वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ८ · २० श्लोकाःSarga 8 · 20 ślokas

प्रातःकाल सुतीक्ष्णसे विदा ले श्रीराम, लक्ष्मण, सीताका वहाँसे प्रस्थान

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ८ — painting

॥ ३ · ८ · १६–१७ ॥

प्रभाते सुतीक्ष्णाश्रमे नीलवर्णो रामः स्कन्धे धनुर्निधाय प्राञ्जलिर्मुनिम् आमन्त्रयते, सुतीक्ष्णश्चाशीर्वादाय हस्तम् उन्नमयति, सज्जो वल्कली लक्ष्मणः ससीतः प्रस्थानोन्मुखो, वनपथश्च दूरं प्रसर्पति।

प्रातःकाल सुतीक्ष्ण के आश्रम में नील वर्ण के श्रीराम कंधे पर धनुष रखे हाथ जोड़कर मुनि से विदा माँग रहे हैं; सुतीक्ष्ण आशीर्वाद देने के लिये हाथ उठाते हैं; धनुष-तूणीर बाँधे वल्कलधारी लक्ष्मण प्रस्थान को तैयार खड़े हैं, वनवसना सीता समीप हैं और वन का मार्ग दूर तक फैला है।

In the pale gold light of dawn at Sutikshna's hermitage the blue Ram, his bow on his shoulder, bows in farewell with folded hands, while the sage lifts a hand in blessing; the bark-clad Lakshman, bow and quiver slung, stands ready to set out, gentle Sita waits nearby, and a forest path winds away into the waking wood.

॥ ३ · ८ · १ ॥
रामस्तु सहसौमित्रिः सुतीक्ष्णेनाभिपूजितः। परिणाम्य निशां तत्र प्रभाते प्रत्यबुध्यत

rāmastu sahasaumitriḥ sutīkṣṇenābhipūjitaḥ।
pariṇāmya niśāṁ tatra prabhāte pratyabudhyata ॥

सुतीक्ष्ण के द्वारा भलीभाँति पूजित हो लक्ष्मणसहित श्रीराम उनके आश्रम में ही रात बिताकर प्रातःकाल जाग उठे

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॥ ३ · ८ · २ ॥
उत्थाय यथाकालं राघवः सह सीतया। उपस्पृश्य सुशीतेन तोयेनोत्पलगन्धिना

utthāya ca yathākālaṁ rāghavaḥ saha sītayā।
upaspṛśya suśītena toyenotpalagandhinā ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ८ · ३ ॥
अथ तेऽग्निं सुरांश्चैव वैदेही रामलक्ष्मणौ। काल्यं विधिवदभ्यर्च्य तपस्विशरणे वने

atha te'gniṁ surāṁścaiva vaidehī rāmalakṣmaṇau।
kālyaṁ vidhivadabhyarcya tapasviśaraṇe vane ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ८ · ४ ॥
उदयन्तं दिनकरं दृष्ट्वा विगतकल्मषाः। सुतीक्ष्णमभिगम्येदं श्लक्ष्णं वचनमब्रुवन्

udayantaṁ dinakaraṁ dṛṣṭvā vigatakalmaṣāḥ।
sutīkṣṇamabhigamyedaṁ ślakṣṇaṁ vacanamabruvan ॥

॥ २–४ ॥

सीतासहित श्रीराम और लक्ष्मण ने ठीक समय से उठकर कमल की सुगन्ध से सुवासित परम शीतल जल के द्वारा स्नान किया। तदनन्तर उन तीनों ने ही मिलकर विधिपूर्वक अग्नि और देवताओं की प्रातःकालिक पूजा की। इसके बाद तपस्वीजनों के आश्रयभूत वन में उदित हुए सूर्यदेव का दर्शन करके वे तीनों निष्पाप पथिक सुतीक्ष्ण मुनि के पास गये और यह मधुर वचन बोले—

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॥ ३ · ८ · ५ ॥
सुखोषिताः स्म भगवंस्त्वया पूज्येन पूजिताः। आपृच्छामः प्रयास्यामो मुनयस्त्वरयन्ति नः

sukhoṣitāḥ sma bhagavaṁstvayā pūjyena pūjitāḥ।
āpṛcchāmaḥ prayāsyāmo munayastvarayanti naḥ ॥

‘भगवन्! आपने पूजनीय होकर भी हमलोगों की पूजा की है। हम आपके आश्रम में बड़े सुख से रहे हैं। अब हम यहाँ से जायँगे, इसके लिये आपकी आज्ञा चाहते हैं। ये मुनि हमें चलने के लिये जल्दी मचा रहे हैं

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॥ ३ · ८ · ६ ॥
त्वरामहे वयं द्रष्टुं कृत्स्नमाश्रममण्डलम्। ऋषीणां पुण्यशीलानां दण्डकारण्यवासिनाम्

tvarāmahe vayaṁ draṣṭuṁ kṛtsnamāśramamaṇḍalam।
ṛṣīṇāṁ puṇyaśīlānāṁ daṇḍakāraṇyavāsinām ॥

‘हमलोग दण्डकारण्य में निवास करनेवाले पुण्यात्मा ऋषियों के सम्पूर्ण आश्रममण्डल का दर्शन करने के लिये उतावले हो रहे हैं

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॥ ३ · ८ · ७ ॥
अभ्यनुज्ञातुमिच्छामः सहैभिर्मुनिपुंगवैः। धर्मनित्यैस्तपोदान्तैर्विशिखैरिव पावकैः

abhyanujñātumicchāmaḥ sahaibhirmunipuṁgavaiḥ।
dharmanityaistapodāntairviśikhairiva pāvakaiḥ ॥

‘अतः हमारी इच्छा है कि आप धूमरहित अग्नि के समान तेजस्वी, तपस्याद्वारा इन्द्रियों को वश में रखनेवाले तथा नित्य-धर्मपरायण इन श्रेष्ठ महर्षियों के साथ यहाँ से जाने के लिये हमें आज्ञा दें

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॥ ३ · ८ · ८ ॥
अविषह्यातपो यावत् सूर्यो नातिविराजते। अमार्गेणागतां लक्ष्मीं प्राप्येवान्वयवर्जितः

aviṣahyātapo yāvat sūryo nātivirājate।
amārgeṇāgatāṁ lakṣmīṁ prāpyevānvayavarjitaḥ ॥

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॥ ३ · ८ · ९ ॥
तावदिच्छामहे गन्तुमित्युक्त्वा चरणौ मुनेः। ववन्दे सहसौमित्रिः सीतया सह राघवः

tāvadicchāmahe gantumityuktvā caraṇau muneḥ।
vavande sahasaumitriḥ sītayā saha rāghavaḥ ॥

॥ ८–९ ॥

‘जैसे अन्याय से आयी हुई सम्पत्ति को पाकर किसी नीच कुल के मनुष्य में असह्य उग्रता आ जाती है, उसी प्रकार यह सूर्यदेव जबतक असह्य ताप देनेवाले होकर प्रचण्ड तेज से प्रकाशित न होने लगें, उसके पहले ही हम यहाँ से चल देना चाहते हैं।’ ऐसा कहकर लक्ष्मण और सीतासहित श्रीराम ने मुनि के चरणों की वन्दना की

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॥ ३ · ८ · १० ॥
तौ संस्पृशन्तौ चरणावुत्थाप्य मुनिपुंगवः। गाढमाश्लिष्य सस्नेहमिदं वचनमब्रवीत्

tau saṁspṛśantau caraṇāvutthāpya munipuṁgavaḥ।
gāḍhamāśliṣya sasnehamidaṁ vacanamabravīt ॥

अपने चरणों का स्पर्श करते हुए श्रीराम और लक्ष्मण को उठाकर मुनिवर सुतीक्ष्ण ने कसकर हृदय से लगा लिया और बड़े स्नेह से इस प्रकार कहा—

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॥ ३ · ८ · ११ ॥
अरिष्टं गच्छ पन्थानं राम सौमित्रिणा सह। सीतया चानया सार्धं छाययेवानुवृत्तया

ariṣṭaṁ gaccha panthānaṁ rāma saumitriṇā saha।
sītayā cānayā sārdhaṁ chāyayevānuvṛttayā ॥

‘श्रीराम! आप छाया की भाँति अनुसरण करनेवाली इस धर्मपत्नी सीता तथा सुमित्राकुमार लक्ष्मण के साथ यात्रा कीजिये। आपका मार्ग विघ्न-बाधाओं से रहित परम मङ्गलमय हो

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॥ ३ · ८ · १२ ॥
पश्याश्रमपदं रम्यं दण्डकारण्यवासिनाम्। एषां तपस्विनां वीर तपसा भावितात्मनाम्

paśyāśramapadaṁ ramyaṁ daṇḍakāraṇyavāsinām।
eṣāṁ tapasvināṁ vīra tapasā bhāvitātmanām ॥

‘वीर! तपस्या से शुद्ध अन्तःकरणवाले दण्डकारण्यवासी इन तपस्वी मुनियों के रमणीय आश्रमों का दर्शन कीजिये

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॥ ३ · ८ · १३ ॥
सुप्राज्यफलमूलानि पुष्पितानि वनानि च। प्रशस्तमृगयूथानि शान्तपक्षिगणानि

suprājyaphalamūlāni puṣpitāni vanāni ca।
praśastamṛgayūthāni śāntapakṣigaṇāni ca ॥

‘इस यात्रा में आप प्रचुर फल-मूलों से युक्त तथा फूलों से सुशोभित अनेक वन देखेंगे; वहाँ उत्तम मृगों के झुंड विचरते होंगे और पक्षी शान्तभाव से रहते होंगे

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॥ ३ · ८ · १४ ॥
फुल्लपङ्कजखण्डानि प्रसन्नसलिलानि च। कारण्डवविकीर्णानि तटाकानि सरांसि

phullapaṅkajakhaṇḍāni prasannasalilāni ca।
kāraṇḍavavikīrṇāni taṭākāni sarāṁsi ca ॥

‘आपको बहुत-से ऐसे तालाब और सरोवर दिखायी देंगे, जिनमें प्रफुल्ल कमलों के समूह शोभा दे रहे होंगे। उनमें स्वच्छ जल भरे होंगे तथा कारण्डव आदि जलपक्षी सब ओर फैल रहे होंगे

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॥ ३ · ८ · १५ ॥
द्रक्ष्यसे दृष्टिरम्याणि गिरिप्रस्रवणानि च। रमणीयान्यरण्यानि मयूराभिरुतानि

drakṣyase dṛṣṭiramyāṇi giriprasravaṇāni ca।
ramaṇīyānyaraṇyāni mayūrābhirutāni ca ॥

‘नेत्रों को रमणीय प्रतीत होनेवाले पहाड़ी झरनों और मोरों की मीठी बोली से गूँजती हुई सुरम्य वनस्थलियों को भी आप देखेंगे

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॥ ३ · ८ · १६ ॥
गम्यतां वत्स सौमित्रे भवानपि गच्छतु। आगन्तव्यं ते दृष्ट्वा पुनरेवाश्रमं प्रति

gamyatāṁ vatsa saumitre bhavānapi ca gacchatu।
āgantavyaṁ ca te dṛṣṭvā punarevāśramaṁ prati ॥

‘श्रीराम! जाइये, वत्स सुमित्राकुमार! तुम भी जाओ। दण्डकारण्य के आश्रमों का दर्शन करके आपलोगों को फिर इसी आश्रम में आ जाना चाहिये’

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॥ ३ · ८ · १७ ॥
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा काकुत्स्थः सहलक्ष्मणः। प्रदक्षिणं मुनिं कृत्वा प्रस्थातुमुपचक्रमे

evamuktastathetyuktvā kākutsthaḥ sahalakṣmaṇaḥ।
pradakṣiṇaṁ muniṁ kṛtvā prasthātumupacakrame ॥

उनके ऐसा कहने पर लक्ष्मणसहित श्रीराम ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर मुनि की परिक्रमा की और वहाँ से प्रस्थान करने की तैयारी की

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॥ ३ · ८ · १८ ॥
ततः शुभतरे तूणी धनुषी चायतेक्षणा। ददौ सीता तयोर्भ्रात्रोः खड्गौ विमलौ ततः

tataḥ śubhatare tūṇī dhanuṣī cāyatekṣaṇā।
dadau sītā tayorbhrātroḥ khaḍgau ca vimalau tataḥ ॥

तदनन्तर विशाल नेत्रोंवाली सीता ने उन दोनों भाइयों के हाथ में दो परम सुन्दर तूणीर, धनुष और चमचमाते हुए खड्ग प्रदान किये

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॥ ३ · ८ · १९ ॥
आबध्य शुभे तूणी चापे चादाय सस्वने। निष्क्रान्तावाश्रमाद् गन्तुमुभौ तौ रामलक्ष्मणौ

ābadhya ca śubhe tūṇī cāpe cādāya sasvane।
niṣkrāntāvāśramād gantumubhau tau rāmalakṣmaṇau ॥

उन सुन्दर तूणीरों को पीठ पर बाँधकर टंकारते हुए धनुषों को हाथ में ले वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण आश्रम से बाहर निकले

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॥ ३ · ८ · २० ॥
शीघ्रं तौ रूपसम्पन्नावनुज्ञातौ महर्षिणा। प्रस्थितौ धृतचापासी सीतया सह राघवौ

śīghraṁ tau rūpasampannāvanujñātau maharṣiṇā।
prasthitau dhṛtacāpāsī sītayā saha rāghavau ॥

वे दोनों रघुवंशी वीर बड़े ही रूपवान् थे, उन्होंने खड्ग और धनुष धारण करके महर्षि की आज्ञा ले सीता के साथ शीघ्र ही वहाँ से प्रस्थान किया

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८ ॥