अङ्गदसहित ताराका भागे हुए वानरोंसे बात करके वालीके समीप आना और उसकी दुर्दशा देखकर रोना
sa vānaramahārājaḥ śayānaḥ śarapīḍitaḥ।
pratyukto hetumadvākyairnottaraṁ pratyapadyata॥
वानरों का महाराज वाली बाण से पीड़ित होकर भूमि पर पड़ा था। श्रीरामचन्द्रजी के युक्तियुक्त वचनद्वारा अपनी बात का उत्तर पाकर उसे फिर कोई जवाब न सूझा
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aśmabhiḥ paribhinnāṅgaḥ pādapairāhato bhṛśam।
rāmabāṇena cākrānto jīvitānte mumoha saḥ॥
पत्थरों की मार पड़ने से उसके अङ्ग टूट-फूट गये थे। वृक्षों के आघात से भी वह बहुत घायल हो गया था और श्रीराम के बाण से आक्रान्त होकर तो वह जीवन के अन्तकाल में ही पहुँच गया था। उस समय वह मूर्च्छित हो गया
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taṁ bhāryā bāṇamokṣeṇa rāmadattena saṁyuge।
hataṁ plavagaśārdūlaṁ tārā śuśrāva vālinam॥
उसकी पत्नी तारा ने सुना कि युद्धस्थल में वानरश्रेष्ठ वाली श्रीराम के चलाये हुए बाण से मारे गये
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sā saputrāpriyaṁ śrutvā vadhaṁ bhartuḥ sudāruṇam।
niṣpapāta bhṛśaṁ tasmādudvignā girikandarāt॥
अपने स्वामी के वध का अत्यन्त भयंकर एवं अप्रिय समाचार सुनकर वह बहुत उद्विग्न हो उठी और अपने पुत्र अङ्गद को साथ ले उस पर्वत की कन्दरा से बाहर निकली
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ye tvaṅgadaparīvārā vānarā hi mahābalāḥ।
te sakārmukamālokya rāmaṁ trastāḥ pradudruvuḥ॥
अङ्गद को चारों ओर से घेरकर उनकी रक्षा करनेवाले जो महाबली वानर थे, वे श्रीरामचन्द्रजी को धनुष लिये देख भयभीत होकर भाग चले
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sā dadarśa tatastrastān harīnāpatato drutam।
yūthādeva paribhraṣṭān mṛgān nihatayūthapān॥
तारा ने वेग से भागकर आते हुए उन भयभीत वानरों को देखा। वे जिनके यूथपति मारे गये हों, उन यूथभ्रष्ट मृगों के समान जान पड़ते थे
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tānuvāca samāsādya duḥkhitān duḥkhitā satī।
rāmavitrāsitān sarvānanubaddhāniveṣubhiḥ॥
वे सब वानर श्रीराम से इस प्रकार डरे हुए थे, मानो उनके बाण इनके पीछे आ रहे हों। उन दुःखी वानरों के पास पहुँचकर सती-साध्वी तारा और भी दुःखी हो गयी तथा उनसे इस प्रकार बोली—
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vānarā rājasiṁhasya yasya yūyaṁ puraḥsarāḥ।
taṁ vihāya suvitrastāḥ kasmād dravata durgatāḥ॥
‘वानरो! तुम तो उन राजसिंह वाली के आगे-आगे चलनेवाले थे। अब उन्हें छोड़कर अत्यन्त भयभीत हो दुर्गति में पड़कर क्यों भागे जा रहे हो?
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rājyahetoḥ sa ced bhrātā bhrātrā krūreṇa pātitaḥ।
rāmeṇa prahitairdūrānmārgaṇairdūrapātibhiḥ॥
‘यदि राज्य के लोभ से उस क्रूर भाई सुग्रीव ने श्रीराम को प्रेरित करके उनके द्वारा दूर से चलाये हुए और दूरतक जानेवाले बाणोंद्वारा अपने भाई को मरवा दिया है तो तुमलोग क्यों भागे जा रहे हो?’
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kapipatnyā vacaḥ śrutvā kapayaḥ kāmarūpiṇaḥ।
prāptakālamaviśliṣṭamūcurvacanamaṅganām॥
वाली की पत्नी का वह वचन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उन वानरों ने कल्याणमयी तारा देवी को सम्बोधित करके सर्वसम्मति से स्पष्ट शब्दों में यह समयोचित बात कही—
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jīvaputre nivartasva putraṁ rakṣasva cāṅgadam।
antako rāmarūpeṇa hatvā nayati vālinam॥
‘देवि! अभी तुम्हारा पुत्र जीवित है। तुम लौट चलो और अपने पुत्र अङ्गद की रक्षा करो। श्रीराम का रूप धारण करके स्वयं यमराज आ पहुँचा है, जो वाली को मारकर अपने साथ ले जा रहा है
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kṣiptān vṛkṣān samāvidhya vipulāśca tathā śilāḥ।
vālī vajrasamairbāṇairvajreṇeva nipātitaḥ॥
‘वाली के चलाये हुए वृक्षों और बड़ी-बड़ी शिलाओं को अपने वज्रतुल्य बाणों से विदीर्ण करके श्रीराम ने वाली को मार गिराया है। मानो वज्रधारी इन्द्र ने अपने वज्र के द्वारा किसी महान् पर्वत को धराशायी कर दिया हो
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abhibhūtamidaṁ sarvaṁ vidrutaṁ vānaraṁ balam।
asmin plavagaśārdūle hate śakrasamaprabhe॥
‘इन्द्र के समान तेजस्वी इन वानरश्रेष्ठ वाली के मारे जाने पर यह सारी वानर-सेना श्रीराम से पराजित-सी होकर भाग खड़ी हुई है
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rakṣyatāṁ nagarī śūrairaṅgadaścābhiṣicyatām।
padasthaṁ vālinaḥ putraṁ bhajiṣyanti plavaṁgamāḥ॥
‘तुम शूरवीरोंद्वारा इस नगरी की रक्षा करो। कुमार अङ्गद का किष्किन्धा के राज्य पर अभिषेक कर दो। राजसिंहासन पर बैठे हुए वालिकुमार अङ्गद की सभी वानर सेवा करेंगे
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athavārucitaṁ sthānamiha te rucirānane।
āviśanti ca durgāṇi kṣipramadyaiva vānarāḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
abhāryāḥ sahabhāryāśca santyatra vanacāriṇaḥ।
lubdhebhyo vipralabdhebhyastebhyo naḥ sumahadbhayam॥
‘अथवा सुमुखि! अब इस नगर में तुम्हारा रहना हमें अच्छा नहीं जान पड़ता; क्योंकि किष्किन्धा के दुर्गम स्थानों में अभी सुग्रीवपक्षीय वानर शीघ्र प्रवेश करेंगे। यहाँ बहुत-से ऐसे वनचारी वानर हैं, जिनमेंसे कुछ तो अपनी स्त्रियों के साथ हैं और कुछ स्त्रियों से बिछुड़े हुए हैं। उनमें राज्यविषयक लोभ पैदा हो गया है और पहले हमलोगों के द्वारा राज्य-सुख से वञ्चित किये गये हैं। अतः इस समय उन सबसे हमलोगों को महान् भय प्राप्त हो सकता है’
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alpāntaragatānāṁ tu śrutvā vacanamaṅganā।
ātmanaḥ pratirūpaṁ sā babhāṣe cāruhāsinī॥
अभी थोड़ी ही दूरतक आये हुए उन वानरों की यह बात सुनकर मनोहर हासवाली कल्याणी तारा ने उन्हें अपने अनुरूप उत्तर दिया—
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putreṇa mama kiṁ kāryaṁ rājyenāpi kimātmanā।
kapisiṁhe mahābhāge tasmin bhartari naśyati॥
‘वानरो! जब मेरे महाभाग पतिदेव कपिसिंह वाली ही नष्ट हो रहे हैं, तब मुझे पुत्र से, राज्य से तथा अपने इस जीवन से भी क्या प्रयोजन है?
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pādamūlaṁ gamiṣyāmi tasyaivāhaṁ mahātmanaḥ।
yo'sau rāmaprayuktena śareṇa vinipātitaḥ॥
‘मैं तो, जिन्हें श्रीराम के चलाये हुए बाण ने मार गिराया है, उन महात्मा वाली के चरणों के समीप ही जाऊँगी’
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evamuktvā pradudrāva rudatī śokamūrcchitā।
śiraścoraśca bāhubhyāṁ duḥkhena samabhighnatī॥
ऐसा कहकर शोक से व्याकुल हुई तारा रोती और अपने दोनों हाथों से दुःखपूर्वक सिर एवं छाती पीटती हुई बड़े जोर से दौड़ी
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sā vrajantī dadarśātha patiṁ nipatitaṁ bhuvi।
hantāraṁ dānavendrāṇāṁ samareṣvanivartinām॥
आगे बढ़ती हुई तारा ने देखा, जो युद्ध में कभी पीठ न दिखानेवाले दानवराजों का भी वध करने में समर्थ थे, वे मेरे पति वानरराज वाली पृथ्वी पर पड़े हुए हैं
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kṣeptāraṁ parvatendrāṇāṁ vajrāṇāmiva vāsavam।
mahāvātasamāviṣṭaṁ mahāmeghaughaniḥsvanam॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
śakratulyaparākrāntaṁ vṛṣṭvevoparataṁ ghanam।
nardantaṁ nardatāṁ bhīmaṁ śūraṁ śūreṇa pātitam।
śārdūlenāmiṣasyārthe mṛgarājamivāhatam॥
वज्र चलानेवाले इन्द्र के समान जो रणभूमि में बड़े-बड़े पर्वतों को उठाकर फेंकते थे, जिनके वेग में प्रचण्ड आँधी का समावेश था, जिनका सिंहनाद महान् मेघों की गम्भीर गर्जना को भी तिरस्कृत कर देता था तथा जो इन्द्र के तुल्य पराक्रमी थे, वे ही इस समय वर्षा करके शान्त हुए बादल के समान चेष्टा से विरत हो गये हैं। जो स्वयं गर्जना करके गर्जनेवाले वीरों के मन में भय उत्पन्न कर देते थे, वे शूरवीर वाली एक दूसरे शूरवीर के द्वारा मार गिराये गये हैं। जैसे मांस के लिये एक सिंह ने दूसरे सिंह को मार डाला हो, उसी प्रकार राज्य के लिये अपने भाई के द्वारा ही इनका वध किया गया है
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arcitaṁ sarvalokasya sapatākaṁ savedikam।
nāgahetoḥ suparṇena caityamunmathitaṁ yathā॥
जो सब लोगों के द्वारा पूजित हो, जहाँ पताका फहरायी गयी हो तथा जिसके पास देवता की वेदी शोभा पाती हो, उस चैत्य वृक्ष या देवालय को वहाँ छिपे हुए किसी नाग को पकड़ने के लिये यदि गरुड़ ने मथ डाला हो—नष्ट-भ्रष्ट कर दिया हो तो उसकी जैसी दुरवस्था देखी जाती है, वैसी ही दशा आज वाली की हो रही है (यह सब तारा ने देखा)
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avaṣṭabhyāvatiṣṭhantaṁ dadarśa dhanurūrjitam।
rāmaṁ rāmānujaṁ caiva bhartuścaiva tathānujam॥
आगे जाने पर उसने देखा, अपने तेजस्वी धनुष को धरती पर टेककर उसके सहारे श्रीरामचन्द्रजी खड़े हैं। साथ ही उनके छोटे भाई लक्ष्मण हैं और वहीं पति के छोटे भाई सुग्रीव भी मौजूद हैं
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tānatītya samāsādya bhartāraṁ nihataṁ raṇe।
samīkṣya vyathitā bhūmau sambhrāntā nipapāta ha॥
उन सबको पार करके वह रणभूमि में घायल पड़े हुए अपने पति के पास पहुँची। उन्हें देखकर उसके मन में बड़ी व्यथा हुई और वह अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी
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suteva punarutthāya āryaputreti vādinī।
ruroda sā patiṁ dṛṣṭvā saṁvītaṁ mṛtyudāmabhiḥ॥
फिर मानो वह सोकर उठी हो, इस प्रकार ‘हा आर्यपुत्र!’ कहकर मृत्युपाश से बँधे हुए पति की ओर देखती हुई रोने लगी
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tāmavekṣya tu sugrīvaḥ krośantīṁ kurarīmiva।
viṣādamagamat kaṣṭaṁ dṛṣṭvā cāṅgadamāgatam॥
उस समय कुररी के समान करुण क्रन्दन करती हुई तारा तथा उसके साथ आये हुए अङ्गद को देखकर सुग्रीव को बड़ा कष्ट हुआ। वे विषाद में डूब गये
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकोनविंशः सर्गः॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १९ ॥