वाल्मीकि रामायणम् · किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

सर्गः ३६ · २० श्लोकाःSarga 36 · 20 ślokas

सुग्रीवका अपनी लघुता तथा श्रीरामकी महत्ता बताते हुए लक्ष्मणसे क्षमा माँगना और लक्ष्मणका उनकी प्रशंसा करके उन्हें अपने साथ चलनेके लिये कहना

॥ ४ · ३६ · १ ॥
इत्युक्तस्तारया वाक्यं प्रश्रितं धर्मसंहितम्। मृदुस्वभावः सौमित्रिः प्रतिजग्राह तद्वचः॥

ityuktastārayā vākyaṁ praśritaṁ dharmasaṁhitam।
mṛdusvabhāvaḥ saumitriḥ pratijagrāha tadvacaḥ॥

तारा ने जब इस प्रकार धर्म के अनुकूल विनययुक्त बात कही, तब कोमल स्वभाववाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने उसे मान लिया (क्रोध को त्याग दिया)

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॥ ४ · ३६ · २ ॥
तस्मिन् प्रतिगृहीते तु वाक्ये हरिगणेश्वरः। लक्ष्मणात् सुमहत् त्रासं वस्त्रं क्लिन्नमिवात्यजत्॥

tasmin pratigṛhīte tu vākye harigaṇeśvaraḥ।
lakṣmaṇāt sumahat trāsaṁ vastraṁ klinnamivātyajat॥

उनके द्वारा तारा की बात मान ली जाने पर वानरयूथपति सुग्रीव ने लक्ष्मण से प्राप्त होनेवाले महान् भय को भीगे हुए वस्त्र की भाँति त्याग दिया

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॥ ४ · ३६ · ३ ॥
ततः कण्ठगतं माल्यं चित्रं बहुगुणं महत्। चिच्छेद विमदश्चासीत् सुग्रीवो वानरेश्वरः॥

tataḥ kaṇṭhagataṁ mālyaṁ citraṁ bahuguṇaṁ mahat।
ciccheda vimadaścāsīt sugrīvo vānareśvaraḥ॥

तदनन्तर वानरराज सुग्रीव ने अपने कण्ठ में पड़ी हुई फूलों की विचित्र, विशाल एवं बहुगुणसम्पन्न माला तोड़ डाली और वे मद से रहित हो गये

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॥ ४ · ३६ · ४ ॥
लक्ष्मणं भीमबलं सर्ववानरसत्तमः। अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं सुग्रीवः सम्प्रहर्षयन्॥

sa lakṣmaṇaṁ bhīmabalaṁ sarvavānarasattamaḥ।
abravīt praśritaṁ vākyaṁ sugrīvaḥ sampraharṣayan॥

फिर समस्त वानरों में शिरोमणि सुग्रीव ने भयंकर बलशाली लक्ष्मण का हर्ष बढ़ाते हुए उनसे यह विनययुक्त बात कही—

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॥ ४ · ३६ · ५ ॥
प्रणष्टा श्रीश्च कीर्तिश्च कपिराज्यं शाश्वतम्। रामप्रसादात् सौमित्रे पुनश्चाप्तमिदं मया॥

praṇaṣṭā śrīśca kīrtiśca kapirājyaṁ ca śāśvatam।
rāmaprasādāt saumitre punaścāptamidaṁ mayā॥

‘सुमित्राकुमार! मेरी श्री, कीर्ति तथा सदा से चला आता हुआ वानरों का राज्य—ये सब नष्ट हो चुके थे। भगवान् श्रीराम की कृपा से ही मुझे पुनः इन सब की प्राप्ति हुई है

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॥ ४ · ३६ · ६ ॥
कः शक्तस्तस्य देवस्य ख्यातस्य स्वेन कर्मणा। तादृशं प्रतिकुर्वीत अंशेनापि नृपात्मज॥

kaḥ śaktastasya devasya khyātasya svena karmaṇā।
tādṛśaṁ pratikurvīta aṁśenāpi nṛpātmaja॥

‘राजकुमार! वे भगवान् श्रीराम अपने कर्मों से ही सर्वत्र विख्यात हैं। उनके उपकार का वैसा ही बदला अंशमात्र से भी कौन चुका सकता है?

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॥ ४ · ३६ · ७ ॥
सीतां प्राप्स्यति धर्मात्मा वधिष्यति रावणम्। सहायमात्रेण मया राघवः स्वेन तेजसा॥

sītāṁ prāpsyati dharmātmā vadhiṣyati ca rāvaṇam।
sahāyamātreṇa mayā rāghavaḥ svena tejasā॥

‘धर्मात्मा श्रीराम अपने ही तेज से रावण का वध करेंगे और सीता को प्राप्त कर लेंगे। मैं तो उनका एक तुच्छ सहायकमात्र रहूँगा

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॥ ४ · ३६ · ८ ॥
सहायकृत्यं किं तस्य येन सप्त महाद्रुमाः। गिरिश्च वसुधा चैव बाणेनैकेन दारिताः॥

sahāyakṛtyaṁ kiṁ tasya yena sapta mahādrumāḥ।
giriśca vasudhā caiva bāṇenaikena dāritāḥ॥

‘जिन्होंने एक ही बाण से सात बड़े-बड़े ताल वृक्ष, पर्वत, पृथ्वी, पाताल और वहाँ रहनेवाले दैत्यों को भी विदीर्ण कर दिया था, उनको दूसरे किसी सहायक की आवश्यकता भी क्या है?

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॥ ४ · ३६ · ९ ॥
धनुर्विस्फारमाणस्य यस्य शब्देन लक्ष्मण। सशैला कम्पिता भूमिः सहायैः किं नु तस्य वै॥

dhanurvisphāramāṇasya yasya śabdena lakṣmaṇa।
saśailā kampitā bhūmiḥ sahāyaiḥ kiṁ nu tasya vai॥

‘लक्ष्मण! जिनके धनुष खींचते समय उसकी टंकार से पर्वतोंसहित पृथ्वी काँप उठी थी, उन्हें सहायकों से क्या लेना है?

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॥ ४ · ३६ · १० ॥
अनुयात्रां नरेन्द्रस्य करिष्येऽहं नरर्षभ। गच्छतो रावणं हन्तुं वैरिणं सपुरस्सरम्॥

anuyātrāṁ narendrasya kariṣye'haṁ nararṣabha।
gacchato rāvaṇaṁ hantuṁ vairiṇaṁ sapurassaram॥

‘नरश्रेष्ठ! मैं तो वैरी रावण का वध करने के लिये अग्रगामी सैनिकोंसहित यात्रा करनेवाले महाराज श्रीराम के पीछे-पीछे चलूँगा

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॥ ४ · ३६ · ११ ॥
यदि किंचिदतिक्रान्तं विश्वासात् प्रणयेन वा। प्रेष्यस्य क्षमितव्यं मे कश्चिन्नापराध्यति॥

yadi kiṁcidatikrāntaṁ viśvāsāt praṇayena vā।
preṣyasya kṣamitavyaṁ me na kaścinnāparādhyati॥

‘विश्वास अथवा प्रेम के कारण यदि कोई अपराध बन गया हो तो मुझ दास के उस अपराध को क्षमा कर देना चाहिये; क्योंकि ऐसा कोई सेवक नहीं है, जिससे कभी कोई अपराध होता ही न हो’

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॥ ४ · ३६ · १२ ॥
इति तस्य ब्रुवाणस्य सुग्रीवस्य महात्मनः। अभवल्लक्ष्मणः प्रीतः प्रेम्णा चेदमुवाच ह॥

iti tasya bruvāṇasya sugrīvasya mahātmanaḥ।
abhavallakṣmaṇaḥ prītaḥ premṇā cedamuvāca ha॥

महात्मा सुग्रीव के ऐसा कहने पर लक्ष्मण प्रसन्न हो गये और बड़े प्रेम से इस प्रकार बोले—

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॥ ४ · ३६ · १३ ॥
सर्वथा हि मम भ्राता सनाथो वानरेश्वर। त्वया नाथेन सुग्रीव प्रश्रितेन विशेषतः॥

sarvathā hi mama bhrātā sanātho vānareśvara।
tvayā nāthena sugrīva praśritena viśeṣataḥ॥

‘वानरराज सुग्रीव! विशेषतः तुम-जैसे विनयशील सहायक को पाकर मेरे भाई श्रीराम सर्वथा सनाथ हैं

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॥ ४ · ३६ · १४ ॥
यस्ते प्रभावः सुग्रीव यच्च ते शौचमीदृशम्। अर्हस्त्वं कपिराज्यस्य श्रियं भोक्तुमनुत्तमाम्॥

yaste prabhāvaḥ sugrīva yacca te śaucamīdṛśam।
arhastvaṁ kapirājyasya śriyaṁ bhoktumanuttamām॥

‘सुग्रीव! तुम्हारा जो प्रभाव है और तुम्हारे हृदय में जो इतना शुद्ध भाव है, इससे तुम वानरराज्य की परम उत्तम लक्ष्मी का सदा ही उपभोग करने के अधिकारी हो

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॥ ४ · ३६ · १५ ॥
सहायेन सुग्रीव त्वया रामः प्रतापवान्। वधिष्यति रणे शत्रूनचिरान्नात्र संशयः॥

sahāyena ca sugrīva tvayā rāmaḥ pratāpavān।
vadhiṣyati raṇe śatrūnacirānnātra saṁśayaḥ॥

‘सुग्रीव! तुम्हें सहायक के रूप में पाकर प्रतापी श्रीराम रणभूमि में अपने शत्रुओं का शीघ्र ही वध कर डालेंगे, इसमें संशय नहीं है

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॥ ४ · ३६ · १६ ॥
धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य संग्रामेष्वनिवर्तिनः। उपपन्नं युक्तं सुग्रीव तव भाषितम्॥

dharmajñasya kṛtajñasya saṁgrāmeṣvanivartinaḥ।
upapannaṁ ca yuktaṁ ca sugrīva tava bhāṣitam॥

‘सुग्रीव! तुम धर्मज्ञ, कृतज्ञ तथा युद्ध में कभी पीठ न दिखानेवाले हो। तुम्हारा यह भाषण सर्वथा युक्तिसंगत और उचित है

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॥ ४ · ३६ · १७ ॥
दोषज्ञः सति सामर्थ्ये कोऽन्यो भाषितुमर्हति। वर्जयित्वा मम ज्येष्ठं त्वां वानरसत्तम॥

doṣajñaḥ sati sāmarthye ko'nyo bhāṣitumarhati।
varjayitvā mama jyeṣṭhaṁ tvāṁ ca vānarasattama॥

‘वानरशिरोमणे! तुमको और मेरे बड़े भाई को छोड़कर दूसरा कौन ऐसा विद्वान् है, जो अपने में सामर्थ्य होते हुए भी ऐसा नम्रतापूर्ण वचन कह सके

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॥ ४ · ३६ · १८ ॥
सदृशश्चासि रामेण विक्रमेण बलेन च। सहायो दैवतैर्दत्तश्चिराय हरिपुंगव॥

sadṛśaścāsi rāmeṇa vikrameṇa balena ca।
sahāyo daivatairdattaścirāya haripuṁgava॥

‘कपिराज! तुम बल और पराक्रम में भगवान् श्रीराम के बराबर हो। देवताओं ने ही हमें दीर्घकाल के लिये तुम-जैसा सहायक प्रदान किया है

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॥ ४ · ३६ · १९ ॥
किं तु शीघ्रमितो वीर निष्क्रम त्वं मया सह। सान्त्वयस्व वयस्यं भार्याहरणदुःखितम्॥

kiṁ tu śīghramito vīra niṣkrama tvaṁ mayā saha।
sāntvayasva vayasyaṁ ca bhāryāharaṇaduḥkhitam॥

‘किंतु वीर! अब तुम शीघ्र ही मेरे साथ इस पुरी से बाहर निकलो। तुम्हारे मित्र अपनी पत्नी के अपहरण से बहुत दुःखी हैं। उन्हें चलकर सान्त्वना दो

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॥ ४ · ३६ · २० ॥
यच्च शोकाभिभूतस्य श्रुत्वा रामस्य भाषितम्। मया त्वं परुषाण्युक्तस्तत् क्षमस्व सखे मम॥

yacca śokābhibhūtasya śrutvā rāmasya bhāṣitam।
mayā tvaṁ paruṣāṇyuktastat kṣamasva sakhe mama॥

‘सखे! शोकमग्न श्रीराम के वचनों को सुनकर जो मैंने तुम्हारे प्रति कठोर बातें कह दी हैं, उनके लिये मुझे क्षमा करो’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३६ ॥