हनुमान्जीका भेदनीतिके द्वारा वानरोंको अपने पक्षमें करके अङ्गदको अपने साथ चलनेके लिये समझाना
tathā bruvati tāre tu tārādhipativarcasi।
atha mene hṛtaṁ rājyaṁ hanūmānaṅgadena tat॥
तारापति चन्द्रमा के समान तेजस्वी तार के ऐसा कहने पर हनुमान्जी ने यह माना कि अब अङ्गद ने वह राज्य (जो अबतक सुग्रीव के अधिकार में था) हर लिया (इस तरह वानरों में फूट पड़ने से बहुत-से वानर अङ्गद का साथ देंगे और बलवान् अङ्गद सुग्रीव को राज्य से वञ्चित कर देंगे—ऐसी सम्भावना का हनुमान्जी के मन में उदय हो गया)
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buddhyā hyaṣṭāṅgayā yuktaṁ caturbalasamanvitam।
caturdaśaguṇaṁ mene hanūmān vālinaḥ sutam॥
हनुमान्जी यह अच्छी तरह जानते थे कि वालिकुमार अङ्गद आठ गुणवाली बुद्धि से, चार प्रकार के बल से और चौदह गुणों से सम्पन्न हैं
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āpūryamāṇaṁ śaśvacca tejobalaparākramaiḥ।
śaśinaṁ śuklapakṣādau vardhamānamiva śriyā॥
वे तेज, बल और पराक्रम से सदा परिपूर्ण हो रहे हैं। शुक्ल पक्ष के आरम्भ में चन्द्रमा के समान राजकुमार अङ्गद की श्री दिनोदिन बढ़ रही है
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bṛhaspatisamaṁ buddhyā vikrame sadṛśaṁ pituḥ।
śuśrūṣamāṇaṁ tārasya śukrasyeva puraṁdaram॥
ये बुद्धि में बृहस्पति के समान और पराक्रम में अपने पिता वाली के तुल्य हैं। जैसे देवराज इन्द्र बृहस्पति के मुख से नीति की बातें सुनते हैं, उसी प्रकार ये अङ्गद तार की बातें सुनते हैं
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bharturarthe pariśrāntaṁ sarvaśāstraviśāradaḥ।
abhisaṁdhātumārebhe hanūmānaṅgadaṁ tataḥ॥
अपने स्वामी सुग्रीव का कार्य सिद्ध करने में ये परिश्रम (थकावट या शिथिलता) का अनुभव करते हैं। ऐसा विचारकर सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञान में निपुण हनुमान्जी ने अङ्गद को तार आदि वानरों की ओर से फोड़ने का प्रयत्न आरम्भ किया
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sa caturṇāmupāyānāṁ tṛtīyamupavarṇayan।
bhedayāmāsa tān sarvān vānarān vākyasampadā॥
वे साम, दाम, भेद और दण्ड—इन चार उपायों में से तीसरे का वर्णन करते हुए अपने युक्तियुक्त वाक्य-वैभव के द्वारा उन सभी वानरों को फोड़ने लगे
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teṣu sarveṣu bhinneṣu tato'bhīṣayadaṅgadam।
bhīṣaṇairvividhairvākyaiḥ kopopāyasamanvitaiḥ॥
जब वे सब वानर फूट गये, तब उन्होंने दण्डरूप चौथे उपाय से युक्त नाना प्रकार के भयदायक वचनोंद्वारा अङ्गद को डराना आरम्भ किया—
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tvaṁ samarthataraḥ pitrā yuddhe tāreya vai dhruvam।
dṛḍhaṁ dhārayituṁ śaktaḥ kapirājyaṁ yathā pitā॥
‘तारानन्दन! तुम युद्ध में अपने पिता के समान ही अत्यन्त शक्तिशाली हो—यह निश्चितरूप से सबको विदित है। जैसे तुम्हारे पिता वानरों का राज्य सँभालते थे, उसी प्रकार तुम भी उसे दृढ़तापूर्वक धारण करने में समर्थ हो
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nityamasthiracittā hi kapayo haripuṁgava।
nājñāpyaṁ viṣahiṣyanti putradāraṁ vinā tvayā॥
‘किंतु वानरशिरोमणे! ये कपिलोग सदा ही चञ्चलचित्त होते हैं। अपने स्त्री-पुत्रों से अलग रहकर तुम्हारी आज्ञा का पालन करना इनके लिये सह्य नहीं होगा
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tvāṁ naite hyanurañjeyuḥ pratyakṣaṁ pravadāmi te।
yathāyaṁ jāmbavān nīlaḥ suhotraśca mahākapiḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
nahyahaṁ te ime sarve sāmadānādibhirguṇaiḥ।
daṇḍena na tvayā śakyāḥ sugrīvādapakarṣitum॥
‘मैं तुम्हारे सामने कहता हूँ, ये कोई भी वानर सुग्रीव से विरोध करके तुम्हारे प्रति अनुरक्त नहीं हो सकते। जैसे ये जाम्बवान्, नील और महाकपि सुहोत्र हैं, उसी प्रकार मैं भी हूँ। मैं तथा ये सब लोग साम, दान आदि उपायोंद्वारा सुग्रीव से अलग नहीं किये जा सकते। तुम दण्ड के द्वारा भी हम सबको वानरराज से दूर कर सको, यह भी सम्भव नहीं है (अतः सुग्रीव तुम्हारी अपेक्षा प्रबल हैं)
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vigṛhyāsanamapyāhurdurbalena balīyasā।
ātmarakṣākarastasmānna vigṛhṇīta durbalaḥ॥
‘दुर्बल के साथ विरोध करके बलवान् पुरुष चुपचाप बैठा रहे, यह तो सम्भव है। परंतु किसी बलवान् से वैर बाँधकर कोई दुर्बल पुरुष कहीं भी सुख से नहीं रह सकता; अतः अपनी रक्षा चाहनेवाले दुर्बल पुरुष को बलवान् के साथ विग्रह नहीं करना चाहिये—यह नीतिज्ञ पुरुषों का कथन है
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yāṁ cemāṁ manyase dhātrīmetad bilamiti śrutam।
etallakṣmaṇabāṇānāmīṣat kāryaṁ vidāraṇam॥
‘तुम जो ऐसा मानने लगे हो कि यह गुफा हमें माता के समान अपनी गोद में छिपा लेगी, इसलिये हमारी रक्षा हो जायगी तथा इस बिल की अभेद्यता के विषय में जो तुमने तार के मुँह से कुछ सुना है, यह सब व्यर्थ है; क्योंकि इस गुफा को विदीर्ण कर देना लक्ष्मण के बाणों के लिये बायें हाथ का खेल है (अत्यन्त तुच्छ कार्य है)
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svalpaṁ hi kṛtamindreṇa kṣipatā hyaśaniṁ purā।
lakṣmaṇo niśitairbāṇairbhindyāt patrapuṭaṁ yathā॥
‘पूर्वकाल में यहाँ वज्र का प्रहार करके इन्द्र ने तो इस गुफा को बहुत थोड़ी हानि पहुँचायी थी; परंतु लक्ष्मण अपने पैने बाणोंद्वारा इसे पत्ते के दोने की भाँति विदीर्ण कर डालेंगे
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lakṣmaṇasya ca nārācā bahavaḥ santi tadvidhāḥ।
vajrāśanisamasparśā girīṇāmapi dārakāḥ॥
‘लक्ष्मण के पास ऐसे बहुत-से नाराच हैं, जिनका हलका-सा स्पर्श भी वज्र और अशनि के समान चोट पहुँचानेवाला है। वे नाराच पर्वतों को भी विदीर्ण कर सकते हैं
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avasthānaṁ yadaiva tvamāsiṣyasi paraṁtapa।
tadaiva harayaḥ sarve tyakṣyanti kṛtaniścayāḥ॥
‘शत्रुओं को संताप देनेवाले वीर! ज्यों ही तुम इस गुफा में रहना आरम्भ करोगे, त्यों ही ये सब वानर तुम्हें त्याग देंगे; क्योंकि इन्होंने ऐसा करने का निश्चय कर लिया है
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smarantaḥ putradārāṇāṁ nityodvignā bubhukṣitāḥ।
kheditā duḥkhaśayyābhistvāṁ kariṣyanti pṛṣṭhataḥ॥
‘ये अपने बाल-बच्चों को याद करके सदा उद्विग्न रहेंगे। जब यहाँ इन्हें भूख का कष्ट सहना पड़ेगा और दुःखद शय्या पर सोने या दुरवस्था में रहने के कारण इनके मन में खेद होगा, तब ये तुम्हें पीछे छोड़कर चल देंगे
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sa tvaṁ hīnaḥ suhṛdbhiśca hitakāmaiśca bandhubhiḥ।
tṛṇādapi bhṛśodvignaḥ spandamānād bhaviṣyasi॥
‘ऐसी दशा में तुम हितैषी बन्धुओं और सुहृदों के सहयोग से वञ्चित हो उड़ते हुए तिनके से भी तुच्छ हो जाओगे और सदा अधिक डरते रहोगे (अथवा हिलते हुए तिनके-से अत्यन्त भयभीत होते रहोगे)
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na ca jātu na hiṁsyustvāṁ ghorā lakṣmaṇasāyakāḥ।
apavṛttaṁ jighāṁsanto mahāvegā durāsadāḥ॥
‘लक्ष्मण के बाण घोर, महान् वेगशाली और दुर्जय हैं। श्रीराम के कार्य से विमुख होने पर तुम्हें कदापि मारे बिना नहीं रहेंगे
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asmābhistu gataṁ sārdhaṁ vinītavadupasthitam।
ānupūrvyāttu sugrīvo rājye tvāṁ sthāpayiṣyati॥
‘हमारे साथ चलकर जब तुम विनीत पुरुष की भाँति उनकी सेवा में उपस्थित होगे, तब सुग्रीव क्रमशः अपने बाद तुम्हींको राज्य पर बिठायेंगे
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dharmarājaḥ pitṛvyaste prītikāmo dṛḍhavrataḥ।
śuciḥ satyapratijñaśca sa tvāṁ jātu na nāśayet॥
‘तुम्हारे चाचा सुग्रीव धर्म के मार्ग पर चलनेवाले राजा हैं। वे सदा तुम्हारी प्रसन्नता चाहनेवाले, दृढ़व्रत, पवित्र और सत्यप्रतिज्ञ हैं। अतः कदापि तुम्हारा नाश नहीं कर सकते
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priyakāmaśca te mātustadarthaṁ cāsya jīvitam।
tasyāpatyaṁ ca nāstyanyat tasmādaṅgada gamyatām॥
‘अङ्गद! उनके मन में सदा तुम्हारी माता का प्रिय करने की इच्छा रहती है। उनकी प्रसन्नता के लिये ही वे जीवन धारण करते हैं। सुग्रीव के तुम्हारे सिवा कोई दूसरा पुत्र भी नहीं है, इसलिये तुम्हें उनके पास चलना चाहिये’
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५४ ॥