वाल्मीकि रामायणम् · किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

सर्गः ५५ · २३ श्लोकाःSarga 55 · 23 ślokas

अङ्गदसहित वानरोंका प्रायोपवेशन

॥ ४ · ५५ · १ ॥
श्रुत्वा हनुमतो वाक्यं प्रश्रितं धर्मसंहितम्। स्वामिसत्कारसंयुक्तमङ्गदो वाक्यमब्रवीत्॥

śrutvā hanumato vākyaṁ praśritaṁ dharmasaṁhitam।
svāmisatkārasaṁyuktamaṅgado vākyamabravīt॥

हनुमान्जी का वचन विनययुक्त, धर्मानुकूल और स्वामी के प्रति सम्मान से युक्त था। उसे सुनकर अङ्गद ने कहा—

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॥ ४ · ५५ · २ ॥
स्थैर्यमात्ममनःशौचमानृशंस्यमथार्जवम्। विक्रमश्चैव धैर्यं सुग्रीवे नोपपद्यते॥

sthairyamātmamanaḥśaucamānṛśaṁsyamathārjavam।
vikramaścaiva dhairyaṁ ca sugrīve nopapadyate॥

‘कपिश्रेष्ठ! राजा सुग्रीव में स्थिरता, शरीर और मन की पवित्रता, क्रूरता का अभाव, सरलता, पराक्रम और धैर्य है—यह मान्यता ठीक नहीं जान पड़ती

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॥ ४ · ५५ · ३ ॥
भ्रातुर्ज्येष्ठस्य यो भार्यां जीवतो महिषीं प्रियाम्। धर्मेण मातरं यस्तु स्वीकरोति जुगुप्सितः॥

bhrāturjyeṣṭhasya yo bhāryāṁ jīvato mahiṣīṁ priyām।
dharmeṇa mātaraṁ yastu svīkaroti jugupsitaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ५५ · ४ ॥
कथं धर्मं जानीते येन भ्रात्रा दुरात्मना। युद्धायाभिनियुक्तेन बिलस्य पिहितं मुखम्॥

kathaṁ sa dharmaṁ jānīte yena bhrātrā durātmanā।
yuddhāyābhiniyuktena bilasya pihitaṁ mukham॥

॥ ३–४ ॥

‘जिसने अपने बड़े भाई के जीते-जी उनकी प्यारी महारानी को, जो धर्मतः उसकी माता के समान थी, कुत्सित भावना से ग्रहण कर लिया था, वह धर्म को जानता है, यह कैसे कहा जा सकता है? जिस दुरात्मा ने युद्ध के लिये जाते हुए भाई के द्वारा बिल की रक्षा के कार्य में नियुक्त होने पर भी पत्थर से उसका मुँह बंद कर दिया, वह कैसे धर्मज्ञ माना जा सकता है?

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॥ ४ · ५५ · ५ ॥
सत्यात् पाणिगृहीतश्च कृतकर्मा महायशाः। विस्मृतो राघवो येन कस्य सुकृतं स्मरेत्॥

satyāt pāṇigṛhītaśca kṛtakarmā mahāyaśāḥ।
vismṛto rāghavo yena sa kasya sukṛtaṁ smaret॥

‘जिन्होंने सत्य को साक्षी देकर उसका हाथ पकड़ा और पहले ही उसका कार्य सिद्ध कर दिया, उन महायशस्वी भगवान् श्रीराम को ही जब उसने भुला दिया, तब दूसरे किसके उपकार को वह याद रख सकता है?

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॥ ४ · ५५ · ६ ॥
लक्ष्मणस्य भयेनेह नाधर्मभयभीरुणा। आदिष्टा मार्गितुं सीता धर्मस्तस्मिन् कथं भवेत्॥

lakṣmaṇasya bhayeneha nādharmabhayabhīruṇā।
ādiṣṭā mārgituṁ sītā dharmastasmin kathaṁ bhavet॥

‘जिसने अधर्म के भय से डरकर नहीं, लक्ष्मण के ही भय से भीत हो हमलोगों को सीता की खोज के लिये भेजा है, उसमें धर्म की सम्भावना कैसे हो सकती है?

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॥ ४ · ५५ · ७ ॥
तस्मिन् पापे कृतघ्ने तु स्मृतिभिन्ने चलात्मनि। आर्यः को विश्वसेज्जातु तत्कुलीनो विशेषतः॥

tasmin pāpe kṛtaghne tu smṛtibhinne calātmani।
āryaḥ ko viśvasejjātu tatkulīno viśeṣataḥ॥

‘उस पापी, कृतघ्न, स्मरण-शक्ति से हीन और चञ्चलचित्त सुग्रीव पर कोई श्रेष्ठ पुरुष, विशेषतः जो उसके कुल में उत्पन्न हुआ हो, कभी भी किस तरह विश्वास कर सकता है?

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॥ ४ · ५५ · ८ ॥
राज्ये पुत्रः प्रतिष्ठाप्यः सगुणो निर्गुणोऽपि वा। कथं शत्रुकुलीनं मां सुग्रीवो जीवयिष्यति॥

rājye putraḥ pratiṣṭhāpyaḥ saguṇo nirguṇo'pi vā।
kathaṁ śatrukulīnaṁ māṁ sugrīvo jīvayiṣyati॥

‘अपना पुत्र गुणवान् हो या गुणहीन, उसीको राज्य पर बिठाना चाहिये, ऐसी धारणा रखनेवाला सुग्रीव मुझ शत्रुकुल में उत्पन्न हुए बालक को कैसे जीवित रहने देगा?

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॥ ४ · ५५ · ९ ॥
भिन्नमन्त्रोऽपराद्धश्च भिन्नशक्तिः कथं ह्यहम्। किष्किन्धां प्राप्य जीवेयमनाथ इव दुर्बलः॥

bhinnamantro'parāddhaśca bhinnaśaktiḥ kathaṁ hyaham।
kiṣkindhāṁ prāpya jīveyamanātha iva durbalaḥ॥

‘सुग्रीव से अलग रहने का जो मेरा गूढ़ विचार था, वह आज प्रकट हो गया। साथ ही, उसकी आज्ञा का पालन न करने के कारण मैं अपराधी भी हूँ। इतना ही नहीं, मेरी शक्ति क्षीण हो गयी है। मैं अनाथ के समान दुर्बल हूँ। ऐसी दशा में किष्किन्धा में जाकर कैसे जीवित रह सकूँगा?

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॥ ४ · ५५ · १० ॥
उपांशुदण्डेन हि मां बन्धनेनोपपादयेत्। शठः क्रूरो नृशंसश्च सुग्रीवो राज्यकारणात्॥

upāṁśudaṇḍena hi māṁ bandhanenopapādayet।
śaṭhaḥ krūro nṛśaṁsaśca sugrīvo rājyakāraṇāt॥

‘सुग्रीव शठ, क्रूर और निर्दयी है। वह राज्य के लिये मुझे गुप्तरूप से दण्ड देगा अथवा सदा के लिये मुझे बन्धन में डाल देगा

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॥ ४ · ५५ · ११ ॥
बन्धनाच्चावसादान्मे श्रेयः प्रायोपवेशनम्। अनुजानन्तु मां सर्वे गृहं गच्छन्तु वानराः॥

bandhanāccāvasādānme śreyaḥ prāyopaveśanam।
anujānantu māṁ sarve gṛhaṁ gacchantu vānarāḥ॥

‘इस प्रकार बन्धनजनित कष्ट भोगने की अपेक्षा उपवास करके प्राण दे देना ही मेरे लिये श्रेयस्कर है। अतः सब वानर मुझे यहीं रहने की आज्ञा दें और अपने-अपने घर को चले जायँ

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॥ ४ · ५५ · १२ ॥
अहं वः प्रतिजानामि गमिष्याम्यहं पुरीम्। इहैव प्रायमासिष्ये श्रेयो मरणमेव मे॥

ahaṁ vaḥ pratijānāmi na gamiṣyāmyahaṁ purīm।
ihaiva prāyamāsiṣye śreyo maraṇameva me॥

‘मैं आपलोगों से प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मैं किष्किन्धापुरी को नहीं जाऊँगा। यहीं मरणान्त उपवास करूँगा। मेरा मर जाना ही अच्छा है

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॥ ४ · ५५ · १३ ॥
अभिवादनपूर्वं तु राजा कुशलमेव च। अभिवादनपूर्वं तु राघवौ बलशालिनौ॥

abhivādanapūrvaṁ tu rājā kuśalameva ca।
abhivādanapūrvaṁ tu rāghavau balaśālinau॥

‘आपलोग राजा सुग्रीव को प्रणाम करके उनसे मेरा कुशल-समाचार कहियेगा। अपने बल के कारण शोभा पानेवाले दोनों रघुवंशी बन्धुओं से भी मेरा सादर प्रणाम निवेदन करते हुए कुशल-समाचार कह दीजियेगा

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॥ ४ · ५५ · १४ ॥
वाच्यस्तातो यवीयान् मे सुग्रीवो वानरेश्वरः। आरोग्यपूर्वं कुशलं वाच्या माता रुमा मे॥

vācyastāto yavīyān me sugrīvo vānareśvaraḥ।
ārogyapūrvaṁ kuśalaṁ vācyā mātā rumā ca me॥

‘मेरे छोटे पिता वानरराज सुग्रीव और माता रुमा से भी मेरा आरोग्यपूर्वक कुशल-समाचार बताइयेगा

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॥ ४ · ५५ · १५ ॥
मातरं चैव मे तारामाश्वासयितुमर्हथ। प्रकृत्या प्रियपुत्रा सा सानुक्रोशा तपस्विनी॥

mātaraṁ caiva me tārāmāśvāsayitumarhatha।
prakṛtyā priyaputrā sā sānukrośā tapasvinī॥

‘मेरी माता तारा को भी धैर्य बँधाइयेगा। वह बेचारी स्वभाव से ही दयालु और पुत्र पर प्रेम रखनेवाली है

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॥ ४ · ५५ · १६ ॥
विनष्टमिह मां श्रुत्वा व्यक्तं हास्यति जीवितम्। एतावदुक्त्वा वचनं वृद्धांस्तानभिवाद्य च॥ विवेश चाङ्गदो भूमौ रुदन् दर्भेषु दुर्मनाः।

vinaṣṭamiha māṁ śrutvā vyaktaṁ hāsyati jīvitam।
etāvaduktvā vacanaṁ vṛddhāṁstānabhivādya ca॥
viveśa cāṅgado bhūmau rudan darbheṣu durmanāḥ।

‘यहाँ मेरे नष्ट होने का समाचार सुनकर वह निश्चय ही अपने प्राण त्याग देगी।’ इतना कहकर अङ्गद ने उन सभी बड़े-बूढ़े वानरों को प्रणाम किया और धरती पर कुश बिछाकर उदास मुँह से रोते-रोते वे मरणान्त उपवास के लिये बैठ गये

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॥ ४ · ५५ · १७ ॥
तस्य संविशतस्तत्र रुदन्तो वानरर्षभाः॥

tasya saṁviśatastatra rudanto vānararṣabhāḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ५५ · १८ ॥
नयनेभ्यः प्रमुमुचुरुष्णं वै वारि दुःखिताः। सुग्रीवं चैव निन्दन्तः प्रशंसन्तश्च वालिनम्॥ परिवार्याङ्गदं सर्वे व्यवसन् प्रायमासितुम्।

nayanebhyaḥ pramumucuruṣṇaṁ vai vāri duḥkhitāḥ।
sugrīvaṁ caiva nindantaḥ praśaṁsantaśca vālinam॥
parivāryāṅgadaṁ sarve vyavasan prāyamāsitum।

॥ १७–१८ ॥

उनके इस प्रकार बैठने पर सभी श्रेष्ठ वानर रोने लगे और दुःखी हो नेत्रों से गरम-गरम आँसू बहाने लगे। सुग्रीव की निन्दा और वाली की प्रशंसा करते हुए उन सबने अङ्गद को सब ओर से घेरकर आमरण उपवास करने का निश्चय किया

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॥ ४ · ५५ · १९ ॥
तद् वाक्यं वालिपुत्रस्य विज्ञाय प्लवगर्षभाः॥

tad vākyaṁ vāliputrasya vijñāya plavagarṣabhāḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ५५ · २० ॥
उपस्पृश्योदकं सर्वे प्राङ्मुखाः समुपाविशन्। दक्षिणाग्रेषु दर्भेषु उदक्तीरं समाश्रिताः॥ मुमूर्षवो हरिश्रेष्ठा एतत् क्षममिति स्म ह।

upaspṛśyodakaṁ sarve prāṅmukhāḥ samupāviśan।
dakṣiṇāgreṣu darbheṣu udaktīraṁ samāśritāḥ॥
mumūrṣavo hariśreṣṭhā etat kṣamamiti sma ha।

॥ १९–२० ॥

वालिकुमार के वचनों पर विचार करके उन वानरशिरोमणियों ने मरना ही उचित समझा और मृत्यु की इच्छा से आचमन करके समुद्र के उत्तर तट पर दक्षिणाग्र कुश बिछाकर वे सब-के-सब पूर्वाभिमुख हो बैठ गये

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॥ ४ · ५५ · २१ ॥
रामस्य वनवासं क्षयं दशरथस्य च॥

rāmasya vanavāsaṁ ca kṣayaṁ daśarathasya ca॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ५५ · २२ ॥
जनस्थानवधं चैव वधं चैव जटायुषः। हरणं चैव वैदेह्या वालिनश्च वधं तथा। रामकोपं वदतां हरीणां भयमागतम्॥

janasthānavadhaṁ caiva vadhaṁ caiva jaṭāyuṣaḥ।
haraṇaṁ caiva vaidehyā vālinaśca vadhaṁ tathā।
rāmakopaṁ ca vadatāṁ harīṇāṁ bhayamāgatam॥

॥ २१–२२ ॥

श्रीराम के वनवास, राजा दशरथ की मृत्यु, जनस्थानवासी राक्षसों के संहार, विदेहकुमारी सीता के अपहरण, जटायु के मरण, वाली के वध और श्रीराम के क्रोध की चर्चा करते हुए उन वानरों पर एक दूसरा ही भय आ पहुँचा

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॥ ४ · ५५ · २३ ॥
संविशद्भिर्बहुभिर्महीधरो महाद्रिकूटप्रतिमैः प्लवंगमैः। बभूव संनादितनिर्दरान्तरो भृशं नदद्भिर्जलदैरिवाम्बरम्॥

sa saṁviśadbhirbahubhirmahīdharo
mahādrikūṭapratimaiḥ plavaṁgamaiḥ।
babhūva saṁnāditanirdarāntaro
bhṛśaṁ nadadbhirjaladairivāmbaram॥

महान् पर्वत-शिखरों के समान शरीरवाले वहाँ बैठे हुए बहुसंख्यक वानर भय के मारे जोर-जोर से शब्द करने लगे, जिससे उस पर्वत की कन्दराओं का भीतरी भाग प्रतिध्वनित हो उठा और गर्जते हुए मेघों से युक्त आकाश के समान प्रतीत होने लगा

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः॥ ५५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५५ ॥