दृष्टि डालकर जब दोनों ने देखा, तब यहाँ के जंगल हरी-हरी घास की तरह दिखायी देते थे

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॥ ४ · ६१ · ८ ॥
उपलैरिव संछन्ना दृश्यते भूः शिलोच्चयैः। आपगाभिश्च संवीता सूत्रैरिव वसुंधरा॥

upalairiva saṁchannā dṛśyate bhūḥ śiloccayaiḥ।
āpagābhiśca saṁvītā sūtrairiva vasuṁdharā॥

‘पर्वतों के कारण यह भूमि ऐसी जान पड़ती थी, मानो इसपर पत्थर बिछाये गये हों और नदियों से ढकी हुई भूमि ऐसी लगती थी, मानो उसमें सूत के धागे लपेटे गये हों

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॥ ४ · ६१ · ९ ॥
हिमवांश्चैव विन्ध्यश्च मेरुश्च सुमहागिरिः। भूतले सम्प्रकाशन्ते नागा इव जलाशये॥

himavāṁścaiva vindhyaśca meruśca sumahāgiriḥ।
bhūtale samprakāśante nāgā iva jalāśaye॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ६१ · १० ॥
तीव्रः स्वेदश्च खेदश्च भयं चासीत् तदावयोः। समाविशत मोहश्च ततो मूर्च्छा दारुणा॥

tīvraḥ svedaśca khedaśca bhayaṁ cāsīt tadāvayoḥ।
samāviśata mohaśca tato mūrcchā ca dāruṇā॥

॥ ९–१० ॥

‘भूतल पर हिमालय, मेरु और विन्ध्य आदि बड़े-बड़े पर्वत तालाब में खड़े हुए हाथियों के समान प्रतीत होते थे। उस समय हम दोनों भाइयों के शरीर से बहुत पसीना निकलने लगा। हमें बड़ी थकावट मालूम हुई। फिर तो हमारे ऊपर भय, मोह और भयानक मूर्च्छा ने अधिकार जमा लिया

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॥ ४ · ६१ · ११ ॥
दिग् ज्ञायते याम्या चाग्नेयी वारुणी। युगान्ते नियतो लोको हतो दग्ध इवाग्निना॥

na ca dig jñāyate yāmyā na cāgneyī na vāruṇī।
yugānte niyato loko hato dagdha ivāgninā॥

‘उस समय न दक्षिण दिशा का ज्ञान होता था, न अग्निकोण अथवा पश्चिम आदि दिशा का ही। यद्यपि यह जगत् नियमितरूप से स्थित था, तथापि उस समय मानो युगान्तकाल में अग्नि से दग्ध हो गया हो, इस प्रकार नष्टप्राय दिखायी देता था

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॥ ४ · ६१ · १२ ॥
मनश्च मे हतं भूयश्चक्षुः प्राप्य तु संश्रयम्। यत्नेन महता ह्यस्मिन् मनः संधाय चक्षुषी॥

manaśca me hataṁ bhūyaścakṣuḥ prāpya tu saṁśrayam।
yatnena mahatā hyasmin manaḥ saṁdhāya cakṣuṣī॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ६१ · १३ ॥
यत्नेन महता भूयो भास्करः प्रतिलोकितः। तुल्यपृथ्वीप्रमाणेन भास्करः प्रतिभाति नौ॥

yatnena mahatā bhūyo bhāskaraḥ pratilokitaḥ।
tulyapṛthvīpramāṇena bhāskaraḥ pratibhāti nau॥

॥ १२–१३ ॥

‘मेरा मन नेत्ररूपी आश्रय को पाकर उसके साथ ही हतप्राय हो गया—सूर्य के तेज से उसकी दर्शन-शक्ति लुप्त हो गयी। तदनन्तर महान् प्रयास करके मैंने पुनः मन और नेत्रों को सूर्यदेव में लगाया। इस प्रकार विशेष प्रयत्न करने पर फिर सूर्यदेव का दर्शन हुआ। वे हमें पृथ्वी के बराबर ही जान पड़ते थे

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॥ ४ · ६१ · १४ ॥
जटायुर्मामनापृच्छ्य निपपात महीं ततः। तं दृष्ट्वा तूर्णमाकाशादात्मानं मुक्तवानहम्॥

jaṭāyurmāmanāpṛcchya nipapāta mahīṁ tataḥ।
taṁ dṛṣṭvā tūrṇamākāśādātmānaṁ muktavānaham॥

‘जटायु मुझसे पूछे बिना ही पृथ्वी पर उतर पड़ा। उसे नीचे जाते देख मैंने भी तुरंत अपने-आपको आकाश से नीचे की ओर छोड़ दिया

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॥ ४ · ६१ · १५ ॥
पक्षाभ्यां मया गुप्तो जटायुर्न प्रदह्यत। प्रमादात् तत्र निर्दग्धः पतन् वायुपथादहम्॥

pakṣābhyāṁ ca mayā gupto jaṭāyurna pradahyata।
pramādāt tatra nirdagdhaḥ patan vāyupathādaham॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ६१ · १६ ॥
आशङ्के तं निपतितं जनस्थाने जटायुषम्। अहं तु पतितो विन्ध्ये दग्धपक्षो जडीकृतः॥

āśaṅke taṁ nipatitaṁ janasthāne jaṭāyuṣam।
ahaṁ tu patito vindhye dagdhapakṣo jaḍīkṛtaḥ॥

॥ १५–१६ ॥

‘मैंने अपने दोनों पंखों से जटायु को ढक लिया था, इसलिये वह जल न सका। मैं ही असावधानी के कारण वहाँ जल गया। वायु के पथ से नीचे गिरते समय मुझे ऐसा संदेह हुआ कि जटायु जनस्थान में गिरा है; परंतु मैं इस विन्ध्यपर्वत पर गिरा था। मेरे दोनों पंख जल गये थे, इसलिये यहाँ जडवत् हो गया

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॥ ४ · ६१ · १७ ॥
राज्याच्च हीनो भ्रात्रा पक्षाभ्यां विक्रमेण च। सर्वथा मर्तुमेवेच्छन् पतिष्ये शिखराद् गिरेः॥

rājyācca hīno bhrātrā ca pakṣābhyāṁ vikrameṇa ca।
sarvathā martumevecchan patiṣye śikharād gireḥ॥

‘राज्य से भ्रष्ट हुआ, भाई से बिछुड़ गया और पंख तथा पराक्रम से भी हाथ धो बैठा। अब मैं सर्वथा मरने की ही इच्छा से इस पर्वतशिखर से नीचे गिरूँगा’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः॥ ६१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें इकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६१ ॥