वाल्मीकि रामायणम् · किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

सर्गः २१ · १६ श्लोकाःSarga 21 · 16 ślokas

हनुमान्जीका ताराको समझाना और ताराका पतिके अनुगमनका ही निश्चय करना

॥ ४ · २१ · १ ॥
ततो निपतितां तारां च्युतां तारामिवाम्बरात्। शनैराश्वासयामास हनुमान् हरियूथपः॥

tato nipatitāṁ tārāṁ cyutāṁ tārāmivāmbarāt।
śanairāśvāsayāmāsa hanumān hariyūthapaḥ॥

तारा को आकाश से टूटकर गिरी हुई तारिका के समान पृथ्वी पर पड़ी देख वानरयूथपति हनुमान् ने धीरे-धीरे समझाना आरम्भ किया—

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॥ ४ · २१ · २ ॥
गुणदोषकृतं जन्तुः स्वकर्म फलहेतुकम्। अव्यग्रस्तदवाप्नोति सर्वं प्रेत्य शुभाशुभम्॥

guṇadoṣakṛtaṁ jantuḥ svakarma phalahetukam।
avyagrastadavāpnoti sarvaṁ pretya śubhāśubham॥

‘देवि! जीव के द्वारा गुणबुद्धि से अथवा दोषबुद्धि से किये हुए जो अपने कर्म हैं, वे ही सुख-दुःखरूप फल की प्राप्ति करानेवाले होते हैं। परलोक में जाकर प्रत्येक जीव शान्तभाव से रहकर अपने शुभ और अशुभ—सभी कर्मों का फल भोगता है

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॥ ४ · २१ · ३ ॥
शोच्या शोचसि कं शोच्यं दीनं दीनानुकम्पसे। कश्च कस्यानुशोच्योऽस्ति देहेऽस्मिन् बुद्बुदोपमे॥

śocyā śocasi kaṁ śocyaṁ dīnaṁ dīnānukampase।
kaśca kasyānuśocyo'sti dehe'smin budbudopame॥

‘तुम स्वयं शोचनीया हो; फिर दूसरे किसको शोचनीय समझकर शोक कर रही हो? स्वयं दीन होकर दूसरे किस दीन पर दया करती हो? पानी के बुलबुले के समान इस शरीर में रहकर कौन जीव किस जीव के लिये शोचनीय है?

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॥ ४ · २१ · ४ ॥
अङ्गदस्तु कुमारोऽयं द्रष्टव्यो जीवपुत्रया। आयत्यां विधेयानि समर्थान्यस्य चिन्तय॥

aṅgadastu kumāro'yaṁ draṣṭavyo jīvaputrayā।
āyatyāṁ ca vidheyāni samarthānyasya cintaya॥

‘तुम्हारे पुत्र कुमार अङ्गद जीवित हैं। अब तुम्हें इन्हींकी ओर देखना चाहिये और इनके लिये भविष्य में जो उन्नति के साधक श्रेष्ठ कार्य हों, उनका विचार करना चाहिये

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॥ ४ · २१ · ५ ॥
जानास्यनियतामेवं भूतानामागतिं गतिम्। तस्माच्छुभं हि कर्तव्यं पण्डिते नेह लौकिकम्॥

jānāsyaniyatāmevaṁ bhūtānāmāgatiṁ gatim।
tasmācchubhaṁ hi kartavyaṁ paṇḍite neha laukikam॥

देवि! तुम विदुषी हो, अतः जानती ही हो कि प्राणियों के जन्म और मृत्यु का कोई निश्चित समय नहीं है। इसलिये शुभ (परलोक के लिये सुखद) कर्म ही करना चाहिये। अधिक रोना-धोना आदि जो लौकिक कर्म (व्यवहार) है, उसे नहीं करना चाहिये

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॥ ४ · २१ · ६ ॥
यस्मिन् हरिसहस्राणि शतानि नियुतानि च। वर्तयन्ति कृताशानि सोऽयं दिष्टान्तमागतः॥

yasmin harisahasrāṇi śatāni niyutāni ca।
vartayanti kṛtāśāni so'yaṁ diṣṭāntamāgataḥ॥

‘सैकड़ों, हजारों और लाखों वानर जिनपर आशा लगाये जीवन-निर्वाह करते थे, वे ही ये वानरराज आज अपनी प्रारब्धनिर्मित आयु की अवधि पूरी कर चुके

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॥ ४ · २१ · ७ ॥
यदयं न्यायदृष्टार्थः सामदानक्षमापरः। गतो धर्मजितां भूमिं नैनं शोचितुमर्हसि॥

yadayaṁ nyāyadṛṣṭārthaḥ sāmadānakṣamāparaḥ।
gato dharmajitāṁ bhūmiṁ nainaṁ śocitumarhasi॥

‘इन्होंने नीतिशास्त्र के अनुसार अर्थ का साधन—राज्य-कार्य का संचालन किया है। ये उपयुक्त समय पर साम, दान और क्षमा का व्यवहार करते आये हैं। अतः धर्मानुसार प्राप्त होनेवाले लोक में गये हैं। इनके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये

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॥ ४ · २१ · ८ ॥
सर्वे हरिशार्दूलाः पुत्रश्चायं तवाङ्गदः। हर्यृक्षपतिराज्यं त्वत्सनाथमनिन्दिते॥

sarve ca hariśārdūlāḥ putraścāyaṁ tavāṅgadaḥ।
haryṛkṣapatirājyaṁ ca tvatsanāthamanindite॥

‘सती साध्वी देवि! ये सभी श्रेष्ठ वानर, ये तुम्हारे पुत्र अङ्गद तथा वानर और भालुओं का यह राज्य—सब तुमसे ही सनाथ हैं—तुम्हीं इन सबकी स्वामिनी हो

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॥ ४ · २१ · ९ ॥
ताविमौ शोकसंतप्तौ शनैः प्रेरय भामिनि। त्वया परिगृहीतोऽयमङ्गदः शास्तु मेदिनीम्॥

tāvimau śokasaṁtaptau śanaiḥ preraya bhāmini।
tvayā parigṛhīto'yamaṅgadaḥ śāstu medinīm॥

‘भामिनि! ये अङ्गद और सुग्रीव दोनों ही शोक से संतप्त हो रहे हैं। तुम इन्हें भावी कार्य के लिये प्रेरित करो। तुम्हारे अधीन रहकर अङ्गद इस पृथ्वी का शासन करें

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॥ ४ · २१ · १० ॥
संततिश्च यथा दृष्टा कृत्यं यच्चापि साम्प्रतम्। राज्ञस्तत् क्रियतां सर्वमेष कालस्य निश्चयः॥

saṁtatiśca yathā dṛṣṭā kṛtyaṁ yaccāpi sāmpratam।
rājñastat kriyatāṁ sarvameṣa kālasya niścayaḥ॥

‘शास्त्र में संतान होने का जो प्रयोजन बतलाया गया है तथा इस समय राजा वाली के पारलौकिक कल्याण के लिये जो कुछ कर्तव्य है, वही करो—यही समय की निश्चित प्रेरणा है

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॥ ४ · २१ · ११ ॥
संस्कार्यो हरिराजस्तु अङ्गदश्चाभिषिच्यताम्। सिंहासनगतं पुत्रं पश्यन्ती शान्तिमेष्यसि॥

saṁskāryo harirājastu aṅgadaścābhiṣicyatām।
siṁhāsanagataṁ putraṁ paśyantī śāntimeṣyasi॥

‘वानरराज का अन्त्येष्टि-संस्कार और कुमार अङ्गद का राज्याभिषेक किया जाय। बेटे को राजसिंहासन पर बैठा देखकर तुम्हें शान्ति मिलेगी’

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॥ ४ · २१ · १२ ॥
सा तस्य वचनं श्रुत्वा भर्तृव्यसनपीडिता। अब्रवीदुत्तरं तारा हनूमन्तमवस्थितम्॥

sā tasya vacanaṁ śrutvā bhartṛvyasanapīḍitā।
abravīduttaraṁ tārā hanūmantamavasthitam॥

तारा अपने स्वामी के विरह-शोक से पीड़ित थी। वह उपर्युक्त वचन सुनकर सामने खड़े हुए हनुमान्जी से बोली—

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॥ ४ · २१ · १३ ॥
अङ्गदप्रतिरूपाणां पुत्राणामेकतः शतम्। हतस्याप्यस्य वीरस्य गात्रसंश्लेषणं वरम्॥

aṅgadapratirūpāṇāṁ putrāṇāmekataḥ śatam।
hatasyāpyasya vīrasya gātrasaṁśleṣaṇaṁ varam॥

‘अङ्गद के समान सौ पुत्र एक ओर और मरे होने पर भी इस वीरवर स्वामी का आलिङ्गन करके सती होना दूसरी ओर—इन दोनों में से अपने वीर पति के शरीर का आलिङ्गन ही मुझे श्रेष्ठ जान पड़ता है

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॥ ४ · २१ · १४ ॥
चाहं हरिराज्यस्य प्रभवाम्यङ्गदस्य वा। पितृव्यस्तस्य सुग्रीवः सर्वकार्येष्वनन्तरः॥

na cāhaṁ harirājyasya prabhavāmyaṅgadasya vā।
pitṛvyastasya sugrīvaḥ sarvakāryeṣvanantaraḥ॥

‘मैं न तो वानरों के राज्य की स्वामिनी हूँ और न मुझे अङ्गद के लिये ही कुछ करने का अधिकार है। इसके चाचा सुग्रीव ही समस्त कार्यों के लिये समर्थ हैं और वे ही मेरी अपेक्षा इसके निकटवर्ती भी हैं

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॥ ४ · २१ · १५ ॥
नह्येषा बुद्धिरास्थेया हनूमन्नङ्गदं प्रति। पिता हि बन्धुः पुत्रस्य माता हरिसत्तम॥

nahyeṣā buddhirāstheyā hanūmannaṅgadaṁ prati।
pitā hi bandhuḥ putrasya na mātā harisattama॥

‘कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी! अङ्गद के विषय में आपकी यह सलाह मेरे लिये काम में लाने योग्य नहीं है। आपको यह समझना चाहिये कि पुत्र के वास्तविक बन्धु (सहायक) पिता और चाचा ही हैं। माता नहीं

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॥ ४ · २१ · १६ ॥
नहि मम हरिराजसंश्रयात् क्षमतरमस्ति परत्र चेह वा। अभिमुखहतवीरसेवितं शयनमिदं मम सेवितुं क्षमम्॥

nahi mama harirājasaṁśrayāt kṣamataramasti paratra ceha vā।
abhimukhahatavīrasevitaṁ śayanamidaṁ mama sevituṁ kṣamam॥

मेरे लिये वानरराज वाली का अनुगमन करने से बढ़कर इस लोक या परलोक में कोई भी कार्य उचित नहीं है। युद्ध में शत्रु से जूझकर मरे हुए अपने वीर स्वामी के द्वारा सेवित चिता आदि की शय्या पर शयन करना ही मेरे लिये सर्वथा योग्य है’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकविंशः सर्गः॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २१ ॥