शरद्-ऋतुका वर्णन तथा श्रीरामका लक्ष्मणको सुग्रीवके पास जानेका आदेश देना
gṛhaṁ praviṣṭe sugrīve vimukte gagane ghanaiḥ।
varṣarātre sthito rāmaḥ kāmaśokābhipīḍitaḥ॥
पूर्वोक्त आदेश देकर सुग्रीव तो अपने महल में चले गये और उधर श्रीरामचन्द्रजी, जो वर्षा की रातों में प्रस्रवणगिरि पर निवास करते थे, आकाश के मेघों से मुक्त एवं निर्मल हो जाने पर सीता से मिलने की उत्कण्ठा लिये उनके विरहजन्य शोक से अत्यन्त पीड़ा का अनुभव करने लगे
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pāṇḍuraṁ gaganaṁ dṛṣṭvā vimalaṁ candramaṇḍalam।
śāradīṁ rajanīṁ caiva dṛṣṭvā jyotsnānulepanām॥
उन्होंने देखा, आकाश श्वेत वर्ण का हो रहा है, चन्द्रमण्डल स्वच्छ दिखायी देता है तथा शरद्-ऋतु की रजनी के अङ्गों पर चाँदनी का अङ्गराग लगा हुआ है। यह सब देखकर वे सीता से मिलने के लिये व्याकुल हो उठे
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kāmavṛttaṁ ca sugrīvaṁ naṣṭāṁ ca janakātmajām।
dṛṣṭvā kālamatītaṁ ca mumoha paramāturaḥ॥
उन्होंने सोचा ‘सुग्रीव काम में आसक्त हो रहा है, जनककुमारी सीता का अबतक कुछ पता नहीं लगा है और रावण पर चढ़ाई करने का समय भी बीता जा रहा है।’ यह सब देखकर अत्यन्त आतुर हुए श्रीराम का हृदय व्याकुल हो उठा
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sa tu saṁjñāmupāgamya muhūrtānmatimān nṛpaḥ।
manaḥsthāmapi vaidehīṁ cintayāmāsa rāghavaḥ॥
दो घड़ी के बाद जब उनका मन कुछ स्वस्थ हुआ, तब वे बुद्धिमान् नरेश श्रीरघुनाथजी अपने मन में बसी हुई विदेहनन्दिनी सीता का चिन्तन करने लगे
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dṛṣṭvā ca vimalaṁ vyoma gatavidyudbalāhakam।
sārasārāvasaṁghuṣṭaṁ vilalāpārtayā girā॥
उन्होंने देखा, आकाश निर्मल है। न कहीं बिजली की गड़गड़ाहट है न मेघों की घटा। वहाँ सब ओर सारसों की बोली सुनायी देती है। यह सब देखकर वे आर्तवाणी में विलाप करने लगे
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āsīnaḥ parvatasyāgre hemadhātuvibhūṣite।
śāradaṁ gaganaṁ dṛṣṭvā jagāma manasā priyām॥
सुनहरे रंग की धातुओं से विभूषित पर्वतशिखर पर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी शरत्काल के स्वच्छ आकाश की ओर दृष्टिपात करके मन-ही-मन अपनी प्यारी पत्नी सीता का ध्यान करने लगे
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sārasārāvasaṁnādaiḥ sārasārāvanādinī।
yā''śrame ramate bālā sādya me ramate katham॥
वे बोले—‘जिसकी बोली सारसों की आवाज के समान मीठी थी तथा जो मेरे आश्रम पर सारसोंद्वारा परस्पर एक-दूसरे को बुलाने के लिये किये गये मधुर शब्दों से मन बहलाती थी, वह मेरी भोलीभाली स्त्री सीता आज किस तरह मनोरञ्जन करती होगी ?
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puṣpitāṁścāsanān dṛṣṭvā kāñcanāniva nirmalān।
kathaṁ sā ramate bālā paśyantī māmapaśyatī॥
‘सुवर्णमय वृक्षों के समान निर्मल और खिले हुए असन नामक वृक्षों को देखकर बार-बार उन्हें निहारती हुई भोली-भाली सीता जब मुझे अपने पास नहीं देखती होगी, तब कैसे उसका मन लगता होगा ?
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yā purā kalahaṁsānāṁ kalena kalabhāṣiṇī।
budhyate cārusarvāṅgī sādya me ramate katham॥
‘जिसके सभी अङ्ग मनोहर हैं तथा जो स्वभाव से ही मधुर भाषण करनेवाली है, वह सीता पहले कलहंसों के मधुर शब्द से जागा करती थी; किंतु आज वह मेरी प्रिया वहाँ कैसे प्रसन्न रहती होगी ?
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niḥsvanaṁ cakravākānāṁ niśamya sahacāriṇām।
puṇḍarīkaviśālākṣī kathameṣā bhaviṣyati॥
‘जिसके विशाल नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान शोभा पाते हैं, वह मेरी प्रिया जब साथ विचरनेवाले चकवों की बोली सुनती होगी, तब उसकी कैसी दशा हो जाती होगी ?
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sarāṁsi sarito vāpīḥ kānanāni vanāni ca।
tāṁ vinā mṛgaśāvākṣīṁ carannādya sukhaṁ labhe॥
‘हाय! मैं नदी, तालाब, बावली, कानन और वन सब जगह घूमता हूँ; परंतु कहीं भी उस मृगशावकनयनी सीता के बिना अब मुझे सुख नहीं मिलता है
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api tāṁ madviyogācca saukumāryācca bhāminīm।
sudūraṁ pīḍayet kāmaḥ śaradguṇanirantaraḥ॥
‘कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि शरद्-ऋतु के गुणों से निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होनेवाला काम भामिनी सीता को अत्यन्त पीड़ित कर दे; क्योंकि ऐसी सम्भावना के दो कारण हैं—एक तो उसे मेरे वियोग का कष्ट है, दूसरे वह अत्यन्त सुकुमारी होने के कारण इस कष्ट को सहन नहीं कर पाती होगी’
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evamādi naraśreṣṭho vilalāpa nṛpātmajaḥ।
vihaṁga iva sāraṅgaḥ salilaṁ tridaśeśvarāt॥
इन्द्र से पानी की याचना करनेवाले प्यासे पपीहे की भाँति नरश्रेष्ठ नरेन्द्रकुमार श्रीराम ने इस तरह की बहुत-सी बातें कहकर विलाप किया
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tataścaṅkramya ramyeṣu phalārthī girisānuṣu।
dadarśa paryupāvṛtto lakṣmīvām̐llakṣmaṇo'grajam॥
उस समय शोभाशाली लक्ष्मण फल लेने के लिये गये थे। वे पर्वत के रमणीय शिखरों पर घूम-फिरकर जब लौटे तब उन्होंने अपने बड़े भाई की अवस्था पर दृष्टिपात किया
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sa cintayā dussahayā parītaṁ visaṁjñamekaṁ vijane manasvī।
bhrāturviṣādāt tvarito'tidīnaḥ samīkṣya saumitriruvāca dīnam॥
वे दुस्सह चिन्ता में मग्न होकर अचेत-से हो गये थे और एकान्त में अकेले ही दुःखी होकर बैठे थे। उस समय मनस्वी सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने जब उन्हें देखा तब वे तुरंत ही भाई के विषाद से अत्यन्त दुःखी हो गये और उनसे इस प्रकार बोले—
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kimārya kāmasya vaśaṁgatena kimātmapauruṣyaparābhavena।
ayaṁ hriyā saṁhriyate samādhiḥ kimatra yogena nivartate na॥
‘आर्य! इस प्रकार काम के अधीन होकर अपने पौरुष का तिरस्कार करने से—पराक्रम को भूल जाने से क्या लाभ होगा? इस लज्जाजनक शोक के कारण आपके चित्त की एकाग्रता नष्ट हो रही है। क्या इस समय योग का सहारा लेने से—मन को एकाग्र करने से यह सारी चिन्ता दूर नहीं हो सकती ?
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kriyābhiyogaṁ manasaḥ prasādaṁ samādhiyogānugataṁ ca kālam।
sahāyasāmarthyamadīnasattvaḥ svakarmahetuṁ ca kuruṣva tāta॥
‘तात! आप आवश्यक कर्मों के अनुष्ठान में पूर्णरूप से लग जाइये, मन को प्रसन्न कीजिये और हर समय चित्त की एकाग्रता बनाये रखिये। साथ ही, अन्तःकरण में दीनता को स्थान न देते हुए अपने पराक्रम की वृद्धि के लिये सहायता और शक्ति को बढ़ाने का प्रयत्न कीजिये
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na jānakī mānavavaṁśanātha tvayā sanāthā sulabhā pareṇa।
na cāgnicūḍāṁ jvalitāmupetya na dahyate vīra varārha kaścit॥
‘मानववंश के नाथ तथा श्रेष्ठ पुरुषों के भी पूजनीय वीर रघुनन्दन! जिनके स्वामी आप हैं, वे जनकनन्दिनी सीता किसी भी दूसरे पुरुष के लिये सुलभ नहीं हैं; क्योंकि जलती हुई आग की लपट के पास जाकर कोई भी दग्ध हुए बिना नहीं रह सकता’
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salakṣaṇaṁ lakṣmaṇamapradhṛṣyaṁ svabhāvajaṁ vākyamuvāca rāmaḥ।
hitaṁ ca pathyaṁ ca nayaprasaktaṁ sasāmadharmārthasamāhitaṁ ca॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
nissaṁśayaṁ kāryamavekṣitavyaṁ kriyāviśeṣo'pyanuvartitavyaḥ।
na tu pravṛddhasya durāsadasya kumāra vīryasya phalaṁ ca cintyam॥
लक्ष्मण उत्तम लक्षणों से सम्पन्न थे। उन्हें कोई परास्त नहीं कर सकता था। भगवान् श्रीराम ने उनसे यह स्वाभाविक बात कही—‘कुमार! तुमने जो बात कही है, वह वर्तमान समय में हितकर, भविष्य में भी सुख पहुँचानेवाली, राजनीति के सर्वथा अनुकूल तथा साम के साथ-साथ धर्म और अर्थ से भी संयुक्त है। निश्चय ही सीता के अनुसंधान कार्य पर ध्यान देना चाहिये तथा उसके लिये विशेष कार्य या उपाय का भी अनुसरण करना चाहिये; किंतु प्रयत्न छोड़कर पूर्णरूप से बढ़े हुए दुर्लभ एवं बलवान् कर्म के फल पर ही दृष्टि रखना उचित नहीं है’
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atha padmapalāśākṣīṁ maithilīmanucintayan।
uvāca lakṣmaṇaṁ rāmo mukhena pariśuṣyatā॥
तदनन्तर प्रफुल्ल कमलदल के समान नेत्रवाली मिथिलेशकुमारी सीता का बार-बार चिन्तन करते हुए श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण को सम्बोधित करके सूखे हुए (उदास) मुँह से बोले—
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tarpayitvā sahasrākṣaḥ salilena vasuṁdharām।
nirvartayitvā sasyāni kṛtakarmā vyavasthitaḥ॥
‘सुमित्रानन्दन! सहस्रनेत्रधारी इन्द्र इस पृथ्वी को जल से तृप्त करके यहाँ के अनाजों को पकाकर अब कृतकृत्य हो गये हैं
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dīrghagambhīranirghoṣāḥ śailadrumapurogamāḥ।
visṛjya salilaṁ meghāḥ pariśāntā nṛpātmaja॥
‘राजकुमार! देखो, जो अत्यन्त गम्भीर स्वर से गर्जना किया करते और पर्वतों, नगरों तथा वृक्षों के ऊपर से होकर निकलते थे, वे मेघ अपना सारा जल बरसाकर शान्त हो गये हैं
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nīlotpaladalaśyāmāḥ śyāmīkṛtvā diśo daśa।
vimadā iva mātaṅgāḥ śāntavegāḥ payodharāḥ॥
‘नील कमलदल के समान श्यामवर्णवाले मेघ दसों दिशाओं को श्याम बनाकर मदरहित गजराजों के समान वेगशून्य हो गये हैं; उनका वेग शान्त हो गया है
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jalagarbhā mahāvegāḥ kuṭajārjunagandhinaḥ।
caritvā viratāḥ saumya vṛṣṭivātāḥ samudyatāḥ॥
‘सौम्य! जिनके भीतर जल विद्यमान था तथा जिनमें कुटज और अर्जुन के फूलों की सुगन्ध भरी हुई थी, वे अत्यन्त वेगशाली झंझावात उमड़-घुमड़कर सम्पूर्ण दिशाओं में विचरण करके अब शान्त हो गये हैं
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ghanānāṁ vāraṇānāṁ ca mayūrāṇāṁ ca lakṣmaṇa।
nādaḥ prasravaṇānāṁ ca praśāntaḥ sahasānagha॥
‘निष्पाप लक्ष्मण! बादलों, हाथियों, मोरों और झरनों के शब्द इस समय सहसा शान्त हो गये हैं
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abhivṛṣṭā mahāmeghairnirmalāścitrasānavaḥ।
anuliptā ivābhānti girayaścandraraśmibhiḥ॥
‘महान् मेघोंद्वारा बरसाये हुए जल से घुल जाने के कारण ये विचित्र शिखरोंवाले पर्वत अत्यन्त निर्मल हो गये हैं। इन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो चन्द्रमा की किरणोंद्वारा इनके ऊपर सफेदी कर दी गयी है
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śākhāsu saptacchadapādapānāṁ prabhāsu tārārkaniśākarāṇām।
līlāsu caivottamavāraṇānāṁ śriyaṁ vibhajyādya śaratpravṛttā॥
‘आज शरद्-ऋतु सपच्छद (छितवन) की डालियों में, सूर्य, चन्द्रमा और तारों की प्रभा में तथा श्रेष्ठ गजराजों की लीलाओं में अपनी शोभा बाँटकर आयी है
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sampratyanekāśrayacitraśobhā lakṣmīḥ śaratkālaguṇopapannā।
sūryāgrahastapratibodhiteṣu padmākareṣvabhyadhikaṁ vibhāti॥
‘इस समय शरत्काल के गुणों से सम्पन्न हुई लक्ष्मी यद्यपि अनेक आश्रयों में विभक्त होकर विचित्र शोभा धारण करती हैं, तथापि सूर्य की प्रथम किरणों से विकसित हुए कमल-वनों में वे सबसे अधिक सुशोभित होती हैं
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saptacchadānāṁ kusumopagandhī ṣaṭpādavṛndairanugīyamānaḥ।
mattadvipānāṁ pavanānusārī darpaṁ vineṣyannadhikaṁ vibhāti॥
‘छितवन के फूलों की सुगन्ध धारण करनेवाला शरत्काल स्वभावतः वायु का अनुसरण कर रहा है। भ्रमरों के समूह उसके गुणगान कर रहे हैं। वह मार्ग के जल को सोखता और मतवाले हाथियों के दर्प को बढ़ाता हुआ अधिक शोभा पा रहा है
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abhyāgataiścāruviśālapakṣaiḥ smarapriyaiḥ padmarajo'vakīrṇaiḥ।
mahānadīnāṁ pulinopayātaiḥ krīḍanti haṁsāḥ saha cakravākaiḥ॥
‘जिनके पंख सुन्दर और विशाल हैं, जिन्हें कामक्रीडा अधिक प्रिय है, जिनके ऊपर कमलों के पराग बिखरे हुए हैं, जो बड़ी-बड़ी नदियों के तटों पर उतरे हैं और मानसरोवर से साथ ही आये हैं, उन चक्रवाकों के साथ हंस क्रीडा कर रहे हैं
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madapragalbheṣu ca vāraṇeṣu gavāṁ samūheṣu ca darpiteṣu।
prasannatoyāsu ca nimnagāsu vibhāti lakṣmīrbahudhā vibhaktā॥
‘मदमत्त गजराजों में, दर्प-भरे वृषभों के समूहों में तथा स्वच्छ जलवाली सरिताओं में नाना रूपों में विभक्त हुई लक्ष्मी विशेष शोभा पा रही है
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nabhaḥ samīkṣyāmbudharairvimuktaṁ vimuktabarhābharaṇā vaneṣu।
priyāsvaraktā vinivṛttaśobhā gatotsavā dhyānaparā mayūrāḥ॥
‘आकाश को बादलों से शून्य हुआ देख वनों में पंखरूपी आभूषणों का परित्याग करनेवाले मोर अपनी प्रियतमाओं से विरक्त हो गये हैं। उनकी शोभा नष्ट हो गयी है और वे आनन्दशून्य हो ध्यानमग्न होकर बैठे हैं
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manojñagandhaiḥ priyakairanalpaiḥ puṣpātibhārāvanatāgraśākhaiḥ।
suvarṇagaurairnayanābhirāmairuddyotitānīva vanāntarāṇi॥
‘वन के भीतर बहुत-से असन नामक वृक्ष खड़े हैं, जिनकी डालियों के अग्रभाग फूलों के अधिक भार से झुक गये हैं। उनपर मनोहर सुगन्ध छा रही है। वे सभी वृक्ष सुवर्ण के समान गौर तथा नेत्रों को आनन्द प्रदान करनेवाले हैं। उनके द्वारा वनप्रान्त प्रकाशित-से हो रहे हैं
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priyānvitānāṁ nalinīpriyāṇāṁ vane priyāṇāṁ kusumodgatānām।
madotkaṭānāṁ madalālasānāṁ gajottamānāṁ gatayo'dya mandāḥ॥
‘जो अपनी प्रियतमाओं के साथ विचरते हैं, जिन्हें कमल के पुष्प तथा वन अधिक प्रिय हैं, जो छितवन के फूलों को सूँघकर उन्मत्त हो उठे हैं, जिनमें अधिक मद है तथा जिन्हें मदजनित कामभोग की लालसा बनी हुई है, उन गजराजों की गति आज मन्द हो गयी है
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vyaktaṁ nabhaḥ śastravidhautavarṇaṁ kṛśapravāhāni nadījalāni।
kahvāraśītāḥ pavanāḥ pravānti tamo vimuktāśca diśaḥ prakāśāḥ॥
‘इस समय आकाश का रंग शान पर चढ़े हुए शस्त्र की धार के समान स्वच्छ दिखायी देता है, नदियों के जल मन्दगति से प्रवाहित हो रहे हैं, श्वेत कमल की सुगन्ध लेकर शीतल मन्द वायु चल रही है, दिशाओं का अन्धकार दूर हो गया है और अब उनमें पूर्ण प्रकाश छा रहा है
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sūryātapakrāmaṇanaṣṭapaṅkā bhūmiścirodghāṭitasāndrareṇuḥ।
anyonyavaireṇa samāyutānāmudyogakālo'dya narādhipānām॥
‘घाम लगने से धरती का कीचड़ सूख गया है। अब उसपर बहुत दिनों के बाद घनी धूल प्रकट हुई है। परस्पर वैर रखनेवाले राजाओं के लिये युद्ध के निमित्त उद्योग करने का समय अब आ गया है
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śaradguṇāpyāyitarūpaśobhāḥ praharṣitāḥ pāṁsusamutthitāṅgāḥ।
madotkaṭāḥ samprati yuddhalubdhā vṛṣā gavāṁ madhyagatā nadanti॥
‘शरद्-ऋतु के गुणों ने जिनके रूप और शोभा को बढ़ा दिया है, जिनके सारे अङ्गों पर धूल छा रही है, जिनके मद की अधिक वृद्धि हुई है तथा जो युद्ध के लिये लुभाये हुए हैं, वे साँड़ इस समय गौओं के बीच में खड़े होकर अत्यन्त हर्षपूर्वक हँकड़ रहे हैं
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samanmathā tīvratarānurāgā kulānvitā mandagatiḥ kareṇuḥ।
madānvitaṁ samparivārya yāntaṁ vaneṣu bhartāramanuprayāti॥
‘जिसमें कामभाव का उदय हुआ है, इसीलिये जो अत्यन्त तीव्र अनुराग से युक्त है और अच्छे कुल में उत्पन्न हुई है, वह मन्दगति से चलनेवाली हथिनी वनों में जाते हुए अपने मदमत्त स्वामी को घेरकर उसका अनुगमन करती है
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tyaktvā varāṇyātmavibhūṣitāni barhāṇi tīropagatā nadīnām।
nirbhartsyamānā iva sārasaughaiḥ prayānti dīnā vimanā mayūrāḥ॥
‘अपने आभूषणरूप श्रेष्ठ पंखों को त्यागकर नदियों के तटों पर आये हुए मोर मानो सारस-समूहों की फटकार सुनकर दुःखी और खिन्नचित्त हो पीछे लौट जाते हैं
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vitrāsya kāraṇḍavacakravākān mahāravairbhinnakaṭā gajendrāḥ।
sarassubaddhāmbujabhūṣaṇeṣu vikṣobhya vikṣobhya jalaṁ pibanti॥
‘जिनके गण्डस्थल से मद की धारा बह रही है, वे गजराज अपनी महती गर्जना से कारण्डवों तथा चक्रवाकों को भयभीत करके विकसित कमलों से विभूषित सरोवरों में जल को हिलोर-हिलोरकर पी रहे हैं
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vyapetapaṅkāsu savālukāsu prasannatoyāsu sagokulāsu।
sasārasārāvavināditāsu nadīṣu haṁsā nipatanti hṛṣṭāḥ॥
‘जिनके कीचड़ दूर हो गये हैं। जो बालुकाओं से सुशोभित हैं, जिनका जल बहुत ही स्वच्छ है तथा गौओं के समुदाय जिनके जल का सेवन करते हैं, सारसों के कलरवों से गूँजती हुई उन सरिताओं में हंस बड़े हर्ष के साथ उतर रहे हैं
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nadīghanaprasravaṇodakānāmatipravṛddhānilabarhiṇānām।
plavaṁgamānāṁ ca gatotsavānāṁ dhruvaṁ ravāḥ samprati sampraṇaṣṭāḥ॥
‘नदी, मेघ, झरनों के जल, प्रचण्ड वायु, मोर और हर्षरहित मेढकों के शब्द निश्चय ही इस समय शान्त हो गये हैं
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anekavarṇāḥ suvinaṣṭakāyā navoditeṣvambudhareṣu naṣṭāḥ।
kṣudhārditā ghoraviṣā bilebhyaściroṣitā viprasaranti sarpāḥ॥
‘नूतन मेघों के उदित होने पर जो चिरकाल से बिलों में छिपे बैठे थे, जिनकी शरीरयात्रा नष्टप्राय हो गयी थी और इस प्रकार जो मृतवत् हो रहे थे, वे भयंकर विषवाले बहुरंगे सर्प भूख से पीड़ित होकर अब बिलों से बाहर निकल रहे हैं
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cañcaccandrakarasparśaharṣonmīlitatārakā।
aho rāgavatī saṁdhyā jahāti svayamambaram॥
‘शोभाशाली चन्द्रमा की किरणों के स्पर्श से होनेवाले हर्ष के कारण जिसके तारे किंचित् प्रकाशित हो रहे हैं (अथवा प्रियतम के करस्पर्शजनित हर्ष से जिसके नेत्रों की पुतली किंचित् खिल उठी है) वह रागयुक्त संध्या (अथवा अनुरागभरी नायिका) स्वयं ही अम्बर (आकाश अथवा वस्त्र) का त्याग कर रही है, यह कैसे आश्चर्य की बात है!
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rātriḥ śaśāṅkeditasaumyavaktrā tārāgaṇonmīlitacārunetrā।
jyotsnāṁśukaprāvaraṇā vibhāti nārīva śuklāṁśukasaṁvṛtāṅgī॥
‘चाँदनी की चादर ओढ़े हुए शरत्काल की यह रात्रि श्वेत साड़ी से ढके हुए अङ्गवाली एक सुन्दरी नारी के समान शोभा पाती है। उदित हुआ चन्द्रमा ही उसका सौम्य मुख है और तारे ही उसकी खुली हुई मनोहर आँखें हैं
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vipakvaśāliprasavāni bhuktvā praharṣitā sārasacārupaṅktiḥ।
nabhaḥ samākrāmati śīghravegā vātāvadhūtā grathiteva mālā॥
‘पके हुए धान की बालों को खाकर हर्ष से भरी हुई और तीव्र वेग से चलनेवाली सारसों की वह सुन्दर पंक्ति वायुकम्पित गुँथी हुई पुष्पमाला की भाँति आकाश में उड़ रही है
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nabhaḥ suptaikahaṁsaṁ kumudairupetaṁ mahāhradasthaṁ salilaṁ vibhāti।
ghanairvimuktaṁ niśi pūrṇacandraṁ tārāgaṇākīrṇamivāntarikṣam॥
‘कुमुद के फूलों से भरा हुआ उस महान् तालाब का जल जिसमें एक हंस सोया हुआ है, ऐसा जान पड़ता है मानो रात के समय बादलों के आवरण से रहित आकाश सब ओर छिटके हुए तारों से व्याप्त होकर पूर्ण चन्द्रमा के साथ शोभा पा रहा हो
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prakīrṇahaṁsākulamekhalānāṁ prabuddhapadmotpalamālinīnām।
vāpyuttamānāmadhikādya lakṣmīrvarāṅganānāmiva bhūṣitānām॥
‘सब ओर बिखरे हुए हंस ही जिनकी फैली हुई मेखला (करधनी) हैं, जो खिले हुए कमलों और उत्पलों की मालाएँ धारण करती हैं। उन उत्तम बावड़ियों की शोभा आज वस्त्राभूषणों से विभूषित हुई सुन्दरी वनिताओं के समान हो रही है
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veṇusvaravyañjitatūryamiśraḥ pratyūṣakāle'nilasampravṛttaḥ।
sammūrchito gargaragovṛṣāṇāmanyonyamāpūrayatīva śabdaḥ॥
‘वेणु के स्वर के रूप में व्यक्त हुए वाद्यघोष से मिश्रित और प्रातःकाल की वायु से वृद्धि को प्राप्त होकर सब ओर फैला हुआ दही मथने के बड़े-बड़े भाण्डों और साँड़ों का शब्द, मानो एक-दूसरे का पूरक हो रहा है
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navairnadīnāṁ kusumaprahāsairvyādhūyamānairmṛdumārutena।
dhautāmalakṣaumapaṭaprakāśaiḥ kūlāni kāśairupaśobhitāni॥
‘नदियों के तट मन्द-मन्द वायु से कम्पित, पुष्परूपी हास से सुशोभित और धुले हुए निर्मल रेशमी वस्त्रों के समान प्रकाशित होनेवाले नूतन कासों से बड़ी शोभा पा रहे हैं
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vanapracaṇḍā madhupānaśauṇḍāḥ priyānvitāḥ ṣaṭcaraṇāḥ prahṛṣṭāḥ।
vaneṣu mattāḥ pavanānuyātrāṁ kurvanti padmāsanareṇugaurāḥ॥
‘वन में ढिठाई के साथ घूमनेवाले तथा कमल और असन के परागों से गौरवर्ण को प्राप्त हुए मतवाले भ्रमर, जो पुष्पों के मकरन्द का पान करने में बड़े चतुर हैं, अपनी प्रियाओं के साथ हर्ष में भरकर वनों में (गन्ध के लोभ से) वायु के पीछे-पीछे जा रहे हैं
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jalaṁ prasannaṁ kusumaprahāsaṁ krauñcasvanaṁ śālivanaṁ vipakvam।
mṛduśca vāyurvimalaśca candraḥ śaṁsanti varṣavyapanītakālam॥
‘जल स्वच्छ हो गया है, धान की खेती पक गयी है, वायु मन्दगति से चलने लगी है और चन्द्रमा अत्यन्त निर्मल दिखायी देता है—ये सब लक्षण उस शरत्काल के आगमन की सूचना देते हैं। जिसमें वर्षा की समाप्ति हो जाती है, क्रौञ्च पक्षी बोलने लगते हैं और फल उस ऋतु के हास की भाँति खिल उठते हैं
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mīnopasaṁdarśitamekhalānāṁ nadīvadhūnāṁ gatayo'dya mandāḥ।
kāntopabhuktālasagāminīnāṁ prabhātakāleṣviva kāminīnām॥
‘रात को प्रियतम के उपभोग में आकर प्रातःकाल अलसायी गति से चलनेवाली कामिनियों की भाँति उन नदीस्वरूपा वधुओं की गति भी आज मन्द हो गयी है, जो मछलियों की मेखला-सी धारण किये हुए हैं
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sacakravākāni saśaivalāni kāśairdukūlairiva saṁvṛtāni।
sapatrarekhāṇi sarocanāni vadhūmukhānīva nadīmukhāni॥
‘नदियों के मुख नव वधुओं के मुँह के समान शोभा पाते हैं। उनमें जो चक्रवाक हैं, वे गोरोचनद्वारा निर्मित तिलक के समान प्रतीत होते हैं, जो सेवार हैं, वे वधू के मुख पर बनी हुई पत्रभङ्गी के समान जान पड़ते हैं तथा जो काश हैं, वे ही मानो श्वेत दुकूल बनकर नदीरूपिणी वधू के मुँह को ढके हुए हैं
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praphullabāṇāsanacitriteṣu prahṛṣṭaṣaṭpādanikūjiteṣu।
gṛhītacāpodyatadaṇḍacaṇḍaḥ pracaṇḍacāpo'dya vaneṣu kāmaḥ॥
‘फूले हुए सरकण्डों और असन के वृक्षों से जिनकी विचित्र शोभा हो रही है तथा जिनमें हर्षभरे भ्रमरों की आवाज गूँजती रहती है, उन वनों में आज प्रचण्ड धनुर्धर कामदेव प्रकट हुआ है, जो धनुष हाथ में लेकर विरही जनों को दण्ड देने के लिये उद्यत हो अत्यन्त कोप का परिचय दे रहा है
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lokaṁ suvṛṣṭyā paritoṣayitvā nadīstaṭākāni ca pūrayitvā।
niṣpannasasyāṁ vasudhāṁ ca kṛtvā tyaktvā nabhastoyadharāḥ praṇaṣṭāḥ॥
‘अच्छी वर्षा से लोगों को संतुष्ट करके नदियों और तालाबों को पानी से भरकर तथा भूतल को परिपक्व धान की खेती से सम्पन्न करके बादल आकाश छोड़कर अदृश्य हो गये
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darśayanti śarannadyaḥ pulināni śanaiḥ śanaiḥ।
navasaṁgamasavrīḍā jaghanānīva yoṣitaḥ॥
‘शरद्-ऋतु की नदियाँ धीरे-धीरे जल के हटने से अपने नग्न तटों को दिखा रही हैं। ठीक उसी तरह जैसे प्रथम समागम के समय लजीली युवतियाँ शनैः-शनैः अपने जघन-स्थल को दिखाने के लिये विवश होती हैं
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prasannasalilāḥ saumya kurarābhivināditāḥ।
cakravākagaṇākīrṇā vibhānti salilāśayāḥ॥
‘सौम्य! सभी जलाशयों के जल स्वच्छ हो गये हैं। वहाँ कुरर पक्षियों के कलनाद गूँज रहे हैं और चक्रवाकों के समुदाय चारों ओर बिखरे हुए हैं। इस प्रकार उन जलाशयों की बड़ी शोभा हो रही है
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anyonyabaddhavairāṇāṁ jigīṣūṇāṁ nṛpātmaja।
udyogasamayaḥ saumya pārthivānāmupasthitaḥ॥
‘सौम्य! राजकुमार! जिनमें परस्पर वैर बँधा हुआ है और जो एक-दूसरे को जीतने की इच्छा रखते हैं, उन भूमिपालों के लिये यह युद्ध के निमित्त उद्योग करने का समय उपस्थित हुआ है
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iyaṁ sā prathamā yātrā pārthivānāṁ nṛpātmaja।
na ca paśyāmi sugrīvamudyogaṁ ca tathāvidham॥
‘नरेशनन्दन! राजाओं की विजय-यात्रा का यह प्रथम अवसर है, किंतु न तो मैं सुग्रीव को यहाँ उपस्थित देखता हूँ और न उनका कोई वैसा उद्योग ही दृष्टिगोचर होता है
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asanāḥ saptaparṇāśca kovidārāśca puṣpitāḥ।
dṛśyante bandhujīvāśca śyāmāśca girisānuṣu॥
‘पर्वत के शिखरों पर असन, छितवन, कोविदार, बन्धुजीव तथा श्याम तमाल खिले दिखायी देते हैं
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haṁsasārasacakrāhvaiḥ kuraraiśca samantataḥ।
pulinānyavakīrṇāni nadīnāṁ paśya lakṣmaṇa॥
‘लक्ष्मण! देखो तो सही, नदियों के तटों पर सब ओर हंस, सारस, चक्रवाक और कुरर नामक पक्षी फैले हुए हैं
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catvāro vārṣikā māsā gatā varṣaśatopamāḥ।
mama śokābhitaptasya tathā sītāmapaśyataḥ॥
‘मैं सीता को न देखने के कारण शोक से संतप्त हो रहा हूँ; अतः ये वर्षा के चार महीने मेरे लिये सौ वर्षों के समान बीते हैं
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cakravākīva bhartāraṁ pṛṣṭhato'nugatā vanam।
viṣamaṁ daṇḍakāraṇyamudyānamiva cāṅganā॥
‘जैसे चकवी अपने स्वामी का अनुसरण करती है, उसी प्रकार कल्याणी सीता इस भयंकर एवं दुर्गम दण्डकारण्य को उद्यान-सा समझकर मेरे पीछे यहाँतक चली आयी थी
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priyāvihīne duḥkhārte hṛtarājye vivāsite।
kṛpāṁ na kurute rājā sugrīvo mayi lakṣmaṇa॥
‘लक्ष्मण! मैं अपनी प्रियतमा से बिछुड़ा हुआ हूँ। मेरा राज्य छीन लिया गया है और मैं देश से निकाल दिया गया हूँ। इस अवस्था में भी राजा सुग्रीव मुझ पर कृपा नहीं कर रहा है
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anātho hṛtarājyo'haṁ rāvaṇena ca dharṣitaḥ।
dīno dūragṛhaḥ kāmī māṁ caiva śaraṇaṁ gataḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
ityetaiḥ kāraṇaiḥ saumya sugrīvasya durātmanaḥ।
ahaṁ vānararājasya paribhūtaḥ paraṁtapaḥ॥
‘सौम्यलक्ष्मण! मैं अनाथ हूँ। राज्य से भ्रष्ट हो गया हूँ। रावण ने मेरा तिरस्कार किया है। मैं दीन हूँ। मेरा घर यहाँ से बहुत दूर है। मैं कामना लेकर यहाँ आया हूँ तथा सुग्रीव यह भी समझता है कि राम मेरी शरण में आये हैं। इन्हीं सब कारणों से वानरों का राजा दुरात्मा सुग्रीव मेरा तिरस्कार कर रहा है; किंतु उसे पता नहीं है कि मैं सदा शत्रुओं को संताप देने में समर्थ हूँ
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sa kālaṁ parisaṁkhyāya sītāyāḥ parimārgaṇe।
kṛtārthaḥ samayaṁ kṛtvā durmatirnāvavudhyate॥
‘उसने सीता की खोज के लिये समय निश्चित कर दिया था; किंतु उसका तो अब काम निकल गया है, इसीलिये वह दुर्बुद्धि वानर प्रतिज्ञा करके भी उसका कुछ खयाल नहीं कर रहा है
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sa kiṣkindhāṁ praviśya tvaṁ brūhi vānarapuṅgavam।
mūrkhaṁ grāmyasukhe saktaṁ sugrīvaṁ vacanānmama॥
‘अतः लक्ष्मण! तुम मेरी आज्ञा से किष्किन्धापुरी में जाओ और विषयभोग में फँसे हुए मूर्ख वानरराज सुग्रीव से इस प्रकार कहो—
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arthināmupapannānāṁ pūrvaṁ cāpyupakāriṇām।
āśāṁ saṁśrutya yo hanti sa loke puruṣādhamaḥ॥
‘जो बल-पराक्रम से सम्पन्न तथा पहले ही उपकार करनेवाले कार्यार्थी पुरुषों को प्रतिज्ञापूर्वक आशा देकर पीछे उसे तोड़ देता है, वह संसार के सभी पुरुषों में नीच है
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śubhaṁ vā yadi vā pāpaṁ yo hi vākyamudīritam।
satyena parigṛhṇāti sa vīraḥ puruṣottamaḥ॥
‘जो अपने मुख से प्रतिज्ञा के रूप में निकले हुए भले या बुरे सभी तरह के वचनों को अवश्य पालनीय समझकर सत्य की रक्षा के उद्देश्य से उनका पालन करता है, वह वीर समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ माना जाता है
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kṛtārthā hyakṛtārthānāṁ mitrāṇāṁ na bhavanti ye।
tān mṛtānapi kravyādāḥ kṛtaghnān nopabhuñjate॥
‘जो अपना स्वार्थ सिद्ध हो जाने पर, जिनके कार्य नहीं पूरे हुए हैं। उन मित्रों के सहायक नहीं होते—उनके कार्य को सिद्ध करने की चेष्टा नहीं करते, उन कृतघ्न पुरुषों के मरने पर मांसाहारी जन्तु भी उनका मांस नहीं खाते हैं
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nūnaṁ kāñcanapṛṣṭhasya vikṛṣṭasya mayā raṇe।
draṣṭumicchasi cāpasya rūpaṁ vidyudgaṇopamam॥
‘सुग्रीव! निश्चय ही तुम युद्ध में मेरे द्वारा खींचे गये सोने की पीठवाले धनुष का कौंधती हुई बिजली के सामन रूप देखना चाहते हो
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ghoraṁ jyātalanirghoṣaṁ kruddhasya mama saṁyuge।
nirghoṣamiva vajrasya punaḥ saṁśrotumicchasi॥
‘संग्राम में कुपित होकर मेरे द्वारा खींची गयी प्रत्यञ्चा की भयंकर टङ्कार को, जो वज्र की गड़गड़ाहट को भी मात करनेवाली है, अब फिर तुम्हें सुनने की इच्छा हो रही है
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kāmamevaṁgate'pyasya parijñāte parākrame।
tvatsahāyasya me vīra na cintā syānnṛpātmaja॥
‘वीर राजकुमार! सुग्रीव को तुम-जैसे सहायक के साथ रहनेवाले मेरे पराक्रम का ज्ञान हो चुका है, ऐसी दशा में भी यदि उसे यह चिन्ता न हो कि ये वाली की भाँति मुझे मार सकते हैं तो यह आश्चर्य की ही बात है!
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yadarthamayamārambhaḥ kṛtaḥ parapuraṁjaya।
samayaṁ nābhijānāti kṛtārthaḥ plavageśvaraḥ॥
‘शत्रु-नगरी पर विजय पानेवाले लक्ष्मण! जिसके लिये यह मित्रता आदि का सारा आयोजन किया गया, सीता की खोजविषयक उस प्रतिज्ञा को इस समय वानरराज सुग्रीव भूल गया है—उसे याद नहीं कर रहा है; क्योंकि उसका अपना काम सिद्ध हो चुका
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varṣāḥ samayakālaṁ tu pratijñāya harīśvaraḥ।
vyatītāṁścaturo māsān viharan nāvabudhyate॥
‘सुग्रीव ने यह प्रतिज्ञा की थी कि वर्षा का अन्त होते ही सीता की खोज आरम्भ कर दी जायगी, किंतु वह क्रीड़ा-विहार में इतना तन्मय हो गया है कि इन बीते हुए चार महीनों का उसे कुछ पता ही नहीं है
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sāmātyapariṣatkrīḍan pānamevopasevate।
śokadīneṣu nāsmāsu sugrīvaḥ kurute dayām॥
‘सुग्रीव मन्त्रियों तथा परिजनोंसहित क्रीडाजनित आमोद-प्रमोद में फँसकर विविध पेय पदार्थों का ही सेवन कर रहा है। हमलोग शोक से व्याकुल हो रहे हैं। तो भी वह हमपर दया नहीं करता है
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ucyatāṁ gaccha sugrīvastvayā vīra mahābala।
mama roṣasya yadrūpaṁ brūyāścainamidaṁ vacaḥ॥
‘महाबली वीर लक्ष्मण! तुम जाओ। सुग्रीव से बात करो। मेरे रोष का जो स्वरूप है, वह उसे बताओ और मेरा यह संदेश भी कह सुनाओ
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na sa saṁkucitaḥ panthā yena vālī hato gataḥ।
samaye tiṣṭha sugrīva mā vālipathamanvagāḥ॥
‘सुग्रीव! वाली मारा जाकर जिस रास्ते से गया है, वह आज भी बंद नहीं हुआ है। इसलिये तुम अपनी प्रतिज्ञा पर डटे रहो। वाली के मार्ग का अनुसरण न करो
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eka eva raṇe vālī śareṇa nihato mayā।
tvāṁ tu satyādatikrāntaṁ haniṣyāmi sabāndhavam॥
‘वाली तो रणक्षेत्र में अकेला ही मेरे बाण से मारा गया था, परंतु यदि तुम सत्य से विचलित हुए तो मैं तुम्हें बन्धु-बान्धवोंसहित काल के गाल में डाल दूँगा
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yadevaṁ vihite kārye yaddhitaṁ puruṣarṣabha।
tat tad brūhi naraśreṣṭha tvara kālavyatikramaḥ॥
‘पुरुषप्रवर! नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! जब इस तरह कार्य बिगड़ने लगे, ऐसे अवसर पर और भी जो-जो बातें कहनी उचित हों— जिनके कहने से अपना हित होता हो, वे सब बातें कहना। जल्दी करो; क्योंकि कार्य आरम्भ करने का समय बीता जा रहा है
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kuruṣva satyaṁ mama vānareśvara pratiśrutaṁ dharmamavekṣya śāśvatam।
mā vālinaṁ pretagato yamakṣaye tvamadya paśyermama coditaḥ śaraiḥ॥
‘सुग्रीव से कहो—‘वानरराज! तुम सनातन धर्म पर दृष्टि रखकर अपनी की हुई प्रतिज्ञा को सत्य कर दिखाओ, अन्यथा ऐसा न हो कि तुम्हें आज ही मेरे बाणों से प्रेरित हो प्रेतभाव को प्राप्त होकर यमलोक में वाली का दर्शन करना पड़े’
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sa pūrvajaṁ tīvravivṛddhakopaṁ lālapyamānaṁ prasamīkṣya dīnam।
cakāra tīvrāṁ matimugratejā harīśvare mānavavaṁśavardhanaḥ॥
मानव-वंश की वृद्धि करनेवाले उग्र तेजस्वी लक्ष्मण ने जब अपने बड़े भाई को दुःखी, बढ़े हुए तीव्र रोष से युक्त तथा अधिक बोलते देखा, तब वानरराज सुग्रीव के प्रति कठोर भाव धारण कर लिया
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रिंशः सर्गः॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३० ॥