हनुमान्जीके समझानेसे सुग्रीवका नीलको वानर-सैनिकोंको एकत्र करनेका आदेश देना
samīkṣya vimalaṁ vyoma gatavidyudbalāhakam।
sārasākulasaṁghuṣṭaṁ ramyajyotsnānulepanam॥
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samṛddhārthaṁ ca sugrīvaṁ mandadharmārthasaṁgraham।
atyarthaṁ cāsatāṁ mārgamekāntagatamānasam॥
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nivṛttakāryaṁ siddhārthaṁ pramadābhirataṁ sadā।
prāptavantamabhipretān sarvāneva manorathān॥
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svāṁ ca patnīmabhipretāṁ tārāṁ cāpi samīpsitām।
viharantamahorātraṁ kṛtārthaṁ vigatajvaram॥
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krīḍantamiva deveśaṁ gandharvāpsarasāṁ gaṇaiḥ।
mantriṣu nyastakāryaṁ ca mantriṇāmanavekṣakam॥
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ucchinnarājyasaṁdehaṁ kāmavṛttamiva sthitam।
niścitārtho'rthatattvajñaḥ kāladharmaviśeṣavit॥
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prasādya vākyairvividhairhetumadbhirmanoramaiḥ।
vākyavid vākyatattvajñaṁ harīśaṁ mārutātmajaḥ॥
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hitaṁ tathyaṁ ca pathyaṁ ca sāmadharmārthanītimat।
praṇayaprītisaṁyuktaṁ viśvāsakṛtaniścayam॥
harīśvaramupāgamya hanūmān vākyamabravīt।
पवनकुमार हनुमान् शास्त्र के निश्चित सिद्धान्त को जाननेवाले थे। क्या करना चाहिये और क्या नहीं—इन सभी बातों का उन्हें यथार्थ ज्ञान था! किस समय किस विशेष धर्म का पालन करना चाहिये—इसको भी वे ठीक-ठीक समझते थे। उन्हें बातचीत करने की कला का भी अच्छा ज्ञान था। उन्होंने देखा, आकाश निर्मल हो गया है। अब उसमें न तो बिजली चमकती है और न बादल ही दिखायी देते हैं। अन्तरिक्ष में सब ओर सारस उड़ रहे हैं और उनकी बोली सुनायी देती है। (चन्द्रोदय होने पर) आकाश ऐसा जान पड़ता है, मानो उसपर श्वेत चन्दनसदृश रमणीय चाँदनी का लेप चढ़ा दिया गया हो। सुग्रीव का प्रयोजन सिद्ध हो जाने के कारण अब वे धर्म और अर्थ के संग्रह में शिथिलता दिखाने लगे हैं। असाधु पुरुषों के मार्ग (कामसेवन) का ही अधिक आश्रय ले रहे हैं। एकान्त में ही (जहाँ स्त्रियों के सङ्ग में कोई बाधा न पड़े) उनका मन लगता है। उनका काम पूरा हो गया है। उनके अभीष्ट प्रयोजन की सिद्धि हो चुकी है। अब वे सदा युवती स्त्रियों के साथ क्रीडा-विलास में ही लगे रहते हैं। उन्होंने अपने सारे अभिलषित मनोरथों को प्राप्त कर लिया है। अपनी मनोवाञ्छित पत्नी रुमा तथा अभीष्ट सुन्दरी तारा को भी प्राप्त करके अब वे कृतकृत्य एवं निश्चिन्त होकर दिन-रात भोग-विलास में लगे रहते हैं। जैसे देवराज इन्द्र गन्धर्वों और अप्सराओं के समुदाय के साथ क्रीडा में तत्पर रहते हैं, उसी प्रकार सुग्रीव भी अपने मन्त्रियों पर राजकार्य का भार रखकर क्रीडा-विहार में तत्पर हैं। मन्त्रियों के कार्यों की देखभाल वे कभी नहीं करते हैं। मन्त्रियों की सज्जनता के कारण यद्यपि राज्य को किसी प्रकार की हानि पहुँचने का संदेह नहीं है, तथापि स्वयं सुग्रीव ही स्वेच्छाचारी-से हो रहे हैं। यह सब सोचकर हनुमान्जी वानरराज सुग्रीव के पास गये और उन्हें युक्तियुक्त विविध एवं मनोरम वचनों के द्वारा प्रसन्न करके बातचीत का मर्म समझनेवाले उन सुग्रीव से हितकर, सत्य, लाभदायक, साम, धर्म और अर्थ-नीति से युक्त, शास्त्रविश्वासी पुरुषों के सुदृढ़ निश्चय से सम्पन्न तथा प्रेम और प्रसन्नता से भरे वचन बोले
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rājyaṁ prāptaṁ yaśaścaiva kaulī śrīrabhivardhitā॥
mitrāṇāṁ saṁgrahaḥ śeṣastad bhavān kartumarhati।
‘राजन्! आपने राज्य और यश प्राप्त कर लिया तथा कुलपरम्परा से आयी हुई लक्ष्मी को भी बढ़ाया; किंतु अभी मित्रों को अपनाने का कार्य शेष रह गया है, उसे आपको इस समय पूर्ण करना चाहिये
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yo hi mitreṣu kālajñaḥ satataṁ sādhu vartate॥
tasya rājyaṁ ca kīrtiśca pratāpaścāpi vardhate।
‘जो राजा ‘कब प्रत्युपकार करना चाहिये’ इस बात को जानकर मित्रों के प्रति सदा साधुतापूर्ण बर्ताव करता है, उसके राज्य, यश और प्रताप की वृद्धि होती है
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yasya kośaśca daṇḍaśca mitrāṇyātmā ca bhūmipa।
samānyetāni sarvāṇi sa rājyaṁ mahadaśnute॥
‘पृथ्वीनाथ! जिस राजा का कोश, दण्ड (सेना), मित्र और अपना शरीर—ये सब-के-सब समान रूप से उसके वश में रहते हैं, वह विशाल राज्य का पालन एवं उपभोग करता है
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tad bhavān vṛttasampannaḥ sthitaḥ pathi niratyaye।
mitrārthamabhinītārthaṁ yathāvat kartumarhati॥
‘आप सदाचार से सम्पन्न और नित्य सनातन धर्म के मार्ग पर स्थित हैं; अतः मित्र के कार्य को सफल बनाने के लिये जो प्रतिज्ञा की है, उसे यथोचितरूप से पूर्ण कीजिये
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saṁtyajya sarvakarmāṇi mitrārthe yo na vartate।
sambhramād vikṛtotsāhaḥ so'narthairnāvarudhyate॥
‘जो अपने सब कार्यों को छोड़कर मित्र का कार्य सिद्ध करने के लिये विशेष उत्साहपूर्वक शीघ्रता के साथ नहीं लग जाता है, उसे अनर्थ का भागी होना पड़ता है
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yo hi kālavyatīteṣu mitrakāryeṣu vartate।
sa kṛtvā mahato'pyarthānna mitrārthena yujyate॥
‘कार्यसाधन का उपयुक्त अवसर बीत जाने के बाद जो मित्र के कार्यों में लगता है, वह बड़े-से-बड़े कार्यों को सिद्ध करके भी मित्र के प्रयोजन को सिद्ध करनेवाला नहीं माना जाता है
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tadidaṁ mitrakāryaṁ naḥ kālātītamariṁdama।
kriyatāṁ rāghavasyaitad vaidehyāḥ parimārgaṇam॥
‘शत्रुदमन! भगवान् श्रीराम हमारे परम सुहृद् हैं। उनके इस कार्य का समय बीता जा रहा है; अतः विदेहकुमारी सीता की खोज आरम्भ कर देनी चाहिये
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na ca kālamatītaṁ te nivedayati kālavit।
tvaramāṇo'pi sa prājñastava rājan vaśānugaḥ॥
‘राजन्! परम बुद्धिमान् श्रीराम समय का ज्ञान रखते हैं और उन्हें अपने कार्य की सिद्धि के लिये जल्दी लगी हुई है, तो भी वे आपके अधीन बने हुए हैं। संकोचवश आपसे नहीं कहते कि मेरे कार्य का समय बीत रहा है
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kulasya hetuḥ sphītasya dīrghabandhuśca rāghavaḥ।
aprameyaprabhāvaśca svayaṁ cāpratimo guṇaiḥ॥
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tasya tvaṁ kuru vai kāryaṁ pūrvaṁ tena kṛtaṁ tava।
harīśvara kapiśreṣṭhānājñāpayitumarhasi॥
‘वानरराज! भगवान् श्रीराम चिरकालतक मित्रता निभानेवाले हैं। वे आपके समृद्धशाली कुल के अभ्युदय के हेतु हैं। उनका प्रभाव अतुलनीय है। वे गुणों में अपना सानी नहीं रखते हैं। अब आप उनका कार्य सिद्ध कीजिये; क्योंकि उन्होंने आपका काम पहले ही सिद्ध कर दिया है। आप प्रधान-प्रधान वानरों को इस कार्य के लिये आज्ञा दीजिये
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nahi tāvad bhavet kālo vyatītaścodanādṛte।
coditasya hi kāryasya bhavet kālavyatikramaḥ॥
‘श्रीरामचन्द्रजी के कहने के पहले ही यदि हमलोग कार्य प्रारम्भ कर दें तो समय बीता हुआ नहीं माना जायगा; किंतु यदि उन्हें इसके लिये प्रेरणा करनी पड़ी तो यही समझा जायगा कि हमने समय बिता दिया है—उनके कार्य में बहुत विलम्ब कर दिया है
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akarturapi kāryasya bhavān kartā harīśvara।
kiṁ punaḥ pratikartuste rājyena ca vadhena ca॥
‘वानरराज! जिसने आपका कोई उपकार नहीं किया हो, उसका कार्य भी आप सिद्ध करनेवाले हैं। फिर जिन्होंने वाली का वध तथा राज्य प्रदान करके आपका उपकार किया है, उनका कार्य आप शीघ्र सिद्ध करें, इसके लिये तो कहना ही क्या है
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śaktimānativikrānto vānararakṣagaṇeśvara।
kartuṁ dāśaratheḥ prītimājñāyāṁ kiṁ nu sajjase॥
‘वानर और भालू-समुदाय के स्वामी सुग्रीव! आप शक्तिमान् और अत्यन्त पराक्रमी हैं; फिर भी दशरथनन्दन श्रीराम का प्रिय कार्य करने के लिये वानरों को आज्ञा देने में क्यों विलम्ब करते हैं?
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kāmaṁ khalu śaraiḥ śaktaḥ surāsuramahoragān।
vaśe dāśarathiḥ kartuṁ tvatpratijñāmavekṣate॥
‘इसमें संदेह नहीं कि दशरथकुमार भगवान् श्रीराम अपने बाणों से समस्त देवताओं, असुरों और बड़े-बड़े नागों को भी अपने वश में कर सकते हैं, तथापि आपने जो उनके कार्य को सिद्ध करने की प्रतिज्ञा की है, उसीकी वे राह देख रहे हैं
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prāṇatyāgāviśaṁkena kṛtaṁ tena mahat priyam।
tasya mārgāma vaidehīṁ pṛthivyāmapi cāmbare॥
‘उन्हें आपके लिये वाली के प्राणतक लेने में हिचक नहीं हुई। वे आपका बहुत बड़ा प्रिय कार्य कर चुके हैं; अतः अब हमलोग उनकी पत्नी विदेहकुमारी सीता का इस भूतल पर और आकाश में भी पता लगावें
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devadānavagandharvā asurāḥ samarudgaṇāḥ।
na ca yakṣā bhayaṁ tasya kuryuḥ kimiva rākṣasāḥ॥
‘देवता, दानव, गन्धर्व, असुर, मरुद्गण तथा यक्ष भी श्रीराम को भय नहीं पहुँचा सकते; फिर राक्षसों की तो बिसात ही क्या है
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tadevaṁ śaktiyuktasya pūrvaṁ pratikṛtastathā।
rāmasyārhasi piṅgeśa kartuṁ sarvātmanā priyam॥
‘वानरराज! ऐसे शक्तिशाली तथा पहले ही उपकार करनेवाले भगवान् श्रीराम का प्रिय कार्य आपको अपनी सारी शक्ति लगाकर करना चाहिये
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nādhastādavanau nāpsu gatirnopari cāmbare।
kasyacit sajjate'smākaṁ kapīśvara tavājñayā॥
‘कपीश्वर! आपकी आज्ञा हो जाय तो जल में, थल में, नीचे (पाताल में) तथा ऊपर आकाश में—कहीं भी हम लोगों की गति रुक नहीं सकती
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tadājñāpaya kaḥ kiṁ te kuto vāpi vyavasyatu।
harayo hyāpradhṛṣyāste santi koṭyagrato'nagha॥
‘निष्पाप कपिराज! अतः आप आज्ञा दीजिये कि कौन कहाँ से आपकी किस आज्ञा का पालन करने के लिये उद्योग करे। आपके अधीन करोड़ों से भी अधिक ऐसे वानर मौजूद हैं, जिन्हें कोई परास्त नहीं कर सकता
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tasya tad vacanaṁ śrutvā kāle sādhu nirūpitam।
sugrīvaḥ sattvasampannaścakāra matimuttamām॥
सुग्रीव सत्त्वगुण से सम्पन्न थे। उन्होंने हनुमान्जी के द्वारा ठीक समय पर अच्छे ढंग से कही हुई उपर्युक्त बातें सुनकर भगवान् श्रीराम का कार्य सिद्ध करने के लिये अत्यन्त उत्तम निश्चय किया
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saṁdideśātimatimān nīlaṁ nityakṛtodyamam।
dikṣu sarvāsu sarveṣāṁ sainyānāmupasaṁgrahe॥
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yathā senā samagrā me yūthapālāśca sarvaśaḥ।
samāgacchantyasaṅgena senāgryeṇa tathā kuru॥
वे परम बुद्धिमान् थे। अतः नित्य उद्यमशील नील नामक वानर को उन्होंने समस्त दिशाओं से सम्पूर्ण वानर-सेनाओं को एकत्र करने के लिये आज्ञा दी और कहा—‘तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे मेरी सारी सेना यहाँ इकट्ठी हो जाय और सभी यूथपति अपनी सेना एवं सेनापतियों के साथ अविलम्ब उपस्थित हो जायँ
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ye tvantapālāḥ plavagāḥ śīghragā vyavasāyinaḥ।
samānayantu te śīghraṁ tvaritāḥ śāsanānmama।
svayaṁ cānantaraṁ kāryaṁ bhavānevānupaśyatu॥
‘राज्य-सीमा की रक्षा करनेवाले जो-जो उद्योगी और शीघ्रगामी वानर हैं, वे सब मेरी आज्ञा से शीघ्र यहाँ आ जायें। उसके बाद जो कुछ कर्तव्य हो, उसपर तुम स्वयं ही ध्यान दो
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tripañcarātrādūrdhvaṁ yaḥ prāpnuyādiha vānaraḥ।
tasya prāṇāntiko daṇḍo nātra kāryā vicāraṇā॥
‘जो वानर पंद्रह दिनों के बाद यहाँ पहुँचेगा, उसे प्राणान्त दण्ड दिया जायगा। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये
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harīṁśca vṛddhānupayātu sāṅgado bhavān mamājñāmadhikṛtya niścitam।
iti vyavasthāṁ haripuṅgaveśvaro vidhāya veśma praviveśa vīryavān॥
‘यह मेरी निश्चित आज्ञा है। इसके अनुसार इस व्यवस्था का अधिकार लेकर अङ्गद के साथ तुम स्वयं बड़े-बूढ़े वानरों के पास जाओ।’ ऐसा प्रबन्ध करके महाबली वानरराज सुग्रीव अपने महल में चले गये
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः॥ २९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें उन्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २९ ॥