वाल्मीकि रामायणम् · किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

सर्गः ४६ · २४ श्लोकाःSarga 46 · 24 ślokas

सुग्रीवका श्रीरामचन्द्रजीको अपने भूमण्डल-भ्रमणका वृत्तान्त बताना

॥ ४ · ४६ · १ ॥
गतेषु वानरेन्द्रेषु रामः सुग्रीवमब्रवीत्। कथं भवान् विजानीते सर्वं वै मण्डलं भुवः॥

gateṣu vānarendreṣu rāmaḥ sugrīvamabravīt।
kathaṁ bhavān vijānīte sarvaṁ vai maṇḍalaṁ bhuvaḥ॥

उन समस्त वानरयूथपतियों के चले जाने पर श्रीरामचन्द्रजी ने सुग्रीव से पूछा—‘सखे! तुम समस्त भूमण्डल के स्थानों का परिचय कैसे जानते हो?’

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॥ ४ · ४६ · २ ॥
सुग्रीवश्च ततो राममुवाच प्रणतात्मवान्। श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये विस्तरेण वचो मम॥

sugrīvaśca tato rāmamuvāca praṇatātmavān।
śrūyatāṁ sarvamākhyāsye vistareṇa vaco mama॥

तब सुग्रीव ने विनीत होकर श्रीरामचन्द्रजी से कहा—‘भगवन्! मैं सब कुछ विस्तार के साथ बता रहा हूँ। मेरी बातें सुनिये

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॥ ४ · ४६ · ३ ॥
यदा तु दुन्दुभिं नाम दानवं महिषाकृतिम्। प्रतिकालयते वाली मलयं प्रति पर्वतम्॥

yadā tu dundubhiṁ nāma dānavaṁ mahiṣākṛtim।
pratikālayate vālī malayaṁ prati parvatam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ४६ · ४ ॥
तदा विवेश महिषो मलयस्य गुहां प्रति। विवेश वाली तत्रापि मलयं तज्जिघांसया॥

tadā viveśa mahiṣo malayasya guhāṁ prati।
viveśa vālī tatrāpi malayaṁ tajjighāṁsayā॥

॥ ३–४ ॥

‘जब वाली महिषरूपधारी दानव दुन्दुभि (उसके पुत्र मायावी) का पीछा कर रहे थे, उस समय वह महिष मलयपर्वत की ओर भागा और उस पर्वत की कन्दरा में घुस गया। यह देख वाली ने उसके वध की इच्छा से उस गुफा के भीतर भी प्रवेश किया

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॥ ४ · ४६ · ५ ॥
ततोऽहं तत्र निक्षिप्तो गुहाद्वारि विनीतवत्। निष्क्रामते वाली तदा संवत्सरे गते॥

tato'haṁ tatra nikṣipto guhādvāri vinītavat।
na ca niṣkrāmate vālī tadā saṁvatsare gate॥

‘उस समय मैं विनीतभाव से उस गुफा के द्वार पर खड़ा रहा; क्योंकि वाली ने मुझे वहीं रख छोड़ा था। परंतु एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी वाली उसके भीतर से नहीं निकले

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॥ ४ · ४६ · ६ ॥
ततः क्षतजवेगेन आपुपूरे तदा बिलम्। तदहं विस्मितो दृष्ट्वा भ्रातुः शोकविषार्दितः॥

tataḥ kṣatajavegena āpupūre tadā bilam।
tadahaṁ vismito dṛṣṭvā bhrātuḥ śokaviṣārditaḥ॥

‘तदनन्तर वेगपूर्वक बहे हुए रक्त की धारा से उस समय वह सारी गुफा भर गयी। यह देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ तथा मैं भाई के शोक से व्यथित हो उठा

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॥ ४ · ४६ · ७ ॥
अथाहं गतबुद्धिस्तु सुव्यक्तं निहतो गुरुः। शिला पर्वतसंकाशा बिलद्वारि मया कृता॥

athāhaṁ gatabuddhistu suvyaktaṁ nihato guruḥ।
śilā parvatasaṁkāśā biladvāri mayā kṛtā॥

‘फिर मेरी बुद्धि में यह बात आयी कि अब मेरे बड़े भाई निश्चय ही मारे गये। यह विचार पैदा होते ही मैंने उस गुफा के द्वार पर एक पहाड़-जैसी चट्टान रख दी

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॥ ४ · ४६ · ८ ॥
अशक्नुवन्निष्क्रमितुं महिषो विनशिष्यति। ततोऽहमागां किष्किन्धां निराशस्तस्य जीविते॥

aśaknuvanniṣkramituṁ mahiṣo vinaśiṣyati।
tato'hamāgāṁ kiṣkindhāṁ nirāśastasya jīvite॥

‘सोचा—इस शिला से द्वार बंद हो जाने पर मायावी निकल नहीं सकेगा, भीतर ही घुट-घुटकर मर जायगा। इसके बाद भाई के जीवन से निराश होकर मैं किष्किन्धापुरी में लौट आया

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॥ ४ · ४६ · ९ ॥
राज्यं सुमहत् प्राप्य तारां रुमया सह। मित्रैश्च सहितस्तत्र वसामि विगतज्वरः॥

rājyaṁ ca sumahat prāpya tārāṁ ca rumayā saha।
mitraiśca sahitastatra vasāmi vigatajvaraḥ॥

‘यहाँ विशाल राज्य तथा रुमासहित तारा को पाकर मित्रों के साथ मैं निश्चिन्ततापूर्वक रहने लगा

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॥ ४ · ४६ · १० ॥
आजगाम ततो वाली हत्वा तं वानरर्षभः। ततोऽहमददां राज्यं गौरवाद् भययन्त्रितः॥

ājagāma tato vālī hatvā taṁ vānararṣabhaḥ।
tato'hamadadāṁ rājyaṁ gauravād bhayayantritaḥ॥

‘तत्पश्चात् वानरश्रेष्ठ वाली उस दानव का वध करके आ पहुँचे। उनके आते ही मैंने भाई के गौरव से भयभीत हो वह राज्य उन्हें वापस कर दिया

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॥ ४ · ४६ · ११ ॥
मां जिघांसुर्दुष्टात्मा वाली प्रव्यथितेन्द्रियः। परिकालयते वाली धावन्तं सचिवैः सह॥

sa māṁ jighāṁsurduṣṭātmā vālī pravyathitendriyaḥ।
parikālayate vālī dhāvantaṁ sacivaiḥ saha॥

‘परंतु दुष्टात्मा वाली मुझे मार डालना चाहता था, उसकी सारी इन्द्रियाँ यह सोचकर व्यथित हो उठी थीं कि ‘यह मुझे मारने के लिये ही गुफा का द्वार बंद करके भाग आया था।’ मैं अपनी प्राण-रक्षा के लिये मन्त्रियों के साथ भागा और वाली मेरा पीछा करने लगा

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॥ ४ · ४६ · १२ ॥
ततोऽहं वालिना तेन सोऽनुबद्धः प्रधावितः। नदीश्च विविधाः पश्यन् वनानि नगराणि च॥

tato'haṁ vālinā tena so'nubaddhaḥ pradhāvitaḥ।
nadīśca vividhāḥ paśyan vanāni nagarāṇi ca॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ४६ · १३ ॥
आदर्शतलसंकाशा ततो वै पृथिवी मया। अलातचक्रप्रतिमा दृष्टा गोष्पदवत् कृता॥

ādarśatalasaṁkāśā tato vai pṛthivī mayā।
alātacakrapratimā dṛṣṭā goṣpadavat kṛtā॥

॥ १२–१३ ॥

‘वाली मेरे पीछे लगा रहा और मैं जोर-जोर को भागता गया। उसी समय मैंने विभिन्न नदियों, वनों और नगरों को देखते हुए सारी पृथ्वी को गाय की खुरी की भाँति मानकर उसकी परिक्रमा कर डाली। भागते समय मुझे यह पृथ्वी दर्पण और अलातचक्र के समान दिखायी दी

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॥ ४ · ४६ · १४ ॥
पूर्वां दिशं ततो गत्वा पश्यामि विविधान् द्रुमान्। पर्वतान् सदरीन् रम्यान् सरांसि विविधानि च॥

pūrvāṁ diśaṁ tato gatvā paśyāmi vividhān drumān।
parvatān sadarīn ramyān sarāṁsi vividhāni ca॥

‘तदनन्तर पूर्व दिशा में जाकर मैंने नाना प्रकार के वृक्ष, कन्दराओंसहित रमणीय पर्वत और भाँति-भाँति के सरोवर देखे

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॥ ४ · ४६ · १५ ॥
उदयं तत्र पश्यामि पर्वतं धातुमण्डितम्। क्षीरोदं सागरं चैव नित्यमप्सरसालयम्॥

udayaṁ tatra paśyāmi parvataṁ dhātumaṇḍitam।
kṣīrodaṁ sāgaraṁ caiva nityamapsarasālayam॥

‘वहीं नाना प्रकार के धातुओं से मण्डित उदयाचल तथा अप्सराओं के नित्य-निवासस्थान क्षीरोद सागर का भी मैंने दर्शन किया

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॥ ४ · ४६ · १६ ॥
परिकाल्यमानस्तु तदा वालिनाभिद्रुतो ह्यहम्। पुनरावृत्य सहसा प्रस्थितोऽहं तदा विभो॥

parikālyamānastu tadā vālinābhidruto hyaham।
punarāvṛtya sahasā prasthito'haṁ tadā vibho॥

‘उस समय वाली पीछा करते रहे और मैं भागता रहा। प्रभो! जब मैं यहाँ फिर लौटकर आया, तब वाली के डर से पुनः सहसा मुझे भागना पड़ा

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॥ ४ · ४६ · १७ ॥
दिशस्तस्यास्ततो भूयः प्रस्थितो दक्षिणां दिशम्। विन्ध्यपादपसंकीर्णां चन्दनद्रुमशोभिताम्॥

diśastasyāstato bhūyaḥ prasthito dakṣiṇāṁ diśam।
vindhyapādapasaṁkīrṇāṁ candanadrumaśobhitām॥

‘उस दिशा को छोड़कर मैं फिर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थित हुआ, जहाँ विन्ध्यपर्वत और नाना प्रकार के वृक्ष भरे हुए हैं तथा चन्दन के वृक्ष जिसकी शोभा बढ़ाते हैं

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॥ ४ · ४६ · १८ ॥
द्रुमशैलान्तरे पश्यन् भूयो दक्षिणतोऽपराम्। अपरां दिशं प्राप्तो वालिना समभिद्रुतः॥

drumaśailāntare paśyan bhūyo dakṣiṇato'parām।
aparāṁ ca diśaṁ prāpto vālinā samabhidrutaḥ॥

‘वृक्षों और पर्वतों की ओट में बारंबार वाली को देखकर मैंने दक्षिण दिशा को छोड़ दिया तथा वाली के खदेड़ने पर पश्चिम दिशा की शरण ली

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॥ ४ · ४६ · १९ ॥
पश्यन् विविधान् देशानस्तं गिरिसत्तमम्। प्राप्य चास्तं गिरिश्रेष्ठमुत्तरं सम्प्रधावितः॥

sa paśyan vividhān deśānastaṁ ca girisattamam।
prāpya cāstaṁ giriśreṣṭhamuttaraṁ sampradhāvitaḥ॥

‘वहाँ नाना प्रकार के देशों को देखता हुआ मैं गिरिश्रेष्ठ अस्ताचलतक जा पहुँचा। वहाँ पहुँचकर मैं पुनः उत्तर दिशा की ओर भागा

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॥ ४ · ४६ · २० ॥
हिमवन्तं मेरुं समुद्रं तथोत्तरम्। यदा विन्दे शरणं वालिना समभिद्रुतः॥ ततो मां बुद्धिसम्पन्नो हनुमान् वाक्यमब्रवीत्।

himavantaṁ ca meruṁ ca samudraṁ ca tathottaram।
yadā na vinde śaraṇaṁ vālinā samabhidrutaḥ॥
tato māṁ buddhisampanno hanumān vākyamabravīt।

‘हिमालय, मेरु और उत्तर समुद्रतक पहुँचकर भी जब वाली के पीछा करने के कारण मुझे कहीं शरण नहीं मिली, तब परम बुद्धिमान् हनुमान्जी ने मुझसे यह बात कही—

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॥ ४ · ४६ · २१ ॥
इदानीं मे स्मृतं राजन् यथा वाली हरीश्वरः॥

idānīṁ me smṛtaṁ rājan yathā vālī harīśvaraḥ॥

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॥ ४ · ४६ · २२ ॥
मतङ्गेन तदा शप्तो ह्यस्मिन्नाश्रममण्डले। प्रविशेद् यदि वै वाली मूर्धास्य शतधा भवेत्॥

mataṅgena tadā śapto hyasminnāśramamaṇḍale।
praviśed yadi vai vālī mūrdhāsya śatadhā bhavet॥

॥ २१–२२ ॥

“राजन्! इस समय मुझे उस घटना का स्मरण हो आया है, जैसा कि मतङ्गमुनि ने उन दिनों वानरराज वाली को शाप दिया था कि ‘यदि वाली इस आश्रम-मण्डल में प्रवेश करेगा तो उसके मस्तक के सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे’

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॥ ४ · ४६ · २३ ॥
तत्र वासः सुखोऽस्माकं निरुद्विग्नो भविष्यति। ततः पर्वतमासाद्य ऋष्यमूकं नृपात्मज॥ विवेश तदा वाली मतङ्गस्य भयात् तदा।

tatra vāsaḥ sukho'smākaṁ nirudvigno bhaviṣyati।
tataḥ parvatamāsādya ṛṣyamūkaṁ nṛpātmaja॥
na viveśa tadā vālī mataṅgasya bhayāt tadā।

“अतः वहीं निवास करना हमलोगों के लिये सुखद और निर्भय होगा”। राजकुमार! इस निश्चय के अनुसार हमलोग ऋष्यमूक पर्वत पर आकर रहने लगे। उस समय मतङ्ग ऋषि के भय से वाली ने वहाँ प्रवेश नहीं किया

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॥ ४ · ४६ · २४ ॥
एवं मया तदा राजन् प्रत्यक्षमुपलक्षितम्। पृथिवीमण्डलं सर्वं गुहामस्म्यागतस्ततः॥

evaṁ mayā tadā rājan pratyakṣamupalakṣitam।
pṛthivīmaṇḍalaṁ sarvaṁ guhāmasmyāgatastataḥ॥

‘राजन्! इस प्रकार मैंने उन दिनों समस्त भूमण्डल को प्रत्यक्ष देखा था। उसके बाद ऋष्यमूक की गुफा में आया था’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः॥ ४६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४६ ॥