वाल्मीकि रामायणम् · किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

किष्किन्धाकाण्डम्Kiṣkindhā Kāṇḍa

सर्गः १७ · ५४ श्लोकाःSarga 17 · 54 ślokas

वालीका श्रीरामचन्द्रजीको फटकारना

॥ ४ · १७ · १ ॥
ततः शरेणाभिहतो रामेण रणकर्कशः। पपात सहसा वाली निकृत्त इव पादपः॥

tataḥ śareṇābhihato rāmeṇa raṇakarkaśaḥ।
papāta sahasā vālī nikṛtta iva pādapaḥ॥

युद्ध में कठोरता दिखानेवाला वाली श्रीराम के बाण से घायल हो कटे वृक्ष की भाँति सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ा

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · २ ॥
भूमौ न्यस्तसर्वाङ्गस्तप्तकाञ्चनभूषणः। अपतद् देवराजस्य मुक्तरश्मिरिव ध्वजः॥

sa bhūmau nyastasarvāṅgastaptakāñcanabhūṣaṇaḥ।
apatad devarājasya muktaraśmiriva dhvajaḥ॥

उसका सारा शरीर पृथ्वी पर पड़ा हुआ था। तपाये हुए सुवर्ण के आभूषण अब भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह देवराज इन्द्र के बन्धनरहित ध्वज की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा था

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ३ ॥
अस्मिन् निपतिते भूमौ हर्यृक्षाणां गणेश्वरे। नष्टचन्द्रमिव व्योम व्यराजत मेदिनी॥

asmin nipatite bhūmau haryṛkṣāṇāṁ gaṇeśvare।
naṣṭacandramiva vyoma na vyarājata medinī॥

वानरों और भालुओं के यूथपति वाली के धराशायी हो जाने पर यह पृथ्वी चन्द्ररहित आकाश की भाँति शोभाहीन हो गयी

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ४ ॥
भूमौ निपतितस्यापि तस्य देहं महात्मनः। श्रीर्जहाति प्राणा तेजो पराक्रमः॥

bhūmau nipatitasyāpi tasya dehaṁ mahātmanaḥ।
na śrīrjahāti na prāṇā na tejo na parākramaḥ॥

पृथ्वी पर पड़े होने पर भी महामना वाली के शरीर को शोभा, प्राण, तेज और पराक्रम नहीं छोड़ सके थे

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ५ ॥
शक्रदत्ता वरा माला काञ्चनी रत्नभूषिता। दधार हरिमुख्यस्य प्राणांस्तेजः श्रियं सा॥

śakradattā varā mālā kāñcanī ratnabhūṣitā।
dadhāra harimukhyasya prāṇāṁstejaḥ śriyaṁ ca sā॥

इन्द्र की दी हुई रत्नजटित श्रेष्ठ सुवर्णमाला उस वानरराज के प्राण, तेज और शोभा को धारण किये हुए थी

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ६ ॥
तया मालया वीरो हैमया हरियूथपः। संध्यानुगतपर्यन्तः पयोधर इवाभवत्॥

sa tayā mālayā vīro haimayā hariyūthapaḥ।
saṁdhyānugataparyantaḥ payodhara ivābhavat॥

उस सुवर्णमाला से विभूषित हुआ वानरयूथपति वीर वाली संध्या की लाली से रँगे हुए प्रान्त भागवाले मेघखण्ड के समान शोभा पा रहा था

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ७ ॥
तस्य माला देहश्च मर्मघाती यः शरः। त्रिधेव रचिता लक्ष्मीः पतितस्यापि शोभते॥

tasya mālā ca dehaśca marmaghātī ca yaḥ śaraḥ।
tridheva racitā lakṣmīḥ patitasyāpi śobhate॥

पृथ्वी पर गिरे होने पर भी वाली की वह सुवर्णमाला, उसका शरीर तथा मर्मस्थल को विदीर्ण करनेवाला वह बाण—ये तीनों पृथक्-पृथक् तीन भागों में विभक्त की हुई अङ्गलक्ष्मी के समान शोभा पा रहे थे

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ८ ॥
तदस्त्रं तस्य वीरस्य स्वर्गमार्गप्रभावनम्। रामबाणासनक्षिप्तमावहत् परमां गतिम्॥

tadastraṁ tasya vīrasya svargamārgaprabhāvanam।
rāmabāṇāsanakṣiptamāvahat paramāṁ gatim॥

वीरवर श्रीराम के धनुष से चलाये गये उस अस्त्र ने वाली के लिये स्वर्ग का मार्ग प्रकाशित कर दिया और उसे परमपद को पहुँचा दिया

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ९ ॥
तं तथा पतितं संख्ये गतार्चिषमिवानलम्। ययातिमिव पुण्यान्ते देवलोकादिह च्युतम्॥

taṁ tathā patitaṁ saṁkhye gatārciṣamivānalam।
yayātimiva puṇyānte devalokādiha cyutam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · १७ · १० ॥
आदित्यमिव कालेन युगान्ते भुवि पातितम्। महेन्द्रमिव दुर्धर्षमुपेन्द्रमिव दुःसहम्॥

ādityamiva kālena yugānte bhuvi pātitam।
mahendramiva durdharṣamupendramiva duḥsaham॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · १७ · ११ ॥
महेन्द्रपुत्रं पतितं वालिनं हेममालिनम्। व्यूढोरस्कं महाबाहुं दीप्तास्यं हरिलोचनम्॥

mahendraputraṁ patitaṁ vālinaṁ hemamālinam।
vyūḍhoraskaṁ mahābāhuṁ dīptāsyaṁ harilocanam॥

॥ ९–११ ॥

इस प्रकार युद्धस्थल में गिरा हुआ इन्द्रपुत्र वाली ज्वालारहित अग्नि के समान, पुण्यों का क्षय होने पर पुण्यलोक से इस पृथ्वी पर गिरे हुए राजा ययाति के समान तथा महाप्रलय के समय कालद्वारा पृथ्वी पर गिराये गये सूर्य के समान जान पड़ता था। उसके गले में सोने की माला शोभा दे रही थी। वह महेन्द्र के समान दुर्जय और भगवान् विष्णु के समान दुस्सह था। उसकी छाती चौड़ी, भुजाएँ बड़ी-बड़ी, मुख दीप्तिमान् और नेत्र कपिलवर्ण के थे

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · १२ ॥
लक्ष्मणानुचरो रामो ददर्शोपससर्प च। तं तथा पतितं वीरं गतार्चिषमिवानलम्॥

lakṣmaṇānucaro rāmo dadarśopasasarpa ca।
taṁ tathā patitaṁ vīraṁ gatārciṣamivānalam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · १७ · १३ ॥
बहुमान्य तं वीरं वीक्षमाणं शनैरिव। उपयातौ महावीर्यौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥

bahumānya ca taṁ vīraṁ vīkṣamāṇaṁ śanairiva।
upayātau mahāvīryau bhrātarau rāmalakṣmaṇau॥

॥ १२–१३ ॥

लक्ष्मण को साथ लिये श्रीराम ने वाली को इस अवस्था में देखा और वे उसके समीप गये। इस प्रकार ज्वालारहित अग्नि की भाँति वहाँ गिरा हुआ वह वीर धीरे-धीरे देख रहा था। महापराक्रमी दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उस वीर का विशेष सम्मान करते हुए उसके पास गये

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · १४ ॥
तं दृष्ट्वा राघवं वाली लक्ष्मणं महाबलम्। अब्रवीत् परुषं वाक्यं प्रश्रितं धर्मसंहितम्॥

taṁ dṛṣṭvā rāghavaṁ vālī lakṣmaṇaṁ ca mahābalam।
abravīt paruṣaṁ vākyaṁ praśritaṁ dharmasaṁhitam॥

उन श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण को देखकर वाली धर्म और विनय से युक्त कठोर वाणी में बोला—

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · १५ ॥
भूमावल्पतेजोऽसुर्निहतो नष्टचेतनः। अर्थसंहितया वाचा गर्वितं रणगर्वितम्॥

sa bhūmāvalpatejo'surnihato naṣṭacetanaḥ।
arthasaṁhitayā vācā garvitaṁ raṇagarvitam॥

अब उसमें तेज और प्राण स्वल्पमात्रा में ही रह गये थे। वह बाण से घायल होकर पृथ्वी पर पड़ा था और उसकी चेष्टा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही थी। उसने युद्ध में गर्वयुक्त पराक्रम प्रकट करनेवाले गर्वीले श्रीराम से कठोर वाणी में इस प्रकार कहना आरम्भ किया—

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · १६ ॥
त्वं नराधिपतेः पुत्रः प्रथितः प्रियदर्शनः। पराङ्मुखवधं कृत्वा कोऽत्र प्राप्तस्त्वया गुणः। यदहं युद्धसंरब्धस्त्वत्कृते निधनं गतः॥

tvaṁ narādhipateḥ putraḥ prathitaḥ priyadarśanaḥ।
parāṅmukhavadhaṁ kṛtvā ko'tra prāptastvayā guṇaḥ।
yadahaṁ yuddhasaṁrabdhastvatkṛte nidhanaṁ gataḥ॥

‘रघुनन्दन! आप राजा दशरथ के सुविख्यात पुत्र हैं। आपका दर्शन सबको प्रिय है। मैं आपसे युद्ध करने नहीं आया था। मैं तो दूसरे के साथ युद्ध में उलझा हुआ था। उस दशा में आपने मेरा वध करके यहाँ कौन-सा गुण प्राप्त किया है—किस महान् यश का उपार्जन किया है? क्योंकि मैं युद्ध के लिये दूसरे पर रोष प्रकट कर रहा था, किंतु आपके कारण बीच में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · १७ ॥
कुलीनः सत्त्वसम्पन्नस्तेजस्वी चरितव्रतः। रामः करुणवेदी प्रजानां हिते रतः॥

kulīnaḥ sattvasampannastejasvī caritavrataḥ।
rāmaḥ karuṇavedī ca prajānāṁ ca hite rataḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ४ · १७ · १८ ॥
सानुक्रोशो महोत्साहः समयज्ञो दृढव्रतः। इत्येतत् सर्वभूतानि कथयन्ति यशो भुवि॥

sānukrośo mahotsāhaḥ samayajño dṛḍhavrataḥ।
ityetat sarvabhūtāni kathayanti yaśo bhuvi॥

॥ १७–१८ ॥

इस भूतल पर सब प्राणी आपके यश का वर्णन करते हुए कहते हैं—श्रीरामचन्द्रजी कुलीन, सत्त्वगुणसम्पन्न, तेजस्वी, उत्तम व्रत का आचरण करनेवाले, करुणा का अनुभव करनेवाले, प्रजा के हितैषी, दयालु, महान् उत्साही, समयोचित कार्य एवं सदाचार के ज्ञाता और दृढ्प्रतिज्ञ हैं

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · १९ ॥
दमः शमः क्षमा धर्मो धृतिः सत्यं पराक्रमः। पार्थिवानां गुणा राजन् दण्डश्चाप्यपकारिषु॥

damaḥ śamaḥ kṣamā dharmo dhṛtiḥ satyaṁ parākramaḥ।
pārthivānāṁ guṇā rājan daṇḍaścāpyapakāriṣu॥

‘राजन्! इन्द्रियनिग्रह, मन का संयम, क्षमा, धर्म, धैर्य, सत्य, पराक्रम तथा अपराधियों को दण्ड देना—ये राजा के गुण हैं

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · २० ॥
तान् गुणान् सम्प्रधार्याहमग्र्यं चाभिजनं तव। तारया प्रतिषिद्धः सन् सुग्रीवेण समागतः॥

tān guṇān sampradhāryāhamagryaṁ cābhijanaṁ tava।
tārayā pratiṣiddhaḥ san sugrīveṇa samāgataḥ॥

‘मैं आपमें इन सभी सद्गुणों का विश्वास करके आपके उत्तम कुल को यादकर तारा के मना करने पर भी सुग्रीव के साथ लड़ने आ गया

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · २१ ॥
मामन्येन संरब्धं प्रमत्तं वेद्धुमर्हसि। इति मे बुद्धिरुत्पन्ना बभूवादर्शने तव॥

na māmanyena saṁrabdhaṁ pramattaṁ veddhumarhasi।
iti me buddhirutpannā babhūvādarśane tava॥

जबतक मैंने आपको नहीं देखा था, तबतक मेरे मन में यही विचार उठता था कि दूसरे के साथ रोषपूर्वक जुझते हुए मुझको आप असावधान अवस्था में अपने बाण से बेधना उचित नहीं समझेंगे

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · २२ ॥
त्वां विनिहतात्मानं धर्मध्वजमधार्मिकम्। जाने पापसमाचारं तृणैः कूपमिवावृतम्॥

sa tvāṁ vinihatātmānaṁ dharmadhvajamadhārmikam।
jāne pāpasamācāraṁ tṛṇaiḥ kūpamivāvṛtam॥

‘परंतु आज मुझे मालूम हुआ कि आपकी बुद्धि मारी गयी है। आप धर्मध्वजी हैं। दिखावे के लिये धर्म का चोला पहने हुए हैं। वास्तव में अधर्मी हैं। आपका आचार-व्यवहार पापपूर्ण है। आप घास-फूस से ढके हुए कूप के समान धोखा देनेवाले हैं

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · २३ ॥
सतां वेषधरं पापं प्रच्छन्नमिव पावकम्। नाहं त्वामभिजानामि धर्मच्छद्माभिसंवृतम्॥

satāṁ veṣadharaṁ pāpaṁ pracchannamiva pāvakam।
nāhaṁ tvāmabhijānāmi dharmacchadmābhisaṁvṛtam॥

‘आपने साधु पुरुषों का-सा वेश धारण कर रखा है; परंतु हैं पापी। राख से ढकी हुई आग के समान आपका असली रूप साधु-वेष में छिप गया है। मैं नहीं जानता था कि आपने लोगों को छलने के लिये ही धर्म की आड़ ली है

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · २४ ॥
विषये वा पुरे वा ते यदा पापं करोम्यहम्। त्वामवजानेऽहं कस्मात् तं हंस्यकिल्बिषम्॥

viṣaye vā pure vā te yadā pāpaṁ karomyaham।
na ca tvāmavajāne'haṁ kasmāt taṁ haṁsyakilbiṣam॥

‘जब मैं आपके राज्य या नगर में कोई उपद्रव नहीं कर रहा था तथा आपका भी तिरस्कार नहीं करता था, तब आपने मुझ निरपराध को क्यों मारा?

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · २५ ॥
फलमूलाशनं नित्यं वानरं वनगोचरम्। मामिहाप्रतियुध्यन्तमन्येन समागतम्॥

phalamūlāśanaṁ nityaṁ vānaraṁ vanagocaram।
māmihāpratiyudhyantamanyena ca samāgatam॥

‘मैं सदा फल-मूल का भोजन करनेवाला और वन में ही विचरनेवाला वानर हूँ। मैं यहाँ आपसे युद्ध नहीं करता था, दूसरे के साथ मेरी लड़ाई हो रही थी। फिर बिना अपराध के आपने मुझे क्यों मारा?

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · २६ ॥
त्वं नराधिपतेः पुत्रः प्रतीतः प्रियदर्शनः। लिङ्गमप्यस्ति ते राजन् दृश्यते धर्मसंहितम्॥

tvaṁ narādhipateḥ putraḥ pratītaḥ priyadarśanaḥ।
liṅgamapyasti te rājan dṛśyate dharmasaṁhitam॥

‘राजन्! आप एक सम्माननीय नरेश के पुत्र हैं। विश्वास के योग्य हैं और देखने में भी प्रिय हैं। आपमें धर्म का साधनभूत चिह्न (जटा) वल्कल धारण आदि भी प्रत्यक्ष दिखायी देता है

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · २७ ॥
कः क्षत्रियकुले जातः श्रुतवान् नष्टसंशयः। धर्मलिङ्गप्रतिच्छन्नः क्रूरं कर्म समाचरेत्॥

kaḥ kṣatriyakule jātaḥ śrutavān naṣṭasaṁśayaḥ।
dharmaliṅgapraticchannaḥ krūraṁ karma samācaret॥

‘क्षत्रियकुल में उत्पन्न शास्त्र का ज्ञाता, संशयरहित तथा धार्मिक वेश-भूषा से आच्छन्न होकर भी कौन मनुष्य ऐसा क्रूरतापूर्ण कर्म कर सकता है

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · २८ ॥
त्वं राघवकुले जातो धर्मवानिति विश्रुतः। अभव्यो भव्यरूपेण किमर्थं परिधावसे॥

tvaṁ rāghavakule jāto dharmavāniti viśrutaḥ।
abhavyo bhavyarūpeṇa kimarthaṁ paridhāvase॥

‘महाराज! रघु के कुल में आपका प्रादुर्भाव हुआ है। आप धर्मात्मा के रूप में प्रसिद्ध हैं तो भी इतने अभव्य (क्रूर) निकले! यदि यही आपका असली रूप है तो फिर किसलिये ऊपर से भव्य (विनीत एवं दयालु) साधु पुरुष का-सा रूप धारण करके चारों ओर दौड़ते-फिरते हैं?

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · २९ ॥
साम दानं क्षमा धर्मः सत्यं धृतिपराक्रमौ। पार्थिवानां गुणा राजन् दण्डश्चाप्यपकारिषु॥

sāma dānaṁ kṣamā dharmaḥ satyaṁ dhṛtiparākramau।
pārthivānāṁ guṇā rājan daṇḍaścāpyapakāriṣu॥

‘राजन्! साम, दान, क्षमा, धर्म, सत्य, धृति, पराक्रम और अपराधियों को दण्ड देना—ये भूपालों के गुण हैं

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ३० ॥
वयं वनचरा राम मृगा मूलफलाशिनः। एषा प्रकृतिरस्माकं पुरुषस्त्वं नरेश्वर॥

vayaṁ vanacarā rāma mṛgā mūlaphalāśinaḥ।
eṣā prakṛtirasmākaṁ puruṣastvaṁ nareśvara॥

‘नरेश्वर राम! हम फल-मूल खानेवाले वनचारी मृग हैं। यही हमारी प्रकृति है; किंतु आप तो पुरुष (मनुष्य) हैं (अतः हमारे और आपमें वैर का कोई कारण नहीं है)

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ३१ ॥
भूमिर्हिरण्यं रूपं विग्रहे कारणानि च। तत्र कस्ते वने लोभो मदीयेषु फलेषु वा॥

bhūmirhiraṇyaṁ rūpaṁ ca vigrahe kāraṇāni ca।
tatra kaste vane lobho madīyeṣu phaleṣu vā॥

‘पृथ्वी, सोना और चाँदी—इन्हीं वस्तुओं के लिये राजाओं में परस्पर युद्ध होते हैं। ये ही तीन कलह के मूल कारण हैं। परंतु यहाँ वे भी नहीं हैं। इस दिशा में इस वन में या हमारे फलों में आपका क्या लोभ हो सकता है

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ३२ ॥
नयश्च विनयश्चोभौ निग्रहानुग्रहावपि। राजवृत्तिरसंकीर्णा नृपाः कामवृत्तयः॥

nayaśca vinayaścobhau nigrahānugrahāvapi।
rājavṛttirasaṁkīrṇā na nṛpāḥ kāmavṛttayaḥ॥

‘नीति और विनय, दण्ड और अनुग्रह—ये राजधर्म हैं, किंतु इनके उपयोग के भिन्न-भिन्न अवसर हैं (इनका अविवेकपूर्वक उपयोग करना उचित नहीं है)। राजाओं को स्वेच्छाचारी नहीं होना चाहिये

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ३३ ॥
त्वं तु कामप्रधानश्च कोपनश्चानवस्थितः। राजवृत्तेषु संकीर्णः शरासनपरायणः॥

tvaṁ tu kāmapradhānaśca kopanaścānavasthitaḥ।
rājavṛtteṣu saṁkīrṇaḥ śarāsanaparāyaṇaḥ॥

‘परंतु आप तो काम के गुलाम, क्रोधी और मर्यादा में स्थित न रहनेवाले—चञ्चल हैं। नय-विनय आदि जो राजाओं के धर्म हैं, उनके अवसर का विचार किये बिना ही किसी का कहीं भी प्रयोग कर देते हैं। जहाँ कहीं भी बाण चलाते-फिरते हैं

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ३४ ॥
तेऽस्त्यपचितिर्धर्मे नार्थे बुद्धिरवस्थिता। इन्द्रियैः कामवृत्तः सन् कृष्यसे मनुजेश्वर॥

na te'styapacitirdharme nārthe buddhiravasthitā।
indriyaiḥ kāmavṛttaḥ san kṛṣyase manujeśvara॥

‘आपका धर्म के विषय में आदर नहीं है और न अर्थसाधन में ही आपकी बुद्धि स्थिर है। नरेश्वर! आप स्वेच्छाचारी हैं। इसलिये आपकी इन्द्रियाँ आपको कहीं भी खींच ले जाती हैं

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ३५ ॥
हत्वा बाणेन काकुत्स्थ मामिहानपराधिनम्। किं वक्ष्यसि सतां मध्ये कर्म कृत्वा जुगुप्सितम्॥

hatvā bāṇena kākutstha māmihānaparādhinam।
kiṁ vakṣyasi satāṁ madhye karma kṛtvā jugupsitam॥

‘काकुत्स्थ! मैं सर्वथा निरपराध था तो भी यहाँ मुझे बाण से मारने का घृणित कर्म करके सत्पुरुषों के बीच में आप क्या कहेंगे

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ३६ ॥
राजहा ब्रह्महा गोघ्नश्चोरः प्राणिवधे रतः। नास्तिकः परिवेत्ता सर्वे निरयगामिनः॥

rājahā brahmahā goghnaścoraḥ prāṇivadhe rataḥ।
nāstikaḥ parivettā ca sarve nirayagāminaḥ॥

‘राजा का वध करनेवाला, ब्रह्म-हत्यारा, गोघाती, चोर, प्राणियों की हिंसा में तत्पर रहनेवाला, नास्तिक और परिवेत्ता (बड़े भाई के अविवाहित रहते अपना विवाह करनेवाला छोटा भाई) ये सब-के-सब नरकगामी होते हैं

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ३७ ॥
सूचकश्च कदर्यश्च मित्रघ्नो गुरुतल्पगः। लोकं पापात्मनामेते गच्छन्ते नात्र संशयः॥

sūcakaśca kadaryaśca mitraghno gurutalpagaḥ।
lokaṁ pāpātmanāmete gacchante nātra saṁśayaḥ॥

‘चुगली खानेवाला, लोभी, मित्र-हत्यारा तथा गुरुपत्नीगामी—ये पापात्माओं के लोक में जाते हैं—इसमें संशय नहीं है

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ३८ ॥
अधार्यं चर्म मे सद्भी रोमाण्यस्थि वर्जितम्। अभक्ष्याणि मांसानि त्वद्विधैर्धर्मचारिभिः॥

adhāryaṁ carma me sadbhī romāṇyasthi ca varjitam।
abhakṣyāṇi ca māṁsāni tvadvidhairdharmacāribhiḥ॥

‘हम वानरों का चमड़ा भी तो सत्पुरुषों के धारण करने-योग्य नहीं होता। हमारे रोम और हड्डियाँ भी वर्जित हैं (छूने-योग्य नहीं हैं। आप-जैसे धर्माचारी पुरुषों के लिये मांस तो सदा ही अभक्ष्य है; फिर किस लोभ से आपने मुझ वानर को अपने बाणों का शिकार बनाया है?)

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ३९ ॥
पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या ब्रह्मक्षत्रेण राघव। शल्यकः श्वाविधो गोधा शशः कूर्मश्च पञ्चमः॥

pañca pañcanakhā bhakṣyā brahmakṣatreṇa rāghava।
śalyakaḥ śvāvidho godhā śaśaḥ kūrmaśca pañcamaḥ॥

‘रघुनन्दन! त्रैवर्णिकों में जिनकी किसी कारण से मांसाहार (जैसे निन्दनीय कर्म) में प्रवृत्ति हो गयी है, उनके लिये भी पाँच नखवाले जीवों में से पाँच ही भक्षण के योग्य बताये गये हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—गेंडा, साही, गोह, खरहा और पाँचवाँ कछुआ

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ४० ॥
चर्म चास्थि मे राम स्पृशन्ति मनीषिणः। अभक्ष्याणि मांसानि सोऽहं पञ्चनखो हतः॥

carma cāsthi ca me rāma na spṛśanti manīṣiṇaḥ।
abhakṣyāṇi ca māṁsāni so'haṁ pañcanakho hataḥ॥

‘श्रीराम! मनीषी पुरुष मेरे (वानर के) चमड़े और हड्डी का स्पर्श नहीं करते हैं। वानर के मांस भी सभी के लिये अभक्ष्य होते हैं। इस तरह जिसका सब कुछ निषिद्ध है, ऐसा पाँच नखवाला मैं आज आपके हाथ से मारा गया हूँ

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ४१ ॥
तारया वाक्यमुक्तोऽहं सत्यं सर्वज्ञया हितम्। तदतिक्रम्य मोहेन कालस्य वशमागतः॥

tārayā vākyamukto'haṁ satyaṁ sarvajñayā hitam।
tadatikramya mohena kālasya vaśamāgataḥ॥

‘मेरी स्त्री तारा सर्वज्ञ है। उसने मुझे सत्य और हित की बात बतायी थी। किंतु मोहवश उसका उल्लङ्घन करके मैं काल के अधीन हो गया

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ४२ ॥
त्वया नाथेन काकुत्स्थ सनाथा वसुंधरा। प्रमदा शीलसम्पूर्णा पत्येव विधर्मणा॥

tvayā nāthena kākutstha na sanāthā vasuṁdharā।
pramadā śīlasampūrṇā patyeva ca vidharmaṇā॥

‘काकुत्स्थ! जैसे सुशीला युवती पापात्मा पति से सुरक्षित नहीं हो पाती, उसी प्रकार आप-जैसे स्वामी को पाकर यह वसुधा सनाथ नहीं हो सकती

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ४३ ॥
शठो नैकृतिकः क्षुद्रो मिथ्याप्रश्रितमानसः। कथं दशरथेन त्वं जातः पापो महात्मना॥

śaṭho naikṛtikaḥ kṣudro mithyāpraśritamānasaḥ।
kathaṁ daśarathena tvaṁ jātaḥ pāpo mahātmanā॥

‘आप शठ (छिपे रहकर दूसरों का अप्रिय करनेवाले), अपकारी, क्षुद्र और झूठे ही शान्तचित्त बने रहनेवाले हैं। महात्मा राजा दशरथ ने आप-जैसे पापी को कैसे उत्पन्न किया

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ४४ ॥
छिन्नचारित्र्यकक्ष्येण सतां धर्मातिवर्तिना। त्यक्तधर्माङ्कुशेनाहं निहतो रामहस्तिना॥

chinnacāritryakakṣyeṇa satāṁ dharmātivartinā।
tyaktadharmāṅkuśenāhaṁ nihato rāmahastinā॥

‘हाय! जिसने सदाचार का रस्सा तोड़ डाला है, सत्पुरुषों के धर्म एवं मर्यादा का उल्लङ्घन किया है तथा जिसने धर्मरूपी अङ्कुश की भी अवहेलना कर दी है, उस रामरूपी हाथी के द्वारा आज मैं मारा गया

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ४५ ॥
अशुभं चाप्ययुक्तं सतां चैव विगर्हितम्। वक्ष्यसे चेदृशं कृत्वा सद्भिः सह समागतः॥

aśubhaṁ cāpyayuktaṁ ca satāṁ caiva vigarhitam।
vakṣyase cedṛśaṁ kṛtvā sadbhiḥ saha samāgataḥ॥

‘ऐसा अशुभ, अनुचित और सत्पुरुषोंद्वारा निन्दित कर्म करके आप श्रेष्ठ पुरुषों से मिलने पर उनके सामने क्या कहेंगे

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ४६ ॥
उदासीनेषु योऽस्मासु विक्रमोऽयं प्रकाशितः। अपकारिषु ते राम नैवं पश्यामि विक्रमम्॥

udāsīneṣu yo'smāsu vikramo'yaṁ prakāśitaḥ।
apakāriṣu te rāma naivaṁ paśyāmi vikramam॥

‘श्रीराम! हम उदासीन प्राणियों पर आपने जो यह पराक्रम प्रकट किया है, ऐसा बल-पराक्रम आप अपना अपकार करनेवालों पर प्रकट कर रहे हों, ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ४७ ॥
दृश्यमानस्तु युध्येथा मया युधि नृपात्मज। अद्य वैवस्वतं देवं पश्येस्त्वं निहतो मया॥

dṛśyamānastu yudhyethā mayā yudhi nṛpātmaja।
adya vaivasvataṁ devaṁ paśyestvaṁ nihato mayā॥

‘राजकुमार! यदि आप युद्धस्थल में मेरी दृष्टि के सामने आकर मेरे साथ युद्ध करते तो आज मेरे द्वारा मारे जाकर सूर्यपुत्र यम देवता का दर्शन करते होते

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ४८ ॥
त्वयादृश्येन तु रणे निहतोऽहं दुरासदः। प्रसुप्तः पन्नगेनैव नरः पापवशं गतः॥

tvayādṛśyena tu raṇe nihato'haṁ durāsadaḥ।
prasuptaḥ pannagenaiva naraḥ pāpavaśaṁ gataḥ॥

‘जैसे किसी सोये हुए पुरुष को साँप आकर डँस ले और वह मर जाय उसी प्रकार रणभूमि में मुझ दुर्जय वीर को आपने छिपे रहकर मारा है तथा ऐसा करके आप पाप के भागी हुए हैं

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ४९ ॥
सुग्रीवप्रियकामेन यदहं निहतस्त्वया। मामेव यदि पूर्वं त्वमेतदर्थमचोदयः। मैथिलीमहमेकाह्ना तव चानीतवान् भवेः॥

sugrīvapriyakāmena yadahaṁ nihatastvayā।
māmeva yadi pūrvaṁ tvametadarthamacodayaḥ।
maithilīmahamekāhnā tava cānītavān bhaveḥ॥

‘जिस उद्देश्य को लेकर सुग्रीव का प्रिय करने की कामना से आपने मेरा वध किया है, उसी उद्देश्य की सिद्धि के लिये यदि आपने पहले मुझसे ही कहा होता तो मैं मिथिलेशकुमारी जानकी को एक ही दिन में ढूँढ़कर आपके पास ला देता

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ५० ॥
राक्षसं दुरात्मानं तव भार्यापहारिणम्। कण्ठे बद्ध्वा प्रदद्यां तेऽनिहतं रावणं रणे॥

rākṣasaṁ ca durātmānaṁ tava bhāryāpahāriṇam।
kaṇṭhe baddhvā pradadyāṁ te'nihataṁ rāvaṇaṁ raṇe॥

‘आपकी पत्नी का अपहरण करनेवाले दुरात्मा राक्षस रावण को मैं युद्ध में मारे बिना ही उसके गले में रस्सी बाँधकर पकड़ लाता और उसे आपके हवाले कर देता

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ५१ ॥
न्यस्तां सागरतोये वा पाताले वापि मैथिलीम्। आनयेयं तवादेशाच्छ्वेतामश्वतरीमिव॥

nyastāṁ sāgaratoye vā pātāle vāpi maithilīm।
ānayeyaṁ tavādeśācchvetāmaśvatarīmiva॥

‘जैसे मधुकैटभद्वारा अपहृत हुई श्वेताश्वतरी श्रुति का भगवान् हयग्रीव ने उद्धार किया था, उसी प्रकार मैं आपके आदेश से मिथिलेशकुमारी सीता को यदि वे समुद्र के जल में या पाताल में रखी गयी होती तो भी वहाँ से ला देता

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ५२ ॥
युक्तं यत्प्राप्नुयाद् राज्यं सुग्रीवः स्वर्गते मयि। अयुक्तं यदधर्मेण त्वयाहं निहतो रणे॥

yuktaṁ yatprāpnuyād rājyaṁ sugrīvaḥ svargate mayi।
ayuktaṁ yadadharmeṇa tvayāhaṁ nihato raṇe॥

‘मेरे स्वर्गवासी हो जाने पर सुग्रीव जो यह राज्य प्राप्त करेंगे, वह तो उचित ही है। अनुचित इतना ही हुआ है कि आपने मुझे रणभूमि में अधर्मपूर्वक मारा है

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ५३ ॥
काममेवंविधो लोकः कालेन विनियुज्यते। क्षमं चेद्भवता प्राप्तमुत्तरं साधु चिन्त्यताम्॥

kāmamevaṁvidho lokaḥ kālena viniyujyate।
kṣamaṁ cedbhavatā prāptamuttaraṁ sādhu cintyatām॥

‘यह जगत् कभी-न-कभी काल के अधीन होता ही है। इसका ऐसा स्वभाव ही है। अतः भले ही मेरी मृत्यु हो जाय, इसके लिये मुझे खेद नहीं है। परंतु मेरे इस तरह मारे जाने का यदि आपने उचित उत्तर ढूँढ़ निकाला हो तो उसे अच्छी तरह सोच-विचारकर कहिये’

English translation coming soon.

॥ ४ · १७ · ५४ ॥
इत्येवमुक्त्वा परिशुष्कवक्त्रः शराभिघाताद् व्यथितो महात्मा। समीक्ष्य रामं रविसंनिकाशं तूष्णीं बभौ वानरराजसूनुः॥

ityevamuktvā pariśuṣkavaktraḥ
śarābhighātād vyathito mahātmā।
samīkṣya rāmaṁ ravisaṁnikāśaṁ
tūṣṇīṁ babhau vānararājasūnuḥ॥

ऐसा कहकर महामनस्वी वानरराजकुमार वाली सूर्य के समान तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी की ओर देखकर चुप हो गया। उसका मुँह सूख गया था और बाण के आघात से उसको बड़ी पीड़ा हो रही थी

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १७ ॥