वाल्मीकि रामायणम् · किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

सर्गः ४२ · ५८ श्लोकाःSarga 42 · 58 ślokas

सुग्रीवका पश्चिम दिशाके स्थानोंका परिचय देते हुए सुषेण आदि वानरोंको वहाँ भेजना

॥ ४ · ४२ · १ ॥
अथ प्रस्थाप्य हरीन्‌ सुग्रीवो दक्षिणां दिशम्‌। अब्रवीन्मेघसंकाशं सुषेणं नाम वानरम्‌॥

atha prasthāpya sa harīn‌ sugrīvo dakṣiṇāṁ diśam‌।
abravīnmeghasaṁkāśaṁ suṣeṇaṁ nāma vānaram‌॥

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॥ ४ · ४२ · २ ॥
तारायाः पितरं राजा श्वशुरं भीमविक्रमम्‌। अब्रवीत्‌ प्राञ्जलिर्वाक्यमभिगम्य प्रणम्य च॥

tārāyāḥ pitaraṁ rājā śvaśuraṁ bhīmavikramam‌।
abravīt‌ prāñjalirvākyamabhigamya praṇamya ca॥

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॥ ४ · ४२ · ३ ॥
महर्षिपुत्रं मारीचमर्चिष्मन्तं महाकपिम्‌। वृतं कपिवरैः शूरैर्महेन्द्रसदृशद्युतिम्‌॥

maharṣiputraṁ mārīcamarciṣmantaṁ mahākapim‌।
vṛtaṁ kapivaraiḥ śūrairmahendrasadṛśadyutim‌॥

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॥ ४ · ४२ · ४ ॥
बुद्धिविक्रमसम्पन्नं वैनतेयसमद्युतिम्‌। मरीचिपुत्रान्‌ मारीचानर्चिर्माल्यान्‌ महाबलान्‌॥

buddhivikramasampannaṁ vainateyasamadyutim‌।
marīciputrān‌ mārīcānarcirmālyān‌ mahābalān‌॥

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॥ ४ · ४२ · ५ ॥
ऋषिपुत्रांश्च तान्‌ सर्वान्‌ प्रतीचीमादिशद्‌ दिशम्‌। द्वाभ्यां शतसहस्राभ्यां कपीनां कपिसत्तमाः॥ सुषेणप्रमुखा यूयं वैदेहीं परिमार्गथ।

ṛṣiputrāṁśca tān‌ sarvān‌ pratīcīmādiśad‌ diśam‌।
dvābhyāṁ śatasahasrābhyāṁ kapīnāṁ kapisattamāḥ॥
suṣeṇapramukhā yūyaṁ vaidehīṁ parimārgatha।

॥ १–५ ॥

दक्षिण दिशा की ओर वानरों को भेजने के पश्चात्‌ राजा सुग्रीव ने तारा के पिता और अपने श्वशुर ‘सुषेण’ नामक वानर के पास जाकर उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कुछ कहना आरम्भ किया। सुषेण मेघ के समान काले और भयंकर पराक्रमी थे। उनके सिवा, महर्षि मरीचि के पुत्र महाकपि अर्चिष्मान्‌ भी वहाँ उपस्थित थे, जो देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी तथा शूरवीर श्रेष्ठ वानरों से घिरे हुए थे। उनकी कान्ति विनतानन्दन गरुड़ के समान थी। वे बुद्धि और पराक्रम से सम्पन्न थे। उनके अतिरिक्त मरीचि के पुत्र मारीच नामवाले वानर भी थे, जो महाबली और ‘अर्चिर्माल्य’ नाम से प्रसिद्ध थे। इनके सिवा और भी बहुत-से ऋषिकुमार थे, जो वानररूप में वहाँ विराजमान थे। सुषेण के साथ उन सबको सुग्रीव ने पश्चिम दिशा की ओर जाने की आज्ञा दी और कहा—‘कपिवरो! आप सब लोग दो लाख वानरों को साथ ले सुषेणजी की प्राधनता में पश्चिम को जाइये और विदेहनन्दिनी सीता की खोज कीजिये

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॥ ४ · ४२ · ६ ॥
सौराष्ट्रान्‌ सहबाह्लीकांश्चन्द्रचित्रांस्तथैव च॥

saurāṣṭrān‌ sahabāhlīkāṁścandracitrāṁstathaiva ca॥

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॥ ४ · ४२ · ७ ॥
स्फीताञ्जनपदान्‌ रम्यान्‌ विपुलानि पुराणि च। पुंनागगहनं कुक्षिं बकुलोद्दालकाकुलम्‌॥ तथा केतकषण्डांश्च मार्गध्वं हरिपुङ्गवाः।

sphītāñjanapadān‌ ramyān‌ vipulāni purāṇi ca।
puṁnāgagahanaṁ kukṣiṁ bakuloddālakākulam‌॥
tathā ketakaṣaṇḍāṁśca mārgadhvaṁ haripuṅgavāḥ।

॥ ६–७ ॥

‘श्रेष्ठ वानरो! सौराष्ट्र, बाहीक और चन्द्रचित्र आदि देशों, अन्यान्य समृद्धिशाली एवं रमणीय जनपदों, बड़े-बड़े नगरों तथा पुन्नाग, बकुल और उद्दालक आदि वृक्षों से भरे हुए कुक्षिदेश में एवं केवड़े के वनों में सीता की खोज करो

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॥ ४ · ४२ · ८ ॥
प्रत्यक्स्रोतोवहाश्चैव नद्यः शीतजलाः शिवाः॥ तापसानामरण्यानि कान्तारगिरयश्च ये।

pratyaksrotovahāścaiva nadyaḥ śītajalāḥ śivāḥ॥
tāpasānāmaraṇyāni kāntāragirayaśca ye।

‘पश्चिम की ओर बहनेवाली शीतल जल से सुशोभित कल्याणमयी नदियों, तपस्वी जनों के वनों तथा दुर्गम पर्वतों में भी विदेहकुमारी का पता लगाओ

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॥ ४ · ४२ · ९ ॥
तत्र स्थलीर्मरुप्राया अत्युच्चशिशिराः शिलाः॥

tatra sthalīrmaruprāyā atyuccaśiśirāḥ śilāḥ॥

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॥ ४ · ४२ · १० ॥
गिरिजालावृतां दुर्गां मार्गित्वा पश्चिमां दिशम्‌। ततः पश्चिममागम्य समुद्रं द्रष्टुमर्हथ॥ तिमिनक्राकुलजलं गत्वा द्रक्ष्यथ वानराः।

girijālāvṛtāṁ durgāṁ mārgitvā paścimāṁ diśam‌।
tataḥ paścimamāgamya samudraṁ draṣṭumarhatha॥
timinakrākulajalaṁ gatvā drakṣyatha vānarāḥ।

॥ ९–१० ॥

‘पश्चिम दिशा में प्रायः मरुभूमि है। अत्यन्त ऊँची और ठंढी शिलाएँ हैं तथा पर्वतमालाओं से घिरे हुए बहुत-से दुर्गम प्रदेश हैं। उन सभी स्थानों में सीता की खोज करते हुए क्रमशः आगे बढ़कर पश्चिम समुद्रतक जाना और वहाँ के प्रत्येक स्थान का निरीक्षण करना। वानरो! समुद्र का जल तिमि नामक मत्स्यों तथा बड़े-बड़े ग्राहों से भरा हुआ है। वहाँ सब ओर देख-भाल करना

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॥ ४ · ४२ · ११ ॥
ततः केतकषण्डेषु तमालगहनेषु च॥

tataḥ ketakaṣaṇḍeṣu tamālagahaneṣu ca॥

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॥ ४ · ४२ · १२ ॥
कपयो विहरिष्यन्ति नारिकेलवनेषु च। तत्र सीतां मार्गध्वं निलयं रावणस्य च॥

kapayo vihariṣyanti nārikelavaneṣu ca।
tatra sītāṁ ca mārgadhvaṁ nilayaṁ rāvaṇasya ca॥

॥ ११–१२ ॥

‘समुद्र के तट पर केवड़ों के कुञ्जों में, तमाल के काननों में तथा नारियल के वनों में तुम्हारे सैनिक वानर भलीभाँति विचरण करेंगे। वहाँ तुमलोग सीता को खोजना और रावण के निवास-स्थान का पता लगाना

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॥ ४ · ४२ · १३ ॥
वेलातलनिविष्टेषु पर्वतेषु वनेषु च। मुरवीपत्तनं चैव रम्यं चैव जटापुरम्‌॥

velātalaniviṣṭeṣu parvateṣu vaneṣu ca।
muravīpattanaṁ caiva ramyaṁ caiva jaṭāpuram‌॥

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॥ ४ · ४२ · १४ ॥
अवन्तीमङ्गलेपां तथा चालक्षितं वनम्‌। राष्ट्राणि विशालानि पत्तनानि ततस्ततः॥

avantīmaṅgalepāṁ ca tathā cālakṣitaṁ vanam‌।
rāṣṭrāṇi ca viśālāni pattanāni tatastataḥ॥

॥ १३–१४ ॥

‘समुद्रतटवर्ती पर्वतों और वनों में भी उन्हें ढूँढ़ना चाहिये। मुरवीपत्तन (मोरवी) तथा रमणीय जटापुर में, अवन्ती तथा अङ्गलेपापुरी में, अलक्षित वन में और बड़े-बड़े राष्ट्रों एवं नगरों में जहाँ-तहाँ घूमकर पता लगाना

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॥ ४ · ४२ · १५ ॥
सिन्धुसागरयोश्चैव संगमे तत्र पर्वतः। महान्‌ सोमगिरिर्नाम शतशृङ्गो महाद्रुमः॥

sindhusāgarayoścaiva saṁgame tatra parvataḥ।
mahān‌ somagirirnāma śataśṛṅgo mahādrumaḥ॥

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॥ ४ · ४२ · १६ ॥
तत्र प्रस्थेषु रम्येषु सिंहाः पक्षगमाः स्थिताः। तिमिमत्स्यगजांश्चैव नीडान्यारोपयन्ति ते॥

tatra prastheṣu ramyeṣu siṁhāḥ pakṣagamāḥ sthitāḥ।
timimatsyagajāṁścaiva nīḍānyāropayanti te॥

॥ १५–१६ ॥

‘सिंधु-नद और समुद्र के संगम पर सोमगिरि नामक एक महान्‌ पर्वत है, जिसके सौ शिखर हैं। वह पर्वत ऊँचे-ऊँचे वृक्षों से भरा है। उसकी रमणीय चोटियों पर सिंह नामक पक्षी रहते हैं। जो तिमि नामवाले विशालकाय मत्स्यों और हाथियों को भी अपने घोंसलों में उठा लाते हैं

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॥ ४ · ४२ · १७ ॥
तानि नीडानि सिंहानां गिरिशृङ्गगताश्च ये। दृप्तास्तृप्ताश्च मातङ्गास्तोयदस्वननिःस्वनाः॥ विचरन्ति विशालेऽस्मिंस्तोयपूर्णे समन्ततः।

tāni nīḍāni siṁhānāṁ giriśṛṅgagatāśca ye।
dṛptāstṛptāśca mātaṅgāstoyadasvananiḥsvanāḥ॥
vicaranti viśāle'smiṁstoyapūrṇe samantataḥ।

‘सिंह नामक पक्षियों के उन घोंसलों में पहुँचकर उस पर्वत-शिखर पर उपस्थित हुए जो हाथी हैं, वे उस पंखधारी सिंह से सम्मानित होने के कारण गर्व का अनुभव करते और मन-ही-मन संतुष्ट होते हैं। इसीलिये मेघों की गर्जना के समान शब्द करते हुए उस पर्वत के जलपूर्ण विशाल शिखर पर चारों ओर विचरते रहते हैं

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॥ ४ · ४२ · १८ ॥
तस्य शृङ्गं दिवस्पर्शं काञ्चनं चित्रपादपम्‌॥ सर्वमाशु विचेतव्यं कपिभिः कामरूपिभिः।

tasya śṛṅgaṁ divasparśaṁ kāñcanaṁ citrapādapam‌॥
sarvamāśu vicetavyaṁ kapibhiḥ kāmarūpibhiḥ।

‘सोमगिरि का गगनचुम्बी शिखर सुवर्णमय है। उसके ऊपर विचित्र वृक्ष शोभा पाते हैं। इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानरों को चाहिये कि वहाँ के सब स्थानों को शीघ्रतापूर्वक अच्छी तरह देख लें

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॥ ४ · ४२ · १९ ॥
कोटिं तत्र समुद्रस्य काञ्चनीं शतयोजनाम्‌॥ दुर्दर्शां पारियात्रस्य गत्वा द्रक्ष्यथ वानराः।

koṭiṁ tatra samudrasya kāñcanīṁ śatayojanām‌॥
durdarśāṁ pāriyātrasya gatvā drakṣyatha vānarāḥ।

‘वहाँ से आगे समुद्र के बीच में पारियात्र पर्वत का सुवर्णमय शिखर दिखायी देगा, जो सौ योजन विस्तृत है। वानरो! उसका दर्शन दूसरों के लिये अत्यन्त कठिन है। वहाँ जाकर तुम्हें सीता की खोज करनी चाहिये

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॥ ४ · ४२ · २० ॥
कोट्यस्तत्र चतुर्विंशद्‌ गन्धर्वाणां तरस्विनाम्‌॥

koṭyastatra caturviṁśad‌ gandharvāṇāṁ tarasvinām‌॥

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॥ ४ · ४२ · २१ ॥
वसन्त्यग्निनिकाशानां घोराणां कामरूपिणाम्‌। पावकार्चिःप्रतीकाशाः समवेताः समन्ततः॥

vasantyagninikāśānāṁ ghorāṇāṁ kāmarūpiṇām‌।
pāvakārciḥpratīkāśāḥ samavetāḥ samantataḥ॥

॥ २०–२१ ॥

‘पारियात्र पर्वत के शिखर पर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, भयंकर, अग्नितुल्य तेजस्वी तथा वेगशाली चौबीस करोड़ गन्धर्व निवास करते हैं। वे सब-के-सब अग्नि की ज्वाला के समान प्रकाशमान हैं और सब ओर से आकर उस पर्वत पर एकत्र हुए हैं

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॥ ४ · ४२ · २२ ॥
नात्यासादयितव्यास्ते वानरैर्भीमविक्रमैः। नादेयं फलं तस्माद्‌ देशात्‌ किंचित्‌ प्लवङ्गमैः॥

nātyāsādayitavyāste vānarairbhīmavikramaiḥ।
nādeyaṁ ca phalaṁ tasmād‌ deśāt‌ kiṁcit‌ plavaṅgamaiḥ॥

‘भयंकर पराक्रमी वानरों को चाहिये कि वे उन गन्धर्वों के अधिक निकट न जायँ—उनका कोई अपराध न करें और उस पर्वतशिखर से कोई फल न लें

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॥ ४ · ४२ · २३ ॥
दुरासदा हि ते वीराः सत्त्ववन्तो महाबलाः। फलमूलानि ते तत्र रक्षन्ते भीमविक्रमाः॥

durāsadā hi te vīrāḥ sattvavanto mahābalāḥ।
phalamūlāni te tatra rakṣante bhīmavikramāḥ॥

‘क्योंकि वे भयंकर बल-विक्रम से सम्पन्न धैर्यवान्‌ महाबली वीर गन्धर्व वहाँ के फल-मूलों की रक्षा करते हैं। उनपर विजय पाना बहुत ही कठिन है

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॥ ४ · ४२ · २४ ॥
तत्र यत्नश्च कर्तव्यो मार्गितव्या जानकी। नहि तेभ्यो भयं किंचित्‌ कपित्वमनुवर्तताम्‌॥

tatra yatnaśca kartavyo mārgitavyā ca jānakī।
nahi tebhyo bhayaṁ kiṁcit‌ kapitvamanuvartatām‌॥

‘वहाँ भी जानकी की खोज करनी चाहिये और उनका पता लगाने के लिये पूरा प्रयत्न करना चाहिये। प्राकृत वानर के स्वभाव का अनुसरण करनेवाले तुम्हारी सेना के वीरों को उन गन्धर्वों से कोई भय नहीं है

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॥ ४ · ४२ · २५ ॥
तत्र वैदूर्यवर्णाभो वज्रसंस्थानसंस्थितः। नानाद्रुमलताकीर्णो वज्रो नाम महागिरिः॥

tatra vaidūryavarṇābho vajrasaṁsthānasaṁsthitaḥ।
nānādrumalatākīrṇo vajro nāma mahāgiriḥ॥

‘पारियात्र पर्वत के पास ही समुद्र में वज्रनाम से प्रसिद्ध एक बहुत ऊँचा पर्वत है, जो नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं से व्याप्त दिखायी देता है। वह वज्रगिरि वैदूर्यमणि के समान नील वर्ण का है। वह कठोरता में वज्रमणि (हीरे) के समान है

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॥ ४ · ४२ · २६ ॥
श्रीमान्‌ समुदितस्तत्र योजनानां शतं समम्‌। गुहास्तत्र विचेतव्याः प्रयत्नेन प्लवङ्गमाः॥

śrīmān‌ samuditastatra yojanānāṁ śataṁ samam‌।
guhāstatra vicetavyāḥ prayatnena plavaṅgamāḥ॥

‘वह सुन्दर पर्वत वहाँ सौ योजन के घेरे में प्रतिष्ठित है। उसकी लंबाई और चौड़ाई दोनों बराबर हैं। वानरो! उस पर्वत पर बहुत-सी गुफाएँ हैं। उन सबमें प्रयत्नपूर्वक सीता का अनुसंधान करना चाहिये

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॥ ४ · ४२ · २७ ॥
चतुर्भागे समुद्रस्य चक्रवान्‌ नाम पर्वतः। तत्र चक्रं सहस्रारं निर्मितं विश्वकर्मणा॥

caturbhāge samudrasya cakravān‌ nāma parvataḥ।
tatra cakraṁ sahasrāraṁ nirmitaṁ viśvakarmaṇā॥

‘समुद्र के चतुर्थ भाग में चक्रवान्‌ नामक पर्वत है। वहीं विश्वकर्मा ने सहस्रार चक्र का निर्माण किया था

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॥ ४ · ४२ · २८ ॥
तत्र पञ्चजनं हत्वा हयग्रीवं दानवम्‌। आजहार ततश्चक्रं शङ्खं पुरुषोत्तमः॥

tatra pañcajanaṁ hatvā hayagrīvaṁ ca dānavam‌।
ājahāra tataścakraṁ śaṅkhaṁ ca puruṣottamaḥ॥

‘वहीं से पुरुषोत्तम भगवान्‌ विष्णु पञ्चजन और हयग्रीव नामक दानवों का वध करके पाञ्चजन्य शङ्ख तथा वह सहस्रार सुदर्शन चक्र लाये थे

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॥ ४ · ४२ · २९ ॥
तस्य सानुषु रम्येषु विशालासु गुहासु च। रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः॥

tasya sānuṣu ramyeṣu viśālāsu guhāsu ca।
rāvaṇaḥ saha vaidehyā mārgitavyastatastataḥ॥

‘चक्रवान्‌ पर्वत के रमणीय शिखरों और विशाल गुफाओं में भी इधर-उधर वैदेहीसहित रावण का पता लगाना चाहिये

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॥ ४ · ४२ · ३० ॥
योजनानि चतुःषष्टिर्वराहो नाम पर्वतः। सुवर्णशृङ्गः सुमहानगाधे वरुणालये॥

yojanāni catuḥṣaṣṭirvarāho nāma parvataḥ।
suvarṇaśṛṅgaḥ sumahānagādhe varuṇālaye॥

‘उससे आगे समुद्र की अगाध जलराशि में सुवर्णमय शिखरोंवाला वराह नामक पर्वत है, जिसका विस्तार चौंसठ योजन की दूरी में है

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॥ ४ · ४२ · ३१ ॥
तत्र प्राग्ज्योतिषं नाम जातरूपमयं पुरम्‌। यस्मिन्‌ वसति दुष्टात्मा नरको नाम दानवः॥

tatra prāgjyotiṣaṁ nāma jātarūpamayaṁ puram‌।
yasmin‌ vasati duṣṭātmā narako nāma dānavaḥ॥

‘वहीं प्राग्ज्योतिष नामक सुवर्णमय नगर है, जिसमें दुष्टात्मा नरक नामक दानव निवास करता है

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॥ ४ · ४२ · ३२ ॥
तत्र सानुषु रम्येषु विशालासु गुहासु च। रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः॥

tatra sānuṣu ramyeṣu viśālāsu guhāsu ca।
rāvaṇaḥ saha vaidehyā mārgitavyastatastataḥ॥

‘उस पर्वत के रमणीय शिखरों पर तथा वहाँ की विशाल गुफाओं में सीतासहित रावण की तलाश करनी चाहिये

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॥ ४ · ४२ · ३३ ॥
तमतिक्रम्य शैलेन्द्रं काञ्चनान्तरदर्शनम्‌। पर्वतः सर्वसौवर्णो धाराप्रस्रवणायुतः॥

tamatikramya śailendraṁ kāñcanāntaradarśanam‌।
parvataḥ sarvasauvarṇo dhārāprasravaṇāyutaḥ॥

‘जिसका भीतरी भाग सुवर्णमय दिखायी देता है, उस पर्वतराज वराह को लाँघकर आगे बढ़ने पर एक ऐसा पर्वत मिलेगा, जिसका सब कुछ सुवर्णमय है तथा जिसमें लगभग दस सहस्र झरने हैं

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॥ ४ · ४२ · ३४ ॥
तं गजाश्च वराहाश्च सिंहा व्याघ्राश्च सर्वतः। अभिगर्जन्ति सततं तेन शब्देन दर्पिताः॥

taṁ gajāśca varāhāśca siṁhā vyāghrāśca sarvataḥ।
abhigarjanti satataṁ tena śabdena darpitāḥ॥

‘उसके चारों ओर हाथी, सूअर, सिंह और व्याघ्र सदा गर्जना करते हैं और अपनी ही गर्जना की प्रतिध्वनि के शब्द से दर्प में भरकर पुनः दहाड़ने लगते हैं

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॥ ४ · ४२ · ३५ ॥
यस्मिन्‌ हरिहयः श्रीमान्‌ महेन्द्रः पाकशासनः। अभिषिक्तः सुरै राजा मेघो नाम पर्वतः॥

yasmin‌ harihayaḥ śrīmān‌ mahendraḥ pākaśāsanaḥ।
abhiṣiktaḥ surai rājā megho nāma sa parvataḥ॥

‘उस पर्वत का नाम है मेघगिरि। जिसपर देवताओं ने हरित रंग के अश्ववाले श्रीमान्‌ पाकशासन इन्द्र को राजा के पद पर अभिषिक्त किया था

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॥ ४ · ४२ · ३६ ॥
तमतिक्रम्य शैलेन्द्रं महेन्द्रपरिपालितम्‌। षष्टिं गिरिसहस्राणि काञ्चनानि गमिष्यथ॥

tamatikramya śailendraṁ mahendraparipālitam‌।
ṣaṣṭiṁ girisahasrāṇi kāñcanāni gamiṣyatha॥

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॥ ४ · ४२ · ३७ ॥
तरुणादित्यवर्णानि भ्राजमानानि सर्वतः। जातरूपमयैर्वृक्षैः शोभितानि सुपुष्पितैः॥

taruṇādityavarṇāni bhrājamānāni sarvataḥ।
jātarūpamayairvṛkṣaiḥ śobhitāni supuṣpitaiḥ॥

॥ ३६–३७ ॥

‘देवराज इन्द्रद्वारा सुरक्षित गिरिराज मेघ को लाँघकर जब तुम आगे बढ़ोगे, तब तुम्हें सोने के साठ हजार पर्वत मिलेंगे, जो सब ओर से सूर्य के समान कान्ति से देदीप्यमान हो रहे हैं और सुन्दर फूलों से भरे हुए सुवर्णमय वृक्षों से सुशोभित हैं

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॥ ४ · ४२ · ३८ ॥
तेषां मध्ये स्थितो राजा मेरुरुत्तमपर्वतः। आदित्येन प्रसन्नेन शैलो दत्तवरः पुरा॥

teṣāṁ madhye sthito rājā meruruttamaparvataḥ।
ādityena prasannena śailo dattavaraḥ purā॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · ४२ · ३९ ॥
तेनैवमुक्तः शैलेन्द्रः सर्व एव त्वदाश्रयाः। मत्प्रसादाद्‌ भविष्यन्ति दिवा रात्रौ काञ्चनाः॥

tenaivamuktaḥ śailendraḥ sarva eva tvadāśrayāḥ।
matprasādād‌ bhaviṣyanti divā rātrau ca kāñcanāḥ॥

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॥ ४ · ४२ · ४० ॥
त्वयि ये चापि वत्स्यन्ति देवगन्धर्वदानवाः। ते भविष्यन्ति भक्ताश्च प्रभया काञ्चनप्रभाः॥

tvayi ye cāpi vatsyanti devagandharvadānavāḥ।
te bhaviṣyanti bhaktāśca prabhayā kāñcanaprabhāḥ॥

॥ ३८–४० ॥

‘उनके मध्यभाग में पर्वतों का राजा गिरिश्रेष्ठ मेरु विराजमान है, जिसे पूर्वकाल में सूर्यदेव ने प्रसन्न होकर वर दिया था। उन्होंने उस शैलराज से कहा था कि ‘जो दिन-रात तुम्हारे आश्रय में रहेंगे, वे मेरी कृपा से सुवर्णमय हो जायँगे तथा देवता, दानव, गन्धर्व जो भी तुम्हारे ऊपर निवास करेंगे, वे सुवर्ण के समान कान्तिमान्‌ और मेरे भक्त हो जायँगे’

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॥ ४ · ४२ · ४१ ॥
विश्वेदेवाश्च वसवो मरुतश्च दिवौकसः। आगत्य पश्चिमां संध्यां मेरुमुत्तमपर्वतम्‌॥

viśvedevāśca vasavo marutaśca divaukasaḥ।
āgatya paścimāṁ saṁdhyāṁ merumuttamaparvatam‌॥

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॥ ४ · ४२ · ४२ ॥
आदित्यमुपतिष्ठन्ति तैश्च सूर्योऽभिपूजितः। अदृश्यः सर्वभूतानामस्तं गच्छति पर्वतम्‌॥

ādityamupatiṣṭhanti taiśca sūryo'bhipūjitaḥ।
adṛśyaḥ sarvabhūtānāmastaṁ gacchati parvatam‌॥

॥ ४१–४२ ॥

‘विश्वेदेव, वसु, मरुद्गण तथा अन्य देवता सायंकाल में उत्तम पर्वत मेरु पर आकर सूर्यदेव का उपस्थान करते हैं। उनके द्वारा भलीभाँति पूजित होकर भगवान्‌ सूर्य सब प्राणियों की आँखों से ओझल होकर अस्ताचल को चले जाते हैं

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॥ ४ · ४२ · ४३ ॥
योजनानां सहस्राणि दश तानि दिवाकरः। मुहूर्तार्धेन तं शीघ्रमभियाति शिलोच्चयम्‌॥

yojanānāṁ sahasrāṇi daśa tāni divākaraḥ।
muhūrtārdhena taṁ śīghramabhiyāti śiloccayam‌॥

‘मेरु से अस्ताचल दस हजार योजन की दूरी पर है, किंतु सूर्यदेव आधे मुहूर्त में ही वहाँ पहुँच जाते हैं

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॥ ४ · ४२ · ४४ ॥
शृङ्गे तस्य महद्दिव्यं भवनं सूर्यसंनिभम्‌। प्रासादगणसम्बाधं विहितं विश्वकर्मणा॥

śṛṅge tasya mahaddivyaṁ bhavanaṁ sūryasaṁnibham‌।
prāsādagaṇasambādhaṁ vihitaṁ viśvakarmaṇā॥

‘उसके शिखर पर विश्वकर्मा का बनाया हुआ एक बहुत बड़ा दिव्य भवन है, जो सूर्य के समान दीप्तिमान्‌ दिखायी देता है। वह अनेक प्रासादों से भरा हुआ है

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॥ ४ · ४२ · ४५ ॥
शोभितं तरुभिश्चित्रैर्नानापक्षिसमाकुलैः। निकेतं पाशहस्तस्य वरुणस्य महात्मनः॥

śobhitaṁ tarubhiścitrairnānāpakṣisamākulaiḥ।
niketaṁ pāśahastasya varuṇasya mahātmanaḥ॥

‘नाना प्रकार के पक्षियों से व्याप्त विचित्र-विचित्र वृक्ष उसकी शोभा बढ़ाते हैं। वह पाशधारी महात्मा वरुण का निवास-स्थान है

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॥ ४ · ४२ · ४६ ॥
अन्तरा मेरुमस्तं तालो दशशिरा महान्‌। जातरूपमयः श्रीमान्‌ भ्राजते चित्रवेदिकः॥

antarā merumastaṁ ca tālo daśaśirā mahān‌।
jātarūpamayaḥ śrīmān‌ bhrājate citravedikaḥ॥

‘मेरु और अस्ताचल के बीच एक स्वर्णमय ताड़ का वृक्ष है, जो बड़ा ही सुन्दर और बहुत ही ऊँचा है। उसके दस स्कन्ध (बड़ी शाखाएँ) हैं। उसके नीचे की वेदी बड़ी विचित्र है। इस तरह वह वृक्ष बड़ी शोभा पाता है

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॥ ४ · ४२ · ४७ ॥
तेषु सर्वेषु दुर्गेषु सरस्सु सरित्सु च। रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः॥

teṣu sarveṣu durgeṣu sarassu ca saritsu ca।
rāvaṇaḥ saha vaidehyā mārgitavyastatastataḥ॥

‘वहाँ के उन सभी दुर्गम स्थानों, सरोवरों और सरिताओं में इधर-उधर सीतासहित रावण का अनुसंधान करना चाहिये

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॥ ४ · ४२ · ४८ ॥
यत्र तिष्ठति धर्मज्ञस्तपसा स्वेन भावितः। मेरुसावर्णिरित्येष ख्यातो वै ब्रह्मणा समः॥

yatra tiṣṭhati dharmajñastapasā svena bhāvitaḥ।
merusāvarṇirityeṣa khyāto vai brahmaṇā samaḥ॥

‘मेरुगिरि पर धर्म के ज्ञाता महर्षि मेरुसावर्णि रहते हैं, जो अपनी तपस्या से ऊँची स्थिति को प्राप्त हुए हैं। वे प्रजापति के समान शक्तिशाली एवं विख्यात ऋषि हैं

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॥ ४ · ४२ · ४९ ॥
प्रष्टव्यो मेरुसावर्णिर्महर्षिः सूर्यसंनिभः। प्रणम्य शिरसा भूमौ प्रवृत्तिं मैथिलीं प्रति॥

praṣṭavyo merusāvarṇirmaharṣiḥ sūryasaṁnibhaḥ।
praṇamya śirasā bhūmau pravṛttiṁ maithilīṁ prati॥

‘सूर्यतुल्य तेजस्वी महर्षि मेरुसावर्णि के चरणों में पृथ्वी पर मस्तक टेककर प्रणाम करने के अनन्तर तुमलोग उनसे मिथिलेशकुमारी का समाचार पूछना

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॥ ४ · ४२ · ५० ॥
एतावज्जीवलोकस्य भास्करो रजनीक्षये। कृत्वा वितिमिरं सर्वमस्तं गच्छति पर्वतम्‌॥

etāvajjīvalokasya bhāskaro rajanīkṣaye।
kṛtvā vitimiraṁ sarvamastaṁ gacchati parvatam‌॥

‘रात्रि के अन्त में (प्रातःकाल) उदित हुए भगवान्‌ सूर्य जीव-जगत् के इन सभी स्थानों को अन्धकाररहित (एवं प्रकाशपूर्ण) करके अन्त में अस्ताचल को चले जाते हैं

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॥ ४ · ४२ · ५१ ॥
एतावद्‌ वानरैः शक्यं गन्तुं वानरपुङ्गवाः। अभास्करममर्यादं जानीमस्ततः परम्‌॥

etāvad‌ vānaraiḥ śakyaṁ gantuṁ vānarapuṅgavāḥ।
abhāskaramamaryādaṁ na jānīmastataḥ param‌॥

‘वानरशिरोमणियो! पश्चिम दिशा में इतनी ही दूरतक वानर जा सकते हैं। उसके आगे न तो सूर्य का प्रकाश है और न किसी देश आदि की सीमा ही। अतः वहाँ से आगे की भूमि के विषय में मुझे कोई जानकारी नहीं है

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॥ ४ · ४२ · ५२ ॥
अवगम्य तु वैदेहीं निलयं रावणस्य च। अस्तं पर्वतमासाद्य पूर्णे मासे निवर्तत॥

avagamya tu vaidehīṁ nilayaṁ rāvaṇasya ca।
astaṁ parvatamāsādya pūrṇe māse nivartata॥

‘अस्ताचलतक जाकर रावण के स्थान और सीता का पता लगाओ तथा एक मास पूर्ण होते ही यहाँ लौट आओ

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॥ ४ · ४२ · ५३ ॥
ऊर्ध्वं मासान्न वस्तव्यं वसन्‌ वध्यो भवेन्मम। सहैव शूरो युष्माभिः श्वशुरो मे गमिष्यति॥

ūrdhvaṁ māsānna vastavyaṁ vasan‌ vadhyo bhavenmama।
sahaiva śūro yuṣmābhiḥ śvaśuro me gamiṣyati॥

‘एक महीने से अधिक न ठहरना। जो ठहरेगा, उसे मेरे हाथ से प्राणदण्ड मिलेगा। तुमलोगों के साथ मेरे पूजनीय श्वशुरजी भी जायँगे

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॥ ४ · ४२ · ५४ ॥
श्रोतव्यं सर्वमेतस्य भवद्भिर्दिष्टकारिभिः। गुरुरेष महाबाहुः श्वशुरो मे महाबलः॥

śrotavyaṁ sarvametasya bhavadbhirdiṣṭakāribhiḥ।
gurureṣa mahābāhuḥ śvaśuro me mahābalaḥ॥

‘तुम सब लोग इनकी आज्ञा के अधीन रहकर इनकी सभी बातें ध्यान से सुनना; क्योंकि ये महाबाहु महाबली सुषेणजी मेरे श्वशुर एवं गुरुजन हैं (अतः तुम्हारे लिये भी गुरु की भाँति ही आदरणीय हैं)

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॥ ४ · ४२ · ५५ ॥
भवन्तश्चापि विक्रान्ताः प्रमाणं सर्व एव हि। प्रमाणमेनं संस्थाप्य पश्यध्वं पश्चिमां दिशम्‌॥

bhavantaścāpi vikrāntāḥ pramāṇaṁ sarva eva hi।
pramāṇamenaṁ saṁsthāpya paśyadhvaṁ paścimāṁ diśam‌॥

‘तुम सब लोग भी बड़े पराक्रमी तथा कर्तव्याकर्तव्य के निर्णय में प्रमाणभूत (विश्वसनीय) हो, तथापि इन्हें अपना प्रधान बनाकर तुम पश्चिम दिशा की देखभाल आरम्भ करो

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॥ ४ · ४२ · ५६ ॥
दृष्टायां तु नरेन्द्रस्य पत्न्याममिततेजसः। कृतकृत्या भविष्यामः कृतस्य प्रतिकर्मणा॥

dṛṣṭāyāṁ tu narendrasya patnyāmamitatejasaḥ।
kṛtakṛtyā bhaviṣyāmaḥ kṛtasya pratikarmaṇā॥

‘अमित तेजस्वी महाराज श्रीराम की पत्नी का पता लग जाने पर हम कृतकृत्य हो जायँगे; क्योंकि उन्होंने जो उपकार किया है, उसका बदला इसी तरह चुक सकेगा

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॥ ४ · ४२ · ५७ ॥
अतोऽन्यदपि यत्कार्यं कार्यस्यास्य प्रियं भवेत्‌। सम्प्रधार्यं भवद्भिश्च देशकालार्थसंहितम्‌॥

ato'nyadapi yatkāryaṁ kāryasyāsya priyaṁ bhavet‌।
sampradhāryaṁ bhavadbhiśca deśakālārthasaṁhitam‌॥

‘अतः इस कार्य के अनुकूल और भी जो कर्तव्य देश, काल और प्रयोजन से सम्बन्ध रखता हो, उसका विचार करके आपलोग उसे भी करें’

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॥ ४ · ४२ · ५८ ॥
ततः सुषेणप्रमुखाः प्लवङ्गाः सुग्रीववाक्यं निपुणं निशम्य। आमन्त्र्य सर्वे प्लवगाधिपं ते जग्मुर्दिशं तां वरुणाभिगुप्ताम्‌॥

tataḥ suṣeṇapramukhāḥ plavaṅgāḥ
sugrīvavākyaṁ nipuṇaṁ niśamya।
āmantrya sarve plavagādhipaṁ te
jagmurdiśaṁ tāṁ varuṇābhiguptām‌॥

सुग्रीव की बातें अच्छी तरह सुनकर सुषेण आदि सब वानर उन वानरराज की अनुमति ले वरुणद्वारा सुरक्षित पश्चिम दिशा की ओर चल दिये

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः॥ ४२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४२ ॥